काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवेदनाध्यायः २५] सूत्रस्थानम् ५३
मुहुर्मुखैनोच्छ्वसिति पीत्वा पीत्वा स्तनं तु यः । स्रवतो नासिके चास्य ललाटं चाभितप्यते ।। ३७ ।।
स्रोतांस्यभीक्ष्णं स्पृशति पीनसे क्षौति कासते । उरोघाते तथैव स्यान्निघ्नन्त्युरसाऽधिकम् ।। ३८ ।।
पीनसरोग (प्रतिश्याय)—जो बालक स्तनपान करता हुआ बार-बार मुख से श्वास लेता है, जिसकी नासिका से स्राव होता रहता है, ललाट तप्त (गरम) रहता है, स्रोतों का बार २ स्पर्श करता है, छींकता है तथा खांसता रहता है—उसे पीनसरोग से आक्रान्त जानना चाहिये । उरोघात—इसमें पूर्वोक्त लक्षणों के साथ २ बालक छाती से बड़े गरम २ सांस निकालता रहता है ।
स्वस्थवृत्तपरो बालो न शेते तु यदा निशि । रक्तबिन्दुचिताङ्गश्च विद्यात्तं जन्तुकादितम् ।। ३९ ।।
जन्तुदंश (Insect Bite)—स्वस्थ (नीरोग) बालक यदि रात्रि में न सोये तथा उसके किसी अंग पर लाल २ बिन्दु दिखाई दें तो यह समझना चाहिये कि उसे किसी जन्तु ने काटा है ।
वक्तव्य—बालकों के रोगों तथा वेदनाओं के ज्ञान के लिये सुश्रुत शा. अ. १० में भी कुछ लक्षण संक्षेप से दिये गये हैं—अङ्गप्रत्यङ्गदेशे तु रुजा यत्रास्य जायते । मुहुर्मुहुः स्पृशति तं स्पृश्यमाने च रोदिति ।। निमीलिताक्षो मूर्धस्थे शिरोरोगे न धारयेत् । बस्तिस्थे मूत्रसङ्गात्तौ रुजा तृष्यति मूर्च्छति ।। विण्मूत्रसङ्गवैवर्ण्यच्छर्द्याध्मानानन्त्रकूजनैः । कोष्ठे दोषान् विजानीयात् सर्वत्रैस्वांश्च रोदनैः ।
यदा तु ललिता धात्री सुखिनी सर्वभोगिनी । पश्यत्यभीक्ष्णं दुःस्वप्नं स्वयं क्षीरं प्रवर्तते ।। ४० ।।
बालो वि(ऽप) स्मरते चास्याः सहसाऽङ्गात् पतत्यपि ।
असज्जनेन संसर्ग याति संभोजनं तथा ।। ४१ ।।
मृतापत्यावकीर्णीभिः परवृद्ध्यसहिष्णुभिः । अमङ्गलानि घोराणि पश्यत्याचरतेऽपि च ।। ४२ ।।
सेवते विपरीतानि मृत्युं चोदयते शिशोः । सुप्ते शिशौ निलीयन्ते पक्षिणो दारुणोदयाः ।। ४३ ।।
विडालो लङ्घयत्येनं परधूमं च जिघ्रति । परावतारणबलिं प्रेक्षते लङ्घयत्यपि ।। ४४ ।।
दुर्गन्धदेहवक्त्रत्वं नासिकाग्रे मलोद्भवः । अहद्यरक्तमाल्यानां मातापुत्रनिषेवणम् ।। ४५ ।।
भस्माङ्गारतुषादीनामधिरोहणसेवनम् । रोदित्यकस्मात्त्रसति छायाशीलविपर्ययः ।। ४६ ।।
अल्पाशितोऽतिविण्मूत्रस्त्रविण्मूत्रो विपर्यये । भविष्यतां निमित्तानि ग्रहाणां वेदनाश्च ताः ।। ४७ ।।
न यः शिरो धारयति क्षिपन्त्यङ्गानि दुर्बलः । श्वासाध्मानपरीताभ्यामन्तवच्चोपलक्ष्यते ।। ४८ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ४२ तमं पत्रम् ।)
विनोद्यमानो बहुधा विनोदं नाभिनन्दति । तृट्प्रमीलकनिद्रार्तः कूजत्यपि कपोतवत् ।। ४९ ।।
ग्रहरोग—जब लालन (प्रेमपूर्वक पालन पोषण) करने वाली, सुखी, तथा सब वस्तुओं का भोग करने वाली धात्री लगातार बुरे स्वप्नों को देखे, उसके स्तनों से स्वयमेव दूध प्रवृत्त होने लगे । उसको बालक का स्मरण न रहे (अथवा बालक को अपस्मार रोग हो जाय), बालक सहसा गोद में से गिर पड़े तथा दुष्ट पुरुषों के साथ संसर्ग एवं भोजन करता हो, जिनके पुत्रों की मृत्यु हो जाती हो, जो अवकीर्णी हों तथा जो दूसरों की वृद्धि (बढ़ती-ऐश्वर्य) को सहन न कर सकती हों ऐसी धात्रियाँ भयंकर अमङ्गलों (अशुभ लक्षणों) को देखती हैं तथा उसी के अनुसार आचरण करती हैं एवं विपरीत भावों का सेवन करती हैं तो उस बालक की मृत्यु होने की संभावना होती है । बालक के सोये रहने पर भयंकर आकृति वाले पक्षी वहां घोंसले बना लेते हैं, विडाल (मार्जार) उसे लांघ जाता है, पर धूम को सूंघता है, वह दूसरे के सिर पर से उतार कर रखी हुई बलि को चाटता है तथा इसका लङ्घन करता है । बालक के शरीर तथा मुख से दुर्गन्ध आती है,