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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

५२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् वेदनाध्यायः २५]

यथोक्तान्यभिदर्शयत्यतिमात्राणि; अतिमात्रप्रदुष्टाश्च दोषाः प्रदुष्टामबद्धमार्गास्तिर्यग्गच्छन्तः कदाचित्केवलमेवास्य शरीरं दण्डवत्स्तम्भयन्ति, ततस्तमलसकमसाध्यं ब्रुवते । अर्थात् इसमें कफ द्वारा मार्गों के बन्द होने से सेवन किया हुआ अन्न पान अन्दर ही रुककर आलसी होने के कारण बाहर नहीं निकलता तथा इसमें वमन तथा अतिसार को छोड़कर आमदोष के सब लक्षण उपस्थित हो जाते हैं ।

अन्यत्र भी कहा है—प्रपातिनोर्ध्वं नाधस्तान्नाहारोऽपि विपच्यते । आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः ॥ यही इन दोनों में अन्तर है ।

दृष्टिव्याकुलता तोदशोथशूलास्ररक्तताः । सुप्तस्य चोपलिप्यन्ते चक्षुषी चक्षुरामये ॥२९॥

चक्षुरोग—इसमें दृष्टि की व्याकुलता, चक्षुओं में तोद, शोथ, शूल, अश्रुBufferओं का अधिक आना (Lacrimation) और लालिमा (Congestion) होती है । सोने पर दोनों आंखें (पलक-Eye lashes) परस्पर (Discharge के कारण) चिपक जाती हैं ।

घर्षत्यङ्गानि शयने रोदितीच्छति मर्दनम् । शुष्ककण्ड्वऽर्दितं विद्यात्ततश्चार्द्रा प्रवर्तते ॥३०॥ सुखायते मृद्यमानं मृद्यमानं च शूयते । शूनं स्रवति सस्योढा (?) मार्द्रयां शूलदाहवत् ॥३१॥

शुष्ककण्डू (Pruritis)—इस रोग में बालक रात्रि को सोते समय अङ्गों का घर्षण करता है (रगड़ता है), वह रोता है तथा शरीर का मर्दन करना चाहता है । आर्द्रकण्डू—शुष्क के बाद आर्द्रकण्डू प्रारंभ होती है । इसमें रोगी रगड़ने पर सुख (आनन्द) का अनुभव करता है । रगड़ने पर वह बढ़ जाती है तथा बढ़ने के बाद उसमें से स्राव (Discharge) आने लगता है । इस प्रकार बढ़ी हुई इस आर्द्रकण्डू में शूल एवं दाह होती है ।

स्तैमित्यमरुचिर्निद्रा गात्रपाण्डुकताऽरतिः । रमणाशनशय्यादीन् धात्रीं च द्वेष्टि नित्यशः ॥३२॥ अस्नातः स्नातलूपश्च स्नातश्चास्नातदर्शनः । आमस्यैतानि रूपाणि विद्याद्वैद्यो भविष्यतः ॥३३॥

आमदोष—इस रोग में स्तिमितता (शरीर का चिपचिपापन), अरुचि, निद्रा, शरीर का पाण्डु (Anaemic) होना और अरति होती है तथा बालक को खेल, भोजन तथा निद्रा तथा धात्री से भी निरन्तर द्वेष (अरुचि या घृणा) हो जाती है । यदि उसने स्नान नहीं किया हुआ है तो स्नान किये हुए के समान प्रतीत होता है । और यदि स्नान किया हुआ है तो स्नान न किये हुए के समान प्रतीत होता है । यदि ये लक्षण हों तो उन्हें देखकर वैद्य कह सकता है कि इस बालक को आमदोष होने वाला है ।

नाभ्यां समन्ततः शोथः श्वेताक्षिनखवक्त्रता । पाण्डुरोगेऽग्निससादश्च श्वयथुश्चाक्षिकूटयोः ॥३४॥ पीतचक्षुर्नखमुखविण्मूत्रः कामलार्दितः । उभयत्र निरुत्साहो नष्टाग्निरुधिरस्पृहः ॥३५॥

पाण्डुरोग (Anaemia)—इसमें नाभि के चारों ओर शोथ होता है । आंखें, नाखून तथा मुंह सफेद हो जाता है । उसे अग्निमांद्य हो जाता है तथा उसकी आंखों के चारों ओर शोथ हो जाता है । कामला (Jaundice) रोग—इसमें आंखें, नाखून, मुख, मल तथा मूत्र पीले हो जाते हैं (Bile Pigments के कारण) । पाण्डु एवं कामला इन दोनों रोगों में मनुष्य उत्साह शून्य होता है, उसकी जठराग्नि नष्ट हो जाती है तथा रुधिर के प्रति उसकी स्पृहा (आकांक्षा अथवा आवश्यकता) होती है ।

मूर्च्छाप्रजागरच्छर्दिधात्रीद्वेषारतिभ्रमैः । वित्रासोद्वेगतृष्णाभिर्विद्याद्बाले मदात्ययम् ॥३६॥

मदात्यय—मूर्छा, जागरण (अनिद्रा Insomnia) वमन, धात्री से द्वेष (अनिच्छा-अरुचि), अरति, भ्रम, वित्रास (डर), उद्वेग (वेगों की प्रबलता) तथा तृष्णा-इन लक्षणों से बालक में मदात्ययरोग का ज्ञान होता है ।

वेदनाध्यायः २५] सूत्रस्थानम् ५३

मुहुर्मुखैनोच्छ्वसिति पीत्वा पीत्वा स्तनं तु यः । स्रवतो नासिके चास्य ललाटं चाभितप्यते ।। ३७ ।।
स्रोतांस्यभीक्ष्णं स्पृशति पीनसे क्षौति कासते । उरोघाते तथैव स्यान्निघ्नन्त्युरसाऽधिकम् ।। ३८ ।।

पीनसरोग (प्रतिश्याय)—जो बालक स्तनपान करता हुआ बार-बार मुख से श्वास लेता है, जिसकी नासिका से स्राव होता रहता है, ललाट तप्त (गरम) रहता है, स्रोतों का बार २ स्पर्श करता है, छींकता है तथा खांसता रहता है—उसे पीनसरोग से आक्रान्त जानना चाहिये । उरोघात—इसमें पूर्वोक्त लक्षणों के साथ २ बालक छाती से बड़े गरम २ सांस निकालता रहता है ।

स्वस्थवृत्तपरो बालो न शेते तु यदा निशि । रक्तबिन्दुचिताङ्गश्च विद्यात्तं जन्तुकादितम् ।। ३९ ।।

जन्तुदंश (Insect Bite)—स्वस्थ (नीरोग) बालक यदि रात्रि में न सोये तथा उसके किसी अंग पर लाल २ बिन्दु दिखाई दें तो यह समझना चाहिये कि उसे किसी जन्तु ने काटा है ।

वक्तव्य—बालकों के रोगों तथा वेदनाओं के ज्ञान के लिये सुश्रुत शा. अ. १० में भी कुछ लक्षण संक्षेप से दिये गये हैं—अङ्गप्रत्यङ्गदेशे तु रुजा यत्रास्य जायते । मुहुर्मुहुः स्पृशति तं स्पृश्यमाने च रोदिति ।। निमीलिताक्षो मूर्धस्थे शिरोरोगे न धारयेत् । बस्तिस्थे मूत्रसङ्गात्तौ रुजा तृष्यति मूर्च्छति ।। विण्मूत्रसङ्गवैवर्ण्यच्छर्द्याध्मानानन्त्रकूजनैः । कोष्ठे दोषान् विजानीयात् सर्वत्रैस्वांश्च रोदनैः ।

यदा तु ललिता धात्री सुखिनी सर्वभोगिनी । पश्यत्यभीक्ष्णं दुःस्वप्नं स्वयं क्षीरं प्रवर्तते ।। ४० ।।
बालो वि(ऽप) स्मरते चास्याः सहसाऽङ्गात् पतत्यपि ।
असज्जनेन संसर्ग याति संभोजनं तथा ।। ४१ ।।
मृतापत्यावकीर्णीभिः परवृद्ध्यसहिष्णुभिः । अमङ्गलानि घोराणि पश्यत्याचरतेऽपि च ।। ४२ ।।
सेवते विपरीतानि मृत्युं चोदयते शिशोः । सुप्ते शिशौ निलीयन्ते पक्षिणो दारुणोदयाः ।। ४३ ।।
विडालो लङ्घयत्येनं परधूमं च जिघ्रति । परावतारणबलिं प्रेक्षते लङ्घयत्यपि ।। ४४ ।।
दुर्गन्धदेहवक्त्रत्वं नासिकाग्रे मलोद्भवः । अहद्यरक्तमाल्यानां मातापुत्रनिषेवणम् ।। ४५ ।।
भस्माङ्गारतुषादीनामधिरोहणसेवनम् । रोदित्यकस्मात्त्रसति छायाशीलविपर्ययः ।। ४६ ।।
अल्पाशितोऽतिविण्मूत्रस्त्रविण्मूत्रो विपर्यये । भविष्यतां निमित्तानि ग्रहाणां वेदनाश्च ताः ।। ४७ ।।
न यः शिरो धारयति क्षिपन्त्यङ्गानि दुर्बलः । श्वासाध्मानपरीताभ्यामन्तवच्चोपलक्ष्यते ।। ४८ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ४२ तमं पत्रम् ।)

विनोद्यमानो बहुधा विनोदं नाभिनन्दति । तृट्प्रमीलकनिद्रार्तः कूजत्यपि कपोतवत् ।। ४९ ।।

ग्रहरोग—जब लालन (प्रेमपूर्वक पालन पोषण) करने वाली, सुखी, तथा सब वस्तुओं का भोग करने वाली धात्री लगातार बुरे स्वप्नों को देखे, उसके स्तनों से स्वयमेव दूध प्रवृत्त होने लगे । उसको बालक का स्मरण न रहे (अथवा बालक को अपस्मार रोग हो जाय), बालक सहसा गोद में से गिर पड़े तथा दुष्ट पुरुषों के साथ संसर्ग एवं भोजन करता हो, जिनके पुत्रों की मृत्यु हो जाती हो, जो अवकीर्णी हों तथा जो दूसरों की वृद्धि (बढ़ती-ऐश्वर्य) को सहन न कर सकती हों ऐसी धात्रियाँ भयंकर अमङ्गलों (अशुभ लक्षणों) को देखती हैं तथा उसी के अनुसार आचरण करती हैं एवं विपरीत भावों का सेवन करती हैं तो उस बालक की मृत्यु होने की संभावना होती है । बालक के सोये रहने पर भयंकर आकृति वाले पक्षी वहां घोंसले बना लेते हैं, विडाल (मार्जार) उसे लांघ जाता है, पर धूम को सूंघता है, वह दूसरे के सिर पर से उतार कर रखी हुई बलि को चाटता है तथा इसका लङ्घन करता है । बालक के शरीर तथा मुख से दुर्गन्ध आती है,

५४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६]

उसकी नासिका के अग्रभाग में मलोत्पत्ति हो जाती है तथा माता और पुत्र दोनों अशुभ एवं रक्तवर्ण की मालाओं को धारण करते हैं। भस्म (राख) अङ्गारों तथा तुष के ढेर पर बैठता है, सहसा रोने लगता है, उसे डर लगता है, उसकी छाया (शारीरिक कान्ति) तथा स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है। बालक कम खाता है। उसे कभी मल एवं मूत्र अधिक आता है तथा कभी कम आने लगता है। बालक अपने सिर को धारण नहीं कर सकता अर्थात् स्थिर नहीं रख सकता, अङ्गों को इधर उधर फेंकता है, दुर्बल हो जाता है, उसे श्वास एवं आध्मानरोग से प्रतीत होने लगता है कि जैसे अब वह बचेगा नहीं। बालक से यदि विनोद किया जाय तो वह उसे पसन्द नहीं करता। वह प्यास, प्रमीलकरोग (तन्द्रा) तथा निद्रा से पीड़ित होता है तथा कबूतर की तरह शब्द करता है ये सब ग्रहरोगों के प्रारम्भ होने के लक्षण हैं। अर्थात् उपर्युक्त लक्षणों को देखकर अनुमान किया जा सकता है कि बालक को संभवतः कोई ग्रहरोग होनेवाला है। अवकीर्णी—ब्रह्मचर्य व्रत का भङ्ग करने वाला व्यक्ति। इसका निम्न लक्षण दिया है—कामतो रेतस् सेकं व्रतस्थस्य द्विजन्मनः। अतिक्रमं व्रतस्याहुर्धर्मज्ञा ब्रह्मवादिनः।। अवकीर्णी भवेद्गत्वा ब्रह्मचारी तु योषितम्। गर्दभं पशुमालभ्य नैर्ऋतं स विशुध्यति।। अर्थात् जो जानबूझ कर ब्रह्मचर्य व्रत का भङ्ग करता है उसे अवकीर्णी कहते हैं। अनिच्छापूर्वक व्रतभङ्ग करनेवाले को अवकीर्णी नहीं कहते।

पीड्यमानस्य रूपाणि ज्वरच्छर्द्यतिसारिषु । वैद्यो दृष्ट्वैव जानीयात् कृच्छ्रं सर्वं न सिध्यति ॥५०॥

इस प्रकार बालक के ज्वर, छर्दि तथा अतिसार आदि रोगों में पीड़ा देने वाले उपर्युक्त लक्षणों को वैद्य देखकर ही तुरत जान लेवे। क्योंकि सम्पूर्ण लक्षण कृच्छ्र होने पर सर्वदा सिद्ध नहीं होते।

इत्येता विविधाः प्रोक्ता वेदना बालदेहजाः । प्रायोद्भावानां रोगाणां कश्यपेन महर्षिणा ॥५१॥

इस प्रकार महर्षि कश्यप ने प्रायः होने वाले रोगों में बालकों के शरीर में होने वाली वेदनाओं तथा लक्षणों को कह दिया है।

तेषां चिकित्सितं स्वं स्वमविरुद्धं यथाक्रमम् । दृष्ट्वा चिकित्सितस्थाने दोषतश्चाभ्यु(प्यु)पक्रमेत् ॥५२॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥
इति वेदनाध्यायः पञ्चविंशतितमः ॥२५॥

