काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | दन्तजन्मिकाध्यायः २०] |
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है, कौनसी दन्तोत्पत्ति प्रशस्त तथा कौनसी अप्रशस्त मानी गई है, तथा क्यों दांत अपने निश्चित परिमाण से अधिक बढ़कर प्राणों के लिये भय (संकट) उत्पन्न कर देता है, दांतों की संख्या कितनी होती है, इनमें से द्विज (दो बार होने वाले) कितने हैं, ये कितने समय में गिरते हैं तथा गिरकर पुनः निकल आते हैं, कौन से दन्तसंपत् तथा कौन से असंपत् होते हैं।
अथोवाच भगवान् कश्यपः–इह खलु नृणां द्वात्रिंशद्दन्ताः, तत्राष्टौ सकृज्जाताः स्वरूढदन्ता भवन्ति, अतः शेषा द्विजाः। यावत्स्वेव च मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते तावत्स्वहःसूद्भिद्यन्ते। यावत्स्वेव च मासेषु जातस्य सत उद्भिद्यन्ते तावत्स्वेवे च वर्षेषु पतिताः पुनरुद्भिद्यन्ते। तत्र मध्ये द्वावुत्तरौ राजदन्तसंज्ञौ भवतः, तौ पवित्रौ, तस्मात्ताभ्यां खण्डे न श्राद्धमर्हति, अपवित्रो हि सः। तयोरुभयतः पार्श्वयोरपि वस्त्रौ(?), तयोरपि दंष्ट्रे, शेषाः स्वरूढा हानव्या इति चोच्यन्ते; तथाऽधस्तात् ।।४।।
भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—मनुष्यों के ३२ दांत होते हैं, इनमें आठ सकृज्जात (केवल एक वार उत्पन्न होने वाले) तथा उसी अपने स्वरूप में ही बढ़ने वाले होते हैं। शेष (२४) द्विज¹ हैं। जितने मास में दांतो का निषेचन होता है उतने ही दिनों में वे फूट आते हैं (अर्थात् यदि चार मास में दांत निषिक्त होते हैं तो चार दिन में वे फूटकर बाहर निकल आते हैं) और बच्चे के उत्पन्न होने के बाद जितने मास में दांत फूटते (निकलते) हैं उतने ही वर्षों में गिरकर वे पुनः निकल आते हैं (अर्थात् यदि छठे मास में दांत निकलते हों तो वे छठे वर्ष में गिरकर पुनः [स्थायी दांत] निकल आते हैं)। ऊपर की पंक्ति में बीच के दो दांतों का नाम राजदन्त (मध्य त्रोटक-Central Incisers) होता है, उनको पवित्र माना गया है, इसलिये उनके खण्डित हो जाने पर मनुष्य श्राद्ध के योग्य नहीं रहता अर्थात् वह किसी का श्राद्ध नहीं कर सकता है, क्योंकि वह अपवित्र हो जाता है। उन दोनों (राजदन्त) के पार्श्व में दोनों ओर वस्त्र (Lateral Incisers) होते हैं, और इनके दोनों ओर दंष्ट्रा (शीवनकीलक, Canine या Eye teeth) होते हैं। (इस प्रकार ये ६ हुए) शेष स्वरूढ (अपने उसी स्वरूप में बढ़ने वाले) हानव्य अर्थात् हनुप्रदेश में होने वाले (चर्वण दन्त—Bicuspids or molars) कहाते हैं (अर्थात् ये १० हुवे) इसी प्रकार नीचे की पंक्ति में भी समझना चाहिये (अर्थात् २० हानव्य और १२ शेष हुवे इस प्रकार कुल ३२ दांत होते हैं)।
वक्तव्य—आधुनिक मतानुसार भी दन्तोद्भेद दो प्रकार का माना गया है। (१) बाल्यावस्था (Infancy) में तथा (२) किशोरावस्था (Childhood) में। दांतो के प्रथम समुदाय (Set) को “दूध के दांत” (Milk teeth या Primary Dentition) कहते हैं तथा दूसरे को “स्थायी दांत” (Secondary Dentition) कहते हैं।
प्रथम समुदाय के दांत (दूध के दांत) बच्चे के उत्पन्न होने के कई मास पूर्व मसूड़ों के अन्दर बीज रूप से (Germs) विद्यमान होते हैं। धीरे २ उनमें अस्थिनिर्माण (Ossification) प्रारंभ होता है तथा दांतों की आकृति बनकर बढ़ते हुवे मसूड़ों को विदीर्ण करके बाहर फूट आते हैं। इसी को हम दन्तोद्भेद या Teething कहते हैं। इस संहिता के उपर्युक्त प्रकरण में इन्हीं तीनों अवस्थाओं के लिये क्रमशः निषिक्त, मूर्तिमान् तथा उद्भेदन शब्द दिये गये हैं। इस विषय में Birch की Management and medical treatment of children in India नामक पुस्तक के ७५ पृष्ठ पर लिखा है—The germs of the first (milk or temporary) set have existed within the jaw for Several months before birth, but they are at no time covered with true bone, As ossification advances, the tooth rises and pressing upwards causes absorption of its
१. द्विज=(द्विजायन्ते-दो बार उगने वाले) अर्थात् दूध के दांत-Milk teeth, क्योंकि दूध के दांत एक बार गिर कर दोबारा उगते हैं।