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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

उपकल्पनीयाध्यायः २४] सूत्रस्थानम् ४३

वक्तव्य—यह श्लोक बीच में ही खण्डित हो गया है। पूरा श्लोक न होने से निश्चयपूर्वक यह कहना कठिन है कि इसका क्या अभिप्राय है। फिर भी यह स्वेदों का प्रकरण चल रहा है। इसी अध्याय में पूर्व आठ प्रकार के स्वेद गिनाये गये हैं। उनमें से यहां ६ का वर्णन किया जा चुका है। दो का वर्णन शेष है। इन दोनों में से भी अवगाह स्वेद का क्रम ग्रन्थ में पहले दिया होने से यह संभवतः उसीका वर्णन है। अवगाहन से अभिप्राय कोष्ठ (Tubs) आदि में बैठकर अवगाह द्वारा स्वेदन करने से है। चरक सू. अ. १४ में नाडीस्वेद देने के उपरान्त अवगाहस्वेद की निम्न विधि मिलती है—एत एव च निर्यूहाः प्रयोज्या जलकोष्ठके। स्वेदनार्थं घृतक्षीरतैलकोष्ठांश्च कारयेत् ।। अर्थात् ग्राम्य आनूप मांस आदि, वरुण आदि तथा भूतीक आदि द्रव्यों के क्वाथों को तथा घृत दूध एवं तैल को स्वेदनार्थ अवगाहन के लिये टब में भरकर प्रयोग करें। वहीं पर पुनः कहा है—वातहरोत्क्वाथक्षीरतैलघृतपिशितसोष्णसलिल कोष्ठकावगाहस्तु यथोक्त एव अवगाहः। अष्टाङ्ग संग्रह सू. अ. २६ में भी कहा है—तैरेवाद्भिः पूर्णे महति कटाहे कुण्डे द्रोण्यां वावगाहयेत्। सुश्रुत में इसीका द्रवस्वेद के रूप में वर्णन मिलता है—द्रवस्वेदस्तु वातहरद्रव्यक्वाथपूर्णे कोष्ठे कटाहे द्रोण्यां वावगाह्य स्वेदयेत् । एवं पयोमांसरसयूषतैलधान्याम्लघृतेवसामूत्रेष्ववगाहयेत् । इस उपर्युक्त विधियों के द्वारा अवगाहनस्वेद किया जाता है। अब हम ग्रन्थोक्त अन्तिम परिषेक (स्वेद) का भी अन्य ग्रन्थों के आधार पर वर्णन करते हैं। चरक सू. अ. १४ में इसका निम्न वर्णन मिलता है—वातिकोत्तरवातिकानां पुनर्मूलादीनामुत्क्वाथैः सुखोष्णैः कुम्भीर्वपुलिकाः प्रनाडीर्वा पूरयित्वा यथार्हसिद्धस्ने हाभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं परिषेचयेदिति परिषेकः ।। अर्थात् परिषेक से अभिप्राय जल का सिंचन करने से है। सबसे पूर्व रोगी के शरीर पर यथायोग्य द्रव से सिद्ध तैल आदि की मालिश करनी चाहिये। उसके बाद देह को वस्त्र से ढककर आवश्यकतानुसार ओषधियों के सुखोष्ण क्वाथों से किसी घड़े, फुआरे अथवा Douche को भरकर उसके द्वारा परिषेचन किया जाता है।

इस प्रकार यह स्वेदाध्याय समाप्त होता है।


चतुर्विंशतितमोऽध्यायः

....................................................................... ।
....................................................................... ।।
................................................... प्रोक्तं चिकित्सितम् ।

वक्तव्य—यह उपकल्पनीय अध्याय है। चरक में भी स्नेहन तथा स्वेदन के बाद उपकल्पनीय अध्याय दिया गया है। उसमें बतलाया गया है कि वमन तथा विरेचन कराने के लिये तथा उनसे उत्पन्न होने वाले उपद्रवों की शान्ति के लिये तात्कालोपयोगी कौन २ से द्रव्य तैयार रखने चाहिये। इस संहिता के भी स्नेहाध्याय में कहा है कि स्नेहन के बाद स्वेदन करावे तथा फिर सम्यक् स्निग्ध एवं स्विन्न हो जाने पर संशोधन करना चाहिये। इसलिये स्वेद सम्बन्धी वर्णन के बाद अब संशोधन का प्रकरण ही होना चाहिये। संशोधन से अभिप्राय वमन एवं विरेचन से है। यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित होने से इससे पूर्व का विषय उपलब्ध नहीं है। परन्तु प्रसङ्ग तथा अन्य ग्रन्थों के विषयों को देखते हुये कहा जा सकता है कि इस खण्डित भाग में वमन एवं विरेचन की विधि का ही सम्भवतः वर्णन किया गया होगा। पाठकों के ज्ञान के लिये हम संक्षेप से पहले वमन विधि का यहां वर्णन करेंगे। चरक सू. अ. १५ में कहा है—ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहतमनसम भसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातममुलिप्तगात्रं स्त्रग्वीणमनुपहतवस्त्रसंवीतं देवताग्निद्विजगुरुवृद्धवैद्यानर्चितवन्तम्, इष्टे नक्षत्रतिथिकरणमुहूर्ते कारयित्वा ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भीरभिमन्त्रितां

४४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्उपकल्पनीयाध्यायः २४]

मधुमधुकसैन्धवफाणितोपहितां मदनफलकषायमात्रां पाययेत्। अर्थात् स्नेहन और स्वेदन कराने के बाद संशोध्य पुरुष को शुभ दिन एवं मुहूर्त में पूर्व रात्रि का भोजन पच जाने पर प्रातः काल मधु, मुलहठी तथा सैन्धव से युक्त मदन फल का कषाय पिलावे। इसमें मधु एवं सैन्धव कफ को पतला करने के लिये मिलाया जाता है। यदि पूर्व रात्रि का भोजन जीर्ण न हुआ हो तो उसे संशोधन न करावें क्योंकि उस अवस्था में संशोधन ओषधि पिलाने से विपरीत प्रभाव होगा। ओषधि पान के बाद थोड़ी देर तक प्रतीक्षा करें। यदि वमन न हो तो अप्रवृत्त दोषों को प्रवृत्त करने के लिये गले में अङ्गुली डालकर वमन कर दे। वमन का अतियोग, हीनयोग अथवा मिथ्यायोग नहीं होना चाहिये।

इसी प्रकार रोगी को यथाविधि विरेचन भी करवा देना चाहिये। संशोधन का विषय चरक सू. अ. १५ में विस्तार से दिया गया है। जिज्ञासु पाठकों को उसे वहीं पर देखना चाहिये।

इस खण्डित अध्याय का प्रारम्भ संशोधित रोगी के पथ्य से है अर्थात् संशोधन के बाद रोगी को क्या पथ्य (भोजन) देना चाहिये तथा किस क्रम से पथ्य की मात्रा धीरे २ बढ़ाकर साधारण भोजन दिया जाना चाहिये इत्यादि विषय का इस अध्याय में वर्णन किया गया है। इस अध्याय के प्रारम्भ में खण्डित अंश में सम्भवतः संशोधन का प्रकरण चल रहा होगा जैसा कि पहले भी कहा गया है। अन्त में वमन एवं विरेचन के अतियोग आदि से जो उपद्रव हो जाते हैं उनकी चिकित्सा का वर्णन किया गया है। वही भाव खण्डित अध्याय के प्रारम्भिक निम्न श्लोकांश से प्रकट होता है (इस प्रकार वमन एवं विरेचन से होने वाले उपद्रवों की) चिकित्सा का वर्णन किया गया है।

अतः पञ्चजनात् कञ्चित्सम्यक्शुद्धं प्रकाङ्क्षितम्। लघुं विशदसर्वाङ्गं प्रसन्नेन्द्रियमिच्छुकम् ।।
सुखाम्बुसिक्तसर्वाङ्गमनुलिप्तं विभूषितम्। कृतपूजानमस्कारं मनोज्ञासनवेश्मगम् ।।
पुराणरक्तशालीनां मण्डपूर्वां सुसाधिताम्। यवागूं त्रिःस्रुतामुष्णां दीपनीयोपसंस्कृताम् ।।
भोजयेद्युक्तलवणां रूक्षां युक्ताशितो भवेत्। भोजनेषु सुहृद्येषु सुधौतेष्वपराह्रिके ।।

अब अच्छी प्रकार शुद्ध होने के बाद, जिसे भोजन में रुचि हो, संशोधन से जिसका शरीर हलका हो गया हो तथा सम्पूर्ण अङ्ग निर्मल हो गये हों, जिसकी सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रसन्न हों, सुखोष्ण जल से जिसने सर्वाङ्ग स्नान किया हो, शरीर पर चन्दन आदि का लेप करके जिसने अपने शरीर को आभूषण आदि से अलंकृत किया हुआ हो, देवता, ब्राह्मण तथा वृद्ध पुरुषों की जिसने पूजा तथा नमस्कार किया हो, जो सुन्दर आसन तथा घर में बैठा हुआ है—ऐसे पञ्चजन (मनुष्य) को पुराने लाल शालि चावलों द्वारा साधित (बनाई हुई), तीन बार स्रुत की हुई, दीपनीय द्रव्यों से संस्कृत, लवणयुक्त, रूक्ष एवं मण्डप्रधान (सिक्थकैः रहितो मण्डः) यवागू मन को अच्छे लगने वाले तथा अच्छी प्रकार धोये हुए पात्रों में अपराह्न काल में पिलावे।

शिरोललाटहृद्ग्रीवावृषणे साक्षशङ्खके। स्वेदश्चेत् पीतमण्डस्य सम्यक्शुद्धं तमादिशेत् ।।
उद्गारवातकर्मभ्यां विशुद्धाभ्यां दिने दिने। निरुपद्रवपुष्टिभ्यां सम्यक्शुद्धं विनिर्दिशेत् ।।

**सम्यक् संशोधित पुरुष के लक्षण—**मण्ड पीने के बाद जिस व्यक्ति को सिर, मस्तिष्क, हृदय, ग्रीवा, अण्डकोश, अक्ष एवं शङ्खप्रदेश (Temporal region) में पसीना आजाय तथा प्रतिदिन डकार एवं अन्य वातकर्मों से शुद्ध हो जाय (अर्थात् अपानवायु, मल आदि में वायु का अनुलोमन हो), कोई उपद्रव न हो तथा शरीर का पोषण ठीक प्रकार से हो—उस व्यक्ति का अच्छी प्रकार संशोधन हुआ समझना चाहिये।

सुखोषितं जीर्णभक्तं द्वितीयेऽहनि भोजयेत्। यवागूं तु तृतीयेऽह्नि दद्यादस्मै विलेपिकाम् ।।
दीपनोदकसंसिद्धां रूक्षामुष्णां ससैन्धवाम्। चतुर्थे मुद्गमण्डः स्यादोदनश्च सुसाधितः ।।

उपकल्पनीयाध्यायः २४] सूत्रस्थानम् ४५

पुराणरक्तशालीनां भृष्टानां वा कृशात्मनः ।
निस्तुषाणां च मुद्गानां मण्डः स्यादु(द्यु)क्तवेषणः (सनः) ।
ईषत्फलाम्लः कर्तव्यो मुद्गमण्डोऽह्नि पञ्चमे । ईषत्स्नेहः कृतः षष्ठे सप्तमे च विधीयते ।।
जाङ्गलानां रसं सिद्धं तनुकं मांसवर्जितम् । दिनेऽष्टमेऽथ नवमे दद्यात् स्नेहाल्पसंस्कृतम् ।।
दशमैकादशे चाह्नि लवणस्नेहसंस्कृतः । फलाम्लसिद्धो युक्तोष्णः शस्यते रसकौदनः ।।
उष्णोदकानुपानौ तु स्यातां वातकफात्मकौ । तत उत्तरकालं तु भोज्यसंसर्ग इष्यते ।।
एषां(ष) मण्डादिसंसर्गो सर्वव्याधिक्रियोपगः । एवं व्यभिचरन्मोहाद्दारुणांल्लभते गदान् ।।

भोजन का संसर्जन क्रम—सुखपूर्वक जिसने रात्रि में शयन किया है तथा पहले दिन का जिसका भोजन जीर्ण हो चुका है उस व्यक्ति को दूसरे दिन केवल यवागू का भोजन करावे । तीसरे दिन इसे दीपनीय जलों से सिद्ध की हुई रूक्ष, उष्ण तथा सैन्धवयुक्त विलेपी (विलेपी विरलद्रवा) देनी चाहिये । चौथे दिन कृश शरीर वाले व्यक्ति को मूंग का मण्ड तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किये हुए ओदन देवे । मण्ड पुराने लाल चावल तथा भुने हुए, एवं छिलके रहित मूंगों का बनाया जाता है जिसमें उचित मात्रा में बेसन आदि डाला हुआ हो । पांचवें दिन इसी मुद्गमण्ड में थोड़ा सा फलाम्ल डालकर खट्टा करके देना चाहिये । छठें तथा सातवें दिन उस मुद्गमण्ड में थोड़ा स्नेह डाल देना चाहिये । आठवें दिन जांगल पशुओं का मांस रहित केवल पतला रस (मांस रस) सिद्ध करके देना चाहिये । नौवें दिन उसमें थोड़ा सा स्नेह भी डाला जा सकता है । दसवें तथा ग्यारहवें दिन लवण तथा स्नेह (घृत) से संस्कृत तथा थोड़ी खटाई डालकर बनाया हुआ थोड़ा २ उष्ण मांसरहित रस तथा ओदन देना चाहिये । वात तथा कफ रोग वालों को साथ में उष्णोदक अनुपान के रूप में देना चाहिये । इसके बाद सामान्य भोजन दिया जाना चाहिये । यह उपर्युक्त मण्ड आदि का क्रम सब व्याधियों में किया जाना चाहिये । जो इस मण्ड आदि के संसर्जन क्रम का भ्रम से उल्लंघन करता है उसको भयंकर रोग (उपद्रव) हो जाते हैं ।

