भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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४२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | स्वेदाध्यायः २३]

पायसैः कृशरैर्मांसरौदनैस्त्रिकठोरकैः । उष्णैः सलवणस्नेहैरम्बरास्तरितैः सुखैः ।।४१।।
किण्ववातसीदधिक्षीरसंयुक्तैः पिण्डकैः कृतैः । स्थानस्वेदनमिच्छन्ति सङ्करस्वेद उच्यते ।।४२।।

सङ्करस्वेद की विधि—लवण एवं स्नेह के सहित उष्ण तथा सुखकारी खीर, कृशरा (यवागू-खिचड़ी), मांस ओदन तथा तीन प्रकार की कठोर वस्तुओं (चरक के स्वेद प्रकरण¹ में, सिकता-बालु, पांशु-धूलि तथा पाषाण-पत्थर का उल्लेख होने से यहाँ भी त्रिकठोर शब्द से वे ही अभिप्रेत प्रतीत होते हैं)—को वस्त्र पर फैलाकर तथा उन्हें किण्व (सुराबीज), अलसी, दही तथा दूध के साथ मिलाकर पिण्ड बनाकर इनके द्वारा स्थानिक स्वेदन (विशेष स्थान का स्वेदन) किया जाता है। इसे सङ्करस्वेद कहते हैं। अर्थात् यह स्वेद सम्पूर्ण स्थान के लिये नहीं है अपितु किसी विशेष अङ्ग के लिये व्यवहृत होता है। चरक सू. अ. १४ में सङ्करस्वेद की निम्न विधि दी है—तत्र वस्त्रान्तरितैरवस्त्रान्तरितैर्वा पिण्डैर्यथोक्तैरुपस्वेदनं सङ्करस्वेद इति विद्यात् । वहीं पिण्ड द्रव्यों का भी उल्लेख किया है—तिलमाषकुलत्थाम्लघृततैलामिषौदनैः । पायसैः कृशरैर्मांसैः पिण्डस्वेदं प्रयोजयेत् ।। गोखरोष्ट्रवराहाश्वशकृद्भिः सतुषैर्यवैः । सिकतापांशुपाषाणकरीषायसपूटकैः ।। श्लैष्मिकान् स्वेदयेत् पूर्वैर्वातिकान् समुपाचरेत् ।। सङ्करस्वेद का ही दूसरा नाम पिण्ड स्वेद भी है। अष्टाङ्गसंग्रह में यह विधि निम्न प्रकार से दी है—तत्र मृत्कपालपाषाणलोष्ट्रलोहपिण्डानग्निवर्णान् संदंशेन गृहीत्वाऽम्लम्भस्यम्ले वा निमज्जयेत् । तैराद्र्राविकवस्त्रेण वेष्टितैः श्लेष्ममेदोभूयिष्ठं सरुजमङ्गं ग्रन्थिंमद्वा स्वेदयेत् । पांशुसिकतागवादिकरीषधान्यबुसपुलाकपलालैर्वाऽम्लोत्क्वथितैः पूर्ववद्वेष्टितैः । गवादिशकृताद्रेण पिण्डीकृतेन वा उपनाहद्रव्योत्कारिकाकृसरमांसपिण्डैर्वा वातरोगेष्विति पिण्डस्वेदः । स एव सङ्कराख्यः ।।

किण्ववातसीदधिक्षीरलवणैः साम्लचिक्कणैः । कुष्ठादिभिश्च सस्नेहैरुपनाहः प्रशस्यते ।।४३।।

किण्व (सुराबीज), अलसी, दही, दूध, सैन्धव, अम्ल (कांजी), कुष्ठ आदि चिकने पदार्थों एवं स्नेह (तिल तैल) इनसे तैयार किया हुआ उपनाह प्रशस्त है।

वक्तव्य— उपनाह से अभिप्राय पुलटिस से है। चरक सू. अ. १४ में इसका निम्न वर्णन मिलता है—गोधूमशकलैश्चूर्णैर्यवानामाम्लसंयुतैः । सस्नेहकिण्वलवणैरुपनाहः प्रशस्यते ।। गन्धैःसुरायाः किण्वेन जीवन्त्या शतपुष्पया । उमया कुष्ठतैलाभ्यां युक्त्या चोपनाहयेत् ।। चर्मभिश्चोपनाह्यव्यः सलोमभिरपूतिभिः । उष्णवीर्यैरलाभे तु कौशेयाविकशाटकैः ।। रात्रौ बद्धं दिवा मुञ्चेन्मुञ्चेद्रात्रौ दिवाकृतम् । विदाहपरिहारार्थं, स्यात्कर्षंस्तु शीतले ।। अर्थात् स्वेद्य स्थान पर उपनाह रखकर ऊपर से किसी वस्त्र की पट्टी अथवा अन्य चमड़े आदि से बांध देना चाहिये जिससे उसकी गर्मी स्थिर रह सके । उपनाह में लगातार अधिक समय तक पट्टी रखने से उस स्थान पर विदाह होने का डर रहता है अतः उसे आवश्यकता के अनुसार खोलकर बदल देना चाहिये।

खराजाविविडालेन(लोन्द्र)द्वीपिंसिंहतरक्षुजैः ।
..................................................... ।।४४।।
..................................................... ।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३८ तमं पत्रम्² ।)

गदहे, भेड़, बकरी, विडाल (वन मार्जार) उन्द्र (कूलचर पशुभेद), चीता, सिंह तथा तरक्षु-भालू के (मांसरसों से सिद्ध द्रव आदियों से अवगाह स्वेद करना चाहिये) ।

(इति ताडपत्रपुस्तके ३९ तमं पत्रम्)


१. चरकीये स्वेदप्रकरणे सिकतापांशुपाषाणेत्युल्लेखदर्शनेनात्रापि त्रिकठोरपदेन तान्येवाभिप्रेतानि स्युः ।।
२. अतः परं ४० तमं पत्रं ताडपत्रपुस्तके त्रुटितम् ।।