भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 418

६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रोगाध्यायः २७]

में भी कहा है—पक्वाशयकटिसक्थिश्रोत्रास्थिस्पर्शनेन्द्रियम्। स्थानं वातस्य तत्रापि पक्वाधानं विशेषतः ॥ नाभिरामाशयः स्वेदो लसीका रुधिरं रसः। दृक्स्पर्शनं च पित्तस्य नाभिरत्रविशेषतः ॥ उरः कण्ठं शिरः क्लोम पर्वाण्यामाशयो रसः। मेदो घ्राणं च जिह्वा च कफस्य सुतरामुरः ॥१२॥

आगन्तुर्बाधते पूर्वं पश्चाद्दोषान् प्रपद्यते । निजस्तु चीयते पूर्वं पश्चाद्वृद्धः प्रबाधते ॥१३॥

आगन्तु तथा निज रोगों में भेद—आगन्तु रोग पहले शरीर को कष्ट पहुंचाता है तथा उसके बाद वातादि दोषों को उत्पन्न करता है। निज रोगों में प्रथम दोषों का चयन होता है फिर उसके बाद वृद्धि को प्राप्त होकर शरीर को कष्ट पहुंचाते हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—आगन्तुर्हि व्यथापूर्वसनु पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वषम्यमापादयति; निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्वं वैषम्यमापद्यन्ते, जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥१३॥

तस्मादागन्तरोगणामिष्यते निजवत् क्रिया । निजानां पूर्वरूपाणि दृष्ट्वा संशोधनं हितम् ।।१४।।

इसलिये आगन्तु रोगों की निज रोगों के समान ही चिकित्सा करनी चाहिये तथा निजरोगों के पूर्वरूपों को देखकर संशोधन करना चाहिये। अर्थात् यदि निज रोगों के होने की संभावना हो तो रोगों के लक्षणों के प्रकट होने से पूर्व ही इनका दोष एवं काल के अनुसार संशोधन कर लेना चाहिये।

हृदि श्लेष्मानुपश्लिष्टमाश्यावं रक्तपीतकम् । तदोजो, वर्धते जन्तुस्तद्वृद्धौ, क्षीयते क्षये ।।१५।।

ओज किसे कहते हैं—श्लेष्मा^१ से रहित, कुछ लालिमा तथा पीलापन लिये हुए जो श्वेत पदार्थ हृदय में रहता है उसे ओज कहते हैं। उस ओज की वृद्धि से प्राणी की वृद्धि होती है। तथा उसके क्षय होने पर प्राणी-क्षीण हो जाता है। चरक सू. अ. १७ में ओज का निम्न वर्णन किया है—हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तमीष सपीतकम्। ओजः शरीरे संख्यात तन्नाशान्ना विनश्यति ॥ इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. १५ में भी कहा है—ओजः सोमात्मकं स्निग्धं शुक्लं शीतं स्थिरं सरम्। विविक्तं मृदु मृत्स्नं च प्राणायतनमुत्तमम् ॥ देहः सावयवस्तेन व्याप्तो भवति देहिनाम्। तदभावाच्च शीर्यन्ते शरीराणि शरीरिणाम् ।। यह ओज प्राणायतन (जीवन का कारण) है। यह सम्पूर्ण देह में व्याप्त होता है। इसके अभाव में प्राणियों के देह नष्ट हो जाते हैं। कई विद्वान् इस ओज को अष्टम धातु मानते हैं। सुश्रुत सू. अ. १५ में कहा है—“तत्र रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत्परं तेजस्तत् खल्वोजस्तदेव बलमित्युच्यते” रस से लेकर शुक्र पर्यन्त धातुओं का जो परम तेज है उसे ही ओज कहा है। इसी को बल भी कहते हैं। वस्तुतः बल और ओज में भेद है। परन्तु सामान्यतया दोनों में अभेद माना है क्योंकि शरीर में बल की उत्पत्ति का प्रधान कारण ओज ही है तथा ओज के क्षय से बल का सबसे अधिक ह्रास होता है। ओज के विषय में प्राचीन ग्रन्थों में भिन्न २ वर्णन मिलता है। आधुनिक विद्वान् भी ओज के विषय में एक मत से अभी तक कुछ नहीं कह सके हैं। चक्रपाणि ने चरक की टीका में दो प्रकार का ओज माना है—“एतेन द्विविधमोजो दर्शयति परमपरं च। तत्राञ्जलिप्रमाणमपरम्, अल्पप्रमाणं तु परम्। अर्धञ्जलिपरिमितस्यौजसो धमन्य एव हृदयाश्रिताः स्थानम्, तथा प्रमेहेऽर्धाञ्जलिपरिमितमेवौजः क्षीयते, नष्टबिन्दुकम्। अस्य हि किंचित्क्षयेऽपि मरणं भवति, प्रमेहे तु ओजः क्षये जीवत्येव तावत्। ओजः क्षयलक्षणमपि अर्धाञ्जल्योजः क्षय एव बोद्धव्यम्”। इसका पूर्णरूप से निश्चय न होने पर भी यह तो स्पष्ट है कि ओज शरीर में एक अत्यन्त महत्व का पदार्थ है। पर-ओज हृदयाश्रयी और अष्टबिन्दु मात्रा वाला है। इसकी ही कमी होने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। अपर ओज वमन्याश्रयी है—उसकी कमी हो सकती है, उससे मृत्यु नहीं होती। मधुमेह आदि रोगों में इस अपर ओज का ही क्षय होता रहता है। आजकल के विज्ञान के अनुसार कई विद्वान् इसे जीवनीय द्रव्य, (Vitamins) कई Albumin तथा कई इसे अण्डकोश आदि ग्रन्थियों का


१. श्लेष्मणाऽसम्पृक्तमित्यर्थः, एतदेव ग्रन्थान्तरे विशुद्धपदेन दर्शितम् ।