उन २ रोगों की चिकित्सा परस्पर अविरुद्ध तथा यथाक्रम चिकित्सास्थान में देखकर अथवा स्वयं दोषों के अनुसार करे।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इति वेदनाध्यायः पञ्चविंशतितमः ॥२५॥


षड्विंशतितमोऽध्यायः

अथातश्चिकित्सासंपदीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम चिकित्सासंपदीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६] सूत्रस्थानम् ५५

चिकित्सासंपद्यथोपपद्यते तमुपायमनुव्याख्यास्यामः। चत्वारः खलु पादाश्चिकित्सितस्योपपद्यन्ते। ते यदा गुणवन्त उपपद्यन्ते तदा साध्यो व्याधिर्नातिवर्तते। तद्यथा—भिषक्, भेषजम्, आतुरः, परिचारक इति ।।३।।

अब हम उन उपायों की व्याख्या करेंगे जिनके द्वारा चिकित्सासंपत् (चिकित्सा का उत्तम गुणों से युक्त होना) उत्पन्न हो सके। चिकित्सा के चार पाद होते हैं अर्थात् चिकित्सा के लिये चार वस्तुओं का होना आवश्यक है। वे चारों पाद जब गुणयुक्त हों तब साध्य व्याधि चिकित्सा का व्यतिक्रम नहीं करती अर्थात् ठीक हो जाती है (साध्य व्याधि की ही चिकित्सा की जा सकती है असाध्य की नहीं। चरक में कहा है—साधनं न त्वसाध्यानां व्याधीनामुपदिश्यते)। वे चारों पाद ये हैं—१. वैद्य २. ओषधि ३. रोगी ४. परिचारक। चरक सूत्रस्थान के खुड्डाकचतुष्पाद अध्याय में भी कहा है—भिषग् द्रव्यमुपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम्। गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकार व्युपशान्तये॥ इसीप्रकार सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है—वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः। एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः॥ ये चारों पाद मिलकर ही आरोग्यरूप कर्मसिद्धि के हेतु हैं।

तत्र भिषक् सुतीर्थो न्यायेनार्षज्ञानप्राप्तो विज्ञानवाननेकशो दृष्टकर्मा विदितसिद्धयोगो दक्षो दक्षिणः शुचिरनुद्धतवेषः सर्वभूतेषु बन्धुभूतः सिद्धिमन् धर्मार्थदर्शी सत्यदयादानार्जवनिरतो देवद्विजगुरुसिद्धानां पूजयिता चाभिगन्ता चोत्तरोत्तरप्रतिपत्तिकुशलो गुरु वृद्धसेवी न्यायाभिनिवेशी व्यपगतभयलोभमोहक्रोधानृतोऽपैशुन्योऽमद्यलौल्यः सुमुखश्चाव्यसनी चेति ।।४।।

वैद्य या चिकित्सक के गुण—सुतीर्थ (योग्य गुरु वाला अर्थात् जिसने योग्य गुरु से शिक्षा ग्रहण की है), न्यायपूर्वक जिसने आर्षज्ञान प्राप्त किया है, जो विज्ञानवान् हो, जिसने बहुत बार चिकित्सा कर्म देखा हुआ है, जिसे सिद्धयोगों का ज्ञान है, जो चतुर, दक्षिण तथा पवित्र है, जिसका वेश उद्धत नहीं हैं अर्थात् सभ्य वेश वाला है, सब प्राणियों के प्रति जिसके मन में बन्धु (प्रेम) भाव है, जिसके हाथ में सिद्धि है, जो धर्मार्थ रोगियों को देखने वाला है अथवा धर्म और अर्थ (धन) के लिये रोगियों को देखता है, जो सत्य, दया, दान तथा सरलतायुक्त है, जो देव, ब्राह्मण, गुरु तथा सिद्ध महात्माओं की पूजा तथा सेवा करने वाला है, जो उत्तरोत्तर रोग निवृत्ति में कुशल है, जो गुरु तथा वृद्ध पुरुषों की सेवा करता है, जो न्यायवान् है, तथा भय, लोभ, मोह, क्रोध, असत्य, पिशुनता (चुगलखोरी) से रहित है, जिसे मद्य की आदत नहीं है—जो सुमुख (दर्शनीय-सुन्दर आकृति वाला) तथा सब प्रकार के व्यसनों से रहित है—ऐसा वैद्य श्रेष्ठ होता है। चरक सू. अ. ९ में वैद्य के ४ मुख्य गुणों का उल्लेख किया गया है—श्रुतेः पर्यवदातत्वं बहुशः दृष्टकर्मता। दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम्। १. शास्त्र का सम्यक् ज्ञान २. अनुभव ३. चतुराई (Skill) तथा ४ शुद्धता—ये गुण आवश्यक हैं। इन चारों गुणों में अन्य सब गुणों का समावेश हो जाता है। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३४ में कहा है—तत्राधिगत शास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वय कृतो। लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी विशारदः। सत्यधर्मपरो यश्च स भिषक् पाद उच्यते ॥४॥

तत्र भेषजसंपत्—सुभूमौ जातं, काले चोद्धृतं, काले चोत्पन्नम्, अविकारि, अग्नितोय-जन्तुविण्मूत्रजरादिभिरनुपहतं, तत्तद्रोगयोग्यं, क्रमेण च विधिवदुपपादितमिति ।।५।।

औषध के गुण—जो प्रशस्त भूमि में उत्पन्न हुई हो, उचित समय पर उखाड़ ली गई हो, उचित समय में उत्पन्न की गई हो, विकार रहित हो, जो अग्नि, जल, जन्तु, मल, मूत्र तथा अवस्था आदि से नष्ट न की गई हो, जो अमुक २ रोग के योग्य हो तथा क्रमशः विधिपूर्वक जिसका प्रयोग किया हुआ है—ऐसी ओषधि गुणयुक्त होती है। चरक सू. अ. ९ में ओषधि के निम्न ४ गुण दिये हैं—बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविधविकल्पना। संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते।। १. पर्याप्त मात्रा में होना २. व्याधि के उपयुक्त होना ३. एक ही ओषधि से नाना प्रकार की कल्पनाओं का

५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६]

बन सकना ४. रस आदि से युक्त होना । सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है—प्रशस्तदेशसंभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् । युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम् ।। दोषघ्नमग्लानिकरमविकारि विपर्यये । समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ।।

वक्तव्य—सुभूमौ जातम्—ओषधि प्रशस्तभूमि में उत्पन्न हुई होनी चाहिये । औषध के योग्य भूमि का वर्णन करते हुए सुश्रुत सू. अ. ३७ में कहा है—

श्वभ्रशर्कराश्मविषवल्मीकश्मसानावातन् देव्तायतनसिकताभिरनुपहतामनुषरामभङ्गुरामदूरोदकां स्निग्धां प्ररोहवतीं मृद्वीं स्थिरां समां कृष्णां गौरी लोहितां वा भूमिमौषधार्थं परीक्षेत ।। उपर्युक्त प्रकार की भूमि में उत्पन्न होने के बाद भी ओषधि में निम्न गुण होने चाहिये—तस्यां जातमपि कृमिविषशस्त्रातपपवनदहनतोयसंबाधमार्गैरनुपहतमेकरसं पुष्टं पृथ्ववगाढ़मूलमुदीच्यां चौषधमाददीतेत्यौषधभूमिपरीक्षाविशेषः सामान्यः । वह ओषधि कृमि विष आदि से अविकृत हो । काले चोद्धृतम्—प्रत्येक ओषधि योग्य काल में अर्थात् रस, वीर्य, विपाक आदि की दृष्टि से पूर्ण परिपक्व हो जाने पर ही तोड़नी चाहिये । ओषधियों के उखाड़ने के विषय में सुश्रुत सू. अ. ३७ में कहा है—सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वृतुष्वाददीताग्नेयान्येयाग्नेयेषु, एवमव्यापन्नगुणानि भवन्ति । सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वृतुषु गृहीतानि सोमगुणभूयिष्ठायां भूमौ जातान्यतिमधुरस्निग्धशीतानि जायन्ते । सोमगुण की प्रधानता वाली ओषधि को सौम्य ऋतु में तथा आग्नेय गुण प्रधान ओषधि को आग्नेय ऋतु में उखाड़ना चाहिये । इससे वे पूर्ण परिपक्व हो जाती हैं ।।५।।

तत्रातुरसंपत्—साध्यरोगता, सत्त्वबलबुद्धिशरीरेन्द्रियधृतितजसां दार्ढ्यं, निदानपूर्वरूपातङ्गोपद्रव-यात्रोपशयानुपशयानां यथावदाख्यानं, धात्र्या वा श्रद्दधानता, देवद्विजगुरुभिषग्भेषजसुहृदामभिनन्दनम्, आस्तिक्यं, विनयप्रधानता, यथोक्तकारित्वं वशित्वं चेति ।।

रोगी के गुण—जिसका रोग साध्य हो, जिसका सत्व (मन) बल, बुद्धि, शरीर, इन्द्रियां, धारणशक्ति तथा तेज दृढ़ हो, जो निदान, पूर्वरूप, रोग, उपद्रव, शरीरयात्रा, उपशय तथा अनुपशय को यथावत् बता सके, धात्री अथवा परिचारक में जिसे श्रद्धा या विश्वास हो, देव, द्विज, गुरु, वैद्य, ओषधि तथा मित्रों का जो अभिनन्दन (सम्मान) करता हो, जो आस्तिक हो अर्थात् परमात्मा में विश्वास रखता हो, जो विनयशील (नम्र) हो, आज्ञा का पालन करता हो तथा जिसकी इन्द्रियां अपने वश में हो अर्थात् संयमी हो—ऐसा रोगी गुणयुक्त माना गया है । चरक सू. अ. ९ में कहा है—स्मृतिनिर्देशकारित्वमभीरुत्वमथापि च । ज्ञापकत्वं च रोगाणामातुरस्य गुणाः स्मृताः ।। रोगी में—१. अपने रोग के प्रारंभ होने का स्मरण होना २. चिकित्सक के निर्देशानुसार कार्य करना ३. निडरता तथा ४. रोग को अच्छी प्रकार बता सकना—ये चार गुण होने चाहिये । इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है—आयुष्मान् सत्यवान् साध्यो द्रव्यवानात्मवानपि । आस्तिको वैद्यवाक्यस्थो व्याधितः पाद उच्यते ।।

तत्र परिचारकसंपत्—विपक्वकषायता, आरोग्यं, शक्तिः, भर्तृभक्तिः, उपचारज्ञता, दाक्ष्यं, शौचम्, आशुकारित्वं, सर्वकर्मसु कौशलम्, अघृणित्वम्, अक्षुद्रपुत्रत्वम्, अद्वैविध्यं, दमो, जितक्रोधादिता, सहिष्णुता चेति ।।७।।

परिचारक (सेवक) के गुण—कषायों का पकाना अर्थात् जो ओषधि आदि को पकाने का कार्य कर सकता है, आरोग्य, शक्ति, स्वामीभक्ति, उपचार को जानना अर्थात् रोगी के भोजन के लिये यूष, रस, आदि बनाना, उसे सुलाना तथा रोगी की सेवा (Nursing) का ज्ञान होना, निपुणता, पवित्रता, शीघ्र कार्य करना, सब कार्यों में कुशलता, घृणा का न होना, क्षुद्र-व्यक्ति का पुत्र न होना अर्थात् कुलीन होना, जिसमें द्वैविध्य (दोगलापन) न हो अर्थात् इधर की बात उधर और उधर की इधर न कहता हो, जिसने अपनी अपनी इन्द्रियों को वश में किया हुआ है, क्रोध आदि पर विजय पाई हुई है तथा जिसमें सहनशक्ति है—इन गुणों से युक्त परिचारक (सेवक) श्रेष्ठ माना जाता है । चरक सू. अ. ९ में कहा है—उपचारज्ञा दाक्ष्यमनुरागश्च भर्त्तरि । शौचं चेति चतुष्कोऽयं गुणः परिचरे जने ।। १. उपचार (सेवा आदि) को जानना

चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६] सूत्रस्थानम् ५७

२. दक्षता ३. स्वामीभक्ति तथा ४. पवित्रता—ये ४ गुण परिचारक में होने चाहिये। सुश्रुत सू. अ. ३४ में भी कहा है— स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे। वैद्यवाक्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः॥ आजकल परिचर्या के लिये पुरुषों की अपेक्षा स्त्रीपरिचारिकाओं (Nerses) का प्रचलन बढ़ रहा है क्योंकि उनमें पुरुषों की अपेक्षा सेवा की प्रवृत्ति एवं सहानुभूति स्वाभाविक होती हैं तथा वे रोगी के कष्ट को अधिक अनुभव कर सकती हैं। चरक में उपर्युक्त चिकित्सा के प्रत्येक पाद के केवल चार २ गुणों का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार चिकित्सा के षोडशगुण माने गये हैं। इसलिये चरक में कहा है—कारणं षोडशगुणं सिद्धौ पादचतुष्टयम्।

इसी प्रकार अष्टाङ्गहृदय में भी कहा है—चतुष्पादं षोडशकलं भेषजमिति भिषजो भाषन्ते॥७॥

तत्र श्लोकाः

अस्य पादचतुष्कस्य मन्यन्ते श्रेष्ठमातुरम्।
तदर्थं गुणवन्तो हि त्रयः पादा इहेप्सिताः॥८॥

इन उपर्युक्त चारों पादों में से रोगी को श्रेष्ठ माना जाता है तथा उसी पाद (रोगी) के लिये अन्य तीनों गुणी पादों (वैद्य, ओषधि तथा परिचारक) की अपेक्षा होती है॥८॥

नेति प्रजापतिः प्राह भिषङ्मूलं चिकित्सितम्।
भिषग्वशे त्रिवर्गो हि सिद्धिश्च भिषजि स्थिता॥९॥
स युनक्ति प्रयुङ्क्ते च शास्ति च ज्ञानचक्षुषा।
तस्माज्ज्ञाने सविज्ञाने युक्तः श्रेष्ठतमो भिषक्॥१०॥
यदा चतुर्णां पादानां संपद्भवति जीवक!।
तदा धर्मार्थयशासां वैद्यो भवति भाजनम्॥११॥

