भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 402
४४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्उपकल्पनीयाध्यायः २४]

मधुमधुकसैन्धवफाणितोपहितां मदनफलकषायमात्रां पाययेत्। अर्थात् स्नेहन और स्वेदन कराने के बाद संशोध्य पुरुष को शुभ दिन एवं मुहूर्त में पूर्व रात्रि का भोजन पच जाने पर प्रातः काल मधु, मुलहठी तथा सैन्धव से युक्त मदन फल का कषाय पिलावे। इसमें मधु एवं सैन्धव कफ को पतला करने के लिये मिलाया जाता है। यदि पूर्व रात्रि का भोजन जीर्ण न हुआ हो तो उसे संशोधन न करावें क्योंकि उस अवस्था में संशोधन ओषधि पिलाने से विपरीत प्रभाव होगा। ओषधि पान के बाद थोड़ी देर तक प्रतीक्षा करें। यदि वमन न हो तो अप्रवृत्त दोषों को प्रवृत्त करने के लिये गले में अङ्गुली डालकर वमन कर दे। वमन का अतियोग, हीनयोग अथवा मिथ्यायोग नहीं होना चाहिये।

इसी प्रकार रोगी को यथाविधि विरेचन भी करवा देना चाहिये। संशोधन का विषय चरक सू. अ. १५ में विस्तार से दिया गया है। जिज्ञासु पाठकों को उसे वहीं पर देखना चाहिये।

इस खण्डित अध्याय का प्रारम्भ संशोधित रोगी के पथ्य से है अर्थात् संशोधन के बाद रोगी को क्या पथ्य (भोजन) देना चाहिये तथा किस क्रम से पथ्य की मात्रा धीरे २ बढ़ाकर साधारण भोजन दिया जाना चाहिये इत्यादि विषय का इस अध्याय में वर्णन किया गया है। इस अध्याय के प्रारम्भ में खण्डित अंश में सम्भवतः संशोधन का प्रकरण चल रहा होगा जैसा कि पहले भी कहा गया है। अन्त में वमन एवं विरेचन के अतियोग आदि से जो उपद्रव हो जाते हैं उनकी चिकित्सा का वर्णन किया गया है। वही भाव खण्डित अध्याय के प्रारम्भिक निम्न श्लोकांश से प्रकट होता है (इस प्रकार वमन एवं विरेचन से होने वाले उपद्रवों की) चिकित्सा का वर्णन किया गया है।

अतः पञ्चजनात् कञ्चित्सम्यक्शुद्धं प्रकाङ्क्षितम्। लघुं विशदसर्वाङ्गं प्रसन्नेन्द्रियमिच्छुकम् ।।
सुखाम्बुसिक्तसर्वाङ्गमनुलिप्तं विभूषितम्। कृतपूजानमस्कारं मनोज्ञासनवेश्मगम् ।।
पुराणरक्तशालीनां मण्डपूर्वां सुसाधिताम्। यवागूं त्रिःस्रुतामुष्णां दीपनीयोपसंस्कृताम् ।।
भोजयेद्युक्तलवणां रूक्षां युक्ताशितो भवेत्। भोजनेषु सुहृद्येषु सुधौतेष्वपराह्रिके ।।

अब अच्छी प्रकार शुद्ध होने के बाद, जिसे भोजन में रुचि हो, संशोधन से जिसका शरीर हलका हो गया हो तथा सम्पूर्ण अङ्ग निर्मल हो गये हों, जिसकी सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रसन्न हों, सुखोष्ण जल से जिसने सर्वाङ्ग स्नान किया हो, शरीर पर चन्दन आदि का लेप करके जिसने अपने शरीर को आभूषण आदि से अलंकृत किया हुआ हो, देवता, ब्राह्मण तथा वृद्ध पुरुषों की जिसने पूजा तथा नमस्कार किया हो, जो सुन्दर आसन तथा घर में बैठा हुआ है—ऐसे पञ्चजन (मनुष्य) को पुराने लाल शालि चावलों द्वारा साधित (बनाई हुई), तीन बार स्रुत की हुई, दीपनीय द्रव्यों से संस्कृत, लवणयुक्त, रूक्ष एवं मण्डप्रधान (सिक्थकैः रहितो मण्डः) यवागू मन को अच्छे लगने वाले तथा अच्छी प्रकार धोये हुए पात्रों में अपराह्न काल में पिलावे।

शिरोललाटहृद्ग्रीवावृषणे साक्षशङ्खके। स्वेदश्चेत् पीतमण्डस्य सम्यक्शुद्धं तमादिशेत् ।।
उद्गारवातकर्मभ्यां विशुद्धाभ्यां दिने दिने। निरुपद्रवपुष्टिभ्यां सम्यक्शुद्धं विनिर्दिशेत् ।।

**सम्यक् संशोधित पुरुष के लक्षण—**मण्ड पीने के बाद जिस व्यक्ति को सिर, मस्तिष्क, हृदय, ग्रीवा, अण्डकोश, अक्ष एवं शङ्खप्रदेश (Temporal region) में पसीना आजाय तथा प्रतिदिन डकार एवं अन्य वातकर्मों से शुद्ध हो जाय (अर्थात् अपानवायु, मल आदि में वायु का अनुलोमन हो), कोई उपद्रव न हो तथा शरीर का पोषण ठीक प्रकार से हो—उस व्यक्ति का अच्छी प्रकार संशोधन हुआ समझना चाहिये।

सुखोषितं जीर्णभक्तं द्वितीयेऽहनि भोजयेत्। यवागूं तु तृतीयेऽह्नि दद्यादस्मै विलेपिकाम् ।।
दीपनोदकसंसिद्धां रूक्षामुष्णां ससैन्धवाम्। चतुर्थे मुद्गमण्डः स्यादोदनश्च सुसाधितः ।।