वक्तव्य—यवागू—चावल, मूंग, तिल आदि के द्वारा बनाई हुई खिचड़ी को यवागू कहते हैं । कहा है—यवागू षड्गुणे तोये सिद्धा स्यात् कृसरा घना । तण्डुलैर्मुद्गमाषैश्च तिलैर्वा साधिता हि सा ।। यवागूर्ग्राहिणी बल्या तर्पणी वातनाशिनी ।। यवागू पुनः मण्ड, पेया एवं विलेपी भेद से तीन प्रकार की होती है । पके तण्डुल आदि के घन भाग में से ऊपर के केवल द्रव भाग को मण्ड कहते हैं । १४ गुने जल में चावल डालकर खूब पकालें । बिना छाने भक्तावयव सहित उस द्रवभाग को पेया कहते हैं । तथा १४ गुने जल में चावलों को खूब पकाया जाय, जब उसमें द्रव कम होकर गाढ़ा हो जाय उस गाढ़े पदार्थ को विलेपी कहते हैं । कहा भी है—सिक्थकैः रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता । विलेपी बहुसिक्था स्यात् यवागू विरलद्रवा ।। बेसन—दालयश्चणकाणान्तु निस्तुषाः यन्त्रपेषिताः । तच्चूर्णं बेसनं प्रोक्तं ............... ।। चरक सू. अ. १५ में यह संसर्जन क्रम अत्यन्त विस्तार से दिया है—अथैनं सायाह्ने परे वाऽह्नि सुखोदकपरिषिक्तं पुराणानां लोहितशालितण्डुलानां स्ववक्लिन्नानां मण्डपूर्वां सुखोष्णां यवागूं पाययेदग्निबलमभिसमीक्ष्य च, एवं द्वितीये तृतीये चान्नकाले; चतुर्थे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालितण्डुलानामूतिस्रस्त्रां विलेपीमुष्णोदकद्वितीयामस्नेहलवणामल्पस्नेहलवणां वा भोजयेत् । एवं पञ्चमे षष्ठे चान्नकाले; सप्तमे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालीनां द्विपसृतं सुस्विन्नमोदनमुष्णोदकानुपानं तनुना तनुस्नेहलवणोपपन्नेन मुद्गयूषेण भोजयेत्; एवमष्टमे नवमे चान्नकाले; दशमे त्वन्नकाले लावकपिञ्जलादीनामन्यत-मस्यमांसरसेनौदकलावणिकेनापि सारवता भोजयेदुष्णोदकानुपानम्; एवमेकादशे द्वादशे चान्नकाले; अत ऊर्ध्वमनुगुणान् क्रमेणोपभुञ्जानः सप्तरात्रेण प्रकृतिभोजनमागच्छेत् । इस प्रकार १२ भोजनकाल का संसर्जन क्रम बताया है । जिसके बाद क्रमशः भोजन बढ़ाते हुए सात दिन के बाद स्वाभाविक भोजन पर आजावे ।

४६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | उपकल्पनीयाध्यायः २४]

सुश्रुत चि. अ. ३९ में भी यह विषय निम्न प्रकार से दिया है—प्रस्थे परिस्रुते देया यवागू स्वल्पतण्डुला। द्वे चैवार्धाढके देये तिस्रश्चाप्याढके गते ।। विलेपीमुचिताद्भाक्ताच्चतुर्थांशकृतां ततः। दद्यादुक्तेन विधिना क्लिन्नसिक्थामपिच्छिलाम् ।। अस्निग्धलवणं स्वच्छमुद्गयूषयुतं ततः। अंशद्वयप्रमाणेन दद्यात् सुस्विन्नमोदनम् ।। ततस्तु कृतसंज्ञेन हृद्येनेन्द्रियबोधिना। त्र्यंशान् वितरेद्भोक्तुमातुरायोदनं मृदुम् ।। ततो यथोचितं भक्तं भोक्तुमस्मै विचक्षणः। लावैणहरिणगदीनां रसैर्दद्यात् सुसंस्कृतैः ।। संसर्गेण विवृद्धेऽग्नौ दोषकोपभयाद्भजेत्। प्राक् स्वादुतिक्तौ स्निग्धाम्ललवणान् कटुकं ततः ।। स्वाद्वम्ललवणान् भूयः स्वादुतिक्तावतः परम् ।। स्निग्धरूक्षान् रसांश्चैव व्यत्यासात् स्वस्थवृत्ततः ।। आगे सुश्रुत में कहा है कि जिस व्यक्ति को केवल स्नेहन अथवा वमन ही कराया गया है उसे ७ दिन में साधारण भोजन दिया जा सकता है परन्तु जिसका शिरावेधन अथवा अन्य विरेचन आदि शोधन किये गये हों उसे एक मास तक लघु भोजन आदि पर ही रहना चाहिये। कहा है— केवलं स्नेहपीतो वा वान्तो यश्चापि केवलम्। स सप्तरात्रं मनुजो भुञ्जीत लघु भोजनम् ।। कृतः सिराव्यधो यस्य कृतं यस्य च शोधनम्। स न परिहरेन्मासं यावद्वा बलवान् भवेत् ।।

ज्वरामकामलापाण्डुकर्णकुष्ठगलामयाः । हिक्कातिसारश्वयथुकासाद्या व्यभिचारजाः ।।
शूलातिसरौ शुद्धस्य शीतपानांन्नसेवनात् । शोथोदरज्वरा अम्लभृशस्नेहदिवाशयात् ।।

उपर्युक्त संसर्जनक्रम तथा उसके बाद पथ्य आहार विहार का सेवन न करने से क्या उपद्रव हो जाते हैं—

ज्वर, आमदोष, कामला, पाण्डु, कर्णरोग, कुष्ठ, गलरोग, हिक्का, अतिसार, शोथ तथा कास आदि रोग संसर्जन क्रम के उल्लंघन से हो जाते हैं। शुद्ध व्यक्ति के शीतल जल एवं अन्न के सेवन से शूल तथा अतिसार हो जाते हैं। खट्टे द्रव्य, अधिक स्नेह, तथा दिवाशयन (दिन में सोने) से शोथ, उदररोग तथा ज्वर हो जाते हैं। सुश्रुत चि. अ. ३९ में इन उपद्रवों का विस्तार से वर्णन किया गया है—क्रुध्यतः कुपितं पित्तं कुर्यात्तांस्तानुपद्रवान्। आयास्यतः शोचतो वा चित्तं विभ्रममृच्छति ।। मैथुनोपगमाद्धोरान् व्याधीनाप्नोति दुर्मतिः। आक्षेपकं पक्षघातमङ्गप्रग्रहमेव च ।। गुह्यप्रदेशे श्वयथुं कासश्वासौ च दारुणौ। रुधिरं शुक्रवच्चापि सरजस्कं प्रवर्तते ।। लभते च दिवास्वप्नात्तांस्तान् व्याधीन् कफात्मकान्। प्लीहोदरं प्रतिश्यायं पाण्डुतां श्वयथु ज्वरम् ।। मोहं सदनमङ्गानामविपाकं तथाऽरुचिम्। तमसा चाभिभूतस्तु स्वप्नमेवाभिनन्दति ।। उच्चैः संभाषणाद्वायुः शिरस्यापाद्येद्रुजम्। आन्ध्यं जाड्यमजिव्रत्वं बाधिर्यं मूकता तथा ।। हनुमोक्षमधीमन्थमर्दितं च सुदारुणम्। नेत्रस्तम्भं निमेषं वा तृष्णां कासं प्रजागरम् ।। लभते दन्तचालं च तांस्तांश्चान्यानुपद्रवान्। यानयानेन लभते छर्दिमूर्छाभ्रमक्लमान् ।। तथैवाङ्गग्रहं घोरमिन्द्रियाणां च विभ्रमम्। चिरासनातथा स्थानाच्छ्रोण्यां भवति वेदना ।। अतिचङ्क्रमणान्द्वायुर्जङ्घयोः कुरुते रुजः। सक्थिप्रशोषं शोफं वा पादहर्षमथापि वा ।। शीतसंभोगतोयानां सेवा मारुतवृद्धये। ततोऽङ्गमर्दविष्टम्भशूलाध्मानप्रवेपकाः ।। वातातपाभ्यां वैवर्ण्यं ज्वरं चापि समाप्नुयात्। विरुद्धाध्यशनान्मृत्यु व्याधिं वा घोरमृच्छति ।। असात्म्यभोजनं हन्याद्बलवर्णमसंशयम्। अनात्मवन्तः पशुवद्भुञ्जते येऽप्रमाणतः ।। रोगानीकस्य ते मूलमजीर्णं प्राप्नुवन्ति हि ।।

कांक्षा बुभुक्षा वैशद्यं लघुता स्थिरता सुखम्। स्वस्थवृत्तानुवृत्तिश्च सम्यग्जीर्णान्नलक्षणम् ।।

अन्न के सम्यक् जीर्ण होने के लक्षण—भोजन की इच्छा होना, भूख लगना, शरीर का विशद (प्रसन्न), हलका, स्थिर तथा स्वस्थ होना और स्वस्थ व्यक्ति के समान शरीर की क्रियाओं का होना—ये खाये हुए अन्न के सम्यक् जीर्ण होने के लक्षण हैं।

विषादो गौरवं तन्द्री श्लेष्मसेकारतिभ्रमाः । स्वस्थवृत्तोपरोधश्च तदजीर्णस्य लक्षणम् ।।

अन्न के जीर्ण न होने के लक्षण—विषाद, भारीपन, तन्द्रा, कफ की वृद्धि, अरति (ग्लानि), भ्रम, तथा स्वस्थवृत्त का पालन न कर सकना—ये खाये हुए अन्न के अजीर्ण के लक्षण हैं।

उपकल्पनीयाध्यायः २४] सूत्रस्थानम् ४७

आमं विदग्धं सश्लेष्म रसशेषं तथैव च। चतुर्विधमजीर्णं तु तस्य वक्ष्यामि लक्षणम्।।

उपर्युक्त अजीर्ण के ४ भेद—१. आमाजीर्ण २. विदग्धाजीर्ण ३. श्लेष्माजीर्ण तथा ४ रसशेषाजीर्ण। यह चार प्रकार का अजीर्ण होता है। उनके लक्षण मैं कहूंगा। सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी अजीर्ण के इन्हीं भेदों का उल्लेख किया है—आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानलैस्त्रिभिः। अजीर्णे केचिदिच्छन्ति चतुर्थं रसशेषतः॥ श्लेष्माजीर्ण को ही यहां विष्टब्धाजीर्ण कहा गया है।

यथाभुक्तं भवेद्दामे, धूमोद्गारौ विदाहिनि। सश्लेष्मणि गुरुत्वं तु, रसशेषे तु हृद्द्रवः ।।

इनके सामान्य लक्षण—आमाजीर्ण में रोगी को ऐसा प्रतीत होता है मानों अभी २ भोजन किया गया है। विदग्धाजीर्ण में मुंह से धुंआ निकलता है तथा डकार आती है। श्लेष्माजीर्ण में शरीर में भारीपन होता है तथा रसशेषाजीर्ण में हृदय में भारीपन (Palpitation of Heart) प्रतीत होता है, सुश्रुत सू. अ. ४६ में इनके निम्न लक्षण दिये हैं—माधुर्यमन्नं गतमामसंज्ञं विदग्धसंज्ञं गतमम्लभावम्। किंचिद्विपक्वं भृशतोदशूलं विष्टब्धमाब(न)द्धविरुद्धवातम्॥ उद्गार शुद्धावपि भक्तकांक्षा न जायते हृद्गुरुता च यस्य। रसावशेषेण तु सप्रसेक चतुर्थमेतत् प्रवदन्त्यजीर्णम्॥ अर्थात् आमाजीर्ण में सेवन किया हुआ भोजन (आम रस के कारण) मधुरता को प्राप्त होता है। विदग्धाजीर्ण में अम्लता को प्राप्त होता है। विष्टब्धाजीर्ण में भोजन का आधा परिपाक होकर पेट में पीड़ा तथा शूल होती है तथा नीचे का मार्ग बन्द हो जाने से वायु ऊपर की ओर चढ़ती है। तथा रसशेषाजीर्ण में शुद्ध डकार आने पर भी भोजन की इच्छा नहीं होती, हृदय प्रदेश पर भारीपन रहता है तथा मुंह से लालास्राव होता रहता है। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. ११ में भी कहा है—तत्रा मे गुरुतोत्क्लेशः शोथो गण्डाक्षिकूटयोः। उद्गारश्च यथाभुक्तमविदग्धः प्रवर्त्तते॥ विष्टब्धे शूलमाध्मानं विविधा वातवेदनाः। मलवाताप्रवृत्तिश्च स्तम्भो मोहोऽङ्गपीडनम्॥ विदग्धे भ्रमतृण्मूर्छाः पित्ताच्च विविधाः रुजाः। उद्गारश्च सधूमाम्लःस्वेदो दाहश्च जायते॥ रसशेषेऽन्नविद्वेषो हृदयाशुद्धिगौरवे॥