वैद्य की श्रेष्ठता का प्रतिपादन—प्रजापति कश्यप ने कहा यह ठीक नहीं है। वस्तुतः चिकित्सा का मूल (प्रधान कारण) वैद्य है। शेष तीनों पादवैद्य के ही आधीन होते हैं तथा सिद्धि (चिकित्सा की सफलता) भी वैद्य पर ही निर्भर है। वह वैद्य ही ज्ञानचक्षुओं के द्वारा योजना (ओषधि आदि की व्यवस्था) करता है, उनका प्रयोग करता है, तथा शासन परिचारक को निर्देश—(Direction आदि) करता है। इस लिये ज्ञान तथा विज्ञान से युक्त वैद्य श्रेष्ठ माना जाता है। हे जीवक! जब चिकित्सा के उपर्युक्त चारों पाद गुणयुक्त होते हैं तब वैद्य धर्म, अर्थ एवं यश का भागी होता है। चरक सू. अ. ९ में भी वैद्य की प्रधानता स्वीकार की गई है—विज्ञाता शासिता योक्ता प्रधानं भिषगत्र तु। पक्तौ हि कारणं पक्तुर्यथा पात्रेन्धनानलाः॥ विजेतुर्विजये भूमिश्चमूः प्रहरणानि च। आतुराद्यास्तथा सिद्धौ पादाः कारणसंज्ञिताः॥ वैद्यस्यातश्चिकित्सायां प्रधानं कारणं भिषक्। मृद्दण्डचक्रमूत्राद्याः कुम्भकारादृते यथा॥ न वहन्ति गुणं वैद्यादृते पादत्रयं तथा॥ चिकित्सा में प्रधान कारण वैद्य ही है शेष तीनों गौण हैं क्योंकि वैद्य के अभाव में ये ओषधि आदि रोगनिवारण में समर्थ नहीं होते। इसी भाव को सुश्रुत सू. अ. ३४ में निम्न रूप दिया है—वैद्यहीनास्त्रयः पादाः गुणवन्तोऽप्यपार्थकाः। उद्गातृहोतृब्रह्माणो यथाऽध्वर्युं विनाऽध्वरे॥ वैद्यस्तु गुणवानेकस्तारयेदातुरान् सदा। प्लवं प्रतितरैर्हीनं कर्णधार इवाम्भसि॥ उपर्युक्त गुणवान् पादचतुष्टय की सहायता से रोगों के प्रतिकार करने को चिकित्सा कहते हैं। चरक में कहा है—चतुर्णां भिषगादीनां शस्त्रानां धातुवैकृते। प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते॥ इसलिये इस अध्याय का नाम ‘चिकित्सासंपदीय’ है॥९-११॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥

इति चिकित्सासंपदीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः ॥२६॥

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इति चिकित्सासंपदीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः ॥२६॥

५८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रोगाध्यायः २७]

सप्तविंशतितमोऽध्यायः

अथातो रोगाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम रोगाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

एको रोगो रुजाकरणसामान्यादिति भार्गवः प्रमतिः, द्वौ रोगौ निजश्वागन्तुश्चेति वार्योविदः, त्रयो रोगाः साध्ययाप्यासाध्या इति काङ्कायनः, चत्वारो रोगा आगन्तुवातपित्तकफजा इति कृष्णो भारद्वाजः पञ्च रोगा आगन्तुवातपित्तकफत्रिदोषजा इति दारुवाहो राजर्षिः षड्रङ्गोगाः षड्रसत्वादन्नपानस्येत्यृषिषडिन्द्रयः(?); सप्त रोगा वाताद्येकैकद्विद्वित्रिदोषजा इति हिरण्याक्षः, अष्टौ रोगा वाताद्येकैकद्विद्वित्रिदोषागन्तुनिमित्ता इति वैदेहो निमिः, अपरिसङ्ख्येयाः समहीनाधिकदोषभेदादिति वृद्धजीवकः, एवमनवस्थानमुपलभ्याह भगवान् कश्यपो—द्वावेव खलु रोगौ निजश्चागन्तुश्च, तावनेकविस्तराविति ॥३॥

प्रमति भार्गव ने कहा—रोग एक ही प्रकार का होता है—सब रोगों में पीडा (कष्ट) के समानरूप में विद्यमान होने से। अर्थात् रुक्-वेदना के विद्यमान होने से ही प्रत्येक रोग को सामान्यरूप से रोग कहते हैं। वार्योविद ने कहा—रोग निज और आगन्तु भेद से दो प्रकार के हैं। काङ्कापन ने कहा-रोग साध्य, असाध्य तथा याप्य भेद से तीन प्रकार के हैं। कृष्णभारद्वाज ने कहा—रोग आगन्तु तथा वात, पित्त और कफ दोष के अनुसार चार प्रकार का है। राजर्षि दारुवाह ने कहा-रोग आगन्तुक तथा वात, पित्त, कफ और त्रिदोष के भेद से पांच प्रकार का है (ऋषि षड्व्य ?) के अनुसार अन्नपान के षड्रसयुक्त होने से रोग ६ प्रकार के हैं। हिरण्याक्ष ने कहा—रोग सात प्रकार के हैं—वातादि दोषों से पृथक् तीन (वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक) द्विदोषज (वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक) तथा त्रिदोषज। वैदेह निमि ने कहा—रोग आठ प्रकार के हैं। उपर्युक्त सात के अतिरिक्त आठवां आगन्तु। वृद्धजीवक ने कहा—दोषों के सम, हीन तथा अधिक होने से रोग असंख्य हैं क्योंकि संसर्ग से दोषों के भेद अनेक हो जाते हैं। इस प्रकार अवस्था दोष (गड़बड़) को देखकर भगवान् कश्यप ने कहा—वस्तुतः रोग निज और आगन्तु भेद से दो ही प्रकार के हैं। उनके ही अनेक प्रकार के विस्तार हो जाते हैं ॥३॥

हेतुप्रकृत्यधिष्ठानविकल्पायतनार्थतः। ज्ञेया रोगा असङ्ख्येयाश्चिकित्सानां च विस्तरात् ॥४॥
अधिष्ठानद्वयं तेषां शरीरं मन एव च। मानसानां च रोगाणां कुर्याच्छारीरवत् क्रियाम् ॥५॥

रोगों के हेतु (कारण), प्रकृति (स्वभाव) तथा अधिष्ठान (आश्रय) के विकल्प के कारण तथा चिकित्सा के विस्तार के कारण रोग असंख्य माने जाते हैं अर्थात् हेतु, प्रकृति आदि के भेद से ही रोगों के असंख्य भेद हो जाते हैं। इन रोगों के शरीर और मन ये दो अधिष्ठान (आश्रय) हैं। मानसिक रोगों की भी शारीरिक रोगों की तरह ही चिकित्सा करनी चाहिये। चरक सू. अ. २० में भी कहा है—चत्वारो रोगा भवन्ति—आगन्तुवात पित्तश्लेष्मनिमित्ताः। तेषां चतुर्णामपि रोगाणां रोगत्वमेकविधं रुक्सामान्यात्। द्विविधा पुनः प्रकृतिरेषां आगन्तुनिजविभागात्। द्विविधं चैषामधिष्ठानं, मनःशरीरविशेषात्। विकाराः पुनरेषामपरिसंख्येयाः, प्रकृत्यधिष्ठानलिङ्गायतनविकल्पविशेषात् तेषामपरिसंख्येयत्वात्। इसी प्रकार चरक सू. अ. १८ में भी कहा है—त एवापरिसंख्येया भिद्यमाना भवन्ति हि। निदानवेदनार्थस्थानसंस्थाननामभिः ॥४-५॥

धातुस्थूणात्मवैषम्यं तद्दुःखं व्याधिसंज्ञकम्।
धातुस्थूणात्मसाम्यं तु तत्सुखं प्रकृतिश्च सा ॥६॥

रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ५९

वात, पित्त, कफ आदि तीन धातुरूपी त्रिस्थूणों की विषमता से ही दुख होते हैं। इसे ही व्याधि (रोग) कहते हैं। तथा धातुरूपी त्रिस्थूणों की साम्यावस्था ही सुख है तथा यही वास्तव में प्रकृति है। अर्थात् तीनों दोषों का समावस्था में होना ही प्रकृति या सुख है तथा इन्हीं की विषमावस्था को रोग कहते हैं। इसी संहिता के सूत्र स्थान के उपलब्ध प्रथम लेहनाध्याय में भी कहा है—अरोगस्तु समस्थूणा वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः ।। इसी प्रकार चरक सू. अ. ७ में भी कहा है—समपित्तानिलकफाः केचिद्गर्भादिमानवाः। दृश्यन्ते वातला केचित् पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा ।। तेषामनातुराः पूर्वे वातलाद्याः सदाऽऽतुराः ।। दोषों की समावस्था ही स्वस्थावस्था है। इसी लिये चरक सू. अ. १ में कहा है—धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् ।।६।।

अव्याहतशरीरायुर्भविवर्धेत वा कथम् । इत्यर्थं भेषजं प्रोक्तं विकाराणां च शान्तये ।।७।।

चिकित्सा का प्रयोजन—शरीर तथा आयु की अव्याहत रूप में वृद्धि तथा विकारों की शान्ति के लिये चिकित्सा कही गई है। अर्थात् चिकित्सा के दो प्रयोजन हैं—१. शरीर तथा आयु की वृद्धि (स्वस्थवृत) तथा २. उत्पन्न हुए रोगों की शान्ति करना। सुश्रुत सू. अ. १ में कहा है—इह खल्वायुर्वेदप्रयोजनं-व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोध्क्षः, स्वस्थस्य रक्षणं च। इसी प्रकार चरक सू. अ. ३० में भी कहा है—प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं चेति। आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी Preventive तथा Curative दो प्रकार की चिकित्सा मानी गई है ।।७।।

निजागन्तुनिमित्ता च द्विविधा प्रकृती रुजाम् । नखदन्ताग्निपानीयवधबन्धादिदेवताः (तः) ।।८।।

रोगों की निज और आगन्तु ये दो प्रकृतियां (कारण) होती हैं। इनमें आगन्तु रोगों के नख, दन्त, अग्नि, वर्षा, वध, बन्ध (बांधना), देवता, शाप तथा अभिचारकर्म आदि कारण हैं। तथा निज रोगों के कारण वातादि दोष हैं। अर्थात् वातादि दोषों की विषमता से निज रोग होते हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—मुखानि तु खल्वागन्तोनर्खदशनपतनाभिघाता-भिचाराभिशापाभिषङ्गव्यधबन्धपीडनरज्जुदहनमन्त्राशनि भूतोपसर्गादीनि, निजस्य तु मुखं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यम् ।।८।।

शापाभिचारादागन्तुर्निजा वातादिहेतवः । वातपित्तकफानां तु देहे स्थानानि मे शृणु ।।९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ४३ तमं पत्रम्)

अब तूँ मुझ से इन वात, पित्त तथा कफ के देह में स्थानों को सुन। अर्थात् शरीर में वातादि के कौन २ से स्थान हैं। इन दोषों के शरीर में सर्वव्यापी होने पर भी इनके विशेष स्थान तथा कर्म कहे जाते हैं ।।९।।

सर्वगानामपि सतां प्रायः स्थानं च कर्म च । अधोनाभ्यस्थिमज्जानौ वातस्थानं प्रचक्षते ।।१०।।
पित्तस्यामाशयः स्वेदो रक्तं सह लसीकया । मेदः शिर उरो ग्रीवा सन्धिर्बाहुः कफाश्रयः ।।११।।

शरीर में वात के मुख्य स्थान—नाभि का निचला हिस्सा, अस्थि तथा मज्जा-वायु के स्थान कहे जाते हैं। पित्त के स्थान—आमाशय, स्वेद, रक्त, लसीका (Lymph) ये पित्त के स्थान हैं। कफ के स्थान-मेद, सिर, छाती, ग्रीवा, सन्धि, तथा बाहु-कफ के स्थान हैं ।।१०-११।।

हृदयं तु विशेषेण श्लेष्मणः स्थानमुच्यते । आमपक्वाशयौ स्थानं विशेषात् पित्तवातयोः ।।१२।।

उपर्युक्त स्थानों के अतिरिक्त हृदय कफ का विशेष स्थान माना गया है। तथा आमाशय और पक्वाशय क्रमशः पित्त और वात के विशेष स्थान हैं। चरक सू. अ. २० में इनके स्थानों का निम्न प्रकार से उल्लेख किया गया है—तेषां त्रयाणामपि दोषाणां शरीरे स्थानविभाग उपदेक्ष्यते, तद्यथा-बस्तिः पुरीषाधानं कटिः संक्थिनी पादावस्थीनि च वातस्थानानि, तत्रापि पक्वाशयोविशेषेण वातस्थानं, स्वेदो रसो लसीका रुधिरमामाशयश्च पित्तस्थानानि, तत्राप्यामाशयो विशेषेण पित्तस्थानं, उरः शिरो ग्रीवा पर्वाण्यामाशयो मेदश्च श्लेष्मणः स्थानानि, तत्राप्युरो विशेषेण श्लेष्मणः स्थानम्। अष्टाङ्गहृदय सू. अ. १२

६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रोगाध्यायः २७]

में भी कहा है—पक्वाशयकटिसक्थिश्रोत्रास्थिस्पर्शनेन्द्रियम्। स्थानं वातस्य तत्रापि पक्वाधानं विशेषतः ॥ नाभिरामाशयः स्वेदो लसीका रुधिरं रसः। दृक्स्पर्शनं च पित्तस्य नाभिरत्रविशेषतः ॥ उरः कण्ठं शिरः क्लोम पर्वाण्यामाशयो रसः। मेदो घ्राणं च जिह्वा च कफस्य सुतरामुरः ॥१२॥

आगन्तुर्बाधते पूर्वं पश्चाद्दोषान् प्रपद्यते । निजस्तु चीयते पूर्वं पश्चाद्वृद्धः प्रबाधते ॥१३॥

