काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७३
शिराओं से युक्त भ्रमणशील व्यक्ति के होते हैं। पृष्ठदेश (Back)—सम, ऊपर से विशाल, शिरा लोभ एवं आवतों से रहित प्रशस्त होता है। बीच के भाग में निम्न हो तो आयुष्यकर होता है। झुका हुआ दुखियों का होता है। यदि पृष्ठप्रदेश बहुत छोटा हो तो व्यक्ति अल्पायु तथा लोमयुक्त हो तो मित्ररहित एवं अल्प सन्तान वाला होता है। स्कन्ध (कन्धे-Shoulders)—कन्धों पर बाल बनियों, भार उठाने वालों, जुआरियों तथा रंगरेजों के होते हैं। शुष्क अंस (कन्धों) वाले व्यक्ति दरिद्र होते हैं। ये दोनों (लोमयुक्त एवं शुष्क स्कन्धों वाले) कभी-२ दीर्घायु भी होते हैं तथा वे व्यक्ति भ्रमणशील होते हैं। स्निग्ध अंस (कन्धा) कर्षण करने वाला, पीन (मोटे) कन्धे वाला गुणी होता है, कठिन (कठोर) कन्धों वाला शूरवीर, शिथिल कन्धों वाला अशक्त (दुर्बल) तथा उन्नत कन्धों वाला व्यक्ति प्रशस्त माना जाता है। कन्या झुके हुए कन्धों वाली प्रशस्त मानी जाती है। इनसे विपरीत में गुणों की हानि होती है अर्थात् वे अप्रशस्त होते हैं। कक्ष (बगल-Axilla)—उन्नत, विशाल, मोटे तथा सुस्पष्ट प्रशस्त माने जाते हैं। इससे विपरीत अप्रशस्त। स्त्रियों के अधिक बालों वाले कक्ष अप्रशस्त होते हैं। बाहु (Arms)—बाहु वे प्रशस्त होते हैं जो क्रमशः उपचित हों अर्थात् ऊपर से मोटी तथा नीचे क्रमशः पतली हों, जिसमें अरत्नि¹ (कोहनी) दृढ़ हों। जो दीर्घ हों तथा घुटनों को स्पर्श करने वाले हों अर्थात् इतने लम्बे हों कि घुटनों तक लटकते हों। शिराओं से युक्त बाहु आयुष्मान् बालकों के, पक्षयुक्त सन्तान वालों के, शिराओं से रहित सन्तानशून्य व्यक्तियों के, तिर्यक (तिरछी) शिरायें कृच्छ्रजीवियों (जो कठिनता से जीवित रहते हैं) के, तिलयुक्त बाहु भ्रमणशील व्यक्तियों के तथा मशक (मस्सो) से युक्त बाहु कलह करने वालों के होते हैं। मणिबन्धन (कलई-Wrist)—पुरुषों की मोटी तथा स्त्रियों की पतली प्रशस्त होती है। पुरुष तथा स्त्री दोनों की तीनों यवपंक्तियां यदि अविच्छिन्न हों तो वे प्रशस्त मानी गई हैं। प्रथम पंक्ति ऐश्वर्ययुक्त, दूसरी मुख्य तथा तीसरी प्रजा एवं आयु के लिये होती है। तीनों पंक्तियां यदि अविच्छिन्न (बिना कटी हुई—पूरी), स्निग्ध, स्पष्ट एवं गहरी चिह्नित दिखाई दे तो बालक अधिपति होता है। चारों पंक्तियां अविच्छिन्न राजर्षियों की, पांच तथा छः पंक्तियां यदि अविच्छिन्न हों तो उसके १०० पुत्र होते हैं। सात पंक्तियां अविच्छिन्न देवनिकायों की होती है तथा यदि एक भी पंक्ति अविच्छिन्न एवं स्पष्टरूप में दिखाई देती हो तो वह व्यक्ति सुखी होता है। .....................................................² स्त्रियों के (बाल) बहुत अधिक बड़े तथा बहुत छोटे निन्दित माने गये हैं। केशभूमि (बालों की जड़ें) स्निग्ध (चिकनी) लोहित, निर्मल तथा व्रणरहित प्रशस्त मानी गई है। मस्त हाथी, बैल, सिंह, चीते तथा हंस की गतियों वाले अधिपति (स्वामी) होते हैं। मन्दगति वाले प्रशस्त होते हैं। चञ्चलगतिवाले व्यक्ति चञ्चलतापूर्वक सुख तथा दुख को प्राप्त करते हैं। तिर्यक् गति वाले अप्रशस्त माने गये हैं। स्खलन (लड़खड़ाना) गति वाले तथा जिनके अङ्ग फटे हुए हैं वे व्यक्ति अप्रशस्त होते हैं। तथा अत्यन्त गौर, अत्यन्त कृष्ण, अतिदीर्घ, अतिह्रस्व, अतिकृश, अतिस्थूल अतिलोमश (बहुत अधिक बालों वाले) अलोमश (जिसके बिलकुल बाल न हों) अतिमृदु तथा अतिकठिन शरीर अप्रशस्त माने गये हैं। बालकों के रुषित (कुपित होना) रोना, सोना, जागरण, क्रोध, हर्ष, विसर्ग (मल मूत्र आदि का त्याग), आदान (अन्न जल आदि का ग्रहण), पंक्ति (पाचन), स्थिरता तथा गम्भीरता आदि लक्षण युक्तियुक्त एवं गुणवाले प्रशस्त माने गये हैं। (इससे पूर्व खण्डित अंश में संभवतः हस्तरेखाओं आदि का वर्णन किया गया है। पाठकों के ज्ञान के लिये अध्याय के अन्त में हम हस्तरेखाओं आदि के विषय को संक्षेप से देंगे) चरक शा. अ. ८ में आयुष्मान् बालकों के निम्न लक्षण दिये हैं:-तत्रेमान्यायुष्मतां कुमाराणां लक्षणानि भवन्ति, तद्यथा-एकैकजा मृद्वोऽल्पाः स्निग्धाः सुबद्धमूलाः कृष्णाः केशाः प्रशस्यन्ते, स्थिरा बहला त्वक्, प्रकृत्याकृतिसुसंपन्नमीषत्प्रमाणा-
१. 'निगूढकूर्परा वत्यर्थः' । 'अरत्निर्ना सप्रकोष्ठतलाङ्गुलिकरेऽपि च। कफोणावपि' इति मेदिनी।
२. ताडपत्र पुस्तक में इससे आगे के दो पृष्ठ खण्डित हैं जिसमें हाथ की (सामुद्रिक) रेखाओं, तथा केशपर्यन्त ऊर्ध्वजत्रु के अवयवों का संभवतः विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया होगा। 'स्त्रीणां च' इत्यादि अगले वाक्य में केशों का ही वर्णन है।