तन्द्रीशूलारतिग्लानितृड्विदाहारुचिभ्रमाः । अङ्गमर्दज्वरानाहाः सर्वेष्वप्यल्पशो गदाः ।।
सर्वैरसध्यतोत्कृष्टैः क्रमशो याप्यसाध्यते । साध्यानां साधनं यत्तु तन्मे प्रवदतः शृणु ।।
आमस्योद्धरणं पथ्यं, विदग्धे प्रावृतः स्वपेत् ।
सश्लेष्मणि भवेत् स्वेदः, परिशोष्यो रसाधिके ।।

सब अजीर्णों के सामान्य लक्षण—सब प्रकार के अजीर्णों में थोड़ी मात्रा में तन्द्रा, शूल, अरति, ग्लानि, प्यास, विदाह, अरुचि, भ्रम, अङ्गमर्द, ज्वर तथा आनाह आदि लक्षण होते हैं। जब ये सब उपर्युक्त लक्षण प्रबल रूप में उपस्थित हों तो रोग असाध्य हो जाता है। इसके विपरीत अल्प लक्षण होने पर रोग क्रमशः याप्य अथवा साध्य होते हैं। इनमें से जो साध्य रोग हैं उनकी तूं मेरे से चिकित्सा सुन।

यदुक्तं पथ्यमशनं तदेवैतेषु शस्यते । दीर्घकालोषधानां तु मुद्गमण्डः सदाडिमः ।।

इनकी सामान्य चिकित्सा—आमाजीर्ण में आम का उद्धरण करना चाहिये अर्थात् लङ्घन के द्वारा आम का पाचन कर देना चाहिये। विदग्धाजीर्ण में कपड़ा ओढ़कर सो जाये (अष्टाङ्गसंग्रह में कहा है—तत्राभुक्तवा दिवा स्वप्यात्-अर्थात् बिना कुछ खाये दिन में सो जाये)। श्लेष्माजीर्ण में स्वेदन देना चाहिये (कफ के विलय के लिये) तथा रस की अधिकता (अर्थात् रसशेषाजीर्ण) में शोषण करना चाहिये (लङ्घन इत्यादि के द्वारा)। सुश्रुत सू. अ. ४६ में इनका निम्न चिकित्सा सूत्र दिया है—तत्रामे लंघनं कार्यं विदग्धे वमनं हितम्। विष्टब्धे स्वेदनं पथ्यं रसशेषे शयीत च॥ यहां चिकित्सा में थोड़ा अन्तर है। सुश्रुत में विदग्धाजीर्ण में वमन तथा रसशेषाजीर्ण में सोने का विधान है जब कि यहां पर विदग्धाजीर्ण में सोने

२६ का.सं.

४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | वेदनाध्यायः २५]

तथा रसशेषाजीर्ण में परिशोधन का उल्लेख है। इसका अभिप्राय यह है कि इनमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी किये जा सकते हैं। इसीलिये अष्टाङ्गहृदय में कहा है—‘‘यथावस्थं हितं भवेत्’’।

सस्नेहलवणव्योषः पेयो मांसरसोऽपि वा । बालमूलकयूषो वा हितः शाल्योदनस्तथा ।।
चिकित्सितं पञ्चजनान् (द्) राज्ञो राजोपमस्यवा । धनिनां निर्धनानां वा यथार्थमुपकल्पयेत् ।।

इन अजीर्णों में पहले जिस पथ्य भोजन का निर्देश किया है वही इनमें देना चाहिये। दीर्घकाल (अर्थात् उचित समय पर स्वयं भी अन्न जीर्ण हो जाता है), औषध, दाडिम सहित मूंगों का मण्ड, स्नेह (अल्प घृत) लवण तथा त्रिकटु युक्त मांसरस, कच्ची मूल का यूष तथा शालिचावलों का भात—हितकर है।

बलघ्नं दोषशमनं बलवर्णसुखावहम्। सम्यक् संशोधनं कृत्वा दीर्घमायुरवाप्नुते ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
इत्युपकल्पनीयोऽध्यायश्चतुर्विंशतितमः ।।२४।।

इस प्रकार राजा, राजासदृश (रईस आदि), धनी तथा निर्धनों का ठीक २ संशोधन करे। अर्थात् धनी एवं निर्धन व्यक्तियों का परिस्थिति के अनुसार संशोधन करना चाहिये। चरक सू. अ. १५ में कहा है—अनेन विधिनाराजा राजमात्रोऽथवा पुनः। यस्य वा विपुलं द्रव्यं स संशोधनमहैति ॥ दरिद्रस्त्वापदं प्राप्य प्राप्तकालं विरेचनम्। पिबेत्काममसंभृत्य संभारानपि दुर्लभान् ॥ न हि सर्वमनुष्याणां सन्ति सर्वपरिच्छदाः । न च रोगा न बाधन्ते दरिद्रानपि दारुणाः ॥ यद्यच्छक्यं मनुष्येण कर्तुमौषधमापदि । तत्त सेव्यं यथाशक्ति वसनान्यशनानि च ॥

बल को नष्ट करने वाले (संशोधन में प्रारंभ में रोगी का बल कुछ कम हो जाता है), दोषों का शमन करने वाले, बलवर्ण तथा सुख को देने वाले संशोधन को सम्यक् प्रकार से यथाविधि करके मनुष्य दीर्घ आयु को प्राप्त करता है अर्थात् चिरायु होता है। चरक में कहा है—मलापहं रोगहरं बलवर्णप्रसादनम्। पीत्वा संशोधनं सम्यगायुषा युज्यते चिरम् ॥

अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—बुद्धिप्रसादं बलमिन्द्रियाणां धातुस्थिरत्वं ज्वलनस्य दीप्तिम्। चिराच्च पाकं वयसः करोति संशोधनं सम्यगुपास्यमानम् ॥

संशोधन के द्वारा शमन किये हुए दोष फिर प्रादुर्भूत नहीं होते। चरक सू. अ. १६ में कहा है—दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिताः लङ्घनपाचनैः। जिताः संशोधनैर्यै तु न तेषां पुनरुद्भवः ॥

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इत्युपकल्पनीयोऽध्यायश्चतुर्विंशतितमः ॥२४॥


पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

अथातो वेदनाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम वेदनाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

उपास्यमानमृषिभिः कश्यपं वृद्धजीवकः। चोदितो दारुवाहेन वेदनायेंऽभ्यचोदयत् ।।३।।
बालकानामवचसां विविधा देहवेदनाः। प्रादुर्भूताः कथं वैद्यो जानीयाल्लक्षणार्थतः ।।४।।

वेदनाध्यायः २५] सूत्रस्थानम् ४९

ऋषियों द्वारा उपासना किये जाते हुए कश्यप को दारुवाह द्वारा प्रेरित वृद्धजीवक ने वेदना संबन्धी उपदेश देने के लिये प्रेरित किया (प्रार्थना की)। भगवन् ! मुख से न बोल सकने वाले बालकों की उत्पन्न हुई विविध प्रकार की वेदनाओं को वैद्य लक्षणों से किस प्रकार जाने (पहचाने) अर्थात् वे कौनसे लक्षण हैं जिनसे वैद्य बालकों के भिन्न २ रोगों तथा वेदनाओं को पहचान सकता है क्योंकि इस अवस्था में बालक स्वयं अपने मुंह से किसी भी अपने कष्ट को बतलाने में असमर्थ होता है।

इति पृष्टो महाभागः कश्यपो लोकवृद्धपः। प्रोवाच वेदनास्तस्मै कारणैर्बालदेहजाः ॥५॥

इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर महान् ऐश्वर्यशाली तथा आयु की दृष्टि से वृद्ध कश्यप ने भिन्न २ कारणों से उत्पन्न होने वाली बालकों की शारीरिक वेदनाओं का उसे उपदेश किया।

भृशं शिरः स्पन्दयति निमीलयति चक्षुषी। अवकूजत्यरतिमानस्वप्नश्च शिरोरुजि ॥६॥

शिरःशूल—शिरःशूल में बालक सिर को बहुत अधिक हिलाता है, आंखें बन्द कर लेता है, रात्रि को सोते २ चिल्लाता है (Night terrors) उसे आहार में ग्लानि हो जाती है तथा उसे नींद नहीं आती है।

कर्णौ स्पृशति हस्ताभ्यां शिरो भ्रमयते भृशम्। अरत्यरोचकास्वप्नैर्जानीयात् कर्णवेदनाम् ॥७॥

कर्णवेदना—कानों की वेदना में बालक हाथों से दोनों कानों का स्पर्श करता है, सिर को बहुत हिलाता है, ग्लानि तथा अरुचि हो जाती है। और उसे नींद नहीं आती है।

लालास्त्रावणमत्यर्थं स्तनद्वेषारतिव्यथाः। पीतमुद्गिरति क्षीरं नासाश्वासी मुखामये ॥८॥

मुखरोग—मुखरोग में बालक के मुख से अत्यन्त लालास्राव होता है, दूध से द्वेष (अरुचि) हो जाती है, उसे ग्लानि एवं व्यथा (पीडा) होती है, पीये हुए दूध को उगल देता है तथा नासिका से श्वास लेता है।

पीतमुद्गिरति स्तन्यं विष्टम्भिश्चश्लेष्मसेवनम्। ईषज्ज्वरोऽरुचिर्ग्लानिः कण्ठवेदनायाऽदिति ॥९॥
(इति ताडपत्रपुस्तके ४१ तमं पत्रम्)

कण्ठवेदना—गले की वेदना में बालक पीये हुए दूध को उगल देता है, श्लेष्मवर्धक पदार्थों के सेवन से उसे विष्टम्भ हो जाता है, हल्का ज्वर, अरुचि तथा ग्लानि हो जाती है।

लालास्रावोऽरुचिर्ग्लानिः कपोले श्वयथुर्व्यथा। मुखस्य विवृतत्वं च जानीयादधिजिह्विकाम् ॥१०॥

अधिजिह्विकारोग—इसमें लालास्राव, अरुचि, ग्लानि, कपोल पर शोथ तथा पीडा होती है और मुख खुला रहता है।

वक्तव्य—अधिजिह्विका के लक्षण सुश्रुत नि. अ. १६ में निम्न दिये हैं—जिह्वारूपः श्वयथुः कफात्तु जिह्वाप्रबन्धोपरि रक्तमिश्रात्। ज्ञेयोऽधिजिह्वः खलु रोग एषः .............. ॥

ज्वरारुचिमुखस्रावा निष्टनेश्व गलग्रहे। कण्डू(ण्ठ)के श्वयथुः कण्ठे ज्वरारुचिशिरोरुजः ॥११॥

ग्रहरोग—इसमें बालक को ज्वर, अरुचि, मुख से लालास्राव तथा श्वास लेने में कष्ट होता है।

कण्ठशोथ—कण्ठ (गले) में शोथ, ज्वर, अरुचि, तथा शिरःशूल होता है।

मुहुर्नमयतेऽङ्गानि जृम्भते कासते मुहुः।
धात्रीमालीयतेऽकस्मात् स्तनं(न्यं) नात्यभिनन्दति ॥१२॥

५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् वेदनाध्यायः २५]

प्रस्त्रावोष्णत्ववैवर्ण्यं ललाटस्यातितप्तता । अरुचिः पादयोः शैत्यं ज्वरे स्युः पूर्ववेदनाः ।।९३।। ज्वर (Fever)—इसमें बालक बार २ अङ्गों को सुकोड़ता है, जंभाई लेता है, बार २ खांसता है, सहसा धात्री से चिपक जाता है, स्तन या दूध की विशेष इच्छा नहीं करता, मुख से लालास्राव होता है, उसका शरीर उष्ण तथा विवर्ण (सफेद या पीला) रहता है, ललाट (माथा) गरम रहता है, अरुचि होती है तथा उसके पैर ठण्डे हो जाते हैं—ये सब लक्षण बालक को ज्वर होने से पूर्व होते हैं।

देहवैवर्ण्यमरतिर्मुखग्लानिरनिद्रता । वातकर्मनिवृत्तिश्चेत्यतीसाराग्रवेदनाः ।।९४।। अतिसार (Diarrhoea)—शरीर विवर्ण (पीला या सफेद) हो जाता है, अरति तथा मुखग्लानि हो जाती है, निद्रा नहीं आती, तथा वायु के कर्मों की निवृत्ति हो जाती है अर्थात् वायु अपना अनुलोमन का कार्य नहीं करती है—ये सब अतिसार के पूर्व लक्षण हैं।

स्तनं व्युदस्यते रौति चोत्तानश्चावभज्यते । उदरस्तब्धता शैत्यं मुखस्वेदश्च शूलिनः ।।९५।। उदरशूल (Intestinal colic)—बालक स्तन पान करना छोड़ देता है, वह रोता है, उत्तान (सीधा-ऊपर को मुख कर के) लेटता है तथा उदर में स्तब्धता होती है, उसे सर्दी लगती है तथा मुख पर पसीना आजाता है।

अनिमित्तमभीक्ष्णं च यस्योद्गारः प्रवर्तते । निद्राजृम्भापरीतस्य छर्दिस्तस्योपजायते ।।९६।। छर्दिरोग (वमन-Vomiting)—बालक को बिना किसी कारण के बार २ डकार आते हों, तथा निद्रा और जंभाई आरही हो तो ऐसा जानना चाहिये कि बालक को वमन होगा।

