काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपकल्पनीयाध्यायः २४] सूत्रस्थानम् ४३
वक्तव्य—यह श्लोक बीच में ही खण्डित हो गया है। पूरा श्लोक न होने से निश्चयपूर्वक यह कहना कठिन है कि इसका क्या अभिप्राय है। फिर भी यह स्वेदों का प्रकरण चल रहा है। इसी अध्याय में पूर्व आठ प्रकार के स्वेद गिनाये गये हैं। उनमें से यहां ६ का वर्णन किया जा चुका है। दो का वर्णन शेष है। इन दोनों में से भी अवगाह स्वेद का क्रम ग्रन्थ में पहले दिया होने से यह संभवतः उसीका वर्णन है। अवगाहन से अभिप्राय कोष्ठ (Tubs) आदि में बैठकर अवगाह द्वारा स्वेदन करने से है। चरक सू. अ. १४ में नाडीस्वेद देने के उपरान्त अवगाहस्वेद की निम्न विधि मिलती है—एत एव च निर्यूहाः प्रयोज्या जलकोष्ठके। स्वेदनार्थं घृतक्षीरतैलकोष्ठांश्च कारयेत् ।। अर्थात् ग्राम्य आनूप मांस आदि, वरुण आदि तथा भूतीक आदि द्रव्यों के क्वाथों को तथा घृत दूध एवं तैल को स्वेदनार्थ अवगाहन के लिये टब में भरकर प्रयोग करें। वहीं पर पुनः कहा है—वातहरोत्क्वाथक्षीरतैलघृतपिशितसोष्णसलिल कोष्ठकावगाहस्तु यथोक्त एव अवगाहः। अष्टाङ्ग संग्रह सू. अ. २६ में भी कहा है—तैरेवाद्भिः पूर्णे महति कटाहे कुण्डे द्रोण्यां वावगाहयेत्। सुश्रुत में इसीका द्रवस्वेद के रूप में वर्णन मिलता है—द्रवस्वेदस्तु वातहरद्रव्यक्वाथपूर्णे कोष्ठे कटाहे द्रोण्यां वावगाह्य स्वेदयेत् । एवं पयोमांसरसयूषतैलधान्याम्लघृतेवसामूत्रेष्ववगाहयेत् । इस उपर्युक्त विधियों के द्वारा अवगाहनस्वेद किया जाता है। अब हम ग्रन्थोक्त अन्तिम परिषेक (स्वेद) का भी अन्य ग्रन्थों के आधार पर वर्णन करते हैं। चरक सू. अ. १४ में इसका निम्न वर्णन मिलता है—वातिकोत्तरवातिकानां पुनर्मूलादीनामुत्क्वाथैः सुखोष्णैः कुम्भीर्वपुलिकाः प्रनाडीर्वा पूरयित्वा यथार्हसिद्धस्ने हाभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं परिषेचयेदिति परिषेकः ।। अर्थात् परिषेक से अभिप्राय जल का सिंचन करने से है। सबसे पूर्व रोगी के शरीर पर यथायोग्य द्रव से सिद्ध तैल आदि की मालिश करनी चाहिये। उसके बाद देह को वस्त्र से ढककर आवश्यकतानुसार ओषधियों के सुखोष्ण क्वाथों से किसी घड़े, फुआरे अथवा Douche को भरकर उसके द्वारा परिषेचन किया जाता है।
इस प्रकार यह स्वेदाध्याय समाप्त होता है।
चतुर्विंशतितमोऽध्यायः
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................................................... प्रोक्तं चिकित्सितम् ।
वक्तव्य—यह उपकल्पनीय अध्याय है। चरक में भी स्नेहन तथा स्वेदन के बाद उपकल्पनीय अध्याय दिया गया है। उसमें बतलाया गया है कि वमन तथा विरेचन कराने के लिये तथा उनसे उत्पन्न होने वाले उपद्रवों की शान्ति के लिये तात्कालोपयोगी कौन २ से द्रव्य तैयार रखने चाहिये। इस संहिता के भी स्नेहाध्याय में कहा है कि स्नेहन के बाद स्वेदन करावे तथा फिर सम्यक् स्निग्ध एवं स्विन्न हो जाने पर संशोधन करना चाहिये। इसलिये स्वेद सम्बन्धी वर्णन के बाद अब संशोधन का प्रकरण ही होना चाहिये। संशोधन से अभिप्राय वमन एवं विरेचन से है। यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित होने से इससे पूर्व का विषय उपलब्ध नहीं है। परन्तु प्रसङ्ग तथा अन्य ग्रन्थों के विषयों को देखते हुये कहा जा सकता है कि इस खण्डित भाग में वमन एवं विरेचन की विधि का ही सम्भवतः वर्णन किया गया होगा। पाठकों के ज्ञान के लिये हम संक्षेप से पहले वमन विधि का यहां वर्णन करेंगे। चरक सू. अ. १५ में कहा है—ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहतमनसम भसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातममुलिप्तगात्रं स्त्रग्वीणमनुपहतवस्त्रसंवीतं देवताग्निद्विजगुरुवृद्धवैद्यानर्चितवन्तम्, इष्टे नक्षत्रतिथिकरणमुहूर्ते कारयित्वा ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भीरभिमन्त्रितां