आगन्तु तथा निज रोगों में भेद—आगन्तु रोग पहले शरीर को कष्ट पहुंचाता है तथा उसके बाद वातादि दोषों को उत्पन्न करता है। निज रोगों में प्रथम दोषों का चयन होता है फिर उसके बाद वृद्धि को प्राप्त होकर शरीर को कष्ट पहुंचाते हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—आगन्तुर्हि व्यथापूर्वसनु पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वषम्यमापादयति; निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्वं वैषम्यमापद्यन्ते, जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥१३॥

तस्मादागन्तरोगणामिष्यते निजवत् क्रिया । निजानां पूर्वरूपाणि दृष्ट्वा संशोधनं हितम् ।।१४।।

इसलिये आगन्तु रोगों की निज रोगों के समान ही चिकित्सा करनी चाहिये तथा निजरोगों के पूर्वरूपों को देखकर संशोधन करना चाहिये। अर्थात् यदि निज रोगों के होने की संभावना हो तो रोगों के लक्षणों के प्रकट होने से पूर्व ही इनका दोष एवं काल के अनुसार संशोधन कर लेना चाहिये।

हृदि श्लेष्मानुपश्लिष्टमाश्यावं रक्तपीतकम् । तदोजो, वर्धते जन्तुस्तद्वृद्धौ, क्षीयते क्षये ।।१५।।

ओज किसे कहते हैं—श्लेष्मा^१ से रहित, कुछ लालिमा तथा पीलापन लिये हुए जो श्वेत पदार्थ हृदय में रहता है उसे ओज कहते हैं। उस ओज की वृद्धि से प्राणी की वृद्धि होती है। तथा उसके क्षय होने पर प्राणी-क्षीण हो जाता है। चरक सू. अ. १७ में ओज का निम्न वर्णन किया है—हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तमीष सपीतकम्। ओजः शरीरे संख्यात तन्नाशान्ना विनश्यति ॥ इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. १५ में भी कहा है—ओजः सोमात्मकं स्निग्धं शुक्लं शीतं स्थिरं सरम्। विविक्तं मृदु मृत्स्नं च प्राणायतनमुत्तमम् ॥ देहः सावयवस्तेन व्याप्तो भवति देहिनाम्। तदभावाच्च शीर्यन्ते शरीराणि शरीरिणाम् ।। यह ओज प्राणायतन (जीवन का कारण) है। यह सम्पूर्ण देह में व्याप्त होता है। इसके अभाव में प्राणियों के देह नष्ट हो जाते हैं। कई विद्वान् इस ओज को अष्टम धातु मानते हैं। सुश्रुत सू. अ. १५ में कहा है—“तत्र रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत्परं तेजस्तत् खल्वोजस्तदेव बलमित्युच्यते” रस से लेकर शुक्र पर्यन्त धातुओं का जो परम तेज है उसे ही ओज कहा है। इसी को बल भी कहते हैं। वस्तुतः बल और ओज में भेद है। परन्तु सामान्यतया दोनों में अभेद माना है क्योंकि शरीर में बल की उत्पत्ति का प्रधान कारण ओज ही है तथा ओज के क्षय से बल का सबसे अधिक ह्रास होता है। ओज के विषय में प्राचीन ग्रन्थों में भिन्न २ वर्णन मिलता है। आधुनिक विद्वान् भी ओज के विषय में एक मत से अभी तक कुछ नहीं कह सके हैं। चक्रपाणि ने चरक की टीका में दो प्रकार का ओज माना है—“एतेन द्विविधमोजो दर्शयति परमपरं च। तत्राञ्जलिप्रमाणमपरम्, अल्पप्रमाणं तु परम्। अर्धञ्जलिपरिमितस्यौजसो धमन्य एव हृदयाश्रिताः स्थानम्, तथा प्रमेहेऽर्धाञ्जलिपरिमितमेवौजः क्षीयते, नष्टबिन्दुकम्। अस्य हि किंचित्क्षयेऽपि मरणं भवति, प्रमेहे तु ओजः क्षये जीवत्येव तावत्। ओजः क्षयलक्षणमपि अर्धाञ्जल्योजः क्षय एव बोद्धव्यम्”। इसका पूर्णरूप से निश्चय न होने पर भी यह तो स्पष्ट है कि ओज शरीर में एक अत्यन्त महत्व का पदार्थ है। पर-ओज हृदयाश्रयी और अष्टबिन्दु मात्रा वाला है। इसकी ही कमी होने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। अपर ओज वमन्याश्रयी है—उसकी कमी हो सकती है, उससे मृत्यु नहीं होती। मधुमेह आदि रोगों में इस अपर ओज का ही क्षय होता रहता है। आजकल के विज्ञान के अनुसार कई विद्वान् इसे जीवनीय द्रव्य, (Vitamins) कई Albumin तथा कई इसे अण्डकोश आदि ग्रन्थियों का


१. श्लेष्मणाऽसम्पृक्तमित्यर्थः, एतदेव ग्रन्थान्तरे विशुद्धपदेन दर्शितम् ।

रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ६१

स्त्राव (Internal Secretion of the testicles, ovaries and Prostate) आदि मानते हैं । परन्तु आधुनिक विज्ञान में हमें अभीतक कोई भी ऐसा उपयुक्त शब्द नहीं मिला है जो ओज का प्रतिनिधि हो सके । श्री रामरक्ष पाठक जी ने अपनी चरक की टीका में इसके विषय में कई भिन्न २ प्रचलित विचार दिये हैं । उन्होंने सूत्र स्थान के १७ वें अध्याय में इसका विस्तृत विवेचन किया है । विशेष ज्ञान के लिये जिज्ञासु पाठक इस विषय को वहां देखें ॥१५॥

मधुरस्निग्धशीतानि लघूनि च हितानि च । ओजसो वर्धनान्याहुस्तस्माद्बालांस्तथाऽऽशयेत् ।। १६ ।।

ओज की वृद्धि के साधन—मधुर, स्निग्ध, शीत, लघु तथा हितकारी पदार्थ ओज की वृद्धि करने वाले हैं । इसलिये बालकों को इन पदार्थों का सेवन करायें ॥१६॥

वृद्धिवर्णबलौजोग्निमेधायुःसुखकारणम् । वातादिसाम्यं, वैषम्यं विकारायोपकल्पते ।। १७ ।।

वातादि दोषों की समानता से शरीर की वृद्धि, वर्ण, बल, ओज, जाठराग्नि, मेधा, आयु तथा सुख की प्राप्ति होती है तथा इनकी विषमता से विकार (रोग) उत्पन्न हो जाते हैं । चरक में कहा है—विकारो धातुवैषम्यं साम्यं प्रकृतिरुच्यते । सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ॥१७॥

तेषामपरिमेयानां विकाराणां स्वलक्षणैः । आविष्कृततमान् व्याधीन यथास्थूलान् प्रचक्ष्महे ।। १८ ।।

उन असंख्य विकारों में से अपने २ लक्षणों सहित हम प्रसिद्ध २ तथा जो स्पष्ट हैं उन व्याधियों का वर्णन करेंगे ॥१८॥

अशीतिर्वातिका रोगाश्चत्वारिंशत्तु पैत्तिकाः ।
विंशतिः कफजाः प्रोक्ता वातरोगान्निबोध मे ।। १९ ।।

इनमें वात के ८०; पित्त के ४० तथा कफ (श्लेष्मा) के २० रोग हैं । चरक सू. अ. २० में भी इतने ही रोगों का परिगणन किया गया है—तद्यथा-अशीतिर्वातविकाराः, चत्वारिंशत्पित्तविकाराः, विंशति श्लेष्मविकाराः ॥१९॥

पादभ्रंशः पादशूलं नखभेदो विपादिका । पादसुप्तिर्वातखुडो वातगुल्फोऽनिलग्रहः ।। २० ।।
गृध्रसीपिण्डिकोद्वेष्टौ जानुविश्लेषभेदकौ । ऊरुस्तम्फोरुसादौ च पाङ्गुल्पं वातकण्टकः ।। २१ ।।
गुदभ्रंशो गुदार्तिश्च वृषणाक्षेपकस्तथा । शेफःस्तम्भः श्रोणिभेदो वंक्षणानाहविड्गदौ (इग्रहौ) ।।
उदावर्तोऽथ कुब्जत्वं वामनत्वं त्रिकग्रहः । पृष्ठग्रहः पार्श्वशूलमुदरावेष्टहृद्द्रवौ ।। २३ ।।
हृन्मोहो वक्षसस्तोदो वक्षोद्धर्षोपरोधकौ । ग्रीवास्तम्भो बाहुशोषः कण्ठोद्ध्वंसो हनुग्रहः ।। २४ ।।
दन्तचालौष्ठभेदौ च मूकत्वं वाग्ग्रहस्तथा । कषायास्यास्यशोषौ च घ्राणनाशो रशाज्ञता ।। २५ ।।
बाधिर्यमुच्चैः श्रवणं कर्णशूलमशब्दता । वर्त्मसंकोचविष्टम्भौ तिमिरं शूलमक्षिषु ।। २६ ।।
व्युदासो भ्रूव्युदासश्च शङ्खभेदः शिरोरुजा । स्फुटनं केशभूमेरच दण्डकाक्षेपकोऽर्दितम् ।। २७ ।।
एकाङ्गकः पक्षवधः श्रमभ्रमविजृम्भिकाः । प्रलापो वेपथुर्ग्लानी रौक्ष्यं निद्रापरिक्षयः ।। २८ ।।
श्यावारुणावभासत्वमनवस्थानमेव च । हिक्काश्वासौ विषादश्च वन्ध्यात्वं षाण्ढ्यमेव च ।। २९ ।।

अब तू मेरे से वातरोगों को सुन—१. पादभ्रंश (जहां पैर को उठाकर रखना हो वहां न पड़कर अन्यत्र जा पड़ना) २. पादशूल ३. नखभेद ४. विपादिका (बिवाई फटना) ५. पादसुप्ति (पैर का सोजानाव्या-स्पर्श ज्ञान न होना) ६. वात खुड (खुड-पैर तथा जंघा की सन्धि में वात का प्रकोप होना) ७. वातगुल्फ (गुल्फ=गिट्टे-Ankle में वातप्रकोप) ८ अनिलग्रह

६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रोगाध्यायः २७]

(वायु के द्वारा शरीर का पकड़ा जाना) ९. गृध्रसी (रींग बाय-Sciatica) १०. पिण्डकोद्वेष्ट (पिण्डलियों में उद्वेष्टन) ११. जानुविश्लेष (जानुसन्धि-Knee goint का ढीला होना) १२. जानुभेद (घुटनों में पीड़ा होना) १३. उरुस्तम्भ १४. उरुसाद (जंघाओं की शिथिलता) १५. पांगुल्य (पंगुला-लंगड़ापन) १६. वातकण्टक १७. गुदभ्रंश (Prolapse of Anus) १८. गुदार्ति (गुदा में पीडा) १९ वृषणाक्षेप (अण्ड-Testicles का नीचे न उतरना) २०. शेफःस्तम्भ (जननेन्द्रिय की जड़ता) २१. श्रोणिभेद (कटि में पीड़ा) २२. वंक्षणाह (वंक्षण प्रदेश-Groin में आनाह) २३. विड्गद या विड्ग्रह (मलरोग या मलबन्ध) २४. उतावर्त २५. कुब्जता (कुबड़ापत) २६. वामन (ठिगना होना) २७. त्रिकग्रह (त्रिकप्रदेश-Secrum का जकड़ा जाना) २८. पृष्ठग्रह (पीठ का जकड़ा जाना) २९. पार्श्वशूल ३० उदरावेष्ट (पेट में आवेष्टन-मरोड़ा होना) ३१. हृद्द्रव (हृदय का स्फुरण Palpitation of Heart) ३२. हृन्मोह (Heart failure) ३३. वक्षतोद (छाती या फुफ्फुस में सूचीवेधवत् पीडा) ३४ वक्षोद्धर्ष (छाती में घर्षणवत् पीडा अथवा फुफ्फुस में घर्षणवत् शब्द Crepitations का होना) ३५. वक्ष उपरोधक (छाती का रुका हुआ अनुभव होना) ३६. ग्रीवास्तम्भ (गर्दन का अकड़ जाना-Torticolis या Rhei Neek) ३७. बाहुशोष (बाहुओं का सूख जाना) ३८. कण्ठोध्वंस (स्वरभेद अथवा शुष्क कास) ३९, हनुग्रह ४०. दन्तचाल (दांतों का हिलना) ४१. ओष्ठभेद ४२. मूकता (गूंगापन) ४३. वाग्रह (वाणी का रुक जाना-बोल न सकना) ४४. कषायास्यता (मुख का स्वाद कसैला होना) ४५. आस्यशोष (मुखशोष-मुख का सूख जाना) ४६. घ्राणनाश (गन्धशक्ति का नष्ट हो जाना-गन्ध का ज्ञान न होना) ४७. रसाज्ञता (जिह्वा को रस का ज्ञान न होना) ४८. बधिरता ४९. उच्चैःश्रवण (ऊँचा सुनना) ५० कर्णशूल ५१. अशब्दता (शब्द का मालूम न पड़ना अथवा शब्द न होते हुए भी शब्दों का सुनाई पड़ना) ५२. वर्त्मसंकोच (वर्त्म-पलकों का सुकड़ना अथवा खोल न सकना) ५३. विष्टम्भ ५४. तिमिर (नेत्रपटल का रोग) ५५. अक्षिशूल ५६. अक्षिव्युदास (आंखों का ऊपर चढ़ा रहना ५७. भ्रूव्यदास (भौओं का ऊपर चढ़ा रहना) ५८. शङ्ख भेद (शङ्खदेश-Temporal region में वेदना) ५९. शिरोरुजा (शिर में पीडा) ६०. केशभूमिस्फुटन (बालों की जड़ों का फूटना) ६१. दण्डकाक्षेप ६२. अर्दित (Facial paralysis) ६३. एकाङ्गक (एकाङ्गवध) ६४. पक्षवध (पक्षाघात) ६५. श्रम (थकावट) ६६. भ्रम (चक्कर आना Giddiness) ६७. विजृम्भिका (जंभाई) ६८. प्रलाप ६९. वेपथु (कम्पन) ७०. ग्लानि ७१. रूक्षता ७२. निद्रापरिक्षय (निद्रानाश) ७३. श्यावारुणावभासता (शरीर अथवा अङ्गों का श्याव तथा अरुण वर्ण का होना) ७४. अनवस्थान (चित्त का स्थिर न होना) ७५. हिक्का ७. श्वास ७७. विषाद (अप्रसन्नता) ७८. वन्ध्यात्व (बांझपना) ७९. षाण्ढ्य (नपुंसकता) तथा ८०. प्रतिश्याय—ये प्रधानरूप से वातिक रोग हैं। चरक सू. २० में भी लगभग इन्हीं ८० वातरोगों का परिगणन किया गया है—तत्रादौ वातविकाराननुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—नखभेदश्च, विपादिका च, पादशूलं च, पादभ्रंशश्च, पादसुप्तता च वाताखुड्डता च, गुल्फग्रहश्च पिण्डिकोद्वेष्टनं च, गृध्रसी च, जानुभेदश्च, जानुविश्लेषश्च, उरुस्तम्भश्च, उरुसादश्च, पाङ्गल्यं च, गुदभ्रंशश्च, गुदार्तिश्च, वृषणोत्क्षेपश्च, शेफःस्तम्भश्च, वङ्क्षणाहश्च, श्रोणिभेदश्च विड्भेदश्च, उदावर्तश्च, खञ्जत्वं च, (कुब्जत्वं च,) वामनत्वं च, त्रिकग्रहश्च, पृष्ठग्रहश्च, ग्रीवावमर्दश्च, उदरावेष्टश्च, हृन्मोहश्च, हृद्द्रवश्च, 'वक्ष उद्धर्षश्च, वक्ष उपरोधश्च (वक्षस्तोदश्च), बाहुशोषश्च, ग्रीवास्तम्भश्च, मलास्तम्भश्च, कण्ठोद्ध्वंसश्च, हनुस्तम्भश्च, ओष्ठभेदश्च (अक्षिभेदश्च), दन्तभेदश्च, दन्तशैथिल्यं च, मूकत्वं च (गद्गदत्वं च), वाक्सङ्गश्च, कषायास्यता च, मुखशोषश्च असंज्ञता च (अगन्धता च, घ्राणनाशश्च), कर्णशूलं च, अशब्दश्रवणं च, उच्चैःश्रुतिश्च, बाधिर्यं च, वर्त्मस्तम्भश्च, वर्त्मसंकोचश्च, तिमिरं च, अक्षिशूलं च, अक्षि व्युदासश्च, भ्रूव्युदाश्च, शङ्खभेदश्च, ललाटभेदश्च, शिरोरुक् च, केशभूमिस्फुटनं च, अर्दितं च, एकाङ्गरोगश्च, सर्वाङ्गरोगश्च (पक्षवधश्च) आक्षेपकश्च, दण्डकश्च, श्रमश्च, भ्रमश्च, वेपथुश्च, जृम्भा च, विषादश्च (हिक्का च, अतिप्रलापश्च, ग्लानिश्च, रौक्ष्यं च, पारुष्यं च, श्यावारुणावभासता च, अस्वप्नश्च, अनवस्थितत्वं चे यशीतिर्वातविकारा वातविकाराणामपरिसंख्येया-नामाविष्कृततमा व्याख्याताः ॥२०-२९॥

रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ६३

प्रतिश्यायः शरण्यश्च प्राधान्येनानिलात्मकाः । तेष्वनुक्तेषु चान्येषु वायोः स्वं रूपमुच्यते ।।३०।।
शैत्यं रौक्ष्यं लघुत्वं च गतिश्चेत्यथ कर्म च । विशदारुणपारुष्यसुप्तिसंकोचवैरसम् ।।३१।।
शूलतोदकषायत्वशौषिर्यखरकम्पनम् । सादहर्षौ कार्श्यवर्तव्यासस्रंसनभेदनम् ।।३२।।

इन उपर्युक्त रोगों के अतिरिक्त अन्य जिनका नाम नहीं लिया गया है उन रोगों में वायु के जो लक्षण होते हैं उनका वर्णन किया जाता है अर्थात् उपर्युक्त नामों द्वारा परिगणित रोगों के अतिरिक्त भी जो वायु के रोग होते हैं उनमें निम्न लक्षणों को देखकर कहा जा सकता है कि यह वायु का ही रोग है। वायु का अपना रूप या लक्षण—शीत, रूक्ष, लघु, गति (चलना-एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना। वायु के मर्म—इस प्रकार के रूप वाली वायु के शरीर के भिन्न भिन्न अवयवों में प्रविष्ट होने पर निम्न लक्षण होते हैं-विशदता, अरुणता, परुषता (कठोरता) सुप्ति (सुन्न हो जाना या स्पर्शज्ञान का न होना), संकोच विरसता (मुंह का स्वाद बिगड़ जाना), शूल, तोद (सूचीवेधवतपीडा), कषायता (मुंह का स्वाद कसैला होना) शुषिरता (छिद्रयुक्त होना), खरता (शरीर की कर्कशता), कम्पन (शरीर का कांपना) साद (शिथिलता), हर्ष (स्थानभेद से रोमहर्ष, दन्तहर्ष, ध्वजहर्ष आदि), कृशता, वर्त (गोलाई करना), व्यास (विस्तार या फैलना), स्रंसन (अपने स्थान से थोड़ा हिलना), भेद (अङ्गभेद), उद्वेष्टन (ऐंठन), दंश, भङ्ग (टूटना) तथा शोष (सूखना)—ये वायु के कर्म कहे हैं।

चरक सू. अ. २० में कहा है—सर्वेष्वपि खल्वेतेषु वातविकारेषूक्तेष्वन्येषु चानुक्तेषु वायोरिद्मात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्यं तदवयवं वा विमुक्तसंदेहा वातविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः; तद्यथा—रौक्ष्यं लाघवं वैशद्यं शैत्यं गतिरमूर्तित्वं चेति वायोरात्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः; तद्यथा—स्रंसभ्रंशव्यासाङ्गभेदहर्षतर्षवर्तमर्दकम्पचालतोदव्यथाचेष्टादीनि; तथा खरपरुषविशदसुषिरतारुणकषायविरस-मुखशोषशूलसुप्तिसंकुञ्चनस्तम्भनखञ्जतादीनि च वायोः कर्माणि, तैरन्वितं वातविकारमेवाध्यवस्येत् ।।३०-३२।।

उद्वेष्टदंशभङ्गाश्च शोषश्चानिलकर्म तत् । मधुराम्लोष्णलवणस्तत्रोपक्रम इष्यते ।।३३।।

वातविकारों की सामान्य चिकित्सा—इन वातविकारों की शान्ति के लिये मधुर, अम्ल, उष्ण तथा लवणरस युक्त पदार्थों का उपयोग करना चाहिये। चरक सू. अ. २० में कहा है—तं मधुराम्ललवणस्निग्धोष्णैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्नेहस्वेदास्थापनानुवासननस्तःकर्मभोजनाभ्यङ्गोत्सादनपरिषेकादिभिर्वातहरैर्मात्रां काल च प्रमाणीकृत्य; आस्थापनानुवासनं तु खलु सर्वोपक्रमेभ्यो वाते प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्घ्यादित एव पक्वाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं वातमूलं छिनत्ति, तत्रावजिते वातेऽपि शरीरान्तर्गता वातविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथा वनस्पतेर्मूले छिन्ने स्कन्धशाखारोहकुसुमफलपलाशादीनां नियतो विनाशस्तद्वत्। उपर्युक्त मधुरादि पदार्थों के सेवन के अतिरिक्त स्नेहन, स्वेदन, आस्थापन, अनुवासन, नस्य, भोजन, अभ्यङ्ग, उत्सादन, परिषेक आदि वातहर उपक्रमों द्वारा चिकित्सा का विधान दिया गया है। आस्थापन तथा अनुवासन का वातविकारों को शान्त करने में विशेष स्थान है ।।३३।।

ओषः प्लोषो भ्रमो दाहो वमथूर्धूमकाम्लकौ । अन्तर्दाहो ज्वरोऽत्यौष्ण्यमतिस्वेदोऽङ्गदाहकः ।।३४।।
त्वग्दाहः शोणितक्लेदो मांसक्लेदोऽङ्गशीर्य(र)णम् । मांसपाकश्चर्भदलो रक्तविस्फोटमण्डले ।।३५।।
रक्तपित्तं च कोठाश्च कक्ष्या हारिद्रनीलके । कामला तिक्तवक्त्रत्वं रक्तगन्धास्यता तथा ।।३६।।
अतृप्तिः पूतिवक्त्रत्वं जीवादानं तमस्तृषा । मेढ्रपायुगलाक्ष्यास्यपाको हारिद्रमूत्रविट् ।।३७।।

पित्त के ४० विकार—१. ओष (सर्वाङ्गीण तीव्रदाह-जिसमें स्वेद एवं अरति हो) २. प्लोष (प्रादेशिक दाह-जैसे अग्नि द्वारा होता है) ३. भ्रम ४. दाह (तीव्र सन्ताप) ५. वमथु (वमन) ६. धूमक (शिर, ग्रीवा, आदि में धुंआ सा उठना) ७. अम्लक (अन्तर्दाह तथा हृदयशूलयुक्त डकार) ८. अन्तर्दाह (शरीर के अन्दर या कोष्ठ आदि में जलन) ९. ज्वर १०.

२७ का.सं.

६४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रोगाध्यायः २७]

अति उष्णता (तापांश का अधिक होना) ११. अतिस्वेद (पसीना अधिक आना) १२. अङ्गदाह (अङ्गों में जलन) १३. त्वग्दाह (त्वचा में जलन) १४. शोणितक्लेद (रक्त का काला, दुर्गन्धियुक्त तथा पतला होना) १५. मांसक्लेद (मांस का काला तथा दुर्गन्धियुक्त होना Gangrenous- हो जाना) १६. अङ्गशीरण (अङ्गों का टूटना) १७. मांसपाक १८. चर्मदल १९. रक्तविस्फोट (लाल चकत्ते-Rashes) २०. रक्तमण्डल २१ रक्तपित्त २२. कोठ (रक्तकोठ) २३. कक्षा (बाहु, पार्श्व, अंस आदि में उत्पन्न हुई पीड़ायुक्त काली २ फुन्सियां-Acute lymphadenitis of the Axillary glands अथवा चरक और अष्टाङ्ग संग्रह के वर्णन के अनुसार इसे Herpes zoster कह सकते हैं) २४. हारिद्र (हल्दी के वर्ण का होना) २५. नीलिका २६. कामला (पीलिया-Gaundice) २७. तिक्तवक्त्रत्व (मुखका कड़वा स्वाद होना) २८. रक्तगन्धास्यता (मुख में रक्त की गन्ध आना) २९. अतृप्ति (भोजन में तृप्ति न होना) ३०. पूतिवक्त्रता (मुख का दुर्गन्धियुक्त होना) ३१. जीवादान (जीवरक्त का निकलना) ३२. तम (आंखों के सामने अंधेरा प्रतीत होना) ३३. तृषा अधिक प्यास) ३४. मेढ्रपाक (मूत्रेन्द्रिय का पकना) ३५. पायुपाक (गुदा का पकना) ३६. गलपाक (गले का पकना) ३७. अक्षिपाक (नेत्रों का पकना) ३८. आस्यपाक (मुख का पकना) ३९. हारिद्रमूत्र (मूत्र का हरा होना) ४०. हारिद्रविट् (मल का हरा होना)—ये मुख्य २ पित्तरोग कहे हैं। चरक सू. अ. २० में पित्त के निम्न ४० रोग गिनाये हैं—पित्तविकाराश्चत्वारिंशदत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यन्ते; तद्यथा—ओषश्च प्लोषश्च, दाहश्च, दवथुश्च, धूमकश्च, आम्लकश्च, विदाहश्च, अन्तर्दाहश्च (अङ्गदाहश्च) ऊष्माधिक्यं च, अतिस्वेदश्च, (अङ्गस्वेदश्च), अङ्गगन्धश्च, अङ्गावदरणं च, शोणितक्लेदश्च, मांसक्लेदश्च, त्वग्दाहश्च, मांसदाहश्च, त्वगवदरणं च, चर्मविदरणं च, रक्तकोठाश्च (रक्तविस्फोटाश्च), रक्तपित्तं च, रक्तमण्डलानि च, हरित्त्वं च, हारिद्रत्वं च, नीलिका च, कक्षा च, कामला च, तिक्तास्यता च, (लोहितगन्धास्यता च), पूतिमुखता च, तृष्णाया आधिक्यं च, अतृप्तिश्च, आस्यपाकश्च, गलपाकश्च, अक्षिपाकश्च गुदपाकश्च, मेढ्रपाकश्च, जीवादानं च, तमः प्रवेशश्च, हरितहारिद्रमूत्रनेत्रवर्चस्त्वं चेति चत्वारिंशत्पित्तविकाराः पित्तविकाराणामपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा भवन्ति ॥३४-३७॥

इति प्रधानाः पित्तार्त्यः, स्वं रूपं तस्य वक्ष्यते । लाघवं तैक्ष्ण्यमौष्ण्यं च वर्णाः शुक्लारुणादृते ।।३८।।
वैगन्ध्यं कटुकाम्लत्वमीषत्स्नेहश्च पित्तजाः । दाहोष्णापाकप्रस्वेदकण्डूकोष्ठस्रवादिभिः ।।३९।।

