काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रोगाध्यायः २७]
सप्तविंशतितमोऽध्यायः
अथातो रोगाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम रोगाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
एको रोगो रुजाकरणसामान्यादिति भार्गवः प्रमतिः, द्वौ रोगौ निजश्वागन्तुश्चेति वार्योविदः, त्रयो रोगाः साध्ययाप्यासाध्या इति काङ्कायनः, चत्वारो रोगा आगन्तुवातपित्तकफजा इति कृष्णो भारद्वाजः पञ्च रोगा आगन्तुवातपित्तकफत्रिदोषजा इति दारुवाहो राजर्षिः षड्रङ्गोगाः षड्रसत्वादन्नपानस्येत्यृषिषडिन्द्रयः(?); सप्त रोगा वाताद्येकैकद्विद्वित्रिदोषजा इति हिरण्याक्षः, अष्टौ रोगा वाताद्येकैकद्विद्वित्रिदोषागन्तुनिमित्ता इति वैदेहो निमिः, अपरिसङ्ख्येयाः समहीनाधिकदोषभेदादिति वृद्धजीवकः, एवमनवस्थानमुपलभ्याह भगवान् कश्यपो—द्वावेव खलु रोगौ निजश्चागन्तुश्च, तावनेकविस्तराविति ॥३॥
प्रमति भार्गव ने कहा—रोग एक ही प्रकार का होता है—सब रोगों में पीडा (कष्ट) के समानरूप में विद्यमान होने से। अर्थात् रुक्-वेदना के विद्यमान होने से ही प्रत्येक रोग को सामान्यरूप से रोग कहते हैं। वार्योविद ने कहा—रोग निज और आगन्तु भेद से दो प्रकार के हैं। काङ्कापन ने कहा-रोग साध्य, असाध्य तथा याप्य भेद से तीन प्रकार के हैं। कृष्णभारद्वाज ने कहा—रोग आगन्तु तथा वात, पित्त और कफ दोष के अनुसार चार प्रकार का है। राजर्षि दारुवाह ने कहा-रोग आगन्तुक तथा वात, पित्त, कफ और त्रिदोष के भेद से पांच प्रकार का है (ऋषि षड्व्य ?) के अनुसार अन्नपान के षड्रसयुक्त होने से रोग ६ प्रकार के हैं। हिरण्याक्ष ने कहा—रोग सात प्रकार के हैं—वातादि दोषों से पृथक् तीन (वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक) द्विदोषज (वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक) तथा त्रिदोषज। वैदेह निमि ने कहा—रोग आठ प्रकार के हैं। उपर्युक्त सात के अतिरिक्त आठवां आगन्तु। वृद्धजीवक ने कहा—दोषों के सम, हीन तथा अधिक होने से रोग असंख्य हैं क्योंकि संसर्ग से दोषों के भेद अनेक हो जाते हैं। इस प्रकार अवस्था दोष (गड़बड़) को देखकर भगवान् कश्यप ने कहा—वस्तुतः रोग निज और आगन्तु भेद से दो ही प्रकार के हैं। उनके ही अनेक प्रकार के विस्तार हो जाते हैं ॥३॥
हेतुप्रकृत्यधिष्ठानविकल्पायतनार्थतः। ज्ञेया रोगा असङ्ख्येयाश्चिकित्सानां च विस्तरात् ॥४॥
अधिष्ठानद्वयं तेषां शरीरं मन एव च। मानसानां च रोगाणां कुर्याच्छारीरवत् क्रियाम् ॥५॥
रोगों के हेतु (कारण), प्रकृति (स्वभाव) तथा अधिष्ठान (आश्रय) के विकल्प के कारण तथा चिकित्सा के विस्तार के कारण रोग असंख्य माने जाते हैं अर्थात् हेतु, प्रकृति आदि के भेद से ही रोगों के असंख्य भेद हो जाते हैं। इन रोगों के शरीर और मन ये दो अधिष्ठान (आश्रय) हैं। मानसिक रोगों की भी शारीरिक रोगों की तरह ही चिकित्सा करनी चाहिये। चरक सू. अ. २० में भी कहा है—चत्वारो रोगा भवन्ति—आगन्तुवात पित्तश्लेष्मनिमित्ताः। तेषां चतुर्णामपि रोगाणां रोगत्वमेकविधं रुक्सामान्यात्। द्विविधा पुनः प्रकृतिरेषां आगन्तुनिजविभागात्। द्विविधं चैषामधिष्ठानं, मनःशरीरविशेषात्। विकाराः पुनरेषामपरिसंख्येयाः, प्रकृत्यधिष्ठानलिङ्गायतनविकल्पविशेषात् तेषामपरिसंख्येयत्वात्। इसी प्रकार चरक सू. अ. १८ में भी कहा है—त एवापरिसंख्येया भिद्यमाना भवन्ति हि। निदानवेदनार्थस्थानसंस्थाननामभिः ॥४-५॥
धातुस्थूणात्मवैषम्यं तद्दुःखं व्याधिसंज्ञकम्।
धातुस्थूणात्मसाम्यं तु तत्सुखं प्रकृतिश्च सा ॥६॥