निघ्नन्तुरसाऽत्युष्णं श्वासस्तस्योपजायते । अकस्मान्मारुतोद्गारः कृशे हिक्का प्रवर्तते ।।९७।। श्वासरोग—श्वासरोग में बालक के छाती से अत्यन्त गरम सांस निकलते हैं। हिक्का—कृश व्यक्ति में एक दम वायु की डकार आवे तो हिक्का होने की संभावना होती है।

स्तनं पिबति चात्यर्थं न च तृप्ति-(प्य) ति रोदिति । शुष्कोष्ठतालुस्तोयेप्सुर्दुर्बलस्तृष्णयाऽर्दितः ।।९८।। तृष्णा—अत्यधिक स्तनपान करने पर भी यदि तृप्त नहीं होता तथा रोता रहता हो, और ओष्ठ तथा तालु सूख गये हों, यदि जल का इच्छुक हो अर्थात् जल चाहता हो तो जानना चाहिये कि बालक को प्यास लगी है।

विशालस्तब्धनयनः पर्वभेदारतिक्कमी । संरुद्धमूत्रानिलविट् शिशुरानाहवेदनी ।।९९।। आनाह—जिसकी आंखें फैली हुई हों तथा स्तब्ध हों, जिसके जोड़ों में दर्द हो, जिसे अरति तथा क्लम (थकावट) हो, जिसके मूत्र, वायु तथा मल सभी रुक गये हों, उस बालक को आनाह (अफारा) समझना चाहिये।

अकस्मादट्टहसनमपस्माराय कल्पते । प्रलापारतिवैचित्त्यैरुन्मादं चोपलक्षयेत् ।।१००।। अपस्मार—इसमें बालक सहसा जोर से अट्टाहास करने लगता है। उन्माद—इसमें प्रलाप (Delirium), अरति तथा वैचित्य (चित्तभ्रम—Upset mind) हो जाता है।

रोमहर्षोऽङ्गहर्षश्च मूत्रकाले च वेदना । मूत्रकृच्छ्रे दशत्योष्ठौ बस्तिं स्पृशति पाणिना ।।१०१।। मूत्रकृच्छ्र (Disurea)—इसमें बालक को रोमहर्ष (बालों का खड़ा होना), अङ्गहर्ष (अङ्गों में कंपकंपी होना) तथा मूत्रत्याग के समय वेदना होती है (Pain during micturation) वह ओष्ठदंशन (ओष्ठ को दांतों के नीचे दबाना) करता है तथा हाथ से बस्तिप्रदेश का स्पर्श करता है।

वेदनाध्यायः २५] सूत्रस्थानम् ५१

गौरवं बद्धता जाड्यमकस्मान्मूत्रनिर्गमः ।
प्रमेहे मक्षिकाका (क्रा) न्तं मूत्रं श्वेतं घनं तथा ।।२२।।

प्रमेह—इसमें बालक का शरीर भारी होता है तथा बंधा हुआ सा और जड़ होता है। तथा अकस्मात् उसका मूत्र निकल जाता है, जिसपर मक्खियां बहुत बैठती हैं तथा मूत्र का रंग श्वेत एवं घन होता है अर्थात् उसका आपेक्षिक गुरुत्व अधिक होता है। साधारण मूत्र का आपेक्षिक गुरुत्व (Specific gravity) १०१० से १०२० तक होता है। किन्तु प्रमेह में इसका गुरुत्व अधिक अर्थात् लगभग १०४०-१०५० तक हो जाता है।

बद्धपक्वपुरीषत्वं सरक्तं वा कृशात्मनः । गुदनिष्पीडनं कण्डूं तोदं चार्शसि लक्षयेत् ।।२३।।

अर्शरोग (बवासीर-Piles)—इसमें मल बंधा हुआ तथा पक्व होगा, साथ में रक्त भी होगा तथा बालक कमजोर होगा। उसकी गुदा में वेदना, कण्डू तथा तोद होगा।

सशर्करातिमूत्रत्वं मूत्रकाले च वेदना । प्रवृत्तं रोदिति क्षामस्तं ब्रूयादश्मरीगदम् ।।२४।।

अश्मरी (Stone in Bladder)—यदि मूत्र शर्करा (Sand) से युक्त हो तथा मात्रा में अधिक होता हो, मूत्रत्याग के समय वेदना होती हो, बालक बहुत अधिक और लगातार रोता हो तथा बहुत दुर्बल हो तो अश्मरी (पथरी) रोग समझना चाहिये।

रक्तमण्डलकोत्पत्तिस्तृष्णा दाहो ज्वरोऽरतिः । स्वादुशीतोपशायित्वं विसर्पस्याग्रवेदनाः ।।२५।।

विसर्परोग (Erysipelus)—इस रोग में बालक के शरीर पर रक्तमण्डल (लाल २ चकत्ते-Rashes) बन जाते हैं। उसे तृष्णा, दाह, ज्वर, अरति, होती है तथा उसे मधुर एवं शीत द्रव्यों के सेवन की इच्छा होती है।

दह्यन्तेऽङ्गानि सूच्यन्ते भज्यन्ते निष्ठनत्यति । विसूचिकायां बालानां हृदि शूलं च वर्धते ।।२६।।

विसूचिका—बालक के अङ्गों में दाह होता है, सूची भेद सदृश पीडा होती है, उसे सांस लेने में कष्ट होता है तथा हृदय में शूल होता है—ये बालकों में विसूचिका के लक्षण होते हैं।

शिरो न धारयति यो भिद्यते जृम्भते मुहुः । स्तनं पिबति नात्यर्थं ग्रथितं छर्दयत्यपि ।।२७।।
विषादाध्मानारुचिभिर्विद्यादलसकं शिशोः । विसूचिकालसकयोर्दुर्ज्ञानि लक्षणौषधे ।।२८।।

अलसक—बालक थोड़ी देर भी सिर को ठीक तरह से धारण नहीं कर सकता है, उसके शरीर का भेदन होता है, वह बार २ जंभाई लेता है, अधिक स्तनपान नहीं करता है, ग्रथित (गांठों से युक्त) वमन कर देता है, तथा विषाद, आध्मान और अरुचि होती है—इन लक्षणों से बालक को अलसक रोग जानें। विसूचिका तथा अलसक रोग के लक्षण एवं औषधि के भेद का ज्ञान कठिनता से होता है। अर्थात् इन दोनों में भेद करना कठिन होता है। विसूचिका तथा अलसक दोनों आमदोष हैं। इन दोनों के भेद के लिये चरक वि. अ. २ में कहा है—तत्र विसूचिकामूर्ध्वं चाधश्च प्रवृत्तामामदोषां यथोक्तरूपां विद्यात् । अर्थात् विसूचिका में आम दोष ऊपर और नीचे दोनों मार्गों से प्रवृत्त होते रहते हैं तथा इसमें तीनों दोषों का प्रकोप होता है। अष्टाङ्गसंग्रह में कहा है—विविधैर्वेदनाभेदैर्वाय्वादिभृशकोषतः । सूचीभिरिव गात्राणि विध्यतीति विसूचिका ।। इसी प्रकार सुश्रुत में कहा है—सूचीभिरिव गात्राणि तुदन् सन्तिष्ठतेऽनिलः । यस्याजीर्णेन सा वैद्यैर्विसूचिति निगद्यते ।। अर्थात् इसमें वायु के प्रकोप से शरीर में विविध प्रकार की सुई चुभने के समान वेदनाएं होती हैं। अलसक के विषय में कहा है—दुर्बलस्याल्पाग्नेर्बहुश्लेष्मणोवातमूत्रपुरीषवेगविधारिणः स्थिरगुरुबहुरूकशीतशुष्कान्नसेविनस्त-दन्नपानमनिलप्रपीडितं श्लेष्मणा च विबद्धमार्गमतिमात्रप्रलीनमलसत्वान्न बहिर्मुखी भवति, ततश्छर्द्यतिसारवर्ज्यान्मामप्रदोषलिङ्गानि

५२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् वेदनाध्यायः २५]

यथोक्तान्यभिदर्शयत्यतिमात्राणि; अतिमात्रप्रदुष्टाश्च दोषाः प्रदुष्टामबद्धमार्गास्तिर्यग्गच्छन्तः कदाचित्केवलमेवास्य शरीरं दण्डवत्स्तम्भयन्ति, ततस्तमलसकमसाध्यं ब्रुवते । अर्थात् इसमें कफ द्वारा मार्गों के बन्द होने से सेवन किया हुआ अन्न पान अन्दर ही रुककर आलसी होने के कारण बाहर नहीं निकलता तथा इसमें वमन तथा अतिसार को छोड़कर आमदोष के सब लक्षण उपस्थित हो जाते हैं ।

अन्यत्र भी कहा है—प्रपातिनोर्ध्वं नाधस्तान्नाहारोऽपि विपच्यते । आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः ॥ यही इन दोनों में अन्तर है ।

दृष्टिव्याकुलता तोदशोथशूलास्ररक्तताः । सुप्तस्य चोपलिप्यन्ते चक्षुषी चक्षुरामये ॥२९॥

चक्षुरोग—इसमें दृष्टि की व्याकुलता, चक्षुओं में तोद, शोथ, शूल, अश्रुBufferओं का अधिक आना (Lacrimation) और लालिमा (Congestion) होती है । सोने पर दोनों आंखें (पलक-Eye lashes) परस्पर (Discharge के कारण) चिपक जाती हैं ।

घर्षत्यङ्गानि शयने रोदितीच्छति मर्दनम् । शुष्ककण्ड्वऽर्दितं विद्यात्ततश्चार्द्रा प्रवर्तते ॥३०॥ सुखायते मृद्यमानं मृद्यमानं च शूयते । शूनं स्रवति सस्योढा (?) मार्द्रयां शूलदाहवत् ॥३१॥

शुष्ककण्डू (Pruritis)—इस रोग में बालक रात्रि को सोते समय अङ्गों का घर्षण करता है (रगड़ता है), वह रोता है तथा शरीर का मर्दन करना चाहता है । आर्द्रकण्डू—शुष्क के बाद आर्द्रकण्डू प्रारंभ होती है । इसमें रोगी रगड़ने पर सुख (आनन्द) का अनुभव करता है । रगड़ने पर वह बढ़ जाती है तथा बढ़ने के बाद उसमें से स्राव (Discharge) आने लगता है । इस प्रकार बढ़ी हुई इस आर्द्रकण्डू में शूल एवं दाह होती है ।

स्तैमित्यमरुचिर्निद्रा गात्रपाण्डुकताऽरतिः । रमणाशनशय्यादीन् धात्रीं च द्वेष्टि नित्यशः ॥३२॥ अस्नातः स्नातलूपश्च स्नातश्चास्नातदर्शनः । आमस्यैतानि रूपाणि विद्याद्वैद्यो भविष्यतः ॥३३॥

आमदोष—इस रोग में स्तिमितता (शरीर का चिपचिपापन), अरुचि, निद्रा, शरीर का पाण्डु (Anaemic) होना और अरति होती है तथा बालक को खेल, भोजन तथा निद्रा तथा धात्री से भी निरन्तर द्वेष (अरुचि या घृणा) हो जाती है । यदि उसने स्नान नहीं किया हुआ है तो स्नान किये हुए के समान प्रतीत होता है । और यदि स्नान किया हुआ है तो स्नान न किये हुए के समान प्रतीत होता है । यदि ये लक्षण हों तो उन्हें देखकर वैद्य कह सकता है कि इस बालक को आमदोष होने वाला है ।

नाभ्यां समन्ततः शोथः श्वेताक्षिनखवक्त्रता । पाण्डुरोगेऽग्निससादश्च श्वयथुश्चाक्षिकूटयोः ॥३४॥ पीतचक्षुर्नखमुखविण्मूत्रः कामलार्दितः । उभयत्र निरुत्साहो नष्टाग्निरुधिरस्पृहः ॥३५॥

पाण्डुरोग (Anaemia)—इसमें नाभि के चारों ओर शोथ होता है । आंखें, नाखून तथा मुंह सफेद हो जाता है । उसे अग्निमांद्य हो जाता है तथा उसकी आंखों के चारों ओर शोथ हो जाता है । कामला (Jaundice) रोग—इसमें आंखें, नाखून, मुख, मल तथा मूत्र पीले हो जाते हैं (Bile Pigments के कारण) । पाण्डु एवं कामला इन दोनों रोगों में मनुष्य उत्साह शून्य होता है, उसकी जठराग्नि नष्ट हो जाती है तथा रुधिर के प्रति उसकी स्पृहा (आकांक्षा अथवा आवश्यकता) होती है ।

मूर्च्छाप्रजागरच्छर्दिधात्रीद्वेषारतिभ्रमैः । वित्रासोद्वेगतृष्णाभिर्विद्याद्बाले मदात्ययम् ॥३६॥

मदात्यय—मूर्छा, जागरण (अनिद्रा Insomnia) वमन, धात्री से द्वेष (अनिच्छा-अरुचि), अरति, भ्रम, वित्रास (डर), उद्वेग (वेगों की प्रबलता) तथा तृष्णा-इन लक्षणों से बालक में मदात्ययरोग का ज्ञान होता है ।

वेदनाध्यायः २५] सूत्रस्थानम् ५३

मुहुर्मुखैनोच्छ्वसिति पीत्वा पीत्वा स्तनं तु यः । स्रवतो नासिके चास्य ललाटं चाभितप्यते ।। ३७ ।।
स्रोतांस्यभीक्ष्णं स्पृशति पीनसे क्षौति कासते । उरोघाते तथैव स्यान्निघ्नन्त्युरसाऽधिकम् ।। ३८ ।।

