काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ५९
वात, पित्त, कफ आदि तीन धातुरूपी त्रिस्थूणों की विषमता से ही दुख होते हैं। इसे ही व्याधि (रोग) कहते हैं। तथा धातुरूपी त्रिस्थूणों की साम्यावस्था ही सुख है तथा यही वास्तव में प्रकृति है। अर्थात् तीनों दोषों का समावस्था में होना ही प्रकृति या सुख है तथा इन्हीं की विषमावस्था को रोग कहते हैं। इसी संहिता के सूत्र स्थान के उपलब्ध प्रथम लेहनाध्याय में भी कहा है—अरोगस्तु समस्थूणा वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः ।। इसी प्रकार चरक सू. अ. ७ में भी कहा है—समपित्तानिलकफाः केचिद्गर्भादिमानवाः। दृश्यन्ते वातला केचित् पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा ।। तेषामनातुराः पूर्वे वातलाद्याः सदाऽऽतुराः ।। दोषों की समावस्था ही स्वस्थावस्था है। इसी लिये चरक सू. अ. १ में कहा है—धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् ।।६।।
अव्याहतशरीरायुर्भविवर्धेत वा कथम् । इत्यर्थं भेषजं प्रोक्तं विकाराणां च शान्तये ।।७।।
चिकित्सा का प्रयोजन—शरीर तथा आयु की अव्याहत रूप में वृद्धि तथा विकारों की शान्ति के लिये चिकित्सा कही गई है। अर्थात् चिकित्सा के दो प्रयोजन हैं—१. शरीर तथा आयु की वृद्धि (स्वस्थवृत) तथा २. उत्पन्न हुए रोगों की शान्ति करना। सुश्रुत सू. अ. १ में कहा है—इह खल्वायुर्वेदप्रयोजनं-व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोध्क्षः, स्वस्थस्य रक्षणं च। इसी प्रकार चरक सू. अ. ३० में भी कहा है—प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं चेति। आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी Preventive तथा Curative दो प्रकार की चिकित्सा मानी गई है ।।७।।
निजागन्तुनिमित्ता च द्विविधा प्रकृती रुजाम् । नखदन्ताग्निपानीयवधबन्धादिदेवताः (तः) ।।८।।
रोगों की निज और आगन्तु ये दो प्रकृतियां (कारण) होती हैं। इनमें आगन्तु रोगों के नख, दन्त, अग्नि, वर्षा, वध, बन्ध (बांधना), देवता, शाप तथा अभिचारकर्म आदि कारण हैं। तथा निज रोगों के कारण वातादि दोष हैं। अर्थात् वातादि दोषों की विषमता से निज रोग होते हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—मुखानि तु खल्वागन्तोनर्खदशनपतनाभिघाता-भिचाराभिशापाभिषङ्गव्यधबन्धपीडनरज्जुदहनमन्त्राशनि भूतोपसर्गादीनि, निजस्य तु मुखं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यम् ।।८।।
शापाभिचारादागन्तुर्निजा वातादिहेतवः । वातपित्तकफानां तु देहे स्थानानि मे शृणु ।।९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ४३ तमं पत्रम्)
अब तूँ मुझ से इन वात, पित्त तथा कफ के देह में स्थानों को सुन। अर्थात् शरीर में वातादि के कौन २ से स्थान हैं। इन दोषों के शरीर में सर्वव्यापी होने पर भी इनके विशेष स्थान तथा कर्म कहे जाते हैं ।।९।।
सर्वगानामपि सतां प्रायः स्थानं च कर्म च । अधोनाभ्यस्थिमज्जानौ वातस्थानं प्रचक्षते ।।१०।।
पित्तस्यामाशयः स्वेदो रक्तं सह लसीकया । मेदः शिर उरो ग्रीवा सन्धिर्बाहुः कफाश्रयः ।।११।।
शरीर में वात के मुख्य स्थान—नाभि का निचला हिस्सा, अस्थि तथा मज्जा-वायु के स्थान कहे जाते हैं। पित्त के स्थान—आमाशय, स्वेद, रक्त, लसीका (Lymph) ये पित्त के स्थान हैं। कफ के स्थान-मेद, सिर, छाती, ग्रीवा, सन्धि, तथा बाहु-कफ के स्थान हैं ।।१०-११।।
हृदयं तु विशेषेण श्लेष्मणः स्थानमुच्यते । आमपक्वाशयौ स्थानं विशेषात् पित्तवातयोः ।।१२।।
उपर्युक्त स्थानों के अतिरिक्त हृदय कफ का विशेष स्थान माना गया है। तथा आमाशय और पक्वाशय क्रमशः पित्त और वात के विशेष स्थान हैं। चरक सू. अ. २० में इनके स्थानों का निम्न प्रकार से उल्लेख किया गया है—तेषां त्रयाणामपि दोषाणां शरीरे स्थानविभाग उपदेक्ष्यते, तद्यथा-बस्तिः पुरीषाधानं कटिः संक्थिनी पादावस्थीनि च वातस्थानानि, तत्रापि पक्वाशयोविशेषेण वातस्थानं, स्वेदो रसो लसीका रुधिरमामाशयश्च पित्तस्थानानि, तत्राप्यामाशयो विशेषेण पित्तस्थानं, उरः शिरो ग्रीवा पर्वाण्यामाशयो मेदश्च श्लेष्मणः स्थानानि, तत्राप्युरो विशेषेण श्लेष्मणः स्थानम्। अष्टाङ्गहृदय सू. अ. १२