काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् दन्तजन्मिकाध्यायः २०]
पिता का अनुकरण (Hereditary) तथा अपने प्राक्तन कर्मों की अपेक्षा होती है ऐसा प्राचीन महर्षि कहते हैं, तथा अन्य भी शरीर की वृद्धि ह्रास, गुण, दोष उत्पन्न होते हैं।
वक्तव्य—Dr. Donald Paterson अपनी पुस्तक “Sick children” के १४ पृष्ठ पर इस विषय में लिखते हैं कि—“Many abnormalities in the appearance of teeth and the type teeth cut will appear to be hereditary and there can be no doubt that good teeth run in families” अर्थात् दांतों के बहुत से विकार तथा उनके निकलने के बहुत से विकृत तरीके आनुवंशिक प्रतीत होते हैं। सुन्दर दांत निःसन्देह एक पारिवारिक देन है। अर्थात् यदि माता पिता के दांत अच्छे होते हैं तो प्रायः सन्तति के दांत भी अच्छे होते हैं।
नृणां तु चतुर्थादिषु मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते। तत्र सदन्तजन्म च, पूर्वमुत्तरदन्तजन्म च, विरलदन्तजन्म च, हीनदन्तता च, अधिकदन्तता च, करालदन्तता च, विवर्णदन्तता च, स्फुटितदन्तता चामङ्गल्या भवति। तत्र शान्त्यर्थं मारुतीमिष्टिं निर्वपेत्, स्थालीपाकमनाहिताग्नेः प्राजापत्यमित्येके, तथाऽन्येष्वपि स्वाङ्गोनाधिकभावेषु, तथा तद्घोरं प्रशाम्यति ॥६॥
पुरुषों के चौथे मास में दांत निषिक्त हो जाते हैं। सदन्तजन्य (दांतों से सहित जन्य), पहले ऊपर के दांतों का निकलना (साधारणतया सबसे पहले निचले तथा मध्य के त्रोटक Incisers निकलने चाहिये), दांतों का विरल (दूर २—Scattered) होना, दांतों का कम होना, दांतों की संख्या अधिक होना, दांतों का कराल¹—भयंकर (लम्बे) होना, दांतों का मैला होना, तथा दांतों का स्फुटित होना (खिरना) अदि ये सब अशुभ माने गये हैं। इनकी शान्ति के लिये मारुती इष्टि (यज्ञ) करे। कुछ लोग कहते हैं कि अनाहिताग्नि पुरुषों की स्थालीपाक (पुरोडाश) प्रजापत्य इष्टि से करे। इसी प्रकार अन्य अङ्गों के कम या अधिक होने पर ऐसा ही करे जिससे वह अनिष्ट शान्त हो जाता है।
चतुर्विधं तु दन्तजन्माचक्षते सामुद्रं, संवृतं, विवृतं, दन्तसंपदिति। तत्र सामुद्रं क्षयि, नित्यसंपातात्, संवृतमधन्यं मलिष्ठं, विवृतं वीतम नित्यलालोपहतमसंछन्नदन्तत्वादाशुदन्तवैवर्ण्यकरमासन्नाबाधमिति ॥७॥
चार प्रकार की दांतों की उत्पत्ति मानी गई है—(१) सामुद्र (२) संवृत (३) विवृत (४) दन्तसंपत्। इनमें 'सामुद्र' बच्चों के दांतों के क्षय की अवस्था में होते हैं क्योंकि उनके दांत सदा गिरते रहते हैं। संवृत-अधन्य (अप्रशस्त) है, इसमें दांत मैले होते हैं। विवृत-जिसमें नित्य लालास्राव (Saliva) होता रहता है तथा होठों द्वारा दांतों के पूरे ढके न जाने के कारण दांत मैले हो जाते हों तथा उनमें सदा रोग होते रहते हों ॥७॥
चतुर्थे तु मासि दन्ता निषिक्ता दुर्बला भवन्त्याशुक्षयिणश्चामयबहुलाश्च, पञ्चमे स्यन्दनाश्च प्रहर्षिणश्चामयबसुलाश्च षष्ठे प्रतीपाश्च मलग्राहिणश्च विवर्णाश्च घुणदन्ताश्च भवन्ति, सप्तमे द्विपुटाः स्फोटिनश्च राजिमन्तश्च खण्डाश्च रूक्षाश्च विषमाश्रोन्नतश्च भवन्ति, तथाऽष्टमे मासि सर्वगुणसंपन्ना भवन्ति। पूर्णता समता घनता शुक्लता स्निग्धता श्लक्ष्णता निर्मलता निरामयता किञ्चिदुत्तरोन्नतता, दन्तबन्धनानां च समता रक्तता स्निग्धता बृहद्वनस्थिरमूलता चेति दन्तसंपदुच्यते। हीनोल्बणसितासिताऽप्रविभक्तदन्तबन्धनत्वमप्रशस्तमृषयो वदन्ति। तत् स्वभावादन्तोदूखलकेषु यच्छोणितं गर्भे निषिक्तं तदेव जातस्य समतोऽभिवर्धमानस्य क्रमेण .....................................। (इति ताडपत्रपुस्तके ३४ तमं पत्रम्।)
१. शनैः प्रकुरुते यत्र दन्ताश्रितोऽनिलः । करालान्विकटान्दन्तान्स करालो न सिध्यति । (भा.प्र. मध्यमखण्ड चि. ७२)
२. शीतरूक्षप्रवाताम्लस्पर्शनासाहाः द्विजाः । तत्र स्युर्वातपित्ताभ्यां दन्तहर्ष; स कीर्तितः ॥ (भा.प्र. मध्यमखण्ड चि. ६८)