पीनसरोग (प्रतिश्याय)—जो बालक स्तनपान करता हुआ बार-बार मुख से श्वास लेता है, जिसकी नासिका से स्राव होता रहता है, ललाट तप्त (गरम) रहता है, स्रोतों का बार २ स्पर्श करता है, छींकता है तथा खांसता रहता है—उसे पीनसरोग से आक्रान्त जानना चाहिये । उरोघात—इसमें पूर्वोक्त लक्षणों के साथ २ बालक छाती से बड़े गरम २ सांस निकालता रहता है ।

स्वस्थवृत्तपरो बालो न शेते तु यदा निशि । रक्तबिन्दुचिताङ्गश्च विद्यात्तं जन्तुकादितम् ।। ३९ ।।

जन्तुदंश (Insect Bite)—स्वस्थ (नीरोग) बालक यदि रात्रि में न सोये तथा उसके किसी अंग पर लाल २ बिन्दु दिखाई दें तो यह समझना चाहिये कि उसे किसी जन्तु ने काटा है ।

वक्तव्य—बालकों के रोगों तथा वेदनाओं के ज्ञान के लिये सुश्रुत शा. अ. १० में भी कुछ लक्षण संक्षेप से दिये गये हैं—अङ्गप्रत्यङ्गदेशे तु रुजा यत्रास्य जायते । मुहुर्मुहुः स्पृशति तं स्पृश्यमाने च रोदिति ।। निमीलिताक्षो मूर्धस्थे शिरोरोगे न धारयेत् । बस्तिस्थे मूत्रसङ्गात्तौ रुजा तृष्यति मूर्च्छति ।। विण्मूत्रसङ्गवैवर्ण्यच्छर्द्याध्मानानन्त्रकूजनैः । कोष्ठे दोषान् विजानीयात् सर्वत्रैस्वांश्च रोदनैः ।

यदा तु ललिता धात्री सुखिनी सर्वभोगिनी । पश्यत्यभीक्ष्णं दुःस्वप्नं स्वयं क्षीरं प्रवर्तते ।। ४० ।।
बालो वि(ऽप) स्मरते चास्याः सहसाऽङ्गात् पतत्यपि ।
असज्जनेन संसर्ग याति संभोजनं तथा ।। ४१ ।।
मृतापत्यावकीर्णीभिः परवृद्ध्यसहिष्णुभिः । अमङ्गलानि घोराणि पश्यत्याचरतेऽपि च ।। ४२ ।।
सेवते विपरीतानि मृत्युं चोदयते शिशोः । सुप्ते शिशौ निलीयन्ते पक्षिणो दारुणोदयाः ।। ४३ ।।
विडालो लङ्घयत्येनं परधूमं च जिघ्रति । परावतारणबलिं प्रेक्षते लङ्घयत्यपि ।। ४४ ।।
दुर्गन्धदेहवक्त्रत्वं नासिकाग्रे मलोद्भवः । अहद्यरक्तमाल्यानां मातापुत्रनिषेवणम् ।। ४५ ।।
भस्माङ्गारतुषादीनामधिरोहणसेवनम् । रोदित्यकस्मात्त्रसति छायाशीलविपर्ययः ।। ४६ ।।
अल्पाशितोऽतिविण्मूत्रस्त्रविण्मूत्रो विपर्यये । भविष्यतां निमित्तानि ग्रहाणां वेदनाश्च ताः ।। ४७ ।।
न यः शिरो धारयति क्षिपन्त्यङ्गानि दुर्बलः । श्वासाध्मानपरीताभ्यामन्तवच्चोपलक्ष्यते ।। ४८ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ४२ तमं पत्रम् ।)

विनोद्यमानो बहुधा विनोदं नाभिनन्दति । तृट्प्रमीलकनिद्रार्तः कूजत्यपि कपोतवत् ।। ४९ ।।

ग्रहरोग—जब लालन (प्रेमपूर्वक पालन पोषण) करने वाली, सुखी, तथा सब वस्तुओं का भोग करने वाली धात्री लगातार बुरे स्वप्नों को देखे, उसके स्तनों से स्वयमेव दूध प्रवृत्त होने लगे । उसको बालक का स्मरण न रहे (अथवा बालक को अपस्मार रोग हो जाय), बालक सहसा गोद में से गिर पड़े तथा दुष्ट पुरुषों के साथ संसर्ग एवं भोजन करता हो, जिनके पुत्रों की मृत्यु हो जाती हो, जो अवकीर्णी हों तथा जो दूसरों की वृद्धि (बढ़ती-ऐश्वर्य) को सहन न कर सकती हों ऐसी धात्रियाँ भयंकर अमङ्गलों (अशुभ लक्षणों) को देखती हैं तथा उसी के अनुसार आचरण करती हैं एवं विपरीत भावों का सेवन करती हैं तो उस बालक की मृत्यु होने की संभावना होती है । बालक के सोये रहने पर भयंकर आकृति वाले पक्षी वहां घोंसले बना लेते हैं, विडाल (मार्जार) उसे लांघ जाता है, पर धूम को सूंघता है, वह दूसरे के सिर पर से उतार कर रखी हुई बलि को चाटता है तथा इसका लङ्घन करता है । बालक के शरीर तथा मुख से दुर्गन्ध आती है,

५४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६]

उसकी नासिका के अग्रभाग में मलोत्पत्ति हो जाती है तथा माता और पुत्र दोनों अशुभ एवं रक्तवर्ण की मालाओं को धारण करते हैं। भस्म (राख) अङ्गारों तथा तुष के ढेर पर बैठता है, सहसा रोने लगता है, उसे डर लगता है, उसकी छाया (शारीरिक कान्ति) तथा स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है। बालक कम खाता है। उसे कभी मल एवं मूत्र अधिक आता है तथा कभी कम आने लगता है। बालक अपने सिर को धारण नहीं कर सकता अर्थात् स्थिर नहीं रख सकता, अङ्गों को इधर उधर फेंकता है, दुर्बल हो जाता है, उसे श्वास एवं आध्मानरोग से प्रतीत होने लगता है कि जैसे अब वह बचेगा नहीं। बालक से यदि विनोद किया जाय तो वह उसे पसन्द नहीं करता। वह प्यास, प्रमीलकरोग (तन्द्रा) तथा निद्रा से पीड़ित होता है तथा कबूतर की तरह शब्द करता है ये सब ग्रहरोगों के प्रारम्भ होने के लक्षण हैं। अर्थात् उपर्युक्त लक्षणों को देखकर अनुमान किया जा सकता है कि बालक को संभवतः कोई ग्रहरोग होनेवाला है। अवकीर्णी—ब्रह्मचर्य व्रत का भङ्ग करने वाला व्यक्ति। इसका निम्न लक्षण दिया है—कामतो रेतस् सेकं व्रतस्थस्य द्विजन्मनः। अतिक्रमं व्रतस्याहुर्धर्मज्ञा ब्रह्मवादिनः।। अवकीर्णी भवेद्गत्वा ब्रह्मचारी तु योषितम्। गर्दभं पशुमालभ्य नैर्ऋतं स विशुध्यति।। अर्थात् जो जानबूझ कर ब्रह्मचर्य व्रत का भङ्ग करता है उसे अवकीर्णी कहते हैं। अनिच्छापूर्वक व्रतभङ्ग करनेवाले को अवकीर्णी नहीं कहते।

पीड्यमानस्य रूपाणि ज्वरच्छर्द्यतिसारिषु । वैद्यो दृष्ट्वैव जानीयात् कृच्छ्रं सर्वं न सिध्यति ॥५०॥

इस प्रकार बालक के ज्वर, छर्दि तथा अतिसार आदि रोगों में पीड़ा देने वाले उपर्युक्त लक्षणों को वैद्य देखकर ही तुरत जान लेवे। क्योंकि सम्पूर्ण लक्षण कृच्छ्र होने पर सर्वदा सिद्ध नहीं होते।

इत्येता विविधाः प्रोक्ता वेदना बालदेहजाः । प्रायोद्भावानां रोगाणां कश्यपेन महर्षिणा ॥५१॥

इस प्रकार महर्षि कश्यप ने प्रायः होने वाले रोगों में बालकों के शरीर में होने वाली वेदनाओं तथा लक्षणों को कह दिया है।

तेषां चिकित्सितं स्वं स्वमविरुद्धं यथाक्रमम् । दृष्ट्वा चिकित्सितस्थाने दोषतश्चाभ्यु(प्यु)पक्रमेत् ॥५२॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥
इति वेदनाध्यायः पञ्चविंशतितमः ॥२५॥

उन २ रोगों की चिकित्सा परस्पर अविरुद्ध तथा यथाक्रम चिकित्सास्थान में देखकर अथवा स्वयं दोषों के अनुसार करे।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इति वेदनाध्यायः पञ्चविंशतितमः ॥२५॥


षड्विंशतितमोऽध्यायः

अथातश्चिकित्सासंपदीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम चिकित्सासंपदीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६] सूत्रस्थानम् ५५

चिकित्सासंपद्यथोपपद्यते तमुपायमनुव्याख्यास्यामः। चत्वारः खलु पादाश्चिकित्सितस्योपपद्यन्ते। ते यदा गुणवन्त उपपद्यन्ते तदा साध्यो व्याधिर्नातिवर्तते। तद्यथा—भिषक्, भेषजम्, आतुरः, परिचारक इति ।।३।।

अब हम उन उपायों की व्याख्या करेंगे जिनके द्वारा चिकित्सासंपत् (चिकित्सा का उत्तम गुणों से युक्त होना) उत्पन्न हो सके। चिकित्सा के चार पाद होते हैं अर्थात् चिकित्सा के लिये चार वस्तुओं का होना आवश्यक है। वे चारों पाद जब गुणयुक्त हों तब साध्य व्याधि चिकित्सा का व्यतिक्रम नहीं करती अर्थात् ठीक हो जाती है (साध्य व्याधि की ही चिकित्सा की जा सकती है असाध्य की नहीं। चरक में कहा है—साधनं न त्वसाध्यानां व्याधीनामुपदिश्यते)। वे चारों पाद ये हैं—१. वैद्य २. ओषधि ३. रोगी ४. परिचारक। चरक सूत्रस्थान के खुड्डाकचतुष्पाद अध्याय में भी कहा है—भिषग् द्रव्यमुपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम्। गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकार व्युपशान्तये॥ इसीप्रकार सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है—वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः। एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः॥ ये चारों पाद मिलकर ही आरोग्यरूप कर्मसिद्धि के हेतु हैं।

तत्र भिषक् सुतीर्थो न्यायेनार्षज्ञानप्राप्तो विज्ञानवाननेकशो दृष्टकर्मा विदितसिद्धयोगो दक्षो दक्षिणः शुचिरनुद्धतवेषः सर्वभूतेषु बन्धुभूतः सिद्धिमन् धर्मार्थदर्शी सत्यदयादानार्जवनिरतो देवद्विजगुरुसिद्धानां पूजयिता चाभिगन्ता चोत्तरोत्तरप्रतिपत्तिकुशलो गुरु वृद्धसेवी न्यायाभिनिवेशी व्यपगतभयलोभमोहक्रोधानृतोऽपैशुन्योऽमद्यलौल्यः सुमुखश्चाव्यसनी चेति ।।४।।

वैद्य या चिकित्सक के गुण—सुतीर्थ (योग्य गुरु वाला अर्थात् जिसने योग्य गुरु से शिक्षा ग्रहण की है), न्यायपूर्वक जिसने आर्षज्ञान प्राप्त किया है, जो विज्ञानवान् हो, जिसने बहुत बार चिकित्सा कर्म देखा हुआ है, जिसे सिद्धयोगों का ज्ञान है, जो चतुर, दक्षिण तथा पवित्र है, जिसका वेश उद्धत नहीं हैं अर्थात् सभ्य वेश वाला है, सब प्राणियों के प्रति जिसके मन में बन्धु (प्रेम) भाव है, जिसके हाथ में सिद्धि है, जो धर्मार्थ रोगियों को देखने वाला है अथवा धर्म और अर्थ (धन) के लिये रोगियों को देखता है, जो सत्य, दया, दान तथा सरलतायुक्त है, जो देव, ब्राह्मण, गुरु तथा सिद्ध महात्माओं की पूजा तथा सेवा करने वाला है, जो उत्तरोत्तर रोग निवृत्ति में कुशल है, जो गुरु तथा वृद्ध पुरुषों की सेवा करता है, जो न्यायवान् है, तथा भय, लोभ, मोह, क्रोध, असत्य, पिशुनता (चुगलखोरी) से रहित है, जिसे मद्य की आदत नहीं है—जो सुमुख (दर्शनीय-सुन्दर आकृति वाला) तथा सब प्रकार के व्यसनों से रहित है—ऐसा वैद्य श्रेष्ठ होता है। चरक सू. अ. ९ में वैद्य के ४ मुख्य गुणों का उल्लेख किया गया है—श्रुतेः पर्यवदातत्वं बहुशः दृष्टकर्मता। दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम्। १. शास्त्र का सम्यक् ज्ञान २. अनुभव ३. चतुराई (Skill) तथा ४ शुद्धता—ये गुण आवश्यक हैं। इन चारों गुणों में अन्य सब गुणों का समावेश हो जाता है। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३४ में कहा है—तत्राधिगत शास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वय कृतो। लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी विशारदः। सत्यधर्मपरो यश्च स भिषक् पाद उच्यते ॥४॥

तत्र भेषजसंपत्—सुभूमौ जातं, काले चोद्धृतं, काले चोत्पन्नम्, अविकारि, अग्नितोय-जन्तुविण्मूत्रजरादिभिरनुपहतं, तत्तद्रोगयोग्यं, क्रमेण च विधिवदुपपादितमिति ।।५।।

