काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रोगाध्यायः २७] |
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अति उष्णता (तापांश का अधिक होना) ११. अतिस्वेद (पसीना अधिक आना) १२. अङ्गदाह (अङ्गों में जलन) १३. त्वग्दाह (त्वचा में जलन) १४. शोणितक्लेद (रक्त का काला, दुर्गन्धियुक्त तथा पतला होना) १५. मांसक्लेद (मांस का काला तथा दुर्गन्धियुक्त होना Gangrenous- हो जाना) १६. अङ्गशीरण (अङ्गों का टूटना) १७. मांसपाक १८. चर्मदल १९. रक्तविस्फोट (लाल चकत्ते-Rashes) २०. रक्तमण्डल २१ रक्तपित्त २२. कोठ (रक्तकोठ) २३. कक्षा (बाहु, पार्श्व, अंस आदि में उत्पन्न हुई पीड़ायुक्त काली २ फुन्सियां-Acute lymphadenitis of the Axillary glands अथवा चरक और अष्टाङ्ग संग्रह के वर्णन के अनुसार इसे Herpes zoster कह सकते हैं) २४. हारिद्र (हल्दी के वर्ण का होना) २५. नीलिका २६. कामला (पीलिया-Gaundice) २७. तिक्तवक्त्रत्व (मुखका कड़वा स्वाद होना) २८. रक्तगन्धास्यता (मुख में रक्त की गन्ध आना) २९. अतृप्ति (भोजन में तृप्ति न होना) ३०. पूतिवक्त्रता (मुख का दुर्गन्धियुक्त होना) ३१. जीवादान (जीवरक्त का निकलना) ३२. तम (आंखों के सामने अंधेरा प्रतीत होना) ३३. तृषा अधिक प्यास) ३४. मेढ्रपाक (मूत्रेन्द्रिय का पकना) ३५. पायुपाक (गुदा का पकना) ३६. गलपाक (गले का पकना) ३७. अक्षिपाक (नेत्रों का पकना) ३८. आस्यपाक (मुख का पकना) ३९. हारिद्रमूत्र (मूत्र का हरा होना) ४०. हारिद्रविट् (मल का हरा होना)—ये मुख्य २ पित्तरोग कहे हैं। चरक सू. अ. २० में पित्त के निम्न ४० रोग गिनाये हैं—पित्तविकाराश्चत्वारिंशदत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यन्ते; तद्यथा—ओषश्च प्लोषश्च, दाहश्च, दवथुश्च, धूमकश्च, आम्लकश्च, विदाहश्च, अन्तर्दाहश्च (अङ्गदाहश्च) ऊष्माधिक्यं च, अतिस्वेदश्च, (अङ्गस्वेदश्च), अङ्गगन्धश्च, अङ्गावदरणं च, शोणितक्लेदश्च, मांसक्लेदश्च, त्वग्दाहश्च, मांसदाहश्च, त्वगवदरणं च, चर्मविदरणं च, रक्तकोठाश्च (रक्तविस्फोटाश्च), रक्तपित्तं च, रक्तमण्डलानि च, हरित्त्वं च, हारिद्रत्वं च, नीलिका च, कक्षा च, कामला च, तिक्तास्यता च, (लोहितगन्धास्यता च), पूतिमुखता च, तृष्णाया आधिक्यं च, अतृप्तिश्च, आस्यपाकश्च, गलपाकश्च, अक्षिपाकश्च गुदपाकश्च, मेढ्रपाकश्च, जीवादानं च, तमः प्रवेशश्च, हरितहारिद्रमूत्रनेत्रवर्चस्त्वं चेति चत्वारिंशत्पित्तविकाराः पित्तविकाराणामपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा भवन्ति ॥३४-३७॥
इति प्रधानाः पित्तार्त्यः, स्वं रूपं तस्य वक्ष्यते । लाघवं तैक्ष्ण्यमौष्ण्यं च वर्णाः शुक्लारुणादृते ।।३८।।
वैगन्ध्यं कटुकाम्लत्वमीषत्स्नेहश्च पित्तजाः । दाहोष्णापाकप्रस्वेदकण्डूकोष्ठस्रवादिभिः ।।३९।।
अब पित्त के अपने रूप (लक्षण) कहे जाते हैं जिन्हें देखकर यह कहा जा सके कि यह पित्तरोग ही है—पित्त के अपने रूप-लघुता, तीक्ष्णता, उष्णता, शुक्ल तथा अरुण वर्ण को छोड़कर अन्य वर्णों वाला होना, वैगन्ध्य (आमगन्ध), कटु, अम्ल, ईषत् स्नेह (अधिक स्निग्ध न होना)—ये पित्त के अपने रूप हैं। पित्त के कर्म—इन रूपों वाले पित्त के शरीर के भिन्न २ अवयवों में प्रविष्ट होने पर निम्न लक्षण होते हैं—दाह (जलन), उष्णता (गर्मी-Heat), पाक (पकना-Suppuration), प्रस्वेद (पसीना), कण्डू, कोठ तथा स्राव इत्यादि पैत्तिक विकारों के कर्म हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—सर्वेष्वपि खल्वेतेषु पित्तविकारेष्वन्येषु चानुक्तेषु पित्तस्येदमात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसन्देहा पित्तविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः, तद्यथा—औष्ण्यं तैक्ष्ण्य लाघवमनतिस्नेहो वर्णश्च शुक्लारुणवर्जो गन्धश्च विस्रो रसौ च कटुकाम्लौ पित्तस्यात्मरूपाणि एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः, तद्यथा—दाहौष्ण्यपाकस्वेदक्लेदकोष्ठस्रावरागा यथास्वं च गन्धवर्णरसाभिनिर्वर्तनं पित्तस्य कर्माणि, तैरन्वितं पित्तविकारमेवाध्यवस्येत् ॥३८-३९॥
विद्यात् पित्तविकारार्तं कर्मैतत्, तदुपक्रमः । कषायतिक्तमधुरस्नेहस्रंसनशोधणाः ।।४०।।
इनकी सामान्य चिकित्सा—इन पित्तविकारों की शान्ति के लिये कषाय, तिक्त एवं मधुर द्रव्य तथा स्नेह, स्रंसन (विरेचन) और शोषण आदि का उपयोग करे। चरक सू. अ. २० में इनकी निम्न चिकित्सा दी है—तं