भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 375

दन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् १७

capsule and the gum, till by their removal the tooth makes its appearance. This upward progress, in its later stages, is what we mean when we talk of ''teething''

दूध के दांत निम्न क्रम से निकलते हैं—

१. निचले मध्य के त्रोटक (Lower central Incisers) ५ से दस मास २. ऊपर के चारों त्रोटक (upper central & lateral Incisers) ८ से १२ मास ३. निचले पार्श्व के त्रोटक (Incisers) तथा निचले और ऊपर के प्रथम चर्वण (Ist molars) १२ से १४ मास ४. निचले तथा ऊपर के शीवन या कीलक (Canine या Eye teeth) १६ से २२ मास ५. निचले तथा ऊपर के दूसरे चर्वण (2nd molars) २४ से ३० मास

इस प्रकार इन २० दांतों के निकलने के साथ २-१/२ वर्ष की अवस्था तक प्रथम दन्तोद्भेद (Primary Dentition) पूर्ण हो जाता है। इसके बाद दांतों का दूसरा समुदाय (स्थायी दांत या Secondary Dentition) प्रारंभ होता है। प्रथम समुदाय के दांतों के समान दूसरे समुदाय के दांत भी जन्म से पूर्व ही मसूड़ों में बीजरूप से स्थित होते हैं परन्तु ये प्रथम की अपेक्षा भी अधिक गहरे होते हैं। Birch की पूर्वोक्त पुस्तक में ही आगे लिखा है—Strange as it may appear, the germs of the second set also existed in the jaw before birth, more deeply seated than those of the milk teeth.

स्थायी दांत निम्न क्रम से निकलते हैं—

१. प्रथम पश्चात्-चर्वण या त्रिमूली (1 st. molars)—५ से ७ वर्ष २. मध्य के त्रोटक (Central Incisers)—६-१/२ से ८ वर्ष ३. पार्श्व के त्रोटक (Lateral Incisers)—७ से ९ वर्ष ४. प्रथम चर्वण या द्विमूली (1 st. Bicuspids)—९ से ११ वर्ष ५. द्वितीय चर्वण या द्विमूली (2 nd. Bicuspids)—१० से १२ वर्ष ६. शीवन या कीलक (Canines or Eye teeth)—११ से १४ वर्ष ७. द्वितीय पश्चात् चर्वण या त्रिमूली (2 nd. molars)—११ से १४ वर्ष ८. तृतीय पश्चात् या चर्वण या त्रिमूली या ज्ञानदन्त (3 rd. molars or wisdom teeth)—१६ से २१ वर्ष या उससे भी बाद में।

इस प्रकार ज्ञानदन्त (Wisdom teeth) के निकालने के साथ-साथ दांतों की ३२ संख्या पूरी हो जाती है तथा दन्तोद्भेद का कार्य भी पूर्ण हो जाता है।

तत्र कुमारीणामाशूतरमल्पाबाधकरं च दन्तजन्म, सुषिरत्वादंशानां मृदुस्वभावाच्च; प्रकृष्टकालमाबाधाबहुलं तु कुमाराणामाचक्षते, घनत्वादंशानां स्थिरस्वभावाच्च। दन्तानां निषेकमूर्त्तित्वोद्भेदवृद्धिपतनपुनर्भावनिवृत्ति-स्थितिपरिक्षयचलनपतनदृढ़दुर्बलता जातिविशेषात्निषेकात् स्वभावान्मातापित्रोरनुकरणात् स्वकर्मविशेषाच्चेत्याचक्षते महर्षयः; तथाऽन्येऽपि शरीरवृद्धिह्रासगुणदोषप्रादुर्भावाः ॥५॥

लड़कियों के दांत जल्दी निकलते हैं तथा कष्ट भी कम होता है क्योंकि उनके दांत सुषिर (सच्छिद्र) एवं मृदु होते हैं। लड़कों के दांत देर में निकलते हैं तथा कष्ट भी अधिक होता है क्योंकि उनके दांत घन (ठोस) तथा स्थिर (दृढ़) होते हैं। दांतों का निषेक, मूर्तरूप होना, प्रकट होना, वृद्धि, पतन (गिरना) गिरकर पुनः न निकलना, स्थिर रहना (जमे रहना), क्षीण होना हिलना, गिरना, दृढ़ता, एवं दुर्बलता इन सब बातों में जाति की विशेषता, निषेक, स्वभाव, माता-

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 375, कुल 942 में से · BharatKosha