औषध के गुण—जो प्रशस्त भूमि में उत्पन्न हुई हो, उचित समय पर उखाड़ ली गई हो, उचित समय में उत्पन्न की गई हो, विकार रहित हो, जो अग्नि, जल, जन्तु, मल, मूत्र तथा अवस्था आदि से नष्ट न की गई हो, जो अमुक २ रोग के योग्य हो तथा क्रमशः विधिपूर्वक जिसका प्रयोग किया हुआ है—ऐसी ओषधि गुणयुक्त होती है। चरक सू. अ. ९ में ओषधि के निम्न ४ गुण दिये हैं—बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविधविकल्पना। संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते।। १. पर्याप्त मात्रा में होना २. व्याधि के उपयुक्त होना ३. एक ही ओषधि से नाना प्रकार की कल्पनाओं का

५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६]

बन सकना ४. रस आदि से युक्त होना । सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है—प्रशस्तदेशसंभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् । युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम् ।। दोषघ्नमग्लानिकरमविकारि विपर्यये । समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ।।

वक्तव्य—सुभूमौ जातम्—ओषधि प्रशस्तभूमि में उत्पन्न हुई होनी चाहिये । औषध के योग्य भूमि का वर्णन करते हुए सुश्रुत सू. अ. ३७ में कहा है—

श्वभ्रशर्कराश्मविषवल्मीकश्मसानावातन् देव्तायतनसिकताभिरनुपहतामनुषरामभङ्गुरामदूरोदकां स्निग्धां प्ररोहवतीं मृद्वीं स्थिरां समां कृष्णां गौरी लोहितां वा भूमिमौषधार्थं परीक्षेत ।। उपर्युक्त प्रकार की भूमि में उत्पन्न होने के बाद भी ओषधि में निम्न गुण होने चाहिये—तस्यां जातमपि कृमिविषशस्त्रातपपवनदहनतोयसंबाधमार्गैरनुपहतमेकरसं पुष्टं पृथ्ववगाढ़मूलमुदीच्यां चौषधमाददीतेत्यौषधभूमिपरीक्षाविशेषः सामान्यः । वह ओषधि कृमि विष आदि से अविकृत हो । काले चोद्धृतम्—प्रत्येक ओषधि योग्य काल में अर्थात् रस, वीर्य, विपाक आदि की दृष्टि से पूर्ण परिपक्व हो जाने पर ही तोड़नी चाहिये । ओषधियों के उखाड़ने के विषय में सुश्रुत सू. अ. ३७ में कहा है—सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वृतुष्वाददीताग्नेयान्येयाग्नेयेषु, एवमव्यापन्नगुणानि भवन्ति । सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वृतुषु गृहीतानि सोमगुणभूयिष्ठायां भूमौ जातान्यतिमधुरस्निग्धशीतानि जायन्ते । सोमगुण की प्रधानता वाली ओषधि को सौम्य ऋतु में तथा आग्नेय गुण प्रधान ओषधि को आग्नेय ऋतु में उखाड़ना चाहिये । इससे वे पूर्ण परिपक्व हो जाती हैं ।।५।।

तत्रातुरसंपत्—साध्यरोगता, सत्त्वबलबुद्धिशरीरेन्द्रियधृतितजसां दार्ढ्यं, निदानपूर्वरूपातङ्गोपद्रव-यात्रोपशयानुपशयानां यथावदाख्यानं, धात्र्या वा श्रद्दधानता, देवद्विजगुरुभिषग्भेषजसुहृदामभिनन्दनम्, आस्तिक्यं, विनयप्रधानता, यथोक्तकारित्वं वशित्वं चेति ।।

रोगी के गुण—जिसका रोग साध्य हो, जिसका सत्व (मन) बल, बुद्धि, शरीर, इन्द्रियां, धारणशक्ति तथा तेज दृढ़ हो, जो निदान, पूर्वरूप, रोग, उपद्रव, शरीरयात्रा, उपशय तथा अनुपशय को यथावत् बता सके, धात्री अथवा परिचारक में जिसे श्रद्धा या विश्वास हो, देव, द्विज, गुरु, वैद्य, ओषधि तथा मित्रों का जो अभिनन्दन (सम्मान) करता हो, जो आस्तिक हो अर्थात् परमात्मा में विश्वास रखता हो, जो विनयशील (नम्र) हो, आज्ञा का पालन करता हो तथा जिसकी इन्द्रियां अपने वश में हो अर्थात् संयमी हो—ऐसा रोगी गुणयुक्त माना गया है । चरक सू. अ. ९ में कहा है—स्मृतिनिर्देशकारित्वमभीरुत्वमथापि च । ज्ञापकत्वं च रोगाणामातुरस्य गुणाः स्मृताः ।। रोगी में—१. अपने रोग के प्रारंभ होने का स्मरण होना २. चिकित्सक के निर्देशानुसार कार्य करना ३. निडरता तथा ४. रोग को अच्छी प्रकार बता सकना—ये चार गुण होने चाहिये । इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है—आयुष्मान् सत्यवान् साध्यो द्रव्यवानात्मवानपि । आस्तिको वैद्यवाक्यस्थो व्याधितः पाद उच्यते ।।

तत्र परिचारकसंपत्—विपक्वकषायता, आरोग्यं, शक्तिः, भर्तृभक्तिः, उपचारज्ञता, दाक्ष्यं, शौचम्, आशुकारित्वं, सर्वकर्मसु कौशलम्, अघृणित्वम्, अक्षुद्रपुत्रत्वम्, अद्वैविध्यं, दमो, जितक्रोधादिता, सहिष्णुता चेति ।।७।।

परिचारक (सेवक) के गुण—कषायों का पकाना अर्थात् जो ओषधि आदि को पकाने का कार्य कर सकता है, आरोग्य, शक्ति, स्वामीभक्ति, उपचार को जानना अर्थात् रोगी के भोजन के लिये यूष, रस, आदि बनाना, उसे सुलाना तथा रोगी की सेवा (Nursing) का ज्ञान होना, निपुणता, पवित्रता, शीघ्र कार्य करना, सब कार्यों में कुशलता, घृणा का न होना, क्षुद्र-व्यक्ति का पुत्र न होना अर्थात् कुलीन होना, जिसमें द्वैविध्य (दोगलापन) न हो अर्थात् इधर की बात उधर और उधर की इधर न कहता हो, जिसने अपनी अपनी इन्द्रियों को वश में किया हुआ है, क्रोध आदि पर विजय पाई हुई है तथा जिसमें सहनशक्ति है—इन गुणों से युक्त परिचारक (सेवक) श्रेष्ठ माना जाता है । चरक सू. अ. ९ में कहा है—उपचारज्ञा दाक्ष्यमनुरागश्च भर्त्तरि । शौचं चेति चतुष्कोऽयं गुणः परिचरे जने ।। १. उपचार (सेवा आदि) को जानना

चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६] सूत्रस्थानम् ५७

२. दक्षता ३. स्वामीभक्ति तथा ४. पवित्रता—ये ४ गुण परिचारक में होने चाहिये। सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है— स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे। वैद्यवाक्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः॥ आजकल परिचर्या के लिये पुरुषों की अपेक्षा स्त्रीपरिचारिकाओं (Nerses) का प्रचलन बढ़ रहा है क्योंकि उनमें पुरुषों की अपेक्षा सेवा की प्रवृत्ति एवं सहानुभूति स्वाभाविक होती हैं तथा वे रोगी के कष्ट को अधिक अनुभव कर सकती हैं। चरक में उपर्युक्त चिकित्सा के प्रत्येक पाद के केवल चार २ गुणों का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार चिकित्सा के षोडशगुण माने गये हैं। इसलिये चरक में कहा है—कारणं षोडशगुणं सिद्धौ पादचतुष्टयम्।

इसी प्रकार अष्टाङ्गहृदय में भी कहा है—चतुष्पादं षोडशकलं भेषजमिति भिषजो भाषन्ते॥७॥

तत्र श्लोकाः

अस्य पादचतुष्कस्य मन्यन्ते श्रेष्ठमातुरम्।
तदर्थं गुणवन्तो हि त्रयः पादा इहेप्सिताः॥८॥

इन उपर्युक्त चारों पादों में से रोगी को श्रेष्ठ माना जाता है तथा उसी पाद (रोगी) के लिये अन्य तीनों गुणी पादों (वैद्य, ओषधि तथा परिचारक) की अपेक्षा होती है॥८॥

नेति प्रजापतिः प्राह भिषङ्मूलं चिकित्सितम्।
भिषग्वशे त्रिवर्गो हि सिद्धिश्च भिषजि स्थिता॥९॥
स युनक्ति प्रयुङ्क्ते च शास्ति च ज्ञानचक्षुषा।
तस्माज्ज्ञाने सविज्ञाने युक्तः श्रेष्ठतमो भिषक्॥१०॥
यदा चतुर्णां पादानां संपद्भवति जीवक!।
तदा धर्मार्थयशासां वैद्यो भवति भाजनम्॥११॥

वैद्य की श्रेष्ठता का प्रतिपादन—प्रजापति कश्यप ने कहा यह ठीक नहीं है। वस्तुतः चिकित्सा का मूल (प्रधान कारण) वैद्य है। शेष तीनों पादवैद्य के ही आधीन होते हैं तथा सिद्धि (चिकित्सा की सफलता) भी वैद्य पर ही निर्भर है। वह वैद्य ही ज्ञानचक्षुओं के द्वारा योजना (ओषधि आदि की व्यवस्था) करता है, उनका प्रयोग करता है, तथा शासन परिचारक को निर्देश—(Direction आदि) करता है। इस लिये ज्ञान तथा विज्ञान से युक्त वैद्य श्रेष्ठ माना जाता है। हे जीवक! जब चिकित्सा के उपर्युक्त चारों पाद गुणयुक्त होते हैं तब वैद्य धर्म, अर्थ एवं यश का भागी होता है। चरक सू. अ. ९ में भी वैद्य की प्रधानता स्वीकार की गई है—विज्ञाता शासिता योक्ता प्रधानं भिषगत्र तु। पक्तौ हि कारणं पक्तुर्यथा पात्रेन्धनानलाः॥ विजेतुर्विजये भूमिश्चमूः प्रहरणानि च। आतुराद्यास्तथा सिद्धौ पादाः कारणसंज्ञिताः॥ वैद्यस्यातश्चिकित्सायां प्रधानं कारणं भिषक्। मृद्दण्डचक्रमूत्राद्याः कुम्भकारादृते यथा॥ न वहन्ति गुणं वैद्यादृते पादत्रयं तथा॥ चिकित्सा में प्रधान कारण वैद्य ही है शेष तीनों गौण हैं क्योंकि वैद्य के अभाव में ये ओषधि आदि रोगनिवारण में समर्थ नहीं होते। इसी भाव को सुश्रुत सू. अ. ३४ में निम्न रूप दिया है—वैद्यहीनास्त्रयः पादाः गुणवन्तोऽप्यपार्थकाः। उद्गातृहोतृब्रह्माणो यथाऽध्वर्युं विनाऽध्वरे॥ वैद्यस्तु गुणवानेकस्तारयेदातुरान् सदा। प्लवं प्रतितरैर्हीनं कर्णधार इवाम्भसि॥ उपर्युक्त गुणवान् पादचतुष्टय की सहायता से रोगों के प्रतिकार करने को चिकित्सा कहते हैं। चरक में कहा है—चतुर्णां भिषगादीनां शस्त्रानां धातुवैकृते। प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते॥ इसलिये इस अध्याय का नाम ‘चिकित्सासंपदीय’ है॥९-११॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥

इति चिकित्सासंपदीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः ॥२६॥

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इति चिकित्सासंपदीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः ॥२६॥

५८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रोगाध्यायः २७]

सप्तविंशतितमोऽध्यायः

अथातो रोगाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम रोगाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

एको रोगो रुजाकरणसामान्यादिति भार्गवः प्रमतिः, द्वौ रोगौ निजश्वागन्तुश्चेति वार्योविदः, त्रयो रोगाः साध्ययाप्यासाध्या इति काङ्कायनः, चत्वारो रोगा आगन्तुवातपित्तकफजा इति कृष्णो भारद्वाजः पञ्च रोगा आगन्तुवातपित्तकफत्रिदोषजा इति दारुवाहो राजर्षिः षड्रङ्गोगाः षड्रसत्वादन्नपानस्येत्यृषिषडिन्द्रयः(?); सप्त रोगा वाताद्येकैकद्विद्वित्रिदोषजा इति हिरण्याक्षः, अष्टौ रोगा वाताद्येकैकद्विद्वित्रिदोषागन्तुनिमित्ता इति वैदेहो निमिः, अपरिसङ्ख्येयाः समहीनाधिकदोषभेदादिति वृद्धजीवकः, एवमनवस्थानमुपलभ्याह भगवान् कश्यपो—द्वावेव खलु रोगौ निजश्चागन्तुश्च, तावनेकविस्तराविति ॥३॥

