काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् वेदनाध्यायः २५]
प्रस्त्रावोष्णत्ववैवर्ण्यं ललाटस्यातितप्तता । अरुचिः पादयोः शैत्यं ज्वरे स्युः पूर्ववेदनाः ।।९३।। ज्वर (Fever)—इसमें बालक बार २ अङ्गों को सुकोड़ता है, जंभाई लेता है, बार २ खांसता है, सहसा धात्री से चिपक जाता है, स्तन या दूध की विशेष इच्छा नहीं करता, मुख से लालास्राव होता है, उसका शरीर उष्ण तथा विवर्ण (सफेद या पीला) रहता है, ललाट (माथा) गरम रहता है, अरुचि होती है तथा उसके पैर ठण्डे हो जाते हैं—ये सब लक्षण बालक को ज्वर होने से पूर्व होते हैं।
देहवैवर्ण्यमरतिर्मुखग्लानिरनिद्रता । वातकर्मनिवृत्तिश्चेत्यतीसाराग्रवेदनाः ।।९४।। अतिसार (Diarrhoea)—शरीर विवर्ण (पीला या सफेद) हो जाता है, अरति तथा मुखग्लानि हो जाती है, निद्रा नहीं आती, तथा वायु के कर्मों की निवृत्ति हो जाती है अर्थात् वायु अपना अनुलोमन का कार्य नहीं करती है—ये सब अतिसार के पूर्व लक्षण हैं।
स्तनं व्युदस्यते रौति चोत्तानश्चावभज्यते । उदरस्तब्धता शैत्यं मुखस्वेदश्च शूलिनः ।।९५।। उदरशूल (Intestinal colic)—बालक स्तन पान करना छोड़ देता है, वह रोता है, उत्तान (सीधा-ऊपर को मुख कर के) लेटता है तथा उदर में स्तब्धता होती है, उसे सर्दी लगती है तथा मुख पर पसीना आजाता है।
अनिमित्तमभीक्ष्णं च यस्योद्गारः प्रवर्तते । निद्राजृम्भापरीतस्य छर्दिस्तस्योपजायते ।।९६।। छर्दिरोग (वमन-Vomiting)—बालक को बिना किसी कारण के बार २ डकार आते हों, तथा निद्रा और जंभाई आरही हो तो ऐसा जानना चाहिये कि बालक को वमन होगा।
निघ्नन्तुरसाऽत्युष्णं श्वासस्तस्योपजायते । अकस्मान्मारुतोद्गारः कृशे हिक्का प्रवर्तते ।।९७।। श्वासरोग—श्वासरोग में बालक के छाती से अत्यन्त गरम सांस निकलते हैं। हिक्का—कृश व्यक्ति में एक दम वायु की डकार आवे तो हिक्का होने की संभावना होती है।
स्तनं पिबति चात्यर्थं न च तृप्ति-(प्य) ति रोदिति । शुष्कोष्ठतालुस्तोयेप्सुर्दुर्बलस्तृष्णयाऽर्दितः ।।९८।। तृष्णा—अत्यधिक स्तनपान करने पर भी यदि तृप्त नहीं होता तथा रोता रहता हो, और ओष्ठ तथा तालु सूख गये हों, यदि जल का इच्छुक हो अर्थात् जल चाहता हो तो जानना चाहिये कि बालक को प्यास लगी है।
विशालस्तब्धनयनः पर्वभेदारतिक्कमी । संरुद्धमूत्रानिलविट् शिशुरानाहवेदनी ।।९९।। आनाह—जिसकी आंखें फैली हुई हों तथा स्तब्ध हों, जिसके जोड़ों में दर्द हो, जिसे अरति तथा क्लम (थकावट) हो, जिसके मूत्र, वायु तथा मल सभी रुक गये हों, उस बालक को आनाह (अफारा) समझना चाहिये।
अकस्मादट्टहसनमपस्माराय कल्पते । प्रलापारतिवैचित्त्यैरुन्मादं चोपलक्षयेत् ।।१००।। अपस्मार—इसमें बालक सहसा जोर से अट्टाहास करने लगता है। उन्माद—इसमें प्रलाप (Delirium), अरति तथा वैचित्य (चित्तभ्रम—Upset mind) हो जाता है।
रोमहर्षोऽङ्गहर्षश्च मूत्रकाले च वेदना । मूत्रकृच्छ्रे दशत्योष्ठौ बस्तिं स्पृशति पाणिना ।।१०१।। मूत्रकृच्छ्र (Disurea)—इसमें बालक को रोमहर्ष (बालों का खड़ा होना), अङ्गहर्ष (अङ्गों में कंपकंपी होना) तथा मूत्रत्याग के समय वेदना होती है (Pain during micturation) वह ओष्ठदंशन (ओष्ठ को दांतों के नीचे दबाना) करता है तथा हाथ से बस्तिप्रदेश का स्पर्श करता है।