काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | लक्षणाध्यायः २८] |
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वैवर्ण्यसंतापशिरोक्षिरोगदौर्बल्यदौर्गन्ध्यतमः प्रवेशाः। वैसर्पविद्रध्युपजिह्वगुल्मरक्तप्रमेहप्रदरातिनिद्राः ।।६३।। मन्दाग्निता स्रोतसां पूतिभावः स्वरक्षयः स्वेदमदानिलासृक्। तृष्णाऽरुचिः कुष्ठविचर्चिकाश्च कण्ड्वः सकोठाः पिडकाः सकण्डवः ।।६४।।
रक्तरोग—विवर्ण (रक्त की कमी से शरीर का रङ्ग सफेद हो जाना), सन्ताप, शिरोरोग, अक्षिरोग, दुर्बलता, दुर्गन्धि, तमःप्रवेश (अन्धकार में प्रवेश करने के समान प्रतीत होना) विसर्प, विद्रधि, उपजिह्व, गुल्म, रक्तप्रमेह (मूत्र के साथ रक्त आना-Haematuria), प्रदर, अतिनिद्रा, मन्दाग्नि, स्रोतों में दुर्गन्धि आना, स्वरक्षर (Laryngitis), स्वेद मल, वायु, तृष्णा, अरुचि, कुष्ठ विचर्चिका, कण्डू, कोठ, पिडका तथा इन रोगों के अतिरिक्त अन्य भी बहुत से अनुक्त रोग रक्त विकार से हो जाते हैं। सुश्रुत सू. अ. २४ में निम्न रक्तज रोग गिनाये हैं-कुष्ठविसर्पपिडकामशकनीलि-कातिलकालकन्यच्छव्यङ्गेन्द्रलुप्तप्लीहविद्रधिगुल्मवातशोणिताशोऽर्बुदाङ्गमर्दासृग्दररक्तपित्तप्रभृतयो रक्तदोषजाः गुदमुखमेढ्रपाकाश्च। इसी प्रकार चरक सू. अ. २८ में भी निम्न रक्तज दोष दिये हैं—कुष्ठवीसर्पपिडका रक्तपित्तमसृग्दरः। गुदमेढ्रास्यपाकश्च प्लीहा गुल्मोऽथविद्रधी ।। नीलिका कामला व्यङ्गं पिप्लवस्तिलकालकाः। दद्रुश्चर्मदलश्वित्रं पामाकोठास्रमण्डलम् ।। रक्तप्रदोषाज्जायन्ते ।। ६३-६५।।
अन्ये च रोगा विविधा अनुक्तास्तेष्वादितः स्त्रंसनमेव पथ्यम्। वैसर्पवच्चात्र वदन्ति सिद्धं रक्तावसेकं च विशोषणं च ।।६५।।
रक्तज दोषों की चिकित्सा—इनमें सर्वप्रथम विरेचन देना चाहिये। इसकी विसर्प के समान चिकित्सा की जाती है तथा इसमें रक्तमोक्षण और शरीर का शोषण किया जाता है। रक्तमोक्षण करते समय सुश्रुत सू. अ. १४ में निम्न बातों का ध्यान रखने को कहा गया है—तस्मान्न शीते नात्युष्णे नास्विन्ने नातितापिते। यवागूं प्रतिपीतस्य शोणितं मोक्षयेद्भिषक् ।। रक्तमोक्षण अत्यन्त सर्दी अथवा अत्यन्त गर्मी में न करके साधारण ऋतु में करना चाहिये ।।६५।।
न त्वेव बालस्य विशोषणं हितं नैवातिसंशोधनरक्तमोक्षणे। स्निग्धैः सुशीतैर्मधुरैरदाहिभिस्तत्रोपचारोऽशनलेपसेचनैः ।।६६।। इति ह स्माह भगवान् कश्यपः। इति रोगाध्यायः सप्तविंशतितमः ।।२७।।
बालक का चिकित्सा कार्य में अधिक शोषण, अधिक रक्त-मोक्षण तथा आवश्यकता से अधिक संशोधन करना उचित नहीं है। उसका स्निग्ध, शीतल, मधुर तथा दाह न उत्पन्न करने वाले अन्नपान, लेप तथा परिषेचन के द्वारा ही उपचार करना चाहिये। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।६६।।
इति रोगाध्यायः सप्तविंशतितमः ।।२७।।
अष्टाविंशतितमोऽध्यायः
अथातो लक्षणाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम लक्षणाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में बालकों के शरीर में होने वाले शुभ तथा अशुभ लक्षणों का वर्णन किया जायगा॥