काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सासंपदीयाध्यायः २६] सूत्रस्थानम् ५७
२. दक्षता ३. स्वामीभक्ति तथा ४. पवित्रता—ये ४ गुण परिचारक में होने चाहिये। सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है— स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे। वैद्यवाक्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः॥ आजकल परिचर्या के लिये पुरुषों की अपेक्षा स्त्रीपरिचारिकाओं (Nerses) का प्रचलन बढ़ रहा है क्योंकि उनमें पुरुषों की अपेक्षा सेवा की प्रवृत्ति एवं सहानुभूति स्वाभाविक होती हैं तथा वे रोगी के कष्ट को अधिक अनुभव कर सकती हैं। चरक में उपर्युक्त चिकित्सा के प्रत्येक पाद के केवल चार २ गुणों का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार चिकित्सा के षोडशगुण माने गये हैं। इसलिये चरक में कहा है—कारणं षोडशगुणं सिद्धौ पादचतुष्टयम्।
इसी प्रकार अष्टाङ्गहृदय में भी कहा है—चतुष्पादं षोडशकलं भेषजमिति भिषजो भाषन्ते॥७॥
तत्र श्लोकाः
अस्य पादचतुष्कस्य मन्यन्ते श्रेष्ठमातुरम्।
तदर्थं गुणवन्तो हि त्रयः पादा इहेप्सिताः॥८॥
इन उपर्युक्त चारों पादों में से रोगी को श्रेष्ठ माना जाता है तथा उसी पाद (रोगी) के लिये अन्य तीनों गुणी पादों (वैद्य, ओषधि तथा परिचारक) की अपेक्षा होती है॥८॥
नेति प्रजापतिः प्राह भिषङ्मूलं चिकित्सितम्।
भिषग्वशे त्रिवर्गो हि सिद्धिश्च भिषजि स्थिता॥९॥
स युनक्ति प्रयुङ्क्ते च शास्ति च ज्ञानचक्षुषा।
तस्माज्ज्ञाने सविज्ञाने युक्तः श्रेष्ठतमो भिषक्॥१०॥
यदा चतुर्णां पादानां संपद्भवति जीवक!।
तदा धर्मार्थयशासां वैद्यो भवति भाजनम्॥११॥
वैद्य की श्रेष्ठता का प्रतिपादन—प्रजापति कश्यप ने कहा यह ठीक नहीं है। वस्तुतः चिकित्सा का मूल (प्रधान कारण) वैद्य है। शेष तीनों पादवैद्य के ही आधीन होते हैं तथा सिद्धि (चिकित्सा की सफलता) भी वैद्य पर ही निर्भर है। वह वैद्य ही ज्ञानचक्षुओं के द्वारा योजना (ओषधि आदि की व्यवस्था) करता है, उनका प्रयोग करता है, तथा शासन परिचारक को निर्देश—(Direction आदि) करता है। इस लिये ज्ञान तथा विज्ञान से युक्त वैद्य श्रेष्ठ माना जाता है। हे जीवक! जब चिकित्सा के उपर्युक्त चारों पाद गुणयुक्त होते हैं तब वैद्य धर्म, अर्थ एवं यश का भागी होता है। चरक सू. अ. ९ में भी वैद्य की प्रधानता स्वीकार की गई है—विज्ञाता शासिता योक्ता प्रधानं भिषगत्र तु। पक्तौ हि कारणं पक्तुर्यथा पात्रेन्धनानलाः॥ विजेतुर्विजये भूमिश्चमूः प्रहरणानि च। आतुराद्यास्तथा सिद्धौ पादाः कारणसंज्ञिताः॥ वैद्यस्यातश्चिकित्सायां प्रधानं कारणं भिषक्। मृद्दण्डचक्रमूत्राद्याः कुम्भकारादृते यथा॥ न वहन्ति गुणं वैद्यादृते पादत्रयं तथा॥ चिकित्सा में प्रधान कारण वैद्य ही है शेष तीनों गौण हैं क्योंकि वैद्य के अभाव में ये ओषधि आदि रोगनिवारण में समर्थ नहीं होते। इसी भाव को सुश्रुत सू. अ. ३४ में निम्न रूप दिया है—वैद्यहीनास्त्रयः पादाः गुणवन्तोऽप्यपार्थकाः। उद्गातृहोतृब्रह्माणो यथाऽध्वर्युं विनाऽध्वरे॥ वैद्यस्तु गुणवानेकस्तारयेदातुरान् सदा। प्लवं प्रतितरैर्हीनं कर्णधार इवाम्भसि॥ उपर्युक्त गुणवान् पादचतुष्टय की सहायता से रोगों के प्रतिकार करने को चिकित्सा कहते हैं। चरक में कहा है—चतुर्णां भिषगादीनां शस्त्रानां धातुवैकृते। प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते॥ इसलिये इस अध्याय का नाम ‘चिकित्सासंपदीय’ है॥९-११॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥
इति चिकित्सासंपदीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः ॥२६॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति चिकित्सासंपदीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः ॥२६॥