काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् वेदनाध्यायः २५]
यथोक्तान्यभिदर्शयत्यतिमात्राणि; अतिमात्रप्रदुष्टाश्च दोषाः प्रदुष्टामबद्धमार्गास्तिर्यग्गच्छन्तः कदाचित्केवलमेवास्य शरीरं दण्डवत्स्तम्भयन्ति, ततस्तमलसकमसाध्यं ब्रुवते । अर्थात् इसमें कफ द्वारा मार्गों के बन्द होने से सेवन किया हुआ अन्न पान अन्दर ही रुककर आलसी होने के कारण बाहर नहीं निकलता तथा इसमें वमन तथा अतिसार को छोड़कर आमदोष के सब लक्षण उपस्थित हो जाते हैं ।
अन्यत्र भी कहा है—प्रपातिनोर्ध्वं नाधस्तान्नाहारोऽपि विपच्यते । आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः ॥ यही इन दोनों में अन्तर है ।
दृष्टिव्याकुलता तोदशोथशूलास्ररक्तताः । सुप्तस्य चोपलिप्यन्ते चक्षुषी चक्षुरामये ॥२९॥
चक्षुरोग—इसमें दृष्टि की व्याकुलता, चक्षुओं में तोद, शोथ, शूल, अश्रुBufferओं का अधिक आना (Lacrimation) और लालिमा (Congestion) होती है । सोने पर दोनों आंखें (पलक-Eye lashes) परस्पर (Discharge के कारण) चिपक जाती हैं ।
घर्षत्यङ्गानि शयने रोदितीच्छति मर्दनम् । शुष्ककण्ड्वऽर्दितं विद्यात्ततश्चार्द्रा प्रवर्तते ॥३०॥ सुखायते मृद्यमानं मृद्यमानं च शूयते । शूनं स्रवति सस्योढा (?) मार्द्रयां शूलदाहवत् ॥३१॥
शुष्ककण्डू (Pruritis)—इस रोग में बालक रात्रि को सोते समय अङ्गों का घर्षण करता है (रगड़ता है), वह रोता है तथा शरीर का मर्दन करना चाहता है । आर्द्रकण्डू—शुष्क के बाद आर्द्रकण्डू प्रारंभ होती है । इसमें रोगी रगड़ने पर सुख (आनन्द) का अनुभव करता है । रगड़ने पर वह बढ़ जाती है तथा बढ़ने के बाद उसमें से स्राव (Discharge) आने लगता है । इस प्रकार बढ़ी हुई इस आर्द्रकण्डू में शूल एवं दाह होती है ।
स्तैमित्यमरुचिर्निद्रा गात्रपाण्डुकताऽरतिः । रमणाशनशय्यादीन् धात्रीं च द्वेष्टि नित्यशः ॥३२॥ अस्नातः स्नातलूपश्च स्नातश्चास्नातदर्शनः । आमस्यैतानि रूपाणि विद्याद्वैद्यो भविष्यतः ॥३३॥
आमदोष—इस रोग में स्तिमितता (शरीर का चिपचिपापन), अरुचि, निद्रा, शरीर का पाण्डु (Anaemic) होना और अरति होती है तथा बालक को खेल, भोजन तथा निद्रा तथा धात्री से भी निरन्तर द्वेष (अरुचि या घृणा) हो जाती है । यदि उसने स्नान नहीं किया हुआ है तो स्नान किये हुए के समान प्रतीत होता है । और यदि स्नान किया हुआ है तो स्नान न किये हुए के समान प्रतीत होता है । यदि ये लक्षण हों तो उन्हें देखकर वैद्य कह सकता है कि इस बालक को आमदोष होने वाला है ।
नाभ्यां समन्ततः शोथः श्वेताक्षिनखवक्त्रता । पाण्डुरोगेऽग्निससादश्च श्वयथुश्चाक्षिकूटयोः ॥३४॥ पीतचक्षुर्नखमुखविण्मूत्रः कामलार्दितः । उभयत्र निरुत्साहो नष्टाग्निरुधिरस्पृहः ॥३५॥
पाण्डुरोग (Anaemia)—इसमें नाभि के चारों ओर शोथ होता है । आंखें, नाखून तथा मुंह सफेद हो जाता है । उसे अग्निमांद्य हो जाता है तथा उसकी आंखों के चारों ओर शोथ हो जाता है । कामला (Jaundice) रोग—इसमें आंखें, नाखून, मुख, मल तथा मूत्र पीले हो जाते हैं (Bile Pigments के कारण) । पाण्डु एवं कामला इन दोनों रोगों में मनुष्य उत्साह शून्य होता है, उसकी जठराग्नि नष्ट हो जाती है तथा रुधिर के प्रति उसकी स्पृहा (आकांक्षा अथवा आवश्यकता) होती है ।
मूर्च्छाप्रजागरच्छर्दिधात्रीद्वेषारतिभ्रमैः । वित्रासोद्वेगतृष्णाभिर्विद्याद्बाले मदात्ययम् ॥३६॥
मदात्यय—मूर्छा, जागरण (अनिद्रा Insomnia) वमन, धात्री से द्वेष (अनिच्छा-अरुचि), अरति, भ्रम, वित्रास (डर), उद्वेग (वेगों की प्रबलता) तथा तृष्णा-इन लक्षणों से बालक में मदात्ययरोग का ज्ञान होता है ।