प्रमति भार्गव ने कहा—रोग एक ही प्रकार का होता है—सब रोगों में पीडा (कष्ट) के समानरूप में विद्यमान होने से। अर्थात् रुक्-वेदना के विद्यमान होने से ही प्रत्येक रोग को सामान्यरूप से रोग कहते हैं। वार्योविद ने कहा—रोग निज और आगन्तु भेद से दो प्रकार के हैं। काङ्कापन ने कहा-रोग साध्य, असाध्य तथा याप्य भेद से तीन प्रकार के हैं। कृष्णभारद्वाज ने कहा—रोग आगन्तु तथा वात, पित्त और कफ दोष के अनुसार चार प्रकार का है। राजर्षि दारुवाह ने कहा-रोग आगन्तुक तथा वात, पित्त, कफ और त्रिदोष के भेद से पांच प्रकार का है (ऋषि षड्व्य ?) के अनुसार अन्नपान के षड्रसयुक्त होने से रोग ६ प्रकार के हैं। हिरण्याक्ष ने कहा—रोग सात प्रकार के हैं—वातादि दोषों से पृथक् तीन (वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक) द्विदोषज (वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक) तथा त्रिदोषज। वैदेह निमि ने कहा—रोग आठ प्रकार के हैं। उपर्युक्त सात के अतिरिक्त आठवां आगन्तु। वृद्धजीवक ने कहा—दोषों के सम, हीन तथा अधिक होने से रोग असंख्य हैं क्योंकि संसर्ग से दोषों के भेद अनेक हो जाते हैं। इस प्रकार अवस्था दोष (गड़बड़) को देखकर भगवान् कश्यप ने कहा—वस्तुतः रोग निज और आगन्तु भेद से दो ही प्रकार के हैं। उनके ही अनेक प्रकार के विस्तार हो जाते हैं ॥३॥

हेतुप्रकृत्यधिष्ठानविकल्पायतनार्थतः। ज्ञेया रोगा असङ्ख्येयाश्चिकित्सानां च विस्तरात् ॥४॥
अधिष्ठानद्वयं तेषां शरीरं मन एव च। मानसानां च रोगाणां कुर्याच्छारीरवत् क्रियाम् ॥५॥

रोगों के हेतु (कारण), प्रकृति (स्वभाव) तथा अधिष्ठान (आश्रय) के विकल्प के कारण तथा चिकित्सा के विस्तार के कारण रोग असंख्य माने जाते हैं अर्थात् हेतु, प्रकृति आदि के भेद से ही रोगों के असंख्य भेद हो जाते हैं। इन रोगों के शरीर और मन ये दो अधिष्ठान (आश्रय) हैं। मानसिक रोगों की भी शारीरिक रोगों की तरह ही चिकित्सा करनी चाहिये। चरक सू. अ. २० में भी कहा है—चत्वारो रोगा भवन्ति—आगन्तुवात पित्तश्लेष्मनिमित्ताः। तेषां चतुर्णामपि रोगाणां रोगत्वमेकविधं रुक्सामान्यात्। द्विविधा पुनः प्रकृतिरेषां आगन्तुनिजविभागात्। द्विविधं चैषामधिष्ठानं, मनःशरीरविशेषात्। विकाराः पुनरेषामपरिसंख्येयाः, प्रकृत्यधिष्ठानलिङ्गायतनविकल्पविशेषात् तेषामपरिसंख्येयत्वात्। इसी प्रकार चरक सू. अ. १८ में भी कहा है—त एवापरिसंख्येया भिद्यमाना भवन्ति हि। निदानवेदनार्थस्थानसंस्थाननामभिः ॥४-५॥

धातुस्थूणात्मवैषम्यं तद्दुःखं व्याधिसंज्ञकम्।
धातुस्थूणात्मसाम्यं तु तत्सुखं प्रकृतिश्च सा ॥६॥

रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ५९

वात, पित्त, कफ आदि तीन धातुरूपी त्रिस्थूणों की विषमता से ही दुख होते हैं। इसे ही व्याधि (रोग) कहते हैं। तथा धातुरूपी त्रिस्थूणों की साम्यावस्था ही सुख है तथा यही वास्तव में प्रकृति है। अर्थात् तीनों दोषों का समावस्था में होना ही प्रकृति या सुख है तथा इन्हीं की विषमावस्था को रोग कहते हैं। इसी संहिता के सूत्र स्थान के उपलब्ध प्रथम लेहनाध्याय में भी कहा है—अरोगस्तु समस्थूणा वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः ।। इसी प्रकार चरक सू. अ. ७ में भी कहा है—समपित्तानिलकफाः केचिद्गर्भादिमानवाः। दृश्यन्ते वातला केचित् पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा ।। तेषामनातुराः पूर्वे वातलाद्याः सदाऽऽतुराः ।। दोषों की समावस्था ही स्वस्थावस्था है। इसी लिये चरक सू. अ. १ में कहा है—धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् ।।६।।

अव्याहतशरीरायुर्भविवर्धेत वा कथम् । इत्यर्थं भेषजं प्रोक्तं विकाराणां च शान्तये ।।७।।

चिकित्सा का प्रयोजन—शरीर तथा आयु की अव्याहत रूप में वृद्धि तथा विकारों की शान्ति के लिये चिकित्सा कही गई है। अर्थात् चिकित्सा के दो प्रयोजन हैं—१. शरीर तथा आयु की वृद्धि (स्वस्थवृत) तथा २. उत्पन्न हुए रोगों की शान्ति करना। सुश्रुत सू. अ. १ में कहा है—इह खल्वायुर्वेदप्रयोजनं-व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोध्क्षः, स्वस्थस्य रक्षणं च। इसी प्रकार चरक सू. अ. ३० में भी कहा है—प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं चेति। आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी Preventive तथा Curative दो प्रकार की चिकित्सा मानी गई है ।।७।।

निजागन्तुनिमित्ता च द्विविधा प्रकृती रुजाम् । नखदन्ताग्निपानीयवधबन्धादिदेवताः (तः) ।।८।।

रोगों की निज और आगन्तु ये दो प्रकृतियां (कारण) होती हैं। इनमें आगन्तु रोगों के नख, दन्त, अग्नि, वर्षा, वध, बन्ध (बांधना), देवता, शाप तथा अभिचारकर्म आदि कारण हैं। तथा निज रोगों के कारण वातादि दोष हैं। अर्थात् वातादि दोषों की विषमता से निज रोग होते हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—मुखानि तु खल्वागन्तोनर्खदशनपतनाभिघाता-भिचाराभिशापाभिषङ्गव्यधबन्धपीडनरज्जुदहनमन्त्राशनि भूतोपसर्गादीनि, निजस्य तु मुखं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यम् ।।८।।

शापाभिचारादागन्तुर्निजा वातादिहेतवः । वातपित्तकफानां तु देहे स्थानानि मे शृणु ।।९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ४३ तमं पत्रम्)

अब तूँ मुझ से इन वात, पित्त तथा कफ के देह में स्थानों को सुन। अर्थात् शरीर में वातादि के कौन २ से स्थान हैं। इन दोषों के शरीर में सर्वव्यापी होने पर भी इनके विशेष स्थान तथा कर्म कहे जाते हैं ।।९।।

सर्वगानामपि सतां प्रायः स्थानं च कर्म च । अधोनाभ्यस्थिमज्जानौ वातस्थानं प्रचक्षते ।।१०।।
पित्तस्यामाशयः स्वेदो रक्तं सह लसीकया । मेदः शिर उरो ग्रीवा सन्धिर्बाहुः कफाश्रयः ।।११।।

शरीर में वात के मुख्य स्थान—नाभि का निचला हिस्सा, अस्थि तथा मज्जा-वायु के स्थान कहे जाते हैं। पित्त के स्थान—आमाशय, स्वेद, रक्त, लसीका (Lymph) ये पित्त के स्थान हैं। कफ के स्थान-मेद, सिर, छाती, ग्रीवा, सन्धि, तथा बाहु-कफ के स्थान हैं ।।१०-११।।

हृदयं तु विशेषेण श्लेष्मणः स्थानमुच्यते । आमपक्वाशयौ स्थानं विशेषात् पित्तवातयोः ।।१२।।

उपर्युक्त स्थानों के अतिरिक्त हृदय कफ का विशेष स्थान माना गया है। तथा आमाशय और पक्वाशय क्रमशः पित्त और वात के विशेष स्थान हैं। चरक सू. अ. २० में इनके स्थानों का निम्न प्रकार से उल्लेख किया गया है—तेषां त्रयाणामपि दोषाणां शरीरे स्थानविभाग उपदेक्ष्यते, तद्यथा-बस्तिः पुरीषाधानं कटिः संक्थिनी पादावस्थीनि च वातस्थानानि, तत्रापि पक्वाशयोविशेषेण वातस्थानं, स्वेदो रसो लसीका रुधिरमामाशयश्च पित्तस्थानानि, तत्राप्यामाशयो विशेषेण पित्तस्थानं, उरः शिरो ग्रीवा पर्वाण्यामाशयो मेदश्च श्लेष्मणः स्थानानि, तत्राप्युरो विशेषेण श्लेष्मणः स्थानम्। अष्टाङ्गहृदय सू. अ. १२

६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रोगाध्यायः २७]

में भी कहा है—पक्वाशयकटिसक्थिश्रोत्रास्थिस्पर्शनेन्द्रियम्। स्थानं वातस्य तत्रापि पक्वाधानं विशेषतः ॥ नाभिरामाशयः स्वेदो लसीका रुधिरं रसः। दृक्स्पर्शनं च पित्तस्य नाभिरत्रविशेषतः ॥ उरः कण्ठं शिरः क्लोम पर्वाण्यामाशयो रसः। मेदो घ्राणं च जिह्वा च कफस्य सुतरामुरः ॥१२॥

आगन्तुर्बाधते पूर्वं पश्चाद्दोषान् प्रपद्यते । निजस्तु चीयते पूर्वं पश्चाद्वृद्धः प्रबाधते ॥१३॥

आगन्तु तथा निज रोगों में भेद—आगन्तु रोग पहले शरीर को कष्ट पहुंचाता है तथा उसके बाद वातादि दोषों को उत्पन्न करता है। निज रोगों में प्रथम दोषों का चयन होता है फिर उसके बाद वृद्धि को प्राप्त होकर शरीर को कष्ट पहुंचाते हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—आगन्तुर्हि व्यथापूर्वसनु पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वषम्यमापादयति; निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्वं वैषम्यमापद्यन्ते, जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥१३॥

तस्मादागन्तरोगणामिष्यते निजवत् क्रिया । निजानां पूर्वरूपाणि दृष्ट्वा संशोधनं हितम् ।।१४।।

इसलिये आगन्तु रोगों की निज रोगों के समान ही चिकित्सा करनी चाहिये तथा निजरोगों के पूर्वरूपों को देखकर संशोधन करना चाहिये। अर्थात् यदि निज रोगों के होने की संभावना हो तो रोगों के लक्षणों के प्रकट होने से पूर्व ही इनका दोष एवं काल के अनुसार संशोधन कर लेना चाहिये।

हृदि श्लेष्मानुपश्लिष्टमाश्यावं रक्तपीतकम् । तदोजो, वर्धते जन्तुस्तद्वृद्धौ, क्षीयते क्षये ।।१५।।

ओज किसे कहते हैं—श्लेष्मा^१ से रहित, कुछ लालिमा तथा पीलापन लिये हुए जो श्वेत पदार्थ हृदय में रहता है उसे ओज कहते हैं। उस ओज की वृद्धि से प्राणी की वृद्धि होती है। तथा उसके क्षय होने पर प्राणी-क्षीण हो जाता है। चरक सू. अ. १७ में ओज का निम्न वर्णन किया है—हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तमीष सपीतकम्। ओजः शरीरे संख्यात तन्नाशान्ना विनश्यति ॥ इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. १५ में भी कहा है—ओजः सोमात्मकं स्निग्धं शुक्लं शीतं स्थिरं सरम्। विविक्तं मृदु मृत्स्नं च प्राणायतनमुत्तमम् ॥ देहः सावयवस्तेन व्याप्तो भवति देहिनाम्। तदभावाच्च शीर्यन्ते शरीराणि शरीरिणाम् ।। यह ओज प्राणायतन (जीवन का कारण) है। यह सम्पूर्ण देह में व्याप्त होता है। इसके अभाव में प्राणियों के देह नष्ट हो जाते हैं। कई विद्वान् इस ओज को अष्टम धातु मानते हैं। सुश्रुत सू. अ. १५ में कहा है—“तत्र रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत्परं तेजस्तत् खल्वोजस्तदेव बलमित्युच्यते” रस से लेकर शुक्र पर्यन्त धातुओं का जो परम तेज है उसे ही ओज कहा है। इसी को बल भी कहते हैं। वस्तुतः बल और ओज में भेद है। परन्तु सामान्यतया दोनों में अभेद माना है क्योंकि शरीर में बल की उत्पत्ति का प्रधान कारण ओज ही है तथा ओज के क्षय से बल का सबसे अधिक ह्रास होता है। ओज के विषय में प्राचीन ग्रन्थों में भिन्न २ वर्णन मिलता है। आधुनिक विद्वान् भी ओज के विषय में एक मत से अभी तक कुछ नहीं कह सके हैं। चक्रपाणि ने चरक की टीका में दो प्रकार का ओज माना है—“एतेन द्विविधमोजो दर्शयति परमपरं च। तत्राञ्जलिप्रमाणमपरम्, अल्पप्रमाणं तु परम्। अर्धञ्जलिपरिमितस्यौजसो धमन्य एव हृदयाश्रिताः स्थानम्, तथा प्रमेहेऽर्धाञ्जलिपरिमितमेवौजः क्षीयते, नष्टबिन्दुकम्। अस्य हि किंचित्क्षयेऽपि मरणं भवति, प्रमेहे तु ओजः क्षये जीवत्येव तावत्। ओजः क्षयलक्षणमपि अर्धाञ्जल्योजः क्षय एव बोद्धव्यम्”। इसका पूर्णरूप से निश्चय न होने पर भी यह तो स्पष्ट है कि ओज शरीर में एक अत्यन्त महत्व का पदार्थ है। पर-ओज हृदयाश्रयी और अष्टबिन्दु मात्रा वाला है। इसकी ही कमी होने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। अपर ओज वमन्याश्रयी है—उसकी कमी हो सकती है, उससे मृत्यु नहीं होती। मधुमेह आदि रोगों में इस अपर ओज का ही क्षय होता रहता है। आजकल के विज्ञान के अनुसार कई विद्वान् इसे जीवनीय द्रव्य, (Vitamins) कई Albumin तथा कई इसे अण्डकोश आदि ग्रन्थियों का


