भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 423

रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ६५

मधुरतिक्तकषायशीतैरुपक्रमैरुपक्रमेत् स्नेहविरेचनप्रदेहपरिषेकाभ्यङ्गावगाहादिभिः पित्तहरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य विरेचनं तु सर्वोपक्रमेभ्यः पित्ते प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः; तद्ध्यादित एवामाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं पित्तमूलं चापकर्षति, तत्रावजिते पित्तेऽपि शरीरान्तर्गताः पित्तविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथाऽग्नौ व्यपोढे केवलमग्निगृहं शीतीभवति तद्वत् । मधुर, तिक्त, कषाय आदि द्रव्यों के उपयोग के अतिरिक्त विरेचन, प्रदेह, परिषेक, अभ्यङ्ग तथा अवगाहन आदि पित्तहर क्रियाओं का विशेष प्रयोग बताया गया है । पैत्तिक रोगों में विरेचन का विशेष स्थान है ॥४०॥

स्तैमित्यं गुरुताऽङ्गस्य निद्रातन्द्रातितृप्तयः । मुखमाधुर्यसंस्रावकफोद्गारबलक्षयाः ॥४१॥
हल्लासोऽथ मलाधिक्यं धमनीकण्ठलेपकौ ॥४२॥
आमं च गलगण्डश्च वह्निसाद उदर्दकः । श्वेतावभासताऽङ्गानां तथा मूत्रपुरीषयोः ॥४३॥

कफ के २० विकार—१. स्तिमितता (गीले वस्त्र से अङ्गों के आच्छादित होने की तरह प्रतीत होना) २. शरीर का भारीपन ३. निद्रा (नींद की अधिकता) ४. तन्द्रा (आलस्य) ५. अतितृप्ति (पेट का शीघ्र ही बहुत भरा मालूम पड़ना) ६. मुखमाधुर्य (मुख का स्वाद मीठा होना) ७. संस्राव (मुखस्राव-मुख से लालास्राव होना) ८. कफोद्गार (कफ का बाहर निकलना-कफ का थूकना) ९. बलक्षय (बल का क्षीण होना) १०. हल्लास (जी मचलाना) ११. मलाधिक्य (मल की अधिकता) १२. धमनीलेपक (धमनियों का श्लेष्मा से लिप्त रहना) १३. कण्ठलेपक (कण्ठ का श्लेष्मा से लिप्त रहना) १४. आम (आम रस का उत्पन्न होना) १५. गलगण्ड १६. वह्निसाद (अग्निसाद जाठराग्नि का मन्द होना) १७. उदर्द १८. श्वेतावभासता (अङ्गों का सफेद मालूम पड़ना) १९. श्वेतमूत्र (मूत्र का रंग सफेद होना—Phosphates, Chyle अथवा Albumin) के कारण) २०. श्वेतपुरीष (मल का रंग सफेद होना—आंव-Mucus के कारण) असंख्य कफरोगों में से इन २० प्रधान रोगों का उल्लेख किया गया है । चरक सू. अ. २० में भी कफ के २० रोग गिनाये हैं—श्लेष्मविकारांश्च विंशतिम त ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः, तद्यथा—तृप्तिश्च, तन्द्रा न, निद्राधिक्यं च, स्तैमित्यं च, गुरुगात्रता च, आलस्यं च, मुखमाधुर्यं च, मुखस्रावश्च, श्लेष्मोद्धिरणं च, मलस्याधिक्यं च, कण्ठोपलेपश्च, बलासश्च, हृदयोपलेपश्च, धमनीप्रतिचयश्च, गलगण्डं च, अतिस्थौल्यं च, शीताग्निता च उददर्दश्च, श्वेतावभासता च, श्वेतमूत्रनेत्रवर्चस्त्वं चेति विंशतिः श्लेष्मविकाराः श्लेष्मविकाराणामपरिसंख्येयानामाविष्कृतमाव्याख्याताः ॥४१-४६॥

कफजानामसंख्यानां प्रधनाः परिकीर्तिताः । स्नेहशैत्यगुरुश्वेतमाधुर्यं कफलक्षणम् ॥४४॥
श्लक्ष्णता चामयोत्पत्तौ तस्य कर्माणि चक्षते । स्नेहादि चिरकारित्वं बन्धोपचयसुप्तयः ॥४५॥

कफ के लक्षण या अपने रूप—स्निग्धता, शीतता, भारीपन, श्वेतता, मधुरता तथा श्लक्ष्णता (चिकनापन) ये कफ के लक्षण हैं। कफ के कर्म—कफ के रोग उत्पन्न हो जाने पर स्नेह आदि (शरीर में स्निग्धता होना), रोग के लक्षणों का चिरकालीन हो जाना (अथवा चिरकारित्व-प्रत्येक कार्य धीरे २ करना), बन्ध, उपचय (उपचित-संचित होना), सुप्ति (शरीर का स्पर्श ज्ञान रहित होना) तथा विष्टम्भ ये कफ के कर्म हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु श्लेष्मविकारेष्वन्येषु चानुक्तेषु श्लेष्मण इदमात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसंदेहाः श्लेष्मविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः, तद्यथा-शैत्यशैत्यस्नेहगौरवमाधुर्यमात्स्र्न्यानि श्लेष्मण आत्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः, तद्यथा—शैत्यशैत्यकण्डूस्थैर्यगौरवस्नेहस्तम्भसुप्तिक्लेदोपदेह-बन्धमाधुर्यचिरकारित्वानि श्लेष्मणः कर्माणि, तैराम्बितं श्लेष्मविकारमेवाध्यवस्येत् ॥४४-४५॥

विष्टम्भश्चेति, तत्र ज्ञः कषायकटुतिक्तकैः । रूक्षोष्णैश्चाप्युपचरेन्मात्राकालौ विचारयन् ॥४६॥

इनकी सामान्य चिकित्सा—विद्वान् चिकित्सक को चाहिये कि मात्रा और काल का विचार करते हुए कफ के रोगों की शान्ति के लिये कषाय, कटु, तिक्त, रूक्ष, तथा उष्ण द्रव्यों तथा स्नेहन, स्वेदन और पञ्चकर्म का प्रयोग करे । चरक