काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 407, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदनाध्यायः २५] सूत्रस्थानम् ४९
ऋषियों द्वारा उपासना किये जाते हुए कश्यप को दारुवाह द्वारा प्रेरित वृद्धजीवक ने वेदना संबन्धी उपदेश देने के लिये प्रेरित किया (प्रार्थना की)। भगवन् ! मुख से न बोल सकने वाले बालकों की उत्पन्न हुई विविध प्रकार की वेदनाओं को वैद्य लक्षणों से किस प्रकार जाने (पहचाने) अर्थात् वे कौनसे लक्षण हैं जिनसे वैद्य बालकों के भिन्न २ रोगों तथा वेदनाओं को पहचान सकता है क्योंकि इस अवस्था में बालक स्वयं अपने मुंह से किसी भी अपने कष्ट को बतलाने में असमर्थ होता है।
इति पृष्टो महाभागः कश्यपो लोकवृद्धपः। प्रोवाच वेदनास्तस्मै कारणैर्बालदेहजाः ॥५॥
इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर महान् ऐश्वर्यशाली तथा आयु की दृष्टि से वृद्ध कश्यप ने भिन्न २ कारणों से उत्पन्न होने वाली बालकों की शारीरिक वेदनाओं का उसे उपदेश किया।
भृशं शिरः स्पन्दयति निमीलयति चक्षुषी। अवकूजत्यरतिमानस्वप्नश्च शिरोरुजि ॥६॥
शिरःशूल—शिरःशूल में बालक सिर को बहुत अधिक हिलाता है, आंखें बन्द कर लेता है, रात्रि को सोते २ चिल्लाता है (Night terrors) उसे आहार में ग्लानि हो जाती है तथा उसे नींद नहीं आती है।
कर्णौ स्पृशति हस्ताभ्यां शिरो भ्रमयते भृशम्। अरत्यरोचकास्वप्नैर्जानीयात् कर्णवेदनाम् ॥७॥
कर्णवेदना—कानों की वेदना में बालक हाथों से दोनों कानों का स्पर्श करता है, सिर को बहुत हिलाता है, ग्लानि तथा अरुचि हो जाती है। और उसे नींद नहीं आती है।
लालास्त्रावणमत्यर्थं स्तनद्वेषारतिव्यथाः। पीतमुद्गिरति क्षीरं नासाश्वासी मुखामये ॥८॥
मुखरोग—मुखरोग में बालक के मुख से अत्यन्त लालास्राव होता है, दूध से द्वेष (अरुचि) हो जाती है, उसे ग्लानि एवं व्यथा (पीडा) होती है, पीये हुए दूध को उगल देता है तथा नासिका से श्वास लेता है।
पीतमुद्गिरति स्तन्यं विष्टम्भिश्चश्लेष्मसेवनम्। ईषज्ज्वरोऽरुचिर्ग्लानिः कण्ठवेदनायाऽदिति ॥९॥
(इति ताडपत्रपुस्तके ४१ तमं पत्रम्)
कण्ठवेदना—गले की वेदना में बालक पीये हुए दूध को उगल देता है, श्लेष्मवर्धक पदार्थों के सेवन से उसे विष्टम्भ हो जाता है, हल्का ज्वर, अरुचि तथा ग्लानि हो जाती है।
लालास्रावोऽरुचिर्ग्लानिः कपोले श्वयथुर्व्यथा। मुखस्य विवृतत्वं च जानीयादधिजिह्विकाम् ॥१०॥
अधिजिह्विकारोग—इसमें लालास्राव, अरुचि, ग्लानि, कपोल पर शोथ तथा पीडा होती है और मुख खुला रहता है।
वक्तव्य—अधिजिह्विका के लक्षण सुश्रुत नि. अ. १६ में निम्न दिये हैं—जिह्वारूपः श्वयथुः कफात्तु जिह्वाप्रबन्धोपरि रक्तमिश्रात्। ज्ञेयोऽधिजिह्वः खलु रोग एषः .............. ॥
ज्वरारुचिमुखस्रावा निष्टनेश्व गलग्रहे। कण्डू(ण्ठ)के श्वयथुः कण्ठे ज्वरारुचिशिरोरुजः ॥११॥
ग्रहरोग—इसमें बालक को ज्वर, अरुचि, मुख से लालास्राव तथा श्वास लेने में कष्ट होता है।
कण्ठशोथ—कण्ठ (गले) में शोथ, ज्वर, अरुचि, तथा शिरःशूल होता है।
मुहुर्नमयतेऽङ्गानि जृम्भते कासते मुहुः।
धात्रीमालीयतेऽकस्मात् स्तनं(न्यं) नात्यभिनन्दति ॥१२॥