भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३४ कश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]

सोत्क्लेश आनाहो ज्वरः स्तम्भो विसञ्ज्ञता । कुष्ठानि कण्डूः पाण्डुत्वं शोफार्शांस्यरुचिस्तृषा ।। जठरं ग्रहणीदोषः स्तैमित्यं वाक्यनिग्रहः । शूलमामप्रदोषश्च जायन्ते स्नेहविभ्रमात् ।।

स्नेहापचारजास्ते रोगाः, स्वेदोपपादिता ये (ते) षु ।
वमनविरेचनयोगा रूक्षाशनतक्रमूत्राद्याः ।।५०।।

स्नेह के विधिपूर्वक सेवन न करने से उत्पन्न होनेवाले रोगों में स्वेदन, वमन, विरेचन के योग (औषध) रूक्ष अन्न का भोजन तथा तक्र और मूत्र का सेवन करना चाहिये । चरक में कहा है—तत्राप्युल्लेखनं शस्तं स्वेदः कालप्रतीक्षणम् । प्रति प्रति व्याधिबलं बुद्ध्वा संस्रसनमेव च ।। तक्रारिष्टप्रयोगश्च रूक्षपानान्नसेवनम् । मूत्राणां त्रिफलायाश्च स्नेहव्यापत्तिभेषजम् ।।

मात्राकालवियुक्तः स्नेहः सात्म्योपचारगुणहीनः ।
युक्तो व्यापदमृच्छति तस्मिन् संशोधनं पथ्यम् ।।५१।।

उपद्रवों के कारण मात्रा तथा काल से रहित (अर्थात् जिस मात्रा में स्नेह का प्रयोग करना चाहिये उससे भिन्न मात्रा तथा जिन २ कालों में भिन्न २ स्नेहों के सेवन का पूर्वविधान बतलाया है उनसे अतिरिक्त कालों में) तथा सात्म्य उपचार (पथ्यापथ्य) से रहित स्नेह (अर्थात् स्नेह के बाद पथ्यापथ्य का पालन न करने से) उपद्रवों को उत्पन्न कर देता है । इन उपद्रवों में संशोधन अर्थात् वमन विरेचन कराना चाहिये । इसी भाव को चरक में निम्नरूप में प्रकट किया गया है—अकाले चाहितश्चैव मात्रया न च योजितः । स्नेहो मिथ्योपचाराच्च व्यापद्येतातिसेवितः ।।

स्नेहद्वेषी क्षामो मृदुकोष्ठः स्नेहमद्यनित्यश्च । अध्वप्रजागरस्त्रीश्रान्ता नाच्छं पिबेयुस्ते ।।५२।।
तेषामन्नैर्विविधैः स्नेहस्य विचारणा सात्म्यम् । निर्दिश्यवा मासाद्यैः कालाग्निवयःप्रकर्षाच्च ।।५३।।
गुरुपानभोज्यमांसैर्गुडदधितिलशाकदुग्धनिर्यूहैः । न स्नेहयेत् प्रमेहे न कुष्ठकफशोषरोगार्तान् ।।५४।।

अच्छ (केवल) स्नेह का किन्हें सेवन नहीं करना चाहिये—जो स्नेह को न चाहते हों, जो कमजोर तथा मृदुकोष्ठ हों, जो नित्य स्नेह एवं मद्य का सेवन करते हों, मार्ग के चलने, जागरण तथा स्त्रीगमन के कारण जो थक गये हों उन्हें अच्छ स्नेह का पान नहीं करना चाहिये । उनको मास (ऋतु) आदि का निर्देश करके काल, जाठराग्नि तथा अवस्था के अनुसार गुरु पान, गुरु भोजन, गुरु मांस तथा गुड, दधि, तिल, शाक, दुग्ध तथा निर्यूह आदि विविध अन्नपानों में से जो सात्म्य हों—उसके साथ स्नेह की विचारणा बनाकर देनी चाहिये । परन्तु इनके द्वारा प्रमेह, कुष्ठ, कफ तथा शोषरोग से पीडित व्यक्तियों का स्नेहन नहीं करना चाहिये । चरक में कहा है—स्नेहद्विषः स्नेहनित्या मृदुकोष्ठाश्च ये नराः । क्लेशासहा मद्यनित्यास्तेषामिष्टा विचारणा ।। अर्थात् इन्हें केवल (अच्छ) स्नेह न देकर उपर्युक्त विचारणाओं के रूप में प्रयोग करना चाहिये । इसी भाव को सुश्रुत चि. अ. ३१ में निम्न रूप में दिया है—सुकुमारं कृशं वृद्धं शिशुं स्नेहद्विषं तथा । तृष्णार्तमुष्णकाले च सहभक्तेन दापयेत् ।। यहाँ भक्त अर्थात् भात (ओदन) शब्द केवल उपलक्षण मात्र है । इससे अन्य विचारणाओं का भी ग्रहण करना चाहिये ।

तद्दोषघ्नैर्द्रव्यैः स्नेहैः सिद्धैर्यास्वमविकारैः । स्नेहास्तथाविधाः स्युस्त्रिफलासव्योषलवणाद्यैः ।।५५।।

उपर्युक्त प्रमेह आदि के रोगियों का रोगानुसार तत्तद्दोषहरत्रिफला, त्रिकटु तथा लवण आदि द्रव्यों से सिद्ध किये हुए अविकारी अर्थात् विकार न करनेवाले—स्नेहों से स्नेहन करे । चरक में कहा है—स्नेहैर्यथास्वं तान् सिद्धैः स्नेहयेदविकारिभि । पिप्पलीभिर्हरीतक्या सिद्धैस्त्रिफलयाऽपि वा । इसी प्रकार अष्टाङ्ग संग्रह में भी कहा है—गुडानूपामिषक्षीरतिलमाषसुरा दधि । कुष्ठ शोफप्रमेहेषु स्नेहार्थं न प्रकल्पयेत् ।। त्रिफला पिप्पली पथ्या गुग्गुल्वादिभिविपञ्चितान् । स्नेहान्यथास्वमेतेषां योजयेदविकारिणः ।।