अब पित्त के अपने रूप (लक्षण) कहे जाते हैं जिन्हें देखकर यह कहा जा सके कि यह पित्तरोग ही है—पित्त के अपने रूप-लघुता, तीक्ष्णता, उष्णता, शुक्ल तथा अरुण वर्ण को छोड़कर अन्य वर्णों वाला होना, वैगन्ध्य (आमगन्ध), कटु, अम्ल, ईषत् स्नेह (अधिक स्निग्ध न होना)—ये पित्त के अपने रूप हैं। पित्त के कर्म—इन रूपों वाले पित्त के शरीर के भिन्न २ अवयवों में प्रविष्ट होने पर निम्न लक्षण होते हैं—दाह (जलन), उष्णता (गर्मी-Heat), पाक (पकना-Suppuration), प्रस्वेद (पसीना), कण्डू, कोठ तथा स्राव इत्यादि पैत्तिक विकारों के कर्म हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—सर्वेष्वपि खल्वेतेषु पित्तविकारेष्वन्येषु चानुक्तेषु पित्तस्येदमात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसन्देहा पित्तविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः, तद्यथा—औष्ण्यं तैक्ष्ण्य लाघवमनतिस्नेहो वर्णश्च शुक्लारुणवर्जो गन्धश्च विस्रो रसौ च कटुकाम्लौ पित्तस्यात्मरूपाणि एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः, तद्यथा—दाहौष्ण्यपाकस्वेदक्लेदकोष्ठस्रावरागा यथास्वं च गन्धवर्णरसाभिनिर्वर्तनं पित्तस्य कर्माणि, तैरन्वितं पित्तविकारमेवाध्यवस्येत् ॥३८-३९॥

विद्यात् पित्तविकारार्तं कर्मैतत्, तदुपक्रमः । कषायतिक्तमधुरस्नेहस्रंसनशोधणाः ।।४०।।

इनकी सामान्य चिकित्सा—इन पित्तविकारों की शान्ति के लिये कषाय, तिक्त एवं मधुर द्रव्य तथा स्नेह, स्रंसन (विरेचन) और शोषण आदि का उपयोग करे। चरक सू. अ. २० में इनकी निम्न चिकित्सा दी है—तं

रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ६५

मधुरतिक्तकषायशीतैरुपक्रमैरुपक्रमेत् स्नेहविरेचनप्रदेहपरिषेकाभ्यङ्गावगाहादिभिः पित्तहरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य विरेचनं तु सर्वोपक्रमेभ्यः पित्ते प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः; तद्ध्यादित एवामाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं पित्तमूलं चापकर्षति, तत्रावजिते पित्तेऽपि शरीरान्तर्गताः पित्तविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथाऽग्नौ व्यपोढे केवलमग्निगृहं शीतीभवति तद्वत् । मधुर, तिक्त, कषाय आदि द्रव्यों के उपयोग के अतिरिक्त विरेचन, प्रदेह, परिषेक, अभ्यङ्ग तथा अवगाहन आदि पित्तहर क्रियाओं का विशेष प्रयोग बताया गया है । पैत्तिक रोगों में विरेचन का विशेष स्थान है ॥४०॥

स्तैमित्यं गुरुताऽङ्गस्य निद्रातन्द्रातितृप्तयः । मुखमाधुर्यसंस्रावकफोद्गारबलक्षयाः ॥४१॥
हल्लासोऽथ मलाधिक्यं धमनीकण्ठलेपकौ ॥४२॥
आमं च गलगण्डश्च वह्निसाद उदर्दकः । श्वेतावभासताऽङ्गानां तथा मूत्रपुरीषयोः ॥४३॥

कफ के २० विकार—१. स्तिमितता (गीले वस्त्र से अङ्गों के आच्छादित होने की तरह प्रतीत होना) २. शरीर का भारीपन ३. निद्रा (नींद की अधिकता) ४. तन्द्रा (आलस्य) ५. अतितृप्ति (पेट का शीघ्र ही बहुत भरा मालूम पड़ना) ६. मुखमाधुर्य (मुख का स्वाद मीठा होना) ७. संस्राव (मुखस्राव-मुख से लालास्राव होना) ८. कफोद्गार (कफ का बाहर निकलना-कफ का थूकना) ९. बलक्षय (बल का क्षीण होना) १०. हल्लास (जी मचलाना) ११. मलाधिक्य (मल की अधिकता) १२. धमनीलेपक (धमनियों का श्लेष्मा से लिप्त रहना) १३. कण्ठलेपक (कण्ठ का श्लेष्मा से लिप्त रहना) १४. आम (आम रस का उत्पन्न होना) १५. गलगण्ड १६. वह्निसाद (अग्निसाद जाठराग्नि का मन्द होना) १७. उदर्द १८. श्वेतावभासता (अङ्गों का सफेद मालूम पड़ना) १९. श्वेतमूत्र (मूत्र का रंग सफेद होना—Phosphates, Chyle अथवा Albumin) के कारण) २०. श्वेतपुरीष (मल का रंग सफेद होना—आंव-Mucus के कारण) असंख्य कफरोगों में से इन २० प्रधान रोगों का उल्लेख किया गया है । चरक सू. अ. २० में भी कफ के २० रोग गिनाये हैं—श्लेष्मविकारांश्च विंशतिम त ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः, तद्यथा—तृप्तिश्च, तन्द्रा न, निद्राधिक्यं च, स्तैमित्यं च, गुरुगात्रता च, आलस्यं च, मुखमाधुर्यं च, मुखस्रावश्च, श्लेष्मोद्धिरणं च, मलस्याधिक्यं च, कण्ठोपलेपश्च, बलासश्च, हृदयोपलेपश्च, धमनीप्रतिचयश्च, गलगण्डं च, अतिस्थौल्यं च, शीताग्निता च उददर्दश्च, श्वेतावभासता च, श्वेतमूत्रनेत्रवर्चस्त्वं चेति विंशतिः श्लेष्मविकाराः श्लेष्मविकाराणामपरिसंख्येयानामाविष्कृतमाव्याख्याताः ॥४१-४६॥

कफजानामसंख्यानां प्रधनाः परिकीर्तिताः । स्नेहशैत्यगुरुश्वेतमाधुर्यं कफलक्षणम् ॥४४॥
श्लक्ष्णता चामयोत्पत्तौ तस्य कर्माणि चक्षते । स्नेहादि चिरकारित्वं बन्धोपचयसुप्तयः ॥४५॥

कफ के लक्षण या अपने रूप—स्निग्धता, शीतता, भारीपन, श्वेतता, मधुरता तथा श्लक्ष्णता (चिकनापन) ये कफ के लक्षण हैं। कफ के कर्म—कफ के रोग उत्पन्न हो जाने पर स्नेह आदि (शरीर में स्निग्धता होना), रोग के लक्षणों का चिरकालीन हो जाना (अथवा चिरकारित्व-प्रत्येक कार्य धीरे २ करना), बन्ध, उपचय (उपचित-संचित होना), सुप्ति (शरीर का स्पर्श ज्ञान रहित होना) तथा विष्टम्भ ये कफ के कर्म हैं। चरक सू. अ. २० में कहा है—सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु श्लेष्मविकारेष्वन्येषु चानुक्तेषु श्लेष्मण इदमात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं, यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसंदेहाः श्लेष्मविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः, तद्यथा-शैत्यशैत्यस्नेहगौरवमाधुर्यमात्स्र्न्यानि श्लेष्मण आत्मरूपाणि, एवंविधत्वाच्च कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः, तद्यथा—शैत्यशैत्यकण्डूस्थैर्यगौरवस्नेहस्तम्भसुप्तिक्लेदोपदेह-बन्धमाधुर्यचिरकारित्वानि श्लेष्मणः कर्माणि, तैराम्बितं श्लेष्मविकारमेवाध्यवस्येत् ॥४४-४५॥

विष्टम्भश्चेति, तत्र ज्ञः कषायकटुतिक्तकैः । रूक्षोष्णैश्चाप्युपचरेन्मात्राकालौ विचारयन् ॥४६॥

इनकी सामान्य चिकित्सा—विद्वान् चिकित्सक को चाहिये कि मात्रा और काल का विचार करते हुए कफ के रोगों की शान्ति के लिये कषाय, कटु, तिक्त, रूक्ष, तथा उष्ण द्रव्यों तथा स्नेहन, स्वेदन और पञ्चकर्म का प्रयोग करे । चरक

६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रोगाध्यायः २७]

सू. अ. २० में कहा है—तं कटुकतिक्तकषायतक्ष्णोष्णरूषैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्वेदनवमनशिरोविरेचनव्यायामादिभिः श्लेष्महरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य, वमनं तु सर्वोपक्रमेभ्यः श्लेष्मणि प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्ध्यादित एवामाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं श्लेष्ममूलमपकर्षति, तत्रावजिते श्लेष्मण्यपि शरीरान्तर्गताः श्लेष्मविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते, यथा—भिन्ने केदारसेतौ शालियवषष्टिकादीन्यनभिष्यन्दमानान्याम्भसा प्रशोषमापद्यन्ते तद्वदिति । उपर्युक्त कषाय तिक्त, आदि द्रव्यों के उपयोग के अतिरिक्त स्वेदन, वमन, शिरोविरेचन, व्यायाम आदि कफनाशक क्रियाओं द्वारा कफ की शान्ति करे। कफरोगों की शान्ति के लिये वमन का प्रधान स्थान माना जाता है ॥४६॥

स्नेहस्वेदोपचारौ च तेषु कर्माणि पञ्च च । वातघ्नानां तु सर्वेषामनुवासनमुत्तमम् ॥४७॥ (इति ताडपत्रपुस्तके ४४ तमं पत्रम् ।)

सब वातघ्न पदार्थों एवं क्रियाओं में अनुवासन, पित्तघ्न पदार्थों एवं क्रियाओं में विरेचन तथा श्लेष्मघ्न पदार्थों एवं क्रियाओं में वमन श्रेष्ठ माना गया है ॥४७॥

पित्तघ्नानां विरेकश्च वमनं श्लेष्मघातिनाम् । येषां चिकित्सितस्थानमर्थे तु परिकीर्तितम् ॥४८॥ तांस्तु रोगान् प्रवक्ष्यामि न ह्यत्रैतत् समाप्यते । महागदोऽथ संन्यास ऊरुस्तम्भस्त एकशः ॥४९॥ ज्वरव्रणामगृध्रस्यः कामला वातशोणितम् । अर्शस्यपि तथाऽऽयामो द्विविधा व्याधयस्तु ते ॥५०॥ वातासृक्श्वित्रशोथास्तु त्रिविधाः परिकीर्तिताः । ग्रहण्यक्षिविकाराश्च कर्णरोगा मुखामयाः ॥५१॥ अपस्माराः प्रतिश्यायः शोषणां हेतवो मदाः । चतुर्विधास्ते निर्दिष्टा मूर्च्छा क्लैव्यानि चैव हि ॥५२॥ तृष्णाच्छर्दिश्वासकासगुल्मप्लीहारुचिव्यथाः । हिक्कोन्मादशिरोरोगा हृद्रोगाः पाण्डुसंज्ञकाः ॥५३॥ एते पञ्चविधाः प्रोक्ताः, षड्विधानपि मे शृणु । उदावर्ता अतीसाराः, सवैसर्पा अथामयाः ॥५४॥ मेहिनां पिडकाः कुष्ठं सप्त सप्तोपलक्षयेत् । शुक्रदोषाः पयोदोषा मूत्राघातोदराणि च ॥५५॥ अष्टावष्टौ वदन्त्येतान् ग्रहास्तु दश कीर्तिताः । योनिव्यापत्कृमिमेहान् विंशतिं विंशतिं विदुः ॥५६॥

यह रोगों का प्रकरण यहां समाप्त नहीं हुआ है। अभी मैं उन रोगों का उपदेश करूंगा जिनके लिये आगे चिकित्सा स्थान कहा गया है अर्थात् जिनका चिकित्सास्थान में वर्णन किया गया है। वे रोग निम्न हैं—एक २ रोग—महागद, सन्यास तथा ऊरुस्तम्भ (महागद को चरक में अतत्त्वाभिनिवेश कहा है अर्थात् जिसमें तत्व का यथावत् ज्ञान न हो)—ये एक २ रोग होते हैं। दो २ रोग—ज्वर, व्रण, आमदोष, गृध्रसी, कामला, वातशोणित (वातरक्त—Gout), अर्श, आयाम (अन्तरायाम तथा बाह्यायाम)—ये दो २ व्याधियां हैं। तीन २ रोग—वातासृक् (वातरक्त), श्वित्र (किलास–कुष्ठ रोग) तथा शोथ–ये तीन २ रोग हैं। चार २ रोग—ग्रहणीरोग, अक्षिरोग, कर्णरोग, मुखरोग, अपस्मार, प्रतिश्याय, शोषों के कारण (साहस, वेगरोध, क्षय, विषमासन), मद, मूर्च्छा तथा क्लीबता—ये चार २ रोग हैं। पांच २ रोग—तृष्णा, छर्दि, श्वास, कास, गुल्म, प्लीहा, अरुचि, व्यथा, हिक्का, उन्माद, शिरोरोग, हृद्रोग तथा पाण्डुरोग–ये पांच २ प्रकार होते हैं। ६ प्रकार के रोग—उतावर्त तथा अतिसार। सात २ रोग—विसर्परोग, मधुमेह की पिडकाएं (Carbuncles) तथा कुष्ठ ये सात २ होते हैं। आठ २ रोग—शुक्रदोष, क्षीरदोष, मूत्राघात तथा उदररोग—ये आठ २ होते हैं। दस प्रकार के रोग—ग्रहरोग १० होते हैं। २० प्रकार के रोग—योनिरोग, कृमिरोग तथा प्रमेह–ये बीस २ होते हैं। इन सब रोगाधिकरणों का चिकित्सास्थान के हेतु से यहाँ संक्षेप में उल्लेख किया गया है। इस प्रकार यहां एक २ रोग के तीन वर्ग, दो २ के आठ, तीन २ के तीन, चार २ के आठ, पांच २ के पन्द्रह, छः २ के दो, सात २ के तीन, आठ २

रोगाध्यायः २७] सूत्रस्थानम् ६७

के चार, दस का एक तथा बीस २ के तीन वर्ग दिये हैं। चरक सू. अ. १९ (अष्टोदरीय अध्याय) में इनका विस्तार के साथ वर्णन किया गया है। विशेष ज्ञान के लिये जिज्ञासु पाठक इसे वहीं देखें ॥४८-५६॥

एते समासतः प्रोक्ताश्चिकित्सास्थानहेतवः। पूर्वोद्भवनिमित्तेन योऽपरो जायते गदः ॥५७॥

