काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 424, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रोगाध्यायः २७]
सू. अ. २० में कहा है—तं कटुकतिक्तकषायतक्ष्णोष्णरूषैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्वेदनवमनशिरोविरेचनव्यायामादिभिः श्लेष्महरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य, वमनं तु सर्वोपक्रमेभ्यः श्लेष्मणि प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्ध्यादित एवामाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं श्लेष्ममूलमपकर्षति, तत्रावजिते श्लेष्मण्यपि शरीरान्तर्गताः श्लेष्मविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथा—भिन्ने केदारसेतौ शालियवषष्टिकादीन्यनभिष्यन्दमानान्याम्भसा प्रशोषमापद्यन्ते तद्वदिति । उपर्युक्त कषाय तिक्त, आदि द्रव्यों के उपयोग के अतिरिक्त स्वेदन, वमन, शिरोविरेचन, व्यायाम आदि कफनाशक क्रियाओं द्वारा कफ की शान्ति करे। कफरोगों की शान्ति के लिये वमन का प्रधान स्थान माना जाता है ॥४६॥
स्नेहस्वेदोपचारौ च तेषु कर्माणि पञ्च च । वातघ्नानां तु सर्वेषामनुवासनमुत्तमम् ॥४७॥ (इति ताडपत्रपुस्तके ४४ तमं पत्रम् ।)
सब वातघ्न पदार्थों एवं क्रियाओं में अनुवासन, पित्तघ्न पदार्थों एवं क्रियाओं में विरेचन तथा श्लेष्मघ्न पदार्थों एवं क्रियाओं में वमन श्रेष्ठ माना गया है ॥४७॥
पित्तघ्नानां विरेकश्च वमनं श्लेष्मघातिनाम् । येषां चिकित्सितस्थानमर्थे तु परिकीर्तितम् ॥४८॥ तांस्तु रोगान् प्रवक्ष्यामि न ह्यत्रैतत् समाप्यते । महागदोऽथ संन्यास ऊरुस्तम्भस्त एकशः ॥४९॥ ज्वरव्रणामगृध्रस्यः कामला वातशोणितम् । अर्शस्यपि तथाऽऽयामो द्विविधा व्याधयस्तु ते ॥५०॥ वातासृक्श्वित्रशोथास्तु त्रिविधाः परिकीर्तिताः । ग्रहण्यक्षिविकाराश्च कर्णरोगा मुखामयाः ॥५१॥ अपस्माराः प्रतिश्यायः शोषणां हेतवो मदाः । चतुर्विधास्ते निर्दिष्टा मूर्च्छा क्लैव्यानि चैव हि ॥५२॥ तृष्णाच्छर्दिश्वासकासगुल्मप्लीहारुचिव्यथाः । हिक्कोन्मादशिरोरोगा हृद्रोगाः पाण्डुसंज्ञकाः ॥५३॥ एते पञ्चविधाः प्रोक्ताः, षड्विधानपि मे शृणु । उदावर्ता अतीसाराः, सवैसर्पा अथामयाः ॥५४॥ मेहिनां पिडकाः कुष्ठं सप्त सप्तोपलक्षयेत् । शुक्रदोषाः पयोदोषा मूत्राघातोदराणि च ॥५५॥ अष्टावष्टौ वदन्त्येतान् ग्रहास्तु दश कीर्तिताः । योनिव्यापत्कृमिमेहान् विंशतिं विंशतिं विदुः ॥५६॥
यह रोगों का प्रकरण यहां समाप्त नहीं हुआ है। अभी मैं उन रोगों का उपदेश करूंगा जिनके लिये आगे चिकित्सा स्थान कहा गया है अर्थात् जिनका चिकित्सास्थान में वर्णन किया गया है। वे रोग निम्न हैं—एक २ रोग—महागद, सन्यास तथा ऊरुस्तम्भ (महागद को चरक में अतत्त्वाभिनिवेश कहा है अर्थात् जिसमें तत्व का यथावत् ज्ञान न हो)—ये एक २ रोग होते हैं। दो २ रोग—ज्वर, व्रण, आमदोष, गृध्रसी, कामला, वातशोणित (वातरक्त—Gout), अर्श, आयाम (अन्तरायाम तथा बाह्यायाम)—ये दो २ व्याधियां हैं। तीन २ रोग—वातासृक् (वातरक्त), श्वित्र (किलास–कुष्ठ रोग) तथा शोथ–ये तीन २ रोग हैं। चार २ रोग—ग्रहणीरोग, अक्षिरोग, कर्णरोग, मुखरोग, अपस्मार, प्रतिश्याय, शोषों के कारण (साहस, वेगरोध, क्षय, विषमासन), मद, मूर्च्छा तथा क्लीबता—ये चार २ रोग हैं। पांच २ रोग—तृष्णा, छर्दि, श्वास, कास, गुल्म, प्लीहा, अरुचि, व्यथा, हिक्का, उन्माद, शिरोरोग, हृद्रोग तथा पाण्डुरोग–ये पांच २ प्रकार होते हैं। ६ प्रकार के रोग—उतावर्त तथा अतिसार। सात २ रोग—विसर्परोग, मधुमेह की पिडकाएं (Carbuncles) तथा कुष्ठ ये सात २ होते हैं। आठ २ रोग—शुक्रदोष, क्षीरदोष, मूत्राघात तथा उदररोग—ये आठ २ होते हैं। दस प्रकार के रोग—ग्रहरोग १० होते हैं। २० प्रकार के रोग—योनिरोग, कृमिरोग तथा प्रमेह–ये बीस २ होते हैं। इन सब रोगाधिकरणों का चिकित्सास्थान के हेतु से यहाँ संक्षेप में उल्लेख किया गया है। इस प्रकार यहां एक २ रोग के तीन वर्ग, दो २ के आठ, तीन २ के तीन, चार २ के आठ, पांच २ के पन्द्रह, छः २ के दो, सात २ के तीन, आठ २