भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

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पृष्ठ 393

स्वेदाध्यायः २३] सूत्रस्थानम् ३५

स्नेहितदेहस्यादौ स्वेदमन्तरमथ प्रयुञ्जीत । सम्यक्स्निग्धस्विन्नैर्विशोधनमन्तरं कार्यम् ।। ५६ ।।
इति स्नेहाध्यायो द्वाविंशतितमः ।। २२ ।।


जिस व्यक्ति का स्नेहन कर लिया गया है उसे पहले स्वेदन कराना चाहिये । फिर ठीक प्रकार से स्नेहन और स्वेदन हो जाने पर संशोधन (वमन, विरेचन आदि पञ्चकर्म की क्रियायें) कराना चाहिये । चरक में भी कहा है—स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमन्तरम् । स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमथेतरत् ।।
इति स्नेहाध्यायो द्वाविंशतितमः ।। २२ ।।


त्रयोविंशतितमोऽध्यायः

अथातः स्वेदाध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम स्वेदाध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।

सम्यक्स्निग्धस्य भगवन् कथं स्वेदं प्रयोजयेत् ।
अनत्ययं भिषग्वाले द्रव्यं स्वेदोपगं च किम् ।। ३ ।।
मन्दातिसम्यक्स्विन्नानां बालानां लक्षणं च किम् ।
कः स्वेद्यो न च कः स्वेद्य इत्युक्तः प्राह कश्यपः ।। ४ ।।
शृणु स्वेदविधिं कृत्स्नं वृद्धजीवक ! तत्त्वतः ।
यथा बाले प्रयोक्तव्यः प्रयुक्तश्च यथा हितः ।। ५ ।।

वृद्धजीवक ने पूछा भगवन् ! सम्यक् स्निग्ध व्यक्ति को किस प्रकार स्वेदन करना चाहिये ? बालक में कौन से स्वेदोपग (स्वेदन में सहायता देनेवाले) द्रव्य स्वास्थ्य को देने वाले हैं ? मन्दस्विन्न, अस्विन्न, अतिस्विन्न, तथा सम्यक् स्विन्न बालकों के क्या २ लक्षण हैं ? स्वेदन के योग्य तथा अयोग्य कौन हैं अर्थात् किनका स्वेदन करना चाहिये तथा किनका नहीं ? इस प्रश्न किये जाने पर महर्षि कश्यप ने उत्तर दिया—हे वृद्धजीवक ! तू स्वेदन की सम्पूर्ण विधि को अच्छी प्रकार सुन । किस प्रकार बालक में उसका प्रयोग करना चाहिये जिससे प्रयुक्त किया हुआ वह स्वेदन हितकारी हो सके ।

स्तैमित्यशूलकाठिन्यविबन्धानाहवाग्ग्रहैः । हल्लासारुच्यलसकशीतासहनवेपनैः ।। ६ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३८ तमं पत्रम् ।)

वातश्लेष्मोद्भवं दृष्ट्वा पृथग्वा स्वेद इष्यते ।
वाते स्निग्धः कफे रूक्षो द्वयोः साधारणो मतः ।। ७ ।।

स्तैमित्य, (जड़ता), शूल, कठोरता, मलबन्ध, आनाह, वाणी का निग्रह (बोल न सकना-गूंगापन), हल्लास (जी मचलाना), अरुचि, अलसक, शीत को न सहन कर सकना तथा कम्पन–इत्यादि लक्षणों को देखकर वातश्लेष्म अथवा

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