उपद्रव का लक्षण—पूर्व उत्पन्न व्याधि के साथ पीछे से जो दूसरा रोग हो जाता है उसे उपद्रव कहते हैं जिस प्रकार ज्वर में पीछे अतिसार हो जाता है। सुश्रुत सू. अ. ३५ में कहा है—‘‘तत्र, औपसर्गिको यः पूर्वोत्पन्नं व्याधिं जघन्यकालजातो व्याधिरुपसृजति स तन्मूलमूलक एवोपद्रवसंज्ञः।’’ जो पहले उत्पन्न हुई व्याधि के उत्तरकाल (बाद में) उत्पन्न होता है तथा पहले व्याधि के मूल में ही जिसका मूल (कारण) है उसे उपद्रव कहते हैं। चरक में इसका निम्न लक्षण दिया है—उपद्रवस्तु खलु रोगोत्तरकालजो रोगाश्रयो रोग एव स्थूलोऽणुर्वा रोगात्पश्चाज्जायत इति उपद्रवसंज्ञः। आजकल के विज्ञान के अनुसार Secondary complications and sequala का अन्तर्भाव ‘उपद्रव’ शब्द में हो जाता है ॥५७॥

तमुपद्रवमित्याहुरतीसारो यथा ज्वरे। चिकित्सितं तथोत्पत्तिं तेषामेके प्रचक्षते ॥५८॥
उपद्रवाणामित्येके पूर्वं नेत्याह कश्यपः। उभयत्रैव यद्युक्तं पानभोजनभेषजम् ॥५९॥
शान्तये तत् प्रयुञ्जीत न वर्धेत तथा ह्युभौ। यं वा तीव्रतरं पश्येद्व्याधिं विद्वान् स्वलक्षणैः ॥६०॥
तमेवोपक्रमेतादौ सिद्धिकामो भिषग्वरः।

उपद्रवों की चिकित्सा—कुछ विद्वान् कहते हैं कि उत्पत्ति के क्रम के अनुसार ही रोगों की चिकित्सा करे अर्थात् जो मुख्य रोग पहले हुआ है उसकी पहले तथा उपद्रव (जो पीछे से अनुबन्ध रूप में हुआ है) की पीछे चिकित्सा करे। तथा कुछ आचार्य कहते हैं कि इनमें से उपद्रवों की चिकित्सा पहले करनी चाहिये। भगवान् कश्यप कहते हैं—यह ठीक नहीं है। उनके मत में दोनों (मूलव्याधि तथा उपद्रव) की ही शान्ति के लिये उचित अन्नपान तथा भेषज का इस प्रकार से प्रयोग करे कि दोनों शान्त हो जायें तथा दोनों में से कोई भी बढ़ने न पावे। अथवा सफलता को चाहने वाले चिकित्सक को चाहिये कि जो व्याधि अपने तीव्र (उग्र—Acute) रूप में हो उसकी पहले चिकित्सा करे अर्थात् जो व्याधि अधिक तीव्र रूप में हो उसकी चिकित्सा पहले करे। उसके शान्त अथवा मन्दवेग हो जाने पर पीछे से दूसरे रोग की चिकित्सा की जा सकती है ॥५८-६०॥

यो हेतुः पित्तरोगणां रक्तजानां स एव तु ॥६१॥
शोणितं कुपितं जन्तुं क्लिश्नाति बहुभिर्मुखैः ॥६२॥

रक्तज रोगों के हेतु तथा चिकित्सा—पैत्तिकरोगों के जो कारण हैं, रक्तरोगों के भी कारण वे ही हैं। कुपित हुआ रक्त प्राणियों को अनेक प्रकार से कष्ट देता है।

वक्तव्य—जिन कारणों से पित्त प्रकुपित होता है उन्हीं से रक्त भी प्रकुपित होता है। हमारे प्राचीन शास्त्रों में पित्त को रक्त का ही मल माना गया है। सुश्रुत—सू. अ. ४६ में कहा है—कफः पित्तं मलः खेषु स्वेदः स्यान्नखरोम च। नेत्रविट् त्वक्षु च स्नेहो धातूनां क्रमश्रो मलाः॥ कफ, पित्त आदि क्रमशः रसरक्त आदि धातुओं के मल हैं। पाश्चात्य विज्ञान के अनुसार भी पित्त का रक्त से ही निर्माण माना गया है। Halliburton's physiology में कहा है—Liver cells take certain materials from plasma and eleborate the constituants of the bile. Bile pigments are formed from pigments of broken down blood Corpaseles. पित्त और रक्तका परस्पर घनिष्ठ संबन्ध है। इसीलिये पित्तप्रकोपक कारणों से ही रक्त भी प्रकुपित हो जाता है। सुश्रुत सू. अ. २१ में कहा भी है—पित्तप्रकोपणैरेव चाभीक्ष्णं द्रवस्निग्धगुरुभिराहारैर्दिवास्वप्नक्रोधामलातपश्रमाभिघाताजीर्णविरुद्धायशनादिभिर्विशेषैरसृक् प्रकोपमापद्यते॥

६८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लक्षणाध्यायः २८]

वैवर्ण्यसंतापशिरोक्षिरोगदौर्बल्यदौर्गन्ध्यतमः प्रवेशाः। वैसर्पविद्रध्युपजिह्वगुल्मरक्तप्रमेहप्रदरातिनिद्राः ।।६३।। मन्दाग्निता स्रोतसां पूतिभावः स्वरक्षयः स्वेदमदानिलासृक्। तृष्णाऽरुचिः कुष्ठविचर्चिकाश्च कण्ड्वः सकोठाः पिडकाः सकण्डवः ।।६४।।

रक्तरोग—विवर्ण (रक्त की कमी से शरीर का रङ्ग सफेद हो जाना), सन्ताप, शिरोरोग, अक्षिरोग, दुर्बलता, दुर्गन्धि, तमःप्रवेश (अन्धकार में प्रवेश करने के समान प्रतीत होना) विसर्प, विद्रधि, उपजिह्व, गुल्म, रक्तप्रमेह (मूत्र के साथ रक्त आना-Haematuria), प्रदर, अतिनिद्रा, मन्दाग्नि, स्रोतों में दुर्गन्धि आना, स्वरक्षर (Laryngitis), स्वेद मल, वायु, तृष्णा, अरुचि, कुष्ठ विचर्चिका, कण्डू, कोठ, पिडका तथा इन रोगों के अतिरिक्त अन्य भी बहुत से अनुक्त रोग रक्त विकार से हो जाते हैं। सुश्रुत सू. अ. २४ में निम्न रक्तज रोग गिनाये हैं-कुष्ठविसर्पपिडकामशकनीलि-कातिलकालकन्यच्छव्यङ्गेन्द्रलुप्तप्लीहविद्रधिगुल्मवातशोणिताशोऽर्बुदाङ्गमर्दासृग्दररक्तपित्तप्रभृतयो रक्तदोषजाः गुदमुखमेढ्रपाकाश्च। इसी प्रकार चरक सू. अ. २८ में भी निम्न रक्तज दोष दिये हैं—कुष्ठवीसर्पपिडका रक्तपित्तमसृग्दरः। गुदमेढ्रास्यपाकश्च प्लीहा गुल्मोऽथविद्रधी ।। नीलिका कामला व्यङ्गं पिप्लवस्तिलकालकाः। दद्रुश्चर्मदलश्वित्रं पामाकोठास्रमण्डलम् ।। रक्तप्रदोषाज्जायन्ते ।। ६३-६५।।

अन्ये च रोगा विविधा अनुक्तास्तेष्वादितः स्त्रंसनमेव पथ्यम्। वैसर्पवच्चात्र वदन्ति सिद्धं रक्तावसेकं च विशोषणं च ।।६५।।

रक्तज दोषों की चिकित्सा—इनमें सर्वप्रथम विरेचन देना चाहिये। इसकी विसर्प के समान चिकित्सा की जाती है तथा इसमें रक्तमोक्षण और शरीर का शोषण किया जाता है। रक्तमोक्षण करते समय सुश्रुत सू. अ. १४ में निम्न बातों का ध्यान रखने को कहा गया है—तस्मान्न शीते नात्युष्णे नास्विन्ने नातितापिते। यवागूं प्रतिपीतस्य शोणितं मोक्षयेद्भिषक् ।। रक्तमोक्षण अत्यन्त सर्दी अथवा अत्यन्त गर्मी में न करके साधारण ऋतु में करना चाहिये ।।६५।।

न त्वेव बालस्य विशोषणं हितं नैवातिसंशोधनरक्तमोक्षणे। स्निग्धैः सुशीतैर्मधुरैरदाहिभिस्तत्रोपचारोऽशनलेपसेचनैः ।।६६।। इति ह स्माह भगवान् कश्यपः। इति रोगाध्यायः सप्तविंशतितमः ।।२७।।

बालक का चिकित्सा कार्य में अधिक शोषण, अधिक रक्त-मोक्षण तथा आवश्यकता से अधिक संशोधन करना उचित नहीं है। उसका स्निग्ध, शीतल, मधुर तथा दाह न उत्पन्न करने वाले अन्नपान, लेप तथा परिषेचन के द्वारा ही उपचार करना चाहिये। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।६६।।

इति रोगाध्यायः सप्तविंशतितमः ।।२७।।


अष्टाविंशतितमोऽध्यायः

अथातो लक्षणाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम लक्षणाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में बालकों के शरीर में होने वाले शुभ तथा अशुभ लक्षणों का वर्णन किया जायगा॥

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ६९

भगवँल्लक्षणैर्बाला आयुष्मन्तो भवन्ति कैः । सुखिनो दुःखिनः कैः कैर्वैद्यो विद्यादनायुषः ॥ ३॥ कति सत्त्वानि मर्त्यानां सत्त्वानां लक्षणं च किम् । प्रशस्तं निन्दितं देहे यद्यत्तत्तदिहोच्यताम् ॥४॥

भगवान् ! किन लक्षणों से बालक आयुष्मान् होते हैं अर्थात् किन लक्षणों को देखकर बालक के दीर्घायुष्य का ज्ञान हो सकता है ? बालकों के सुख, दुःख तथा अनायुष्य (कम आयु) का ज्ञान कैसे हो सकता है ? मनुष्यों के कितने सत्व होते हैं ? सत्त्वों के लक्षण क्या हैं ? तथा अन्य भी शरीर में जो जो प्रशस्त एवं निन्दित भाव हों उन २ का आप उपदेश कीजिये ॥

पञ्चावदानवचनं श्रुत्वा प्रोवाच कश्यपः । कृत्स्न लक्षणविज्ञानं सत्त्वं निन्दितपूजितम् ।।५।।

इन उपर्युक्त पांच प्रशस्त वचनों (प्रश्नों) को सुनकर महर्षि कश्यप ने सम्पूर्ण लक्षण विज्ञान, सत्व तथा अन्य निन्दित एवं प्रशस्त भावों का उपदेश किया ॥५॥

इह खलु कुमाराणां वृद्धजीवक ! स्निग्धतनुश्लक्ष्णताम्रा नखा आधिपत्याय भवन्ति, स्थूला आचार्याणां, राजीमन्तश्च दीर्घाश्चायुष्मतां, निम्नशुक्तितुषाकृतयो दरिद्राणां, रूक्षा दुःखभागिनां, पुष्पिता लुण्ठानां, श्वेता मण्डला अनायुषां, स्फुटिता अस्वत्तन्त्राणां, विवर्णा व्यसनिनां, समुन्नता निपिण्डान्ता अल्पाः सुखभागिनां, विपुलैर्नखैर्मध्यत्वमाह, स्थूलाः श्वेता विषमाश्च प्रव्राजयन्ति । पादैः पीनैः सुप्रतिष्ठितैरूर्ध्वलेखैरायुष्मन्तो धनवन्तोऽधिपतयः, स्वस्तिकलाङ्गलकमलशङ्खचक्रहयगजरथप्रहरणमङ्गलाङ्कितै राजानः, ताम्रैः स्निग्धैः सुभगाः, उत्कृ(त्क)टकैर्मध्यधनायुषः, श्वेतैरधनाः, अलेखैः परकर्मकराः, बहुलेखै रोगिणः, सुवृत्तश्लक्ष्णपाष्णिभिः सर्वगुणोपपन्ना भवन्ति, हीनपाष्णिभिरनायुषः प्रजाहीनाः, चिपिटाः पारदारिकाः । अङ्गुलीनखपादैर्दीर्घैर्दीर्घायुषो, ह्रस्वैर्ह्रस्वायुषः । अङ्गुलीभिर्घनाभिर्भाग्यवन्तो, गूढपर्वाभिर्भोगिनः, स्थूलपर्वाभिराचार्याः, लोमशाभिरधनाः । खरपरुषतनुविषमस्फुटितमलिनापाष्ठिरप्रशस्ता । उत्तरपादमुन्नतमसिरमलोमकं प्रशस्यते, विषमं विपरीतं च तस्कराणाम् । गुल्फौ गूढावल्पावलोमशिरौ प्रशस्येते, धननाशयोल्वणौ, विपुलो परिक्लेशाय । प्रजङ्घा तन्वी प्रशस्यते, स्थूला पतिपुत्रद्रव्यसुखक्षयकरी स्तेनाय च । जङ्घे चानुद्वद्धे असिरे अलोमिके प्रशस्येते, शुष्कस्थूलसिरालोमशे विपरीते, वैधव्यकर्यौ तु नारीणाम् । जानुनी च गूढे धन्ये । ऊरू मांसोपचितौ गूढसिरौ श्लक्ष्णौ प्रशस्येते । स्फिचौ निर्वृत्तावलम्बौ ।

(इति ताडपत्रपुस्तके ४५ तमं पत्रम् ।)

