काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६]
बन सकना ४. रस आदि से युक्त होना । सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है—प्रशस्तदेशसंभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् । युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम् ।। दोषघ्नमग्लानिकरमविकारि विपर्यये । समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ।।
वक्तव्य—सुभूमौ जातम्—ओषधि प्रशस्तभूमि में उत्पन्न हुई होनी चाहिये । औषध के योग्य भूमि का वर्णन करते हुए सुश्रुत सू. अ. ३७ में कहा है—
श्वभ्रशर्कराश्मविषवल्मीकश्मसानावातन् देव्तायतनसिकताभिरनुपहतामनुषरामभङ्गुरामदूरोदकां स्निग्धां प्ररोहवतीं मृद्वीं स्थिरां समां कृष्णां गौरी लोहितां वा भूमिमौषधार्थं परीक्षेत ।। उपर्युक्त प्रकार की भूमि में उत्पन्न होने के बाद भी ओषधि में निम्न गुण होने चाहिये—तस्यां जातमपि कृमिविषशस्त्रातपपवनदहनतोयसंबाधमार्गैरनुपहतमेकरसं पुष्टं पृथ्ववगाढ़मूलमुदीच्यां चौषधमाददीतेत्यौषधभूमिपरीक्षाविशेषः सामान्यः । वह ओषधि कृमि विष आदि से अविकृत हो । काले चोद्धृतम्—प्रत्येक ओषधि योग्य काल में अर्थात् रस, वीर्य, विपाक आदि की दृष्टि से पूर्ण परिपक्व हो जाने पर ही तोड़नी चाहिये । ओषधियों के उखाड़ने के विषय में सुश्रुत सू. अ. ३७ में कहा है—सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वृतुष्वाददीताग्नेयान्येयाग्नेयेषु, एवमव्यापन्नगुणानि भवन्ति । सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वृतुषु गृहीतानि सोमगुणभूयिष्ठायां भूमौ जातान्यतिमधुरस्निग्धशीतानि जायन्ते । सोमगुण की प्रधानता वाली ओषधि को सौम्य ऋतु में तथा आग्नेय गुण प्रधान ओषधि को आग्नेय ऋतु में उखाड़ना चाहिये । इससे वे पूर्ण परिपक्व हो जाती हैं ।।५।।
तत्रातुरसंपत्—साध्यरोगता, सत्त्वबलबुद्धिशरीरेन्द्रियधृतितजसां दार्ढ्यं, निदानपूर्वरूपातङ्गोपद्रव-यात्रोपशयानुपशयानां यथावदाख्यानं, धात्र्या वा श्रद्दधानता, देवद्विजगुरुभिषग्भेषजसुहृदामभिनन्दनम्, आस्तिक्यं, विनयप्रधानता, यथोक्तकारित्वं वशित्वं चेति ।।
रोगी के गुण—जिसका रोग साध्य हो, जिसका सत्व (मन) बल, बुद्धि, शरीर, इन्द्रियां, धारणशक्ति तथा तेज दृढ़ हो, जो निदान, पूर्वरूप, रोग, उपद्रव, शरीरयात्रा, उपशय तथा अनुपशय को यथावत् बता सके, धात्री अथवा परिचारक में जिसे श्रद्धा या विश्वास हो, देव, द्विज, गुरु, वैद्य, ओषधि तथा मित्रों का जो अभिनन्दन (सम्मान) करता हो, जो आस्तिक हो अर्थात् परमात्मा में विश्वास रखता हो, जो विनयशील (नम्र) हो, आज्ञा का पालन करता हो तथा जिसकी इन्द्रियां अपने वश में हो अर्थात् संयमी हो—ऐसा रोगी गुणयुक्त माना गया है । चरक सू. अ. ९ में कहा है—स्मृतिनिर्देशकारित्वमभीरुत्वमथापि च । ज्ञापकत्वं च रोगाणामातुरस्य गुणाः स्मृताः ।। रोगी में—१. अपने रोग के प्रारंभ होने का स्मरण होना २. चिकित्सक के निर्देशानुसार कार्य करना ३. निडरता तथा ४. रोग को अच्छी प्रकार बता सकना—ये चार गुण होने चाहिये । इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है—आयुष्मान् सत्यवान् साध्यो द्रव्यवानात्मवानपि । आस्तिको वैद्यवाक्यस्थो व्याधितः पाद उच्यते ।।
तत्र परिचारकसंपत्—विपक्वकषायता, आरोग्यं, शक्तिः, भर्तृभक्तिः, उपचारज्ञता, दाक्ष्यं, शौचम्, आशुकारित्वं, सर्वकर्मसु कौशलम्, अघृणित्वम्, अक्षुद्रपुत्रत्वम्, अद्वैविध्यं, दमो, जितक्रोधादिता, सहिष्णुता चेति ।।७।।
परिचारक (सेवक) के गुण—कषायों का पकाना अर्थात् जो ओषधि आदि को पकाने का कार्य कर सकता है, आरोग्य, शक्ति, स्वामीभक्ति, उपचार को जानना अर्थात् रोगी के भोजन के लिये यूष, रस, आदि बनाना, उसे सुलाना तथा रोगी की सेवा (Nursing) का ज्ञान होना, निपुणता, पवित्रता, शीघ्र कार्य करना, सब कार्यों में कुशलता, घृणा का न होना, क्षुद्र-व्यक्ति का पुत्र न होना अर्थात् कुलीन होना, जिसमें द्वैविध्य (दोगलापन) न हो अर्थात् इधर की बात उधर और उधर की इधर न कहता हो, जिसने अपनी अपनी इन्द्रियों को वश में किया हुआ है, क्रोध आदि पर विजय पाई हुई है तथा जिसमें सहनशक्ति है—इन गुणों से युक्त परिचारक (सेवक) श्रेष्ठ माना जाता है । चरक सू. अ. ९ में कहा है—उपचारज्ञा दाक्ष्यमनुरागश्च भर्त्तरि । शौचं चेति चतुष्कोऽयं गुणः परिचरे जने ।। १. उपचार (सेवा आदि) को जानना