भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 413

चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६] सूत्रस्थानम् ५५

चिकित्सासंपद्यथोपपद्यते तमुपायमनुव्याख्यास्यामः। चत्वारः खलु पादाश्चिकित्सितस्योपपद्यन्ते। ते यदा गुणवन्त उपपद्यन्ते तदा साध्यो व्याधिर्नातिवर्तते। तद्यथा—भिषक्, भेषजम्, आतुरः, परिचारक इति ।।३।।

अब हम उन उपायों की व्याख्या करेंगे जिनके द्वारा चिकित्सासंपत् (चिकित्सा का उत्तम गुणों से युक्त होना) उत्पन्न हो सके। चिकित्सा के चार पाद होते हैं अर्थात् चिकित्सा के लिये चार वस्तुओं का होना आवश्यक है। वे चारों पाद जब गुणयुक्त हों तब साध्य व्याधि चिकित्सा का व्यतिक्रम नहीं करती अर्थात् ठीक हो जाती है (साध्य व्याधि की ही चिकित्सा की जा सकती है असाध्य की नहीं। चरक में कहा है—साधनं न त्वसाध्यानां व्याधीनामुपदिश्यते)। वे चारों पाद ये हैं—१. वैद्य २. ओषधि ३. रोगी ४. परिचारक। चरक सूत्रस्थान के खुड्डाकचतुष्पाद अध्याय में भी कहा है—भिषग् द्रव्यमुपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम्। गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकार व्युपशान्तये॥ इसीप्रकार सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है—वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः। एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः॥ ये चारों पाद मिलकर ही आरोग्यरूप कर्मसिद्धि के हेतु हैं।

तत्र भिषक् सुतीर्थो न्यायेनार्षज्ञानप्राप्तो विज्ञानवाननेकशो दृष्टकर्मा विदितसिद्धयोगो दक्षो दक्षिणः शुचिरनुद्धतवेषः सर्वभूतेषु बन्धुभूतः सिद्धिमन् धर्मार्थदर्शी सत्यदयादानार्जवनिरतो देवद्विजगुरुसिद्धानां पूजयिता चाभिगन्ता चोत्तरोत्तरप्रतिपत्तिकुशलो गुरु वृद्धसेवी न्यायाभिनिवेशी व्यपगतभयलोभमोहक्रोधानृतोऽपैशुन्योऽमद्यलौल्यः सुमुखश्चाव्यसनी चेति ।।४।।

वैद्य या चिकित्सक के गुण—सुतीर्थ (योग्य गुरु वाला अर्थात् जिसने योग्य गुरु से शिक्षा ग्रहण की है), न्यायपूर्वक जिसने आर्षज्ञान प्राप्त किया है, जो विज्ञानवान् हो, जिसने बहुत बार चिकित्सा कर्म देखा हुआ है, जिसे सिद्धयोगों का ज्ञान है, जो चतुर, दक्षिण तथा पवित्र है, जिसका वेश उद्धत नहीं हैं अर्थात् सभ्य वेश वाला है, सब प्राणियों के प्रति जिसके मन में बन्धु (प्रेम) भाव है, जिसके हाथ में सिद्धि है, जो धर्मार्थ रोगियों को देखने वाला है अथवा धर्म और अर्थ (धन) के लिये रोगियों को देखता है, जो सत्य, दया, दान तथा सरलतायुक्त है, जो देव, ब्राह्मण, गुरु तथा सिद्ध महात्माओं की पूजा तथा सेवा करने वाला है, जो उत्तरोत्तर रोग निवृत्ति में कुशल है, जो गुरु तथा वृद्ध पुरुषों की सेवा करता है, जो न्यायवान् है, तथा भय, लोभ, मोह, क्रोध, असत्य, पिशुनता (चुगलखोरी) से रहित है, जिसे मद्य की आदत नहीं है—जो सुमुख (दर्शनीय-सुन्दर आकृति वाला) तथा सब प्रकार के व्यसनों से रहित है—ऐसा वैद्य श्रेष्ठ होता है। चरक सू. अ. ९ में वैद्य के ४ मुख्य गुणों का उल्लेख किया गया है—श्रुतेः पर्यवदातत्वं बहुशः दृष्टकर्मता। दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम्। १. शास्त्र का सम्यक् ज्ञान २. अनुभव ३. चतुराई (Skill) तथा ४ शुद्धता—ये गुण आवश्यक हैं। इन चारों गुणों में अन्य सब गुणों का समावेश हो जाता है। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३४ में कहा है—तत्राधिगत शास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वय कृतो। लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी विशारदः। सत्यधर्मपरो यश्च स भिषक् पाद उच्यते ॥४॥

तत्र भेषजसंपत्—सुभूमौ जातं, काले चोद्धृतं, काले चोत्पन्नम्, अविकारि, अग्नितोय-जन्तुविण्मूत्रजरादिभिरनुपहतं, तत्तद्रोगयोग्यं, क्रमेण च विधिवदुपपादितमिति ।।५।।

औषध के गुण—जो प्रशस्त भूमि में उत्पन्न हुई हो, उचित समय पर उखाड़ ली गई हो, उचित समय में उत्पन्न की गई हो, विकार रहित हो, जो अग्नि, जल, जन्तु, मल, मूत्र तथा अवस्था आदि से नष्ट न की गई हो, जो अमुक २ रोग के योग्य हो तथा क्रमशः विधिपूर्वक जिसका प्रयोग किया हुआ है—ऐसी ओषधि गुणयुक्त होती है। चरक सू. अ. ९ में ओषधि के निम्न ४ गुण दिये हैं—बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविधविकल्पना। संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते।। १. पर्याप्त मात्रा में होना २. व्याधि के उपयुक्त होना ३. एक ही ओषधि से नाना प्रकार की कल्पनाओं का

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