भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 419

रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ६१

स्त्राव (Internal Secretion of the testicles, ovaries and Prostate) आदि मानते हैं । परन्तु आधुनिक विज्ञान में हमें अभीतक कोई भी ऐसा उपयुक्त शब्द नहीं मिला है जो ओज का प्रतिनिधि हो सके । श्री रामरक्ष पाठक जी ने अपनी चरक की टीका में इसके विषय में कई भिन्न २ प्रचलित विचार दिये हैं । उन्होंने सूत्र स्थान के १७ वें अध्याय में इसका विस्तृत विवेचन किया है । विशेष ज्ञान के लिये जिज्ञासु पाठक इस विषय को वहां देखें ॥१५॥

मधुरस्निग्धशीतानि लघूनि च हितानि च । ओजसो वर्धनान्याहुस्तस्माद्बालांस्तथाऽऽशयेत् ।। १६ ।।

ओज की वृद्धि के साधन—मधुर, स्निग्ध, शीत, लघु तथा हितकारी पदार्थ ओज की वृद्धि करने वाले हैं । इसलिये बालकों को इन पदार्थों का सेवन करायें ॥१६॥

वृद्धिवर्णबलौजोग्निमेधायुःसुखकारणम् । वातादिसाम्यं, वैषम्यं विकारायोपकल्पते ।। १७ ।।

वातादि दोषों की समानता से शरीर की वृद्धि, वर्ण, बल, ओज, जाठराग्नि, मेधा, आयु तथा सुख की प्राप्ति होती है तथा इनकी विषमता से विकार (रोग) उत्पन्न हो जाते हैं । चरक में कहा है—विकारो धातुवैषम्यं साम्यं प्रकृतिरुच्यते । सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ॥१७॥

तेषामपरिमेयानां विकाराणां स्वलक्षणैः । आविष्कृततमान् व्याधीन यथास्थूलान् प्रचक्ष्महे ।। १८ ।।

उन असंख्य विकारों में से अपने २ लक्षणों सहित हम प्रसिद्ध २ तथा जो स्पष्ट हैं उन व्याधियों का वर्णन करेंगे ॥१८॥

अशीतिर्वातिका रोगाश्चत्वारिंशत्तु पैत्तिकाः ।
विंशतिः कफजाः प्रोक्ता वातरोगान्निबोध मे ।। १९ ।।

इनमें वात के ८०; पित्त के ४० तथा कफ (श्लेष्मा) के २० रोग हैं । चरक सू. अ. २० में भी इतने ही रोगों का परिगणन किया गया है—तद्यथा-अशीतिर्वातविकाराः, चत्वारिंशत्पित्तविकाराः, विंशति श्लेष्मविकाराः ॥१९॥

पादभ्रंशः पादशूलं नखभेदो विपादिका । पादसुप्तिर्वातखुडो वातगुल्फोऽनिलग्रहः ।। २० ।।
गृध्रसीपिण्डिकोद्वेष्टौ जानुविश्लेषभेदकौ । ऊरुस्तम्फोरुसादौ च पाङ्गुल्पं वातकण्टकः ।। २१ ।।
गुदभ्रंशो गुदार्तिश्च वृषणाक्षेपकस्तथा । शेफःस्तम्भः श्रोणिभेदो वंक्षणानाहविड्गदौ (इग्रहौ) ।।
उदावर्तोऽथ कुब्जत्वं वामनत्वं त्रिकग्रहः । पृष्ठग्रहः पार्श्वशूलमुदरावेष्टहृद्द्रवौ ।। २३ ।।
हृन्मोहो वक्षसस्तोदो वक्षोद्धर्षोपरोधकौ । ग्रीवास्तम्भो बाहुशोषः कण्ठोद्ध्वंसो हनुग्रहः ।। २४ ।।
दन्तचालौष्ठभेदौ च मूकत्वं वाग्ग्रहस्तथा । कषायास्यास्यशोषौ च घ्राणनाशो रशाज्ञता ।। २५ ।।
बाधिर्यमुच्चैः श्रवणं कर्णशूलमशब्दता । वर्त्मसंकोचविष्टम्भौ तिमिरं शूलमक्षिषु ।। २६ ।।
व्युदासो भ्रूव्युदासश्च शङ्खभेदः शिरोरुजा । स्फुटनं केशभूमेरच दण्डकाक्षेपकोऽर्दितम् ।। २७ ।।
एकाङ्गकः पक्षवधः श्रमभ्रमविजृम्भिकाः । प्रलापो वेपथुर्ग्लानी रौक्ष्यं निद्रापरिक्षयः ।। २८ ।।
श्यावारुणावभासत्वमनवस्थानमेव च । हिक्काश्वासौ विषादश्च वन्ध्यात्वं षाण्ढ्यमेव च ।। २९ ।।

अब तू मेरे से वातरोगों को सुन—१. पादभ्रंश (जहां पैर को उठाकर रखना हो वहां न पड़कर अन्यत्र जा पड़ना) २. पादशूल ३. नखभेद ४. विपादिका (बिवाई फटना) ५. पादसुप्ति (पैर का सोजानाव्या-स्पर्श ज्ञान न होना) ६. वात खुड (खुड-पैर तथा जंघा की सन्धि में वात का प्रकोप होना) ७. वातगुल्फ (गुल्फ=गिट्टे-Ankle में वातप्रकोप) ८ अनिलग्रह