काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रोगाध्यायः २७]
(वायु के द्वारा शरीर का पकड़ा जाना) ९. गृध्रसी (रींग बाय-Sciatica) १०. पिण्डकोद्वेष्ट (पिण्डलियों में उद्वेष्टन) ११. जानुविश्लेष (जानुसन्धि-Knee goint का ढीला होना) १२. जानुभेद (घुटनों में पीड़ा होना) १३. उरुस्तम्भ १४. उरुसाद (जंघाओं की शिथिलता) १५. पांगुल्य (पंगुला-लंगड़ापन) १६. वातकण्टक १७. गुदभ्रंश (Prolapse of Anus) १८. गुदार्ति (गुदा में पीडा) १९ वृषणाक्षेप (अण्ड-Testicles का नीचे न उतरना) २०. शेफःस्तम्भ (जननेन्द्रिय की जड़ता) २१. श्रोणिभेद (कटि में पीड़ा) २२. वंक्षणाह (वंक्षण प्रदेश-Groin में आनाह) २३. विड्गद या विड्ग्रह (मलरोग या मलबन्ध) २४. उतावर्त २५. कुब्जता (कुबड़ापत) २६. वामन (ठिगना होना) २७. त्रिकग्रह (त्रिकप्रदेश-Secrum का जकड़ा जाना) २८. पृष्ठग्रह (पीठ का जकड़ा जाना) २९. पार्श्वशूल ३० उदरावेष्ट (पेट में आवेष्टन-मरोड़ा होना) ३१. हृद्द्रव (हृदय का स्फुरण Palpitation of Heart) ३२. हृन्मोह (Heart failure) ३३. वक्षतोद (छाती या फुफ्फुस में सूचीवेधवत् पीडा) ३४ वक्षोद्धर्ष (छाती में घर्षणवत् पीडा अथवा फुफ्फुस में घर्षणवत् शब्द Crepitations का होना) ३५. वक्ष उपरोधक (छाती का रुका हुआ अनुभव होना) ३६. ग्रीवास्तम्भ (गर्दन का अकड़ जाना-Torticolis या Rhei Neek) ३७. बाहुशोष (बाहुओं का सूख जाना) ३८. कण्ठोध्वंस (स्वरभेद अथवा शुष्क कास) ३९, हनुग्रह ४०. दन्तचाल (दांतों का हिलना) ४१. ओष्ठभेद ४२. मूकता (गूंगापन) ४३. वाग्रह (वाणी का रुक जाना-बोल न सकना) ४४. कषायास्यता (मुख का स्वाद कसैला होना) ४५. आस्यशोष (मुखशोष-मुख का सूख जाना) ४६. घ्राणनाश (गन्धशक्ति का नष्ट हो जाना-गन्ध का ज्ञान न होना) ४७. रसाज्ञता (जिह्वा को रस का ज्ञान न होना) ४८. बधिरता ४९. उच्चैःश्रवण (ऊँचा सुनना) ५० कर्णशूल ५१. अशब्दता (शब्द का मालूम न पड़ना अथवा शब्द न होते हुए भी शब्दों का सुनाई पड़ना) ५२. वर्त्मसंकोच (वर्त्म-पलकों का सुकड़ना अथवा खोल न सकना) ५३. विष्टम्भ ५४. तिमिर (नेत्रपटल का रोग) ५५. अक्षिशूल ५६. अक्षिव्युदास (आंखों का ऊपर चढ़ा रहना ५७. भ्रूव्यदास (भौओं का ऊपर चढ़ा रहना) ५८. शङ्ख भेद (शङ्खदेश-Temporal region में वेदना) ५९. शिरोरुजा (शिर में पीडा) ६०. केशभूमिस्फुटन (बालों की जड़ों का फूटना) ६१. दण्डकाक्षेप ६२. अर्दित (Facial paralysis) ६३. एकाङ्गक (एकाङ्गवध) ६४. पक्षवध (पक्षाघात) ६५. श्रम (थकावट) ६६. भ्रम (चक्कर आना Giddiness) ६७. विजृम्भिका (जंभाई) ६८. प्रलाप ६९. वेपथु (कम्पन) ७०. ग्लानि ७१. रूक्षता ७२. निद्रापरिक्षय (निद्रानाश) ७३. श्यावारुणावभासता (शरीर अथवा अङ्गों का श्याव तथा अरुण वर्ण का होना) ७४. अनवस्थान (चित्त का स्थिर न होना) ७५. हिक्का ७. श्वास ७७. विषाद (अप्रसन्नता) ७८. वन्ध्यात्व (बांझपना) ७९. षाण्ढ्य (नपुंसकता) तथा ८०. प्रतिश्याय—ये प्रधानरूप से वातिक रोग हैं। चरक सू. २० में भी लगभग इन्हीं ८० वातरोगों का परिगणन किया गया है—तत्रादौ वातविकाराननुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—नखभेदश्च, विपादिका च, पादशूलं च, पादभ्रंशश्च, पादसुप्तता च वाताखुड्डता च, गुल्फग्रहश्च पिण्डिकोद्वेष्टनं च, गृध्रसी च, जानुभेदश्च, जानुविश्लेषश्च, उरुस्तम्भश्च, उरुसादश्च, पाङ्गल्यं च, गुदभ्रंशश्च, गुदार्तिश्च, वृषणोत्क्षेपश्च, शेफःस्तम्भश्च, वङ्क्षणाहश्च, श्रोणिभेदश्च विड्भेदश्च, उदावर्तश्च, खञ्जत्वं च, (कुब्जत्वं च,) वामनत्वं च, त्रिकग्रहश्च, पृष्ठग्रहश्च, ग्रीवावमर्दश्च, उदरावेष्टश्च, हृन्मोहश्च, हृद्द्रवश्च, 'वक्ष उद्धर्षश्च, वक्ष उपरोधश्च (वक्षस्तोदश्च), बाहुशोषश्च, ग्रीवास्तम्भश्च, मलास्तम्भश्च, कण्ठोद्ध्वंसश्च, हनुस्तम्भश्च, ओष्ठभेदश्च (अक्षिभेदश्च), दन्तभेदश्च, दन्तशैथिल्यं च, मूकत्वं च (गद्गदत्वं च), वाक्सङ्गश्च, कषायास्यता च, मुखशोषश्च असंज्ञता च (अगन्धता च, घ्राणनाशश्च), कर्णशूलं च, अशब्दश्रवणं च, उच्चैःश्रुतिश्च, बाधिर्यं च, वर्त्मस्तम्भश्च, वर्त्मसंकोचश्च, तिमिरं च, अक्षिशूलं च, अक्षि व्युदासश्च, भ्रूव्युदाश्च, शङ्खभेदश्च, ललाटभेदश्च, शिरोरुक् च, केशभूमिस्फुटनं च, अर्दितं च, एकाङ्गरोगश्च, सर्वाङ्गरोगश्च (पक्षवधश्च) आक्षेपकश्च, दण्डकश्च, श्रमश्च, भ्रमश्च, वेपथुश्च, जृम्भा च, विषादश्च (हिक्का च, अतिप्रलापश्च, ग्लानिश्च, रौक्ष्यं च, पारुष्यं च, श्यावारुणावभासता च, अस्वप्नश्च, अनवस्थितत्वं चे यशीतिर्वातविकारा वातविकाराणामपरिसंख्येया-नामाविष्कृततमा व्याख्याताः ॥२०-२९॥