काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 425, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंरोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ६७
के चार, दस का एक तथा बीस २ के तीन वर्ग दिये हैं। चरक सू. अ. १९ (अष्टोदरीय अध्याय) में इनका विस्तार के साथ वर्णन किया गया है। विशेष ज्ञान के लिये जिज्ञासु पाठक इसे वहीं देखें ॥४८-५६॥
एते समासतः प्रोक्ताश्चिकित्सास्थानहेतवः। पूर्वोद्भवनिमित्तेन योऽपरो जायते गदः ॥५७॥
उपद्रव का लक्षण—पूर्व उत्पन्न व्याधि के साथ पीछे से जो दूसरा रोग हो जाता है उसे उपद्रव कहते हैं जिस प्रकार ज्वर में पीछे अतिसार हो जाता है। सुश्रुत सू. अ. ३५ में कहा है—‘‘तत्र, औपसर्गिको यः पूर्वोत्पन्नं व्याधिं जघन्यकालजातो व्याधिरुपसृजति स तन्मूलमूलक एवोपद्रवसंज्ञः।’’ जो पहले उत्पन्न हुई व्याधि के उत्तरकाल (बाद में) उत्पन्न होता है तथा पहले व्याधि के मूल में ही जिसका मूल (कारण) है उसे उपद्रव कहते हैं। चरक में इसका निम्न लक्षण दिया है—उपद्रवस्तु खलु रोगोत्तरकालजो रोगाश्रयो रोग एव स्थूलोऽणुर्वा रोगात्पश्चाज्जायत इति उपद्रवसंज्ञः। आजकल के विज्ञान के अनुसार Secondary complications and sequala का अन्तर्भाव ‘उपद्रव’ शब्द में हो जाता है ॥५७॥
तमुपद्रवमित्याहुरतीसारो यथा ज्वरे। चिकित्सितं तथोत्पत्तिं तेषामेके प्रचक्षते ॥५८॥
उपद्रवाणामित्येके पूर्वं नेत्याह कश्यपः। उभयत्रैव यद्युक्तं पानभोजनभेषजम् ॥५९॥
शान्तये तत् प्रयुञ्जीत न वर्धेत तथा ह्युभौ। यं वा तीव्रतरं पश्येद्व्याधिं विद्वान् स्वलक्षणैः ॥६०॥
तमेवोपक्रमेतादौ सिद्धिकामो भिषग्वरः।
उपद्रवों की चिकित्सा—कुछ विद्वान् कहते हैं कि उत्पत्ति के क्रम के अनुसार ही रोगों की चिकित्सा करे अर्थात् जो मुख्य रोग पहले हुआ है उसकी पहले तथा उपद्रव (जो पीछे से अनुबन्ध रूप में हुआ है) की पीछे चिकित्सा करे। तथा कुछ आचार्य कहते हैं कि इनमें से उपद्रवों की चिकित्सा पहले करनी चाहिये। भगवान् कश्यप कहते हैं—यह ठीक नहीं है। उनके मत में दोनों (मूलव्याधि तथा उपद्रव) की ही शान्ति के लिये उचित अन्नपान तथा भेषज का इस प्रकार से प्रयोग करे कि दोनों शान्त हो जायें तथा दोनों में से कोई भी बढ़ने न पावे। अथवा सफलता को चाहने वाले चिकित्सक को चाहिये कि जो व्याधि अपने तीव्र (उग्र—Acute) रूप में हो उसकी पहले चिकित्सा करे अर्थात् जो व्याधि अधिक तीव्र रूप में हो उसकी चिकित्सा पहले करे। उसके शान्त अथवा मन्दवेग हो जाने पर पीछे से दूसरे रोग की चिकित्सा की जा सकती है ॥५८-६०॥
यो हेतुः पित्तरोगणां रक्तजानां स एव तु ॥६१॥
शोणितं कुपितं जन्तुं क्लिश्नाति बहुभिर्मुखैः ॥६२॥
रक्तज रोगों के हेतु तथा चिकित्सा—पैत्तिकरोगों के जो कारण हैं, रक्तरोगों के भी कारण वे ही हैं। कुपित हुआ रक्त प्राणियों को अनेक प्रकार से कष्ट देता है।
वक्तव्य—जिन कारणों से पित्त प्रकुपित होता है उन्हीं से रक्त भी प्रकुपित होता है। हमारे प्राचीन शास्त्रों में पित्त को रक्त का ही मल माना गया है। सुश्रुत—सू. अ. ४६ में कहा है—कफः पित्तं मलः खेषु स्वेदः स्यान्नखरोम च। नेत्रविट् त्वक्षु च स्नेहो धातूनां क्रमश्रो मलाः॥ कफ, पित्त आदि क्रमशः रसरक्त आदि धातुओं के मल हैं। पाश्चात्य विज्ञान के अनुसार भी पित्त का रक्त से ही निर्माण माना गया है। Halliburton's physiology में कहा है—Liver cells take certain materials from plasma and eleborate the constituants of the bile. Bile pigments are formed from pigments of broken down blood Corpaseles. पित्त और रक्तका परस्पर घनिष्ठ संबन्ध है। इसीलिये पित्तप्रकोपक कारणों से ही रक्त भी प्रकुपित हो जाता है। सुश्रुत सू. अ. २१ में कहा भी है—पित्तप्रकोपणैरेव चाभीक्ष्णं द्रवस्निग्धगुरुभिराहारैर्दिवास्वप्नक्रोधामलातपश्रमाभिघाताजीर्णविरुद्धायशनादिभिर्विशेषैरसृक् प्रकोपमापद्यते॥