काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपकल्पनीयाध्यायः २४] सूत्रस्थानम् ४५
पुराणरक्तशालीनां भृष्टानां वा कृशात्मनः ।
निस्तुषाणां च मुद्गानां मण्डः स्यादु(द्यु)क्तवेषणः (सनः) ।
ईषत्फलाम्लः कर्तव्यो मुद्गमण्डोऽह्नि पञ्चमे । ईषत्स्नेहः कृतः षष्ठे सप्तमे च विधीयते ।।
जाङ्गलानां रसं सिद्धं तनुकं मांसवर्जितम् । दिनेऽष्टमेऽथ नवमे दद्यात् स्नेहाल्पसंस्कृतम् ।।
दशमैकादशे चाह्नि लवणस्नेहसंस्कृतः । फलाम्लसिद्धो युक्तोष्णः शस्यते रसकौदनः ।।
उष्णोदकानुपानौ तु स्यातां वातकफात्मकौ । तत उत्तरकालं तु भोज्यसंसर्ग इष्यते ।।
एषां(ष) मण्डादिसंसर्गो सर्वव्याधिक्रियोपगः । एवं व्यभिचरन्मोहाद्दारुणांल्लभते गदान् ।।
भोजन का संसर्जन क्रम—सुखपूर्वक जिसने रात्रि में शयन किया है तथा पहले दिन का जिसका भोजन जीर्ण हो चुका है उस व्यक्ति को दूसरे दिन केवल यवागू का भोजन करावे । तीसरे दिन इसे दीपनीय जलों से सिद्ध की हुई रूक्ष, उष्ण तथा सैन्धवयुक्त विलेपी (विलेपी विरलद्रवा) देनी चाहिये । चौथे दिन कृश शरीर वाले व्यक्ति को मूंग का मण्ड तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किये हुए ओदन देवे । मण्ड पुराने लाल चावल तथा भुने हुए, एवं छिलके रहित मूंगों का बनाया जाता है जिसमें उचित मात्रा में बेसन आदि डाला हुआ हो । पांचवें दिन इसी मुद्गमण्ड में थोड़ा सा फलाम्ल डालकर खट्टा करके देना चाहिये । छठें तथा सातवें दिन उस मुद्गमण्ड में थोड़ा स्नेह डाल देना चाहिये । आठवें दिन जांगल पशुओं का मांस रहित केवल पतला रस (मांस रस) सिद्ध करके देना चाहिये । नौवें दिन उसमें थोड़ा सा स्नेह भी डाला जा सकता है । दसवें तथा ग्यारहवें दिन लवण तथा स्नेह (घृत) से संस्कृत तथा थोड़ी खटाई डालकर बनाया हुआ थोड़ा २ उष्ण मांसरहित रस तथा ओदन देना चाहिये । वात तथा कफ रोग वालों को साथ में उष्णोदक अनुपान के रूप में देना चाहिये । इसके बाद सामान्य भोजन दिया जाना चाहिये । यह उपर्युक्त मण्ड आदि का क्रम सब व्याधियों में किया जाना चाहिये । जो इस मण्ड आदि के संसर्जन क्रम का भ्रम से उल्लंघन करता है उसको भयंकर रोग (उपद्रव) हो जाते हैं ।
वक्तव्य—यवागू—चावल, मूंग, तिल आदि के द्वारा बनाई हुई खिचड़ी को यवागू कहते हैं । कहा है—यवागू षड्गुणे तोये सिद्धा स्यात् कृसरा घना । तण्डुलैर्मुद्गमाषैश्च तिलैर्वा साधिता हि सा ।। यवागूर्ग्राहिणी बल्या तर्पणी वातनाशिनी ।। यवागू पुनः मण्ड, पेया एवं विलेपी भेद से तीन प्रकार की होती है । पके तण्डुल आदि के घन भाग में से ऊपर के केवल द्रव भाग को मण्ड कहते हैं । १४ गुने जल में चावल डालकर खूब पकालें । बिना छाने भक्तावयव सहित उस द्रवभाग को पेया कहते हैं । तथा १४ गुने जल में चावलों को खूब पकाया जाय, जब उसमें द्रव कम होकर गाढ़ा हो जाय उस गाढ़े पदार्थ को विलेपी कहते हैं । कहा भी है—सिक्थकैः रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता । विलेपी बहुसिक्था स्यात् यवागू विरलद्रवा ।। बेसन—दालयश्चणकाणान्तु निस्तुषाः यन्त्रपेषिताः । तच्चूर्णं बेसनं प्रोक्तं ............... ।। चरक सू. अ. १५ में यह संसर्जन क्रम अत्यन्त विस्तार से दिया है—अथैनं सायाह्ने परे वाऽह्नि सुखोदकपरिषिक्तं पुराणानां लोहितशालितण्डुलानां स्ववक्लिन्नानां मण्डपूर्वां सुखोष्णां यवागूं पाययेदग्निबलमभिसमीक्ष्य च, एवं द्वितीये तृतीये चान्नकाले; चतुर्थे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालितण्डुलानामूतिस्रस्त्रां विलेपीमुष्णोदकद्वितीयामस्नेहलवणामल्पस्नेहलवणां वा भोजयेत् । एवं पञ्चमे षष्ठे चान्नकाले; सप्तमे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालीनां द्विपसृतं सुस्विन्नमोदनमुष्णोदकानुपानं तनुना तनुस्नेहलवणोपपन्नेन मुद्गयूषेण भोजयेत्; एवमष्टमे नवमे चान्नकाले; दशमे त्वन्नकाले लावकपिञ्जलादीनामन्यत-मस्यमांसरसेनौदकलावणिकेनापि सारवता भोजयेदुष्णोदकानुपानम्; एवमेकादशे द्वादशे चान्नकाले; अत ऊर्ध्वमनुगुणान् क्रमेणोपभुञ्जानः सप्तरात्रेण प्रकृतिभोजनमागच्छेत् । इस प्रकार १२ भोजनकाल का संसर्जन क्रम बताया है । जिसके बाद क्रमशः भोजन बढ़ाते हुए सात दिन के बाद स्वाभाविक भोजन पर आजावे ।