भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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स्वेदाध्यायः २३] सूत्रस्थानम् ३७

कर्पूरचूर्णमास्येन धारयेत् स्विद्यतः सुखम्।
फलाम्लयुक्तं खण्डं वा मृद्वीकां वा सशर्कराम्।।१२।।

सुखपूर्वक स्वेदन करने के लिये मुख में कर्पूरचूर्ण को धारण करे अथवा खाण्डयुक्त अम्लवेतस या अम्लरस वाले फलों या शर्करा से युक्त मृद्वीका (मुनक्का) धारण करे। अर्थात् स्वेदन करते समय मुँह में कर्पूर, खाण्ड से युक्त अम्लफल अथवा मुनक्का धारण करने से सुखपूर्वक स्वेदन हो जाता है।

शीतगौरवविष्टम्भशूलादीनां निवर्तने। तद्विपर्ययभावे च स्वेदं प्राज्ञो निवर्तयेत् ।।१३।।

स्वेद देना कब बन्द करना चाहिये—शीत, गौरव (शरीर का भारीपन) विष्टम्भ तथा शूल (वेदना) आदियों के शान्त हो जाने पर तथा इनसे विपरीत भाव उत्पन्न हो जाने पर बुद्धिमान् व्यक्ति स्वेद को बन्द कर दे। अर्थात् जब शरीर में उष्णता तथा हलकापन आ जाय और विष्टम्भ शूल आदि शान्त हो जायं तब स्वेद बन्द कर देना चाहिये।

विषादमूर्च्छातृड्दाहपित्तकोपारतिभ्रमाः। स्वराङ्गहानिर्वैह्वल्यमतिस्विन्नस्य लक्षणम्।।१४।।

अतिस्विन्न के लक्षण—विषाद, मूर्छा, प्यास, दाह, पित्त-प्रकोप, अरति (ग्लानि) भ्रम, स्वर और अङ्गों की दुर्बलता तथा विह्वलता (व्याकुलता)—ये अतिस्विन्न पुरुष के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १४ में कहा है—पित्तप्रकोपो मूर्छा च शरीरसदनं तृषा। दाहस्वेदाङ्गदौर्बल्यमतिस्विन्नस्य लक्षणम्।। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—स्विन्नेऽत्यर्थं सन्धिपीडाविदाहः स्फोटोत्पत्तिः पित्तरक्तप्रकोपः। मूर्छा भ्रान्तिर्दाहतृष्णो क्लमश्च ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गहृदय में भी कहा है—पित्तास्रकोपतृन्मूर्छास्वराङ्गसदनभ्रमाः। सन्धिपीडाज्वरश्यावरक्तमण्डलदर्शनम् ।। स्वेदातियोगाच्छर्दिंश्च ..... ।।

तच्चिकित्सां प्रयुञ्जीत यथा वैसर्पिणां तथा। रागव्रणविसंज्ञाभिः कृच्छ्रसाध्यं तमादिशेत् ।।१५।।

अतिस्विन्न की चिकित्सा—विसर्प रोग के रोगी की तरह इसकी चिकित्सा करे। तथा जब राग, व्रण तथा विसंज्ञा (मूर्छा) हो जाय तब उसे कृच्छ्र साध्य जाने।

वक्तव्य—चरक चि. अ. २१ में विसर्प रोग का निम्न चिकित्सासूत्र दिया है—लङ्घनोल्लेखने शस्ते तिक्तकानां च सेवनम्। कफस्थानगते सा मे रूक्षशीतैः प्रलेपनम् ।। इसी प्रकार अतिस्विन्न व्यक्ति में भी लङ्घन, वमन, तिक्त ओषधियों का सेवन करना चाहिये तथा रूक्ष एवं शीत द्रव्यों का प्रलेप लगाना चाहिये। अष्टाङ्गहृदय में भी यही विधान दिया है। वहाँ शीत प्रलेप की व्याख्या करते हुए अत्यन्त शीतप्रलेपों का निषेध करके अनुष्णशीत प्रलेपों का प्रयोग लिखा है। चरक सू. अ. १४ में अतिस्विन्न की चिकित्सा में लिखा है—उक्तस्तस्या-शितीये यो ग्रैष्मिकः सर्वशोविधिः। सोऽतिस्विन्नस्य कर्तव्यो मधुरः स्निग्धशीतलः ।। अर्थात् अतिस्विन्न व्यक्ति के लिये ग्रीष्मचर्योक्त मधुर स्निग्ध तथा शीतल विधियों का प्रयोग करना चाहिये। परन्तु ग्रीष्मचर्या में दिये हुए मद्यपान को टीकाकारों ने सर्वथा वर्जित बताया है।

वातस्याप्रगुणत्वं च गुरुत्वं स्तब्धगात्रता।
मन्दस्विन्ने न च ग्लानिस्तृष्णादीनां च विभ्रमः।।१६।।
तत्र स्वेदं प्रयुञ्जीत भिषग्भूयो विचारयन्। बलकालवयोदोषान् पथ्यचेष्टाशनस्थितीः।।१७।।

मन्दस्विन्न के लक्षण—स्वेदन मात्रा से थोड़ा होने पर वायु अनुलोम नहीं होती, शरीर भारी तथा स्तब्ध (जकड़ा हुआ) होता है तथा ग्लानि और तृष्णा शान्त नहीं होती। इस अवस्था में अर्थात् सम्यक् स्वेदन न होने पर चिकित्सक को चाहिये कि रोगी के बल, काल (ऋतु), अवस्था, दोष, चेष्टा तथा भोजन (आहार-विहार) के पथ्य का विचार करते हुए पुनः स्वेदन करावे।