निर्व्रणावलोमशावविषमौ प्रशस्येते, शुष्कावनपत्यानां, लम्बौ प्रधाननाशाय, महान्तौ पौंश्चल्याय, अल्पकौ शीलवताम् । कुकुन्दरौ गम्भीरावलोमशौ प्रविभक्तौ समौ प्रशस्येते, लोमशौ प्रव्रज्यायै, प्रदक्षिणावर्तौ तु धन्यौ, विपुलौ दीर्घायुषां, श्लिष्टावनायुषाम् । जघनमुरसा तुल्यं प्रशस्यत इत्येके । कुमाराणामुरस्तु विशालतरं, जघनं तु कुमारीणां, न तु मध्याय कल्पते । वृषणौ प्रलम्बौ बृहतौ गौरस्य, कृष्णौ कृष्णस्य, गौरौ रक्तस्य, श्यामौ श्यामस्य, रक्तौ लोमशौ मध्यौ स्मृतौ, पीनौ प्रशस्येते, विपरीतौ दौर्भाग्यपुस्त्वप्रजाहानिकरौ, स्वल्पावनायुषां, दुःखाय चैके, गोखरहयाजाविकाकृती तु सुभगनामायुष्मतां च विज्ञेयौ । प्रजननं मृदु दीर्घमुच्छ्रितं बृहत्ताप्रनिर्वृत्तमणि महाकोशं महास्रोतः प्रशस्यते, तनु ह्रस्वं लम्बि विकोशं श्वेतश्यावविसृतं वामावृत्तमप्रशस्तम् । मूत्रमनाविद्धमतनुकमनल्पमृजुवेगं प्रशस्यते, तद्विपरीतमतिगन्धि सवेदनमत्युष्णं विवर्णमनिमित्तकालमशब्दमप्रशस्तं; कन्यकानां च स्फालितमूत्रत्वमुभयोर्वाऽनथ्यकरम् ।

७०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लक्षणाध्यायः २८]

योनिः शकटाकृतिरपत्यलाभाय, पीना सौभाग्याय, लम्बाऽपत्यवधाय, मण्डलाव्याभिचरणाय, उत्क्षिप्ताऽनपत्यत्वाय, सूचीमुखी दौर्भाग्याय, भृशविवृतसंवृतशुष्का लम्बा विषमा विलिङ्गा क्लेशलाभाय, मध्यनिबिडा कन्याप्रजननाय, उन्नता रमणीया मांसला पुत्रजन्मने, व्यञ्जनवती च धन्या, अतिलोमशा वैधव्यकरी, व्यञ्जनहीना त्वयशसे, पिप्लुमद्द्सावती व्यभिचारप्रव्रज्यायैः । तथैव लोमराज्युभयतो मध्यमगता नातिघना प्रशस्यते, वैधव्यायाति स्थूला, अतिस्थूलघनलोमा पौंश्चल्याय, अधोजाता दौर्भाग्याय, नाभिमतिवृत्ता मध्यत्वाय । कुक्षौ समुन्नतौ प्रशस्येते, लोमशौ प्रव्रज्यायै, सिरालौ कुभोजनाय, निम्नौ दारिद्र्याय, समौ मध्यत्वाय, दक्षिणोन्नतौ पुत्रजन्मने, वामोन्नतौ विपरीतौ । ईषदुन्नतमुदरमशिथिलमकठिनमविपुलं प्रशस्यते, दारिद्र्याय शुष्कम्, उन्नतं भोगाय, विशालविषमं विषमशीलभोगाय कल्पते, भृशशुष्कमनपत्यं; स्त्रियाश्चाधस्तादुपचितमशिरमतिविपुलमवलिकमनायुषे, मध्यं नाभेरूपरिष्टादनायुषे, एकवलिकं धन्यं, द्विवलिकं बुद्धिलाभाय, त्रिवलिकं सौभाग्याय, चतुर्वलिकं प्रजायुषे, बहुवलिकमध्यमनायुषे भवत्युदरम् । नाभिः गम्भीरा प्रदक्षिणा वृत्तोत्सङ्गिनी लोमसिरावर्तवर्जिता प्रशस्यते, गर्ताकृतिरनुन्नता सुखदुःखकरी, विषमोन्नताऽनायुष्या, स्वल्पाकृतिरनपत्या, विदेशस्था प्रव्राजयति, बृहती गम्भीरोन्नताऽऽधिपत्याय । नाभ्या पायुर्व्याख्यातः । पार्श्वे वृत्ते मांसले स्निग्धे अलोमसिरे प्रशस्येते, लोमसिरे प्रव्राजयते । पृष्ठं सममुपरिविशालमसिरमलोमकमनावर्तकं प्रशस्यते, मध्ये निम्नमायुष्मतां, निर्भुग्नं दुःखभागिनां, संक्षिप्तमनायुषां, लोमशममैत्राणामल्पापत्यानां च । लोमस्कन्धोवणिग्भारजीवी कितवो रङ्गजीवी वा, शुष्कांसो दरिद्रः, तावुभौ दीर्घायुषौ कदाचित् प्रव्रजेतामपि; स्निग्धांसः कर्षकः, पीनांस आढ्यः, कठिनांसः शूरः, शिथिलांसोऽस(श)क्तः; उन्नतांसः पुमान् प्रशस्यते, भ्रष्टांसा कन्या; विपरीते तद्गुणहानिः । कक्षावृत्तौ पृथुलौ पीनौ सुव्यञ्जनौ प्रशस्येते, विपरीतावधन्यौ, भृशलोमशौ च नारीणाम् । तथा बाहू आनुपूर्व्योपचितौ गूढारत्नी दीर्घौ जानुस्पृशौ प्रशस्येते, सिराततावायुष्मतां, पक्ष्म (क्ष)वन्तौ प्रजावताम्, असिरावप्रजानां, तिर्यक्सिरौ कृच्छ्रजीविनां, तिलवन्तौ प्रव्राजयतः, मशकलक्षणवन्तौ कलहाय । मणिबन्धने स्थूले पुंसः प्रशस्येते, तनू स्त्रियाः । उभयोरेव तिस्रो यत्रपङ्क्त्योऽच्छिन्नाः प्रशस्यन्ते, प्रथमा धन्या, द्वितीया मुख्या, तृतीया प्रजायुषे, सर्वाश्चेदविच्छिन्नाः स्निग्धा व्यक्तगम्भीरलिखिता आधिपत्याय, चतस्रो राजर्षेः, पञ्च षट् शतपुत्रस्य, सप्त देवनिकायानाम्, एकाऽपि चेदविच्छिन्ना व्यक्ता सुखायोपपद्यते ।

.................................................................................... (इति ताडपत्रपुस्तके ४६ तमं पत्रम् ।) .................................................. स्त्रीणां चातिदीर्घाश्चातिह्रस्वाश्च निन्दिताः । केशभूमिः स्निग्धा लोहिता निर्मला निर्व्रणा च प्रशस्यते ।।

मत्तगजवृषभसिंहशार्दूलहंसगतयोऽधिपतयः, स्तिमितगतयो धन्याः, चपलगतायश्चपलसुखदुःखलाधिनः, तिर्यग्गतयस्त्वधन्याः स्खलनाश्चाङ्गविस्फोटिनश्चाप्रशस्ताः । तथा, अतिगौरमतिकृष्णमतिदीर्घमतिह्रस्व- मतिकृशमतिस्थूलमतिलोमशमलोमशमतिसृद्वतिकठिनं च शरीरेष्व(रम) प्रशस्तमुच्यते । तथा बालानां रुषितरुदितस्वप्रजागरक्रोधहर्षविसर्गदानपङ्क्तिस्थैर्यगाम्भीर्याणि युक्तानि गुणाधिकानि प्रशस्यन्त इति ।। ६ ।।

हे वृद्धजीवक बालकों के दीर्घायुष्य के निम्न लक्षण होते हैं—नख—स्निग्ध, तनु (पतले) चिकने तथा ताम्र वर्ण के हों तो बालक अधिपति (राजा या स्वामी) होता है । स्थूल नख हों तो आचार्य होता है । रेखायुक्त तथा दीर्घ हों तो

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७१

आयुष्मान् (दीर्घायुष्य वाला), नख नीचे झुके हुए, शुक्ति (सीप) तथा तुषाकृति हों तो बालक दरिद्र, रूक्ष हों तो दुखी, पुष्पित (पुष्पों की गन्धरूप अरिष्ट लक्षणों से युक्त) हों तो लुण्ठ व्यक्ति, श्वेतवर्ण के तथा मण्डलाकार हों तो कम आयु वाला, स्फुटित टूटे हुए हों तो पराधीन, विवर्ण हों तो व्यसनी, उन्नत (उठे हुए), किनारे पर मुड़े हुए या गोल तथा छोटे हों तो बालक सुखी होता है। नख विपुल हों तो वह मध्य श्रेणी का होता है तथा स्थूल श्वेत एवं विषम हों तो बालक भ्रमणशील होता है। पाद (पैर—Foot)—मोटे, अच्छी प्रकार प्रतिष्ठित तथा ऊपर की ओर रेखाओं वाले हों तो बालक आयुष्मान्, धनवान् तथा अधिपति (स्वामी) होते हैं। स्वस्तिक, लाङ्गल (हल) कमल, शंख, चक्र, घोड़ा, हाथी, रथ आदि मङ्गलकारी प्रहरणों से चिन्हित हों तो वे बालक राजा होते हैं। ताम्र वर्ण एवं चिकने हों तो ऐश्वर्यशाली होते हैं। यदि पैर मुड़े हुए हों तो मध्यम (साधारण) धन एवं आयु होती है। यदि उनके पैर श्वेत हों तो वे निर्धन, रेखाओं से रहित हों तो वे दूसरों का काम अर्थात् नौकरी (दासत्व) करने वाले, बहुत रेखायें हों तो वह रोगी, गोल तथा चिकनी एड़ी वाले हों तो वे सर्वगुणसम्पन्न, यदि छोटी एड़ी वाले हों तो कम आयु वाले एवं सन्तान रहित तथा यदि उनके पैर चपटे हों तो वे दूसरों की स्त्रियों को भगाने वाले अथवा उनसे प्रेम आदि करने वाले होते हैं। अङ्गुलियां, नाखून तथा पैर आदि यदि दीर्घ हों तो वे दीर्घायु तथा ह्रस्व हों तो अल्पायु होते हैं। अंगुलियां—यदि बालक की अंगुलियां मजबूत हों तो वह भाग्यवान्, पर्व (अंगुलियों की सन्धियां) यदि खूब गूढ हों तो भोगी तथा स्थूल हों तो आचार्य, और यदि अंगुलियां लोमश (बालों से युक्त) हों तो बालक निर्धन होता है। पाष्णि (एड़ी—Heal)—खुरदरी, परुष (कठोर), तनु (पतली), विषम, फटी हुई तथा मलिन एड़ी अप्रशस्त मानी गई है। उत्तरपाद (पैर का ऊपर का भाग—Dorsum of Foot)—उन्नत (उठा हुआ), शिराओं से रहित (जिस पर शिरायें—Veins उभरी हुई न हों) तथा लोम (बालों) से रहित प्रशस्त होता है। इससे विपरीत तथा विषम हो तो वह बालक चोर होता है। गुल्फ (टखने—Ankles)—मजबूत, छोटे तथा लोम (बालों) और शिराओं से रहित प्रशस्त माने गये हैं। इसके विपरीत यदि ये बहुत उभरे हुए हों तो धननाश तथा बहुत विशाल हों तो क्लेश (दुःख) के कारण होते हैं। प्रजङ्घा (Lower and of the leg)—यह पतली प्रशस्त मानी गई है। स्थूल प्रजङ्घापति पुत्र धन तथा सुख का क्षय करने वाली एवं चोरों की होती है। जङ्घा (Legs)—कसी हुई तथा शिरा और लोम से रहित प्रशस्त मानी गई है। अतिशुष्क (सूखी हुई पतली) अतिस्थूल तथा शिरा और लोम से युक्त अप्रशस्त होती हैं। ये (अप्रशस्त जङ्घायें) नारियों के लिये वैधव्य करने वाली होती हैं अर्थात् जिन स्त्रियों की जङ्घायें अप्रशस्त होती हैं वे भविष्य में विधवा हो जाती हैं। जानु (घुटने—Knee joints)—मजबूत प्रशस्त होते हैं। ऊरु (जांघ—Thigh)—मांस से युक्त, गहरी (Deep seated शिराओं वाली) तथा चिकनी—प्रशस्त होती हैं। दोनों स्फिक् (नितम्ब—Buttocks)—निर्वृत्त (गोल), जो लम्बे न हों, व्रण एवं लोमरहित तथा अविषम (जो विषम न हो अर्थात् सम हों) प्रशस्त होते हैं। शुष्क नितम्ब सन्तान रहित व्यक्ति के, लम्बे—प्रधानता नष्ट होने वालों के (अर्थात् जिनके नितम्ब लम्बे होते हैं उनकी प्रधानता—बड़प्पन नष्ट हो जाती है), बड़े नितम्ब दुश्चरित्रा के तथा छोटे शीलवान् बालकों के होते हैं। कुकुन्दर (Ischial tuberosities)—गंभीर (गहरे) लोमरहित, विभक्त हुए तथा समान आकार वाले प्रशस्त होते हैं। लोमयुक्त कुकुन्दर भ्रमणशील स्त्रियों के होते हैं। दक्षिण की ओर जिसमें आवर्त (चक्कर) हों वे प्रशस्त माने गये हैं, विपुल (बड़े) दीर्घायु वाले व्यक्तियों के तथा श्लिष्ट (आपस में मिले हुए) अल्पायु के होते हैं। जघन (कूल्हे—Pelvis)—कुछ लोग कहते हैं कि कूल्हे छाती के समान परिमाण वाले प्रशस्त होते हैं। बालकों की छाती विशाल होती है तथा बालिकाओं के कूल्हे (Pelvicregion) विशाल होते हैं। ये दोनों छाती तथा कूल्हे मध्यम आकारवाले प्रशस्त नहीं होते हैं। वृषण (Testicles)—गौरवर्ण वाले बालक के वृषण लम्बे तथा बड़े, कृष्णवर्णवाले के कृष्ण, रक्तवर्ण वाले के गौर तथा श्यामवर्ण वाले के श्याम होते हैं। रक्तवर्ण तथा लोमयुक्त वृषण मध्यम श्रेणी के माने गये हैं। मोटे वृषण प्रशस्त होते हैं। इससे विपरीत अर्थात् पतले वृषण दुर्भाग्य वाले तथा पुंस्त्व और सन्तान नाशक माने गये हैं। छोटे वृषण अल्पायुओं