१. श्लेष्मणाऽसम्पृक्तमित्यर्थः, एतदेव ग्रन्थान्तरे विशुद्धपदेन दर्शितम् ।

रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ६१

स्त्राव (Internal Secretion of the testicles, ovaries and Prostate) आदि मानते हैं । परन्तु आधुनिक विज्ञान में हमें अभीतक कोई भी ऐसा उपयुक्त शब्द नहीं मिला है जो ओज का प्रतिनिधि हो सके । श्री रामरक्ष पाठक जी ने अपनी चरक की टीका में इसके विषय में कई भिन्न २ प्रचलित विचार दिये हैं । उन्होंने सूत्र स्थान के १७ वें अध्याय में इसका विस्तृत विवेचन किया है । विशेष ज्ञान के लिये जिज्ञासु पाठक इस विषय को वहां देखें ॥१५॥

मधुरस्निग्धशीतानि लघूनि च हितानि च । ओजसो वर्धनान्याहुस्तस्माद्बालांस्तथाऽऽशयेत् ।। १६ ।।

ओज की वृद्धि के साधन—मधुर, स्निग्ध, शीत, लघु तथा हितकारी पदार्थ ओज की वृद्धि करने वाले हैं । इसलिये बालकों को इन पदार्थों का सेवन करायें ॥१६॥

वृद्धिवर्णबलौजोग्निमेधायुःसुखकारणम् । वातादिसाम्यं, वैषम्यं विकारायोपकल्पते ।। १७ ।।

वातादि दोषों की समानता से शरीर की वृद्धि, वर्ण, बल, ओज, जाठराग्नि, मेधा, आयु तथा सुख की प्राप्ति होती है तथा इनकी विषमता से विकार (रोग) उत्पन्न हो जाते हैं । चरक में कहा है—विकारो धातुवैषम्यं साम्यं प्रकृतिरुच्यते । सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ॥१७॥

तेषामपरिमेयानां विकाराणां स्वलक्षणैः । आविष्कृततमान् व्याधीन यथास्थूलान् प्रचक्ष्महे ।। १८ ।।

उन असंख्य विकारों में से अपने २ लक्षणों सहित हम प्रसिद्ध २ तथा जो स्पष्ट हैं उन व्याधियों का वर्णन करेंगे ॥१८॥

अशीतिर्वातिका रोगाश्चत्वारिंशत्तु पैत्तिकाः ।
विंशतिः कफजाः प्रोक्ता वातरोगान्निबोध मे ।। १९ ।।

इनमें वात के ८०; पित्त के ४० तथा कफ (श्लेष्मा) के २० रोग हैं । चरक सू. अ. २० में भी इतने ही रोगों का परिगणन किया गया है—तद्यथा-अशीतिर्वातविकाराः, चत्वारिंशत्पित्तविकाराः, विंशति श्लेष्मविकाराः ॥१९॥

पादभ्रंशः पादशूलं नखभेदो विपादिका । पादसुप्तिर्वातखुडो वातगुल्फोऽनिलग्रहः ।। २० ।।
गृध्रसीपिण्डिकोद्वेष्टौ जानुविश्लेषभेदकौ । ऊरुस्तम्फोरुसादौ च पाङ्गुल्पं वातकण्टकः ।। २१ ।।
गुदभ्रंशो गुदार्तिश्च वृषणाक्षेपकस्तथा । शेफःस्तम्भः श्रोणिभेदो वंक्षणानाहविड्गदौ (इग्रहौ) ।।
उदावर्तोऽथ कुब्जत्वं वामनत्वं त्रिकग्रहः । पृष्ठग्रहः पार्श्वशूलमुदरावेष्टहृद्द्रवौ ।। २३ ।।
हृन्मोहो वक्षसस्तोदो वक्षोद्धर्षोपरोधकौ । ग्रीवास्तम्भो बाहुशोषः कण्ठोद्ध्वंसो हनुग्रहः ।। २४ ।।
दन्तचालौष्ठभेदौ च मूकत्वं वाग्ग्रहस्तथा । कषायास्यास्यशोषौ च घ्राणनाशो रशाज्ञता ।। २५ ।।
बाधिर्यमुच्चैः श्रवणं कर्णशूलमशब्दता । वर्त्मसंकोचविष्टम्भौ तिमिरं शूलमक्षिषु ।। २६ ।।
व्युदासो भ्रूव्युदासश्च शङ्खभेदः शिरोरुजा । स्फुटनं केशभूमेरच दण्डकाक्षेपकोऽर्दितम् ।। २७ ।।
एकाङ्गकः पक्षवधः श्रमभ्रमविजृम्भिकाः । प्रलापो वेपथुर्ग्लानी रौक्ष्यं निद्रापरिक्षयः ।। २८ ।।
श्यावारुणावभासत्वमनवस्थानमेव च । हिक्काश्वासौ विषादश्च वन्ध्यात्वं षाण्ढ्यमेव च ।। २९ ।।

अब तू मेरे से वातरोगों को सुन—१. पादभ्रंश (जहां पैर को उठाकर रखना हो वहां न पड़कर अन्यत्र जा पड़ना) २. पादशूल ३. नखभेद ४. विपादिका (बिवाई फटना) ५. पादसुप्ति (पैर का सोजानाव्या-स्पर्श ज्ञान न होना) ६. वात खुड (खुड-पैर तथा जंघा की सन्धि में वात का प्रकोप होना) ७. वातगुल्फ (गुल्फ=गिट्टे-Ankle में वातप्रकोप) ८ अनिलग्रह

६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रोगाध्यायः २७]

(वायु के द्वारा शरीर का पकड़ा जाना) ९. गृध्रसी (रींग बाय-Sciatica) १०. पिण्डकोद्वेष्ट (पिण्डलियों में उद्वेष्टन) ११. जानुविश्लेष (जानुसन्धि-Knee goint का ढीला होना) १२. जानुभेद (घुटनों में पीड़ा होना) १३. उरुस्तम्भ १४. उरुसाद (जंघाओं की शिथिलता) १५. पांगुल्य (पंगुला-लंगड़ापन) १६. वातकण्टक १७. गुदभ्रंश (Prolapse of Anus) १८. गुदार्ति (गुदा में पीडा) १९ वृषणाक्षेप (अण्ड-Testicles का नीचे न उतरना) २०. शेफःस्तम्भ (जननेन्द्रिय की जड़ता) २१. श्रोणिभेद (कटि में पीड़ा) २२. वंक्षणाह (वंक्षण प्रदेश-Groin में आनाह) २३. विड्गद या विड्ग्रह (मलरोग या मलबन्ध) २४. उतावर्त २५. कुब्जता (कुबड़ापत) २६. वामन (ठिगना होना) २७. त्रिकग्रह (त्रिकप्रदेश-Secrum का जकड़ा जाना) २८. पृष्ठग्रह (पीठ का जकड़ा जाना) २९. पार्श्वशूल ३० उदरावेष्ट (पेट में आवेष्टन-मरोड़ा होना) ३१. हृद्द्रव (हृदय का स्फुरण Palpitation of Heart) ३२. हृन्मोह (Heart failure) ३३. वक्षतोद (छाती या फुफ्फुस में सूचीवेधवत् पीडा) ३४ वक्षोद्धर्ष (छाती में घर्षणवत् पीडा अथवा फुफ्फुस में घर्षणवत् शब्द Crepitations का होना) ३५. वक्ष उपरोधक (छाती का रुका हुआ अनुभव होना) ३६. ग्रीवास्तम्भ (गर्दन का अकड़ जाना-Torticolis या Rhei Neek) ३७. बाहुशोष (बाहुओं का सूख जाना) ३८. कण्ठोध्वंस (स्वरभेद अथवा शुष्क कास) ३९, हनुग्रह ४०. दन्तचाल (दांतों का हिलना) ४१. ओष्ठभेद ४२. मूकता (गूंगापन) ४३. वाग्रह (वाणी का रुक जाना-बोल न सकना) ४४. कषायास्यता (मुख का स्वाद कसैला होना) ४५. आस्यशोष (मुखशोष-मुख का सूख जाना) ४६. घ्राणनाश (गन्धशक्ति का नष्ट हो जाना-गन्ध का ज्ञान न होना) ४७. रसाज्ञता (जिह्वा को रस का ज्ञान न होना) ४८. बधिरता ४९. उच्चैःश्रवण (ऊँचा सुनना) ५० कर्णशूल ५१. अशब्दता (शब्द का मालूम न पड़ना अथवा शब्द न होते हुए भी शब्दों का सुनाई पड़ना) ५२. वर्त्मसंकोच (वर्त्म-पलकों का सुकड़ना अथवा खोल न सकना) ५३. विष्टम्भ ५४. तिमिर (नेत्रपटल का रोग) ५५. अक्षिशूल ५६. अक्षिव्युदास (आंखों का ऊपर चढ़ा रहना ५७. भ्रूव्यदास (भौओं का ऊपर चढ़ा रहना) ५८. शङ्ख भेद (शङ्खदेश-Temporal region में वेदना) ५९. शिरोरुजा (शिर में पीडा) ६०. केशभूमिस्फुटन (बालों की जड़ों का फूटना) ६१. दण्डकाक्षेप ६२. अर्दित (Facial paralysis) ६३. एकाङ्गक (एकाङ्गवध) ६४. पक्षवध (पक्षाघात) ६५. श्रम (थकावट) ६६. भ्रम (चक्कर आना Giddiness) ६७. विजृम्भिका (जंभाई) ६८. प्रलाप ६९. वेपथु (कम्पन) ७०. ग्लानि ७१. रूक्षता ७२. निद्रापरिक्षय (निद्रानाश) ७३. श्यावारुणावभासता (शरीर अथवा अङ्गों का श्याव तथा अरुण वर्ण का होना) ७४. अनवस्थान (चित्त का स्थिर न होना) ७५. हिक्का ७. श्वास ७७. विषाद (अप्रसन्नता) ७८. वन्ध्यात्व (बांझपना) ७९. षाण्ढ्य (नपुंसकता) तथा ८०. प्रतिश्याय—ये प्रधानरूप से वातिक रोग हैं। चरक सू. २० में भी लगभग इन्हीं ८० वातरोगों का परिगणन किया गया है—तत्रादौ वातविकाराननुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—नखभेदश्च, विपादिका च, पादशूलं च, पादभ्रंशश्च, पादसुप्तता च वाताखुड्डता च, गुल्फग्रहश्च पिण्डिकोद्वेष्टनं च, गृध्रसी च, जानुभेदश्च, जानुविश्लेषश्च, उरुस्तम्भश्च, उरुसादश्च, पाङ्गल्यं च, गुदभ्रंशश्च, गुदार्तिश्च, वृषणोत्क्षेपश्च, शेफःस्तम्भश्च, वङ्क्षणाहश्च, श्रोणिभेदश्च विड्भेदश्च, उदावर्तश्च, खञ्जत्वं च, (कुब्जत्वं च,) वामनत्वं च, त्रिकग्रहश्च, पृष्ठग्रहश्च, ग्रीवावमर्दश्च, उदरावेष्टश्च, हृन्मोहश्च, हृद्द्रवश्च, 'वक्ष उद्धर्षश्च, वक्ष उपरोधश्च (वक्षस्तोदश्च), बाहुशोषश्च, ग्रीवास्तम्भश्च, मलास्तम्भश्च, कण्ठोद्ध्वंसश्च, हनुस्तम्भश्च, ओष्ठभेदश्च (अक्षिभेदश्च), दन्तभेदश्च, दन्तशैथिल्यं च, मूकत्वं च (गद्गदत्वं च), वाक्सङ्गश्च, कषायास्यता च, मुखशोषश्च असंज्ञता च (अगन्धता च, घ्राणनाशश्च), कर्णशूलं च, अशब्दश्रवणं च, उच्चैःश्रुतिश्च, बाधिर्यं च, वर्त्मस्तम्भश्च, वर्त्मसंकोचश्च, तिमिरं च, अक्षिशूलं च, अक्षि व्युदासश्च, भ्रूव्युदाश्च, शङ्खभेदश्च, ललाटभेदश्च, शिरोरुक् च, केशभूमिस्फुटनं च, अर्दितं च, एकाङ्गरोगश्च, सर्वाङ्गरोगश्च (पक्षवधश्च) आक्षेपकश्च, दण्डकश्च, श्रमश्च, भ्रमश्च, वेपथुश्च, जृम्भा च, विषादश्च (हिक्का च, अतिप्रलापश्च, ग्लानिश्च, रौक्ष्यं च, पारुष्यं च, श्यावारुणावभासता च, अस्वप्नश्च, अनवस्थितत्वं चे यशीतिर्वातविकारा वातविकाराणामपरिसंख्येया-नामाविष्कृततमा व्याख्याताः ॥२०-२९॥