भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 942 में से

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लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७१

आयुष्मान् (दीर्घायुष्य वाला), नख नीचे झुके हुए, शुक्ति (सीप) तथा तुषाकृति हों तो बालक दरिद्र, रूक्ष हों तो दुखी, पुष्पित (पुष्पों की गन्धरूप अरिष्ट लक्षणों से युक्त) हों तो लुण्ठ व्यक्ति, श्वेतवर्ण के तथा मण्डलाकार हों तो कम आयु वाला, स्फुटित टूटे हुए हों तो पराधीन, विवर्ण हों तो व्यसनी, उन्नत (उठे हुए), किनारे पर मुड़े हुए या गोल तथा छोटे हों तो बालक सुखी होता है। नख विपुल हों तो वह मध्य श्रेणी का होता है तथा स्थूल श्वेत एवं विषम हों तो बालक भ्रमणशील होता है। पाद (पैर—Foot)—मोटे, अच्छी प्रकार प्रतिष्ठित तथा ऊपर की ओर रेखाओं वाले हों तो बालक आयुष्मान्, धनवान् तथा अधिपति (स्वामी) होते हैं। स्वस्तिक, लाङ्गल (हल) कमल, शंख, चक्र, घोड़ा, हाथी, रथ आदि मङ्गलकारी प्रहरणों से चिन्हित हों तो वे बालक राजा होते हैं। ताम्र वर्ण एवं चिकने हों तो ऐश्वर्यशाली होते हैं। यदि पैर मुड़े हुए हों तो मध्यम (साधारण) धन एवं आयु होती है। यदि उनके पैर श्वेत हों तो वे निर्धन, रेखाओं से रहित हों तो वे दूसरों का काम अर्थात् नौकरी (दासत्व) करने वाले, बहुत रेखायें हों तो वह रोगी, गोल तथा चिकनी एड़ी वाले हों तो वे सर्वगुणसम्पन्न, यदि छोटी एड़ी वाले हों तो कम आयु वाले एवं सन्तान रहित तथा यदि उनके पैर चपटे हों तो वे दूसरों की स्त्रियों को भगाने वाले अथवा उनसे प्रेम आदि करने वाले होते हैं। अङ्गुलियां, नाखून तथा पैर आदि यदि दीर्घ हों तो वे दीर्घायु तथा ह्रस्व हों तो अल्पायु होते हैं। अंगुलियां—यदि बालक की अंगुलियां मजबूत हों तो वह भाग्यवान्, पर्व (अंगुलियों की सन्धियां) यदि खूब गूढ हों तो भोगी तथा स्थूल हों तो आचार्य, और यदि अंगुलियां लोमश (बालों से युक्त) हों तो बालक निर्धन होता है। पाष्णि (एड़ी—Heal)—खुरदरी, परुष (कठोर), तनु (पतली), विषम, फटी हुई तथा मलिन एड़ी अप्रशस्त मानी गई है। उत्तरपाद (पैर का ऊपर का भाग—Dorsum of Foot)—उन्नत (उठा हुआ), शिराओं से रहित (जिस पर शिरायें—Veins उभरी हुई न हों) तथा लोम (बालों) से रहित प्रशस्त होता है। इससे विपरीत तथा विषम हो तो वह बालक चोर होता है। गुल्फ (टखने—Ankles)—मजबूत, छोटे तथा लोम (बालों) और शिराओं से रहित प्रशस्त माने गये हैं। इसके विपरीत यदि ये बहुत उभरे हुए हों तो धननाश तथा बहुत विशाल हों तो क्लेश (दुःख) के कारण होते हैं। प्रजङ्घा (Lower and of the leg)—यह पतली प्रशस्त मानी गई है। स्थूल प्रजङ्घापति पुत्र धन तथा सुख का क्षय करने वाली एवं चोरों की होती है। जङ्घा (Legs)—कसी हुई तथा शिरा और लोम से रहित प्रशस्त मानी गई है। अतिशुष्क (सूखी हुई पतली) अतिस्थूल तथा शिरा और लोम से युक्त अप्रशस्त होती हैं। ये (अप्रशस्त जङ्घायें) नारियों के लिये वैधव्य करने वाली होती हैं अर्थात् जिन स्त्रियों की जङ्घायें अप्रशस्त होती हैं वे भविष्य में विधवा हो जाती हैं। जानु (घुटने—Knee joints)—मजबूत प्रशस्त होते हैं। ऊरु (जांघ—Thigh)—मांस से युक्त, गहरी (Deep seated शिराओं वाली) तथा चिकनी—प्रशस्त होती हैं। दोनों स्फिक् (नितम्ब—Buttocks)—निर्वृत्त (गोल), जो लम्बे न हों, व्रण एवं लोमरहित तथा अविषम (जो विषम न हो अर्थात् सम हों) प्रशस्त होते हैं। शुष्क नितम्ब सन्तान रहित व्यक्ति के, लम्बे—प्रधानता नष्ट होने वालों के (अर्थात् जिनके नितम्ब लम्बे होते हैं उनकी प्रधानता—बड़प्पन नष्ट हो जाती है), बड़े नितम्ब दुश्चरित्रा के तथा छोटे शीलवान् बालकों के होते हैं। कुकुन्दर (Ischial tuberosities)—गंभीर (गहरे) लोमरहित, विभक्त हुए तथा समान आकार वाले प्रशस्त होते हैं। लोमयुक्त कुकुन्दर भ्रमणशील स्त्रियों के होते हैं। दक्षिण की ओर जिसमें आवर्त (चक्कर) हों वे प्रशस्त माने गये हैं, विपुल (बड़े) दीर्घायु वाले व्यक्तियों के तथा श्लिष्ट (आपस में मिले हुए) अल्पायु के होते हैं। जघन (कूल्हे—Pelvis)—कुछ लोग कहते हैं कि कूल्हे छाती के समान परिमाण वाले प्रशस्त होते हैं। बालकों की छाती विशाल होती है तथा बालिकाओं के कूल्हे (Pelvicregion) विशाल होते हैं। ये दोनों छाती तथा कूल्हे मध्यम आकारवाले प्रशस्त नहीं होते हैं। वृषण (Testicles)—गौरवर्ण वाले बालक के वृषण लम्बे तथा बड़े, कृष्णवर्णवाले के कृष्ण, रक्तवर्ण वाले के गौर तथा श्यामवर्ण वाले के श्याम होते हैं। रक्तवर्ण तथा लोमयुक्त वृषण मध्यम श्रेणी के माने गये हैं। मोटे वृषण प्रशस्त होते हैं। इससे विपरीत अर्थात् पतले वृषण दुर्भाग्य वाले तथा पुंस्त्व और सन्तान नाशक माने गये हैं। छोटे वृषण अल्पायुओं

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