काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 409, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदनाध्यायः २५] सूत्रस्थानम् ५१
गौरवं बद्धता जाड्यमकस्मान्मूत्रनिर्गमः ।
प्रमेहे मक्षिकाका (क्रा) न्तं मूत्रं श्वेतं घनं तथा ।।२२।।
प्रमेह—इसमें बालक का शरीर भारी होता है तथा बंधा हुआ सा और जड़ होता है। तथा अकस्मात् उसका मूत्र निकल जाता है, जिसपर मक्खियां बहुत बैठती हैं तथा मूत्र का रंग श्वेत एवं घन होता है अर्थात् उसका आपेक्षिक गुरुत्व अधिक होता है। साधारण मूत्र का आपेक्षिक गुरुत्व (Specific gravity) १०१० से १०२० तक होता है। किन्तु प्रमेह में इसका गुरुत्व अधिक अर्थात् लगभग १०४०-१०५० तक हो जाता है।
बद्धपक्वपुरीषत्वं सरक्तं वा कृशात्मनः । गुदनिष्पीडनं कण्डूं तोदं चार्शसि लक्षयेत् ।।२३।।
अर्शरोग (बवासीर-Piles)—इसमें मल बंधा हुआ तथा पक्व होगा, साथ में रक्त भी होगा तथा बालक कमजोर होगा। उसकी गुदा में वेदना, कण्डू तथा तोद होगा।
सशर्करातिमूत्रत्वं मूत्रकाले च वेदना । प्रवृत्तं रोदिति क्षामस्तं ब्रूयादश्मरीगदम् ।।२४।।
अश्मरी (Stone in Bladder)—यदि मूत्र शर्करा (Sand) से युक्त हो तथा मात्रा में अधिक होता हो, मूत्रत्याग के समय वेदना होती हो, बालक बहुत अधिक और लगातार रोता हो तथा बहुत दुर्बल हो तो अश्मरी (पथरी) रोग समझना चाहिये।
रक्तमण्डलकोत्पत्तिस्तृष्णा दाहो ज्वरोऽरतिः । स्वादुशीतोपशायित्वं विसर्पस्याग्रवेदनाः ।।२५।।
विसर्परोग (Erysipelus)—इस रोग में बालक के शरीर पर रक्तमण्डल (लाल २ चकत्ते-Rashes) बन जाते हैं। उसे तृष्णा, दाह, ज्वर, अरति, होती है तथा उसे मधुर एवं शीत द्रव्यों के सेवन की इच्छा होती है।
दह्यन्तेऽङ्गानि सूच्यन्ते भज्यन्ते निष्ठनत्यति । विसूचिकायां बालानां हृदि शूलं च वर्धते ।।२६।।
विसूचिका—बालक के अङ्गों में दाह होता है, सूची भेद सदृश पीडा होती है, उसे सांस लेने में कष्ट होता है तथा हृदय में शूल होता है—ये बालकों में विसूचिका के लक्षण होते हैं।
शिरो न धारयति यो भिद्यते जृम्भते मुहुः । स्तनं पिबति नात्यर्थं ग्रथितं छर्दयत्यपि ।।२७।।
विषादाध्मानारुचिभिर्विद्यादलसकं शिशोः । विसूचिकालसकयोर्दुर्ज्ञानि लक्षणौषधे ।।२८।।
अलसक—बालक थोड़ी देर भी सिर को ठीक तरह से धारण नहीं कर सकता है, उसके शरीर का भेदन होता है, वह बार २ जंभाई लेता है, अधिक स्तनपान नहीं करता है, ग्रथित (गांठों से युक्त) वमन कर देता है, तथा विषाद, आध्मान और अरुचि होती है—इन लक्षणों से बालक को अलसक रोग जानें। विसूचिका तथा अलसक रोग के लक्षण एवं औषधि के भेद का ज्ञान कठिनता से होता है। अर्थात् इन दोनों में भेद करना कठिन होता है। विसूचिका तथा अलसक दोनों आमदोष हैं। इन दोनों के भेद के लिये चरक वि. अ. २ में कहा है—तत्र विसूचिकामूर्ध्वं चाधश्च प्रवृत्तामामदोषां यथोक्तरूपां विद्यात् । अर्थात् विसूचिका में आम दोष ऊपर और नीचे दोनों मार्गों से प्रवृत्त होते रहते हैं तथा इसमें तीनों दोषों का प्रकोप होता है। अष्टाङ्गसंग्रह में कहा है—विविधैर्वेदनाभेदैर्वाय्वादिभृशकोषतः । सूचीभिरिव गात्राणि विध्यतीति विसूचिका ।। इसी प्रकार सुश्रुत में कहा है—सूचीभिरिव गात्राणि तुदन् सन्तिष्ठतेऽनिलः । यस्याजीर्णेन सा वैद्यैर्विसूचिति निगद्यते ।। अर्थात् इसमें वायु के प्रकोप से शरीर में विविध प्रकार की सुई चुभने के समान वेदनाएं होती हैं। अलसक के विषय में कहा है—दुर्बलस्याल्पाग्नेर्बहुश्लेष्मणोवातमूत्रपुरीषवेगविधारिणः स्थिरगुरुबहुरूकशीतशुष्कान्नसेविनस्त-दन्नपानमनिलप्रपीडितं श्लेष्मणा च विबद्धमार्गमतिमात्रप्रलीनमलसत्वान्न बहिर्मुखी भवति, ततश्छर्द्यतिसारवर्ज्यान्मामप्रदोषलिङ्गानि