भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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५४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६]

उसकी नासिका के अग्रभाग में मलोत्पत्ति हो जाती है तथा माता और पुत्र दोनों अशुभ एवं रक्तवर्ण की मालाओं को धारण करते हैं। भस्म (राख) अङ्गारों तथा तुष के ढेर पर बैठता है, सहसा रोने लगता है, उसे डर लगता है, उसकी छाया (शारीरिक कान्ति) तथा स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है। बालक कम खाता है। उसे कभी मल एवं मूत्र अधिक आता है तथा कभी कम आने लगता है। बालक अपने सिर को धारण नहीं कर सकता अर्थात् स्थिर नहीं रख सकता, अङ्गों को इधर उधर फेंकता है, दुर्बल हो जाता है, उसे श्वास एवं आध्मानरोग से प्रतीत होने लगता है कि जैसे अब वह बचेगा नहीं। बालक से यदि विनोद किया जाय तो वह उसे पसन्द नहीं करता। वह प्यास, प्रमीलकरोग (तन्द्रा) तथा निद्रा से पीड़ित होता है तथा कबूतर की तरह शब्द करता है ये सब ग्रहरोगों के प्रारम्भ होने के लक्षण हैं। अर्थात् उपर्युक्त लक्षणों को देखकर अनुमान किया जा सकता है कि बालक को संभवतः कोई ग्रहरोग होनेवाला है। अवकीर्णी—ब्रह्मचर्य व्रत का भङ्ग करने वाला व्यक्ति। इसका निम्न लक्षण दिया है—कामतो रेतस् सेकं व्रतस्थस्य द्विजन्मनः। अतिक्रमं व्रतस्याहुर्धर्मज्ञा ब्रह्मवादिनः।। अवकीर्णी भवेद्गत्वा ब्रह्मचारी तु योषितम्। गर्दभं पशुमालभ्य नैर्ऋतं स विशुध्यति।। अर्थात् जो जानबूझ कर ब्रह्मचर्य व्रत का भङ्ग करता है उसे अवकीर्णी कहते हैं। अनिच्छापूर्वक व्रतभङ्ग करनेवाले को अवकीर्णी नहीं कहते।

पीड्यमानस्य रूपाणि ज्वरच्छर्द्यतिसारिषु । वैद्यो दृष्ट्वैव जानीयात् कृच्छ्रं सर्वं न सिध्यति ॥५०॥

इस प्रकार बालक के ज्वर, छर्दि तथा अतिसार आदि रोगों में पीड़ा देने वाले उपर्युक्त लक्षणों को वैद्य देखकर ही तुरत जान लेवे। क्योंकि सम्पूर्ण लक्षण कृच्छ्र होने पर सर्वदा सिद्ध नहीं होते।

इत्येता विविधाः प्रोक्ता वेदना बालदेहजाः । प्रायोद्भावानां रोगाणां कश्यपेन महर्षिणा ॥५१॥

इस प्रकार महर्षि कश्यप ने प्रायः होने वाले रोगों में बालकों के शरीर में होने वाली वेदनाओं तथा लक्षणों को कह दिया है।

तेषां चिकित्सितं स्वं स्वमविरुद्धं यथाक्रमम् । दृष्ट्वा चिकित्सितस्थाने दोषतश्चाभ्यु(प्यु)पक्रमेत् ॥५२॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥
इति वेदनाध्यायः पञ्चविंशतितमः ॥२५॥

उन २ रोगों की चिकित्सा परस्पर अविरुद्ध तथा यथाक्रम चिकित्सास्थान में देखकर अथवा स्वयं दोषों के अनुसार करे।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इति वेदनाध्यायः पञ्चविंशतितमः ॥२५॥


षड्विंशतितमोऽध्यायः

अथातश्चिकित्सासंपदीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम चिकित्सासंपदीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