भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | वेदनाध्यायः २५]

तथा रसशेषाजीर्ण में परिशोधन का उल्लेख है। इसका अभिप्राय यह है कि इनमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी किये जा सकते हैं। इसीलिये अष्टाङ्गहृदय में कहा है—‘‘यथावस्थं हितं भवेत्’’।

सस्नेहलवणव्योषः पेयो मांसरसोऽपि वा । बालमूलकयूषो वा हितः शाल्योदनस्तथा ।।
चिकित्सितं पञ्चजनान् (द्) राज्ञो राजोपमस्यवा । धनिनां निर्धनानां वा यथार्थमुपकल्पयेत् ।।

इन अजीर्णों में पहले जिस पथ्य भोजन का निर्देश किया है वही इनमें देना चाहिये। दीर्घकाल (अर्थात् उचित समय पर स्वयं भी अन्न जीर्ण हो जाता है), औषध, दाडिम सहित मूंगों का मण्ड, स्नेह (अल्प घृत) लवण तथा त्रिकटु युक्त मांसरस, कच्ची मूल का यूष तथा शालिचावलों का भात—हितकर है।

बलघ्नं दोषशमनं बलवर्णसुखावहम्। सम्यक् संशोधनं कृत्वा दीर्घमायुरवाप्नुते ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
इत्युपकल्पनीयोऽध्यायश्चतुर्विंशतितमः ।।२४।।

इस प्रकार राजा, राजासदृश (रईस आदि), धनी तथा निर्धनों का ठीक २ संशोधन करे। अर्थात् धनी एवं निर्धन व्यक्तियों का परिस्थिति के अनुसार संशोधन करना चाहिये। चरक सू. अ. १५ में कहा है—अनेन विधिनाराजा राजमात्रोऽथवा पुनः। यस्य वा विपुलं द्रव्यं स संशोधनमहैति ॥ दरिद्रस्त्वापदं प्राप्य प्राप्तकालं विरेचनम्। पिबेत्काममसंभृत्य संभारानपि दुर्लभान् ॥ न हि सर्वमनुष्याणां सन्ति सर्वपरिच्छदाः । न च रोगा न बाधन्ते दरिद्रानपि दारुणाः ॥ यद्यच्छक्यं मनुष्येण कर्तुमौषधमापदि । तत्त सेव्यं यथाशक्ति वसनान्यशनानि च ॥

बल को नष्ट करने वाले (संशोधन में प्रारंभ में रोगी का बल कुछ कम हो जाता है), दोषों का शमन करने वाले, बलवर्ण तथा सुख को देने वाले संशोधन को सम्यक् प्रकार से यथाविधि करके मनुष्य दीर्घ आयु को प्राप्त करता है अर्थात् चिरायु होता है। चरक में कहा है—मलापहं रोगहरं बलवर्णप्रसादनम्। पीत्वा संशोधनं सम्यगायुषा युज्यते चिरम् ॥

अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—बुद्धिप्रसादं बलमिन्द्रियाणां धातुस्थिरत्वं ज्वलनस्य दीप्तिम्। चिराच्च पाकं वयसः करोति संशोधनं सम्यगुपास्यमानम् ॥

संशोधन के द्वारा शमन किये हुए दोष फिर प्रादुर्भूत नहीं होते। चरक सू. अ. १६ में कहा है—दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिताः लङ्घनपाचनैः। जिताः संशोधनैर्यै तु न तेषां पुनरुद्भवः ॥

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इत्युपकल्पनीयोऽध्यायश्चतुर्विंशतितमः ॥२४॥


पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

अथातो वेदनाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम वेदनाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

उपास्यमानमृषिभिः कश्यपं वृद्धजीवकः। चोदितो दारुवाहेन वेदनायेंऽभ्यचोदयत् ।।३।।
बालकानामवचसां विविधा देहवेदनाः। प्रादुर्भूताः कथं वैद्यो जानीयाल्लक्षणार्थतः ।।४।।