भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ६३

प्रतिश्यायः शरण्यश्च प्राधान्येनानिलात्मकाः । तेष्वनुक्तेषु चान्येषु वायोः स्वं रूपमुच्यते ।।३०।।
शैत्यं रौक्ष्यं लघुत्वं च गतिश्चेत्यथ कर्म च । विशदारुणपारुष्यसुप्तिसंकोचवैरसम् ।।३१।।
शूलतोदकषायत्वशौषिर्यखरकम्पनम् । सादहर्षौ कार्श्यवर्तव्यासस्रंसनभेदनम् ।।३२।।

इन उपर्युक्त रोगों के अतिरिक्त अन्य जिनका नाम नहीं लिया गया है उन रोगों में वायु के जो लक्षण होते हैं उनका वर्णन किया जाता है अर्थात् उपर्युक्त नामों द्वारा परिगणित रोगों के अतिरिक्त भी जो वायु के रोग होते हैं उनमें निम्न लक्षणों को देखकर कहा जा सकता है कि यह वायु का ही रोग है। वायु का अपना रूप या लक्षण—शीत, रूक्ष, लघु, गति (चलना-एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना। वायु के मर्म—इस प्रकार के रूप वाली वायु के शरीर के भिन्न भिन्न अवयवों में प्रविष्ट होने पर निम्न लक्षण होते हैं-विशदता, अरुणता, परुषता (कठोरता) सुप्ति (सुन्न हो जाना या स्पर्शज्ञान का न होना), संकोच विरसता (मुंह का स्वाद बिगड़ जाना), शूल, तोद (सूचीवेधवतपीडा), कषायता (मुंह का स्वाद कसैला होना) शुषिरता (छिद्रयुक्त होना), खरता (शरीर की कर्कशता), कम्पन (शरीर का कांपना) साद (शिथिलता), हर्ष (स्थानभेद से रोमहर्ष, दन्तहर्ष, ध्वजहर्ष आदि), कृशता, वर्त (गोलाई करना), व्यास (विस्तार या फैलना), स्रंसन (अपने स्थान से थोड़ा हिलना), भेद (अङ्गभेद), उद्वेष्टन (ऐंठन), दंश, भङ्ग (टूटना) तथा शोष (सूखना)—ये वायु के कर्म कहे हैं।

चरक सू. अ. २० में कहा है—सर्वेष्वपि खल्वेतेषु वातविकारेषूक्तेष्वन्येषु चानुक्तेषु वायोरिद्मात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्यं तदवयवं वा विमुक्तसंदेहा वातविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः; तद्यथा—रौक्ष्यं लाघवं वैशद्यं शैत्यं गतिरमूर्तित्वं चेति वायोरात्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः; तद्यथा—स्रंसभ्रंशव्यासाङ्गभेदहर्षतर्षवर्तमर्दकम्पचालतोदव्यथाचेष्टादीनि; तथा खरपरुषविशदसुषिरतारुणकषायविरस-मुखशोषशूलसुप्तिसंकुञ्चनस्तम्भनखञ्जतादीनि च वायोः कर्माणि, तैरन्वितं वातविकारमेवाध्यवस्येत् ।।३०-३२।।

उद्वेष्टदंशभङ्गाश्च शोषश्चानिलकर्म तत् । मधुराम्लोष्णलवणस्तत्रोपक्रम इष्यते ।।३३।।

वातविकारों की सामान्य चिकित्सा—इन वातविकारों की शान्ति के लिये मधुर, अम्ल, उष्ण तथा लवणरस युक्त पदार्थों का उपयोग करना चाहिये। चरक सू. अ. २० में कहा है—तं मधुराम्ललवणस्निग्धोष्णैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्नेहस्वेदास्थापनानुवासननस्तःकर्मभोजनाभ्यङ्गोत्सादनपरिषेकादिभिर्वातहरैर्मात्रां काल च प्रमाणीकृत्य; आस्थापनानुवासनं तु खलु सर्वोपक्रमेभ्यो वाते प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्घ्यादित एव पक्वाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं वातमूलं छिनत्ति, तत्रावजिते वातेऽपि शरीरान्तर्गता वातविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथा वनस्पतेर्मूले छिन्ने स्कन्धशाखारोहकुसुमफलपलाशादीनां नियतो विनाशस्तद्वत्। उपर्युक्त मधुरादि पदार्थों के सेवन के अतिरिक्त स्नेहन, स्वेदन, आस्थापन, अनुवासन, नस्य, भोजन, अभ्यङ्ग, उत्सादन, परिषेक आदि वातहर उपक्रमों द्वारा चिकित्सा का विधान दिया गया है। आस्थापन तथा अनुवासन का वातविकारों को शान्त करने में विशेष स्थान है ।।३३।।

ओषः प्लोषो भ्रमो दाहो वमथूर्धूमकाम्लकौ । अन्तर्दाहो ज्वरोऽत्यौष्ण्यमतिस्वेदोऽङ्गदाहकः ।।३४।।
त्वग्दाहः शोणितक्लेदो मांसक्लेदोऽङ्गशीर्य(र)णम् । मांसपाकश्चर्भदलो रक्तविस्फोटमण्डले ।।३५।।
रक्तपित्तं च कोठाश्च कक्ष्या हारिद्रनीलके । कामला तिक्तवक्त्रत्वं रक्तगन्धास्यता तथा ।।३६।।
अतृप्तिः पूतिवक्त्रत्वं जीवादानं तमस्तृषा । मेढ्रपायुगलाक्ष्यास्यपाको हारिद्रमूत्रविट् ।।३७।।

पित्त के ४० विकार—१. ओष (सर्वाङ्गीण तीव्रदाह-जिसमें स्वेद एवं अरति हो) २. प्लोष (प्रादेशिक दाह-जैसे अग्नि द्वारा होता है) ३. भ्रम ४. दाह (तीव्र सन्ताप) ५. वमथु (वमन) ६. धूमक (शिर, ग्रीवा, आदि में धुंआ सा उठना) ७. अम्लक (अन्तर्दाह तथा हृदयशूलयुक्त डकार) ८. अन्तर्दाह (शरीर के अन्दर या कोष्ठ आदि में जलन) ९. ज्वर १०.

२७ का.सं.