भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् [लक्षणाध्यायः २८]

के तथा दुःख के कारण होते हैं। गौ, गदहा, घोड़ा, बकरी तथा भेड़ की आकृति वाले वृषण सौभाग्यशाली तथा आयुष्मान् बालकों के होते हैं। प्रजनन (शेप—Penis)—कोमल, दीर्घ, उच्छ्रित (उछ्राय अथवा हर्षयुक्त), बड़ी ताम्रवर्ण की तथा गोल मणि (Glans) युक्त, महान् कोश तथा महान् स्रोतों वाला प्रशस्त होता है। तथा तनु (पतला), बहुत छोटा, बहुत लम्बा, कोशरहित, श्वेत तथा काले स्राव वाला तथा वाम पार्श्व में आवृत्त वाला प्रजनन अप्रशस्त होता है। मूत्र-जो कष्ट से न आता हो, अत्यन्त पतला न हो, मात्रा में बहुत कम न हो तथा जिसका वेग सरलता पूर्वक हो-वह प्रशस्त होता है। इससे विपरीत अत्यन्त गन्ध (odour) वाला, वेदनायुक्त (Dysurea) अत्यन्त उष्ण, विवर्ण (श्वेतवर्णवाला अथवा अस्वाभाविक वर्ण वाला,-Straw Colour मूत्र का स्वाभाविक वर्ण माना जाता है, इससे विपरीत वर्ण वाला अस्वाभाविक होता है), अनिश्चित समय पर आने वाला तथा शब्द से रहित अप्रशस्त माना गया है। कन्याओं के लिये अथवा कन्या एवं बालक दोनों के लिये स्फालितमूत्रत्व (मूत्र का इधर-उधर फैल जाना) अनपत्यकर (सन्तानोत्पत्ति को नष्ट करने वाला) होता है। योनि (Vagina)—शकटाकार योनि सन्तानोत्पत्ति के लिये होती है स्थूल सौभाग्य के लिये, लम्बी अपत्यवध (सन्तानघात) के लिये, गोल व्यभिचार के लिये, उत्क्षिप्त (ऊपर उठी हुई) अनपत्य (सन्तान न होने) के लिये, सूचीमुखाकार दुर्भाग्य के लिये, बहुत अधिक फैली हुई बिल्कुल संकुचित, शुष्क, लम्बी, विषम तथा लिङ्गरहित योनि क्लेश के लिये, मध्यम रूप से भिंची हुई (न अधिक फैली हुई और न सिकुड़ी हुई) योनि कन्या की उत्पत्ति के लिये, उन्नत (उठी-उभरी हुई) रमणीय तथा मांसयुक्त योनि पुत्रोत्पत्ति के लिये होती है। व्यञ्जनयुक्त योनि प्रशस्त, अत्यन्त लोमश वैधव्य उत्पन्न करने वाली, व्यञ्जन रहित अप्रशस्त, तथा पिप्लु¹ (मांसाङ्कुर) एवं वसावती (वसा-भेद वाली) योनि व्यभिचार के लिये होती है। इसी प्रकार दोनों ओर बालों की पंक्तियों वाली, मध्यम तथा जो अत्यन्त घनी न हो वह योनि प्रशस्त होती है। अत्यन्त स्थूल वैधव्य के लिये होती है। अत्यन्त स्थूल एवं घने बालों वाली पुंश्चली (कुलटा) के लिये, नीचे झुकी हुई दुर्भाग्य के लिये तथा नाभि से भी ऊपर पहुंची हुई योनि मध्यम श्रेणी की होती है। कुक्षि (कोख-Flanks)—उन्नत (उठी हुई) प्रशस्त होती है। लोमयुक्त कोख अत्यन्त घूमने (भ्रमण करने) वाली के लिये, शिराओं से युक्त कुत्सित भोजनवालों के लिये, नीचे दबे हुए दरिद्रों के, सम आकार वाले मध्यम बालकों के, तथा यदि दक्षिण कुक्षि (Right flank) उभरी हुई हो तो पुत्रजन्म के लिये वाम कुक्षि (Left flank) उभरी हुई हो तो कन्या के जन्म के लिये होती है। उदर (Abdomen)—ईषत् उन्नत, अशथिल (जो शिथिल-ढीला न हो), कोमल तथा बहुत बड़ा न होना प्रशस्त होता है। शुष्क उदर दरिद्रों के लिये, बड़ा उदर भोग के लिये, विशाल तथा विषम उदर विषम स्वभाव तथा भोग वालों के होते हैं, अत्यन्त सूखा हुआ उदर अनपत्यकर होता है। स्त्रियों का पेट नीचे से बहुत अधिक उपचित (बढ़ा हुआ), शिराओं से रहित, अत्यन्त बड़ा तथा वलियों (लकीरों) से रहित अनायुष्यकर होता है। नाभि से ऊपर दबा हुआ होना अनायुष्यकर होता है। पेट पर यदि एक वलि (लकीर) हो तो वह प्रशस्त होता है, दो वलियों वाला बुद्धि के लिये, तीन वलियों वाला सौभाग्य के लिये, चार वलियों वाला सन्तान तथा आयु के लिये तथा बहुत वलियों वाला उदर अनायुष्यकर तथा अप्रशस्त होता है। नाभि (Umblicus)—गहरी, दक्षिण की ओर घूमी हुई, गोल, उठे हुए किनारों वाली, लोम शिरा तथा आवतों से रहित प्रशस्त होती है। गर्ताकार तथा अनुन्नत (जो उन्नत न हो) नाभि सुख तथा दुःख को करने वाली है। विषम रूप से उभरी हुई नाभि अनायुष्यकर होती है। स्वल्प आकृति वाली नाभि अनपत्यकर होती है। अपने स्थान से हटी हुई नाभि भ्रमणशील व्यक्ति की होती है तथा बड़ी, गम्भीर और उन्नत नाभि अधिपति (स्वामी) की होती है। नाभि के द्वारा ही वायु (गुदा-Anus) का भी व्याख्यान समझना चाहिये। अर्थात् नाभि के समान ही गुदा के लक्षण समझने चाहिये। पार्श्व—गोल, मांसल, स्निग्ध तथा लोम और शिराओं से रहित प्रशस्त होते हैं। लोम और


१. 'जडुलः कालकः पिप्लुः' इत्यमरः, 'निरुक्तृष्णो मांसाङ्कुरः' इत्यष्टाङ्गसंग्रहव्याख्यायामिन्दुः, जतुमणिरित्यस्य नामान्तरम्, पिप्लुमती वसावती (मेदःस्विनी) चेत्यर्थः।