काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | स्वेदाध्यायः २३]
पृथक् २ (वातिक एवं श्लैष्मिक) स्वेदन करना चाहिये । वात की प्रधानता में स्निग्ध, कफ की प्रधानता में रूक्ष तथा दोनों का संयोग होने पर साधारण अर्थात् स्निग्ध एवं रूक्ष मिला हुआ स्वेदन देना चाहिये । चरक सू. अ. १४ में कहा है—वातश्लेष्मणि वाते वा कफे वा स्वेद इष्यते । स्निग्धरूक्षस्तथा स्निग्धो रूक्षश्चायुपकल्पितः ।। अर्थात् केवल वात में स्निग्ध, श्लेष्म में रूक्ष तथा वातकफ (द्वन्द्वज) में स्निग्ध और रूक्ष दोनों प्रकार के द्रव्यों से तैयार किया हुआ स्वेदन देना चाहिये ।
बालानां कृशमध्यानां स्वेद आवस्थिको हितः । शीतव्याधिशरीराणां बालानां च विशेषतः ।।८।।
कृश एवं मध्यबल वाले बालकों को आवस्थिक (रोग एवं बल की अवस्था के अनुसार) स्वेद देना चाहिये । बालकों को स्वेद देते हुए विशेषकर शीत (सर्दी), व्याधि एवं शरीर का ध्यान रखना चाहिये अर्थात् सर्दी कम है या अधिक तथा इसी प्रकार व्याधि और शारीरिक बल को भी दृष्टि में रखना चाहिये ।
वक्तव्य—सर्दी अधिक हो तो स्वेद अधिक मात्रा में दिया जा सकता है । इसी प्रकार यदि रोग बलवान है तथा शारीरिक बल भी पर्याप्त है तो स्वेद अधिक दिया जा सकता है । परन्तु यदि रोग मृदु एवं शारीरिक बल भी कम हो तो स्वेद भी थोड़ा ही देना चाहिये ।
वृषणौ हृदयं चक्षुर्मृदु वा स्वेदयेन्न वा । शेपोवङ्क्षणसन्धींस्तु मध्यमं, शेषमिष्टतः ।।९।।
अण्डकोष, हृदय तथा नेत्रों को मृदु ही स्वेद देना चाहिये अथवा बिलकुल ही स्वेद न दें । शेप (जननेन्द्रिय) वङ्क्षण (रानों) तथा सन्धियों में मध्य स्वेद देना चाहिये । तथा शरीर के शेष अवयवों पर यथाप्रयोजन मृदु, मध्य अथवा महास्वेद दे सकते हैं ।
वक्तव्य—यहाँ देशभेद से स्वेद मृदु, मध्य तथा महान् तीन प्रकार का स्वेद बताया है । इनमें से अण्डकोष, हृदय तथा नेत्रों को साधारणतया स्वेद नहीं देना चाहिये अपितु अन्य उपायों का ही अवलम्बन करना चाहिये । परन्तु यदि इनमें स्वेद से ही अच्छे होनेवाले रोग हों तो मृदु स्वेद देना चाहिये । जननेन्द्रिय, रानों तथा सन्धियों में मध्य स्वेद तथा शेष अङ्गों पर आवश्यकता के अनुसार मृदु, मध्य अथवा महास्वेद निर्भयता के साथ दिया जा सकता है । चरक सू. अ. १४ में भी कहा है—'वृषणौ हृदयं दृष्टी स्वेदयेन्मृदु नैव वा । मध्यमं वङ्क्षणं शेषमङ्गावयवमिष्टतः' ।।
कुमुदोत्पलपद्मानां पत्रैराच्छाद्य लोचने । वाससा वाऽथ श्लक्ष्णेन बाले स्वेदं प्रयोजयेत् ।।१०।।
मुक्तावलीचन्द्रकान्तशीताम्बुकरभाजनैः । स्पृशेदभीक्ष्णं हृदयं बालस्य स्वेदकर्मणि ।।११।।
सम्पूर्ण शरीर का स्वेदन करते समय चक्षु तथा हृदय की रक्षा का उपाय—कुमुद, उत्पल (नीलकमल) तथा कमल के पत्तों अथवा नरम कपड़े से बालक के नेत्रों को अच्छी प्रकार ढककर स्वेद देना चाहिये । तथा स्वेद देते हुए मोतियों की मालाओं, चन्द्रकान्त मणि तथा शीतल जल से भरे हुए पात्रों से बालक के हृदय का निरन्तर स्पर्श करते रहना चाहिये । अर्थात् जब बालक को स्वेद देना हो तब कमल आदि के कोमल पत्तों से बालक की आँखें ढक दें तथा हृदयप्रदेश को भी यथासंभव उपायों द्वारा शीतल रखने का प्रयत्न करें जिससे उन प्रदेशों पर स्वेद न पहुँचे । चरक सू. अ. १४ में कहा है—सुशुद्धैर्लक्तकैः पिण्ड्या गोधूमानांमथापि वा । पद्मोत्पलपलाशैर्वा स्वेद्यः संवृत्य चक्षुषी ।। मुक्तावलीभिः शीताभिः शीतलैर्भाजनैरपि । जलाद्रैर्जलजहस्तैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत् ।। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतैराच्छाद्य चक्षुषी । स्विद्यमानस्य च मुहुर्हृदयं शीतलैः स्पृशेत् ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २६ में भी कहा है—पद्मोत्पलादिभिः सक्तुपिण्ड्या वाच्छाद्य चक्षुषी । शीतैर्मुक्तावली पद्मकुमुदोत्पलभाजनैः ।। मुहुः करैश्च तोयार्द्रैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत् ।।