काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 373, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंदन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् १५
परवृद्धितभोक्त्री च परालालिततर्पणा । परवेश्मरता धात्री मुच्यते स्तनकीलकात् ।।
जो धात्री दूसरे के यहां हितकारक (पथ्य) भोजन करती है, दूसरे के यहां जिसका लालन पालन (पोषण) एवं तर्पण होता है, तथा जो दूसरे के घर में रहती है—वह स्तनकीलक नामक रोग से मुक्त हो जाती है। अर्थात् उपर्युक्त प्रकार की धात्री को स्तनकीलक नामक रोग नहीं होते हैं।
दर्शनीयौ स्तनौ पीनौ सुजातौ संहतौ समौ ।
सुकरौ पर्यकीलौ च दृष्ट्वा त्वीक्ष(त्विच्छ)न्ति दुर्हृदः ।।
ततो रुजामवाप्नोति कार्यं तन्त्रावचारणम् ।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति क्षीरोत्पत्तिर्नामाध्याय ऊनविंशतितमः ॥१९॥
जिस माता या धात्री के स्तन दर्शनीय (सुन्दर) मोटे, सुन्दर आकृति वाले, उत्तम संघात वाले हों तथा दोनों स्तन आकार में समान, सुन्दर और आगे से गोल, घुण्डीदार होते हैं, उन्हें देखकर दुष्ट जन ईर्ष्या करते हैं (अर्थात् उनकी नज़र लग जाती है)। इससे धात्री या माता रुग्ण हो जाती है। इसमें तान्त्रिक प्रक्रियाओं का प्रयोग करना चाहिये।
परिहृत्याममांसं तु निशि नेयं चतुष्पथम् ।।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तथ्यमृषिपत्न्यः प्रहर्षिताः । प्रशंसुर्महात्मानं कश्यपं लोकपूजितम् ।।
उस स्त्री को कच्चा मांस काटकर रात्रि को चौराहे पर ले जाना चाहिये। इस तथ्य वचन को सुनकर ऋषि पत्निय बहुत प्रसन्न हुई तथा लोक पूजित महात्मा कश्यप की प्रशंसा की। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति क्षीरोत्पत्तिर्नामाध्याय ऊनविंशतितमः ॥१९॥
विंशतितमोऽध्यायः
अथातो दन्तजन्मिकमध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम दन्तजन्मिक (दांतो की उत्पत्ति का जिसमें वर्णन हो) अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
अथ खलु भगवन् देहिनां जातानामभिवर्धमानानां कतिषु मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते, निषिक्ताश्च कियता कालेन मूर्तीभवन्ति, मूर्तीभूताश्च कदोद्भिद्यन्ते, कानि चैषां पूर्वरूपाणि, के चोपद्रवाः, कश्चैषामुपक्रमः, किञ्च दन्तजन्म प्रशस्तमप्रशस्तं च किं, कस्माच्च स्वमङ्गमभिवर्धमानं प्राणसंशयाय भवति, कियन्तश्च दन्ताः, कतिचैषां द्विजाः, कियता च कालेन पतन्ति, पतिता वा जायन्ते, दन्तसंपदसंपच्च कीदृशीति ।।३।।
भगवन् ! प्राणियों के उत्पन्न होकर बढ़ते हुये कितने मासों में दांतों का निषेचन होता है (अर्थात् मसूड़ों के अन्दर दांत बैठते हैं), निषेचन के कितने समय बाद वे मूर्तरूप धारण करते हैं, मूर्तरूप होने के बाद कब प्रकट होते (फूटते) हैं, दांतों के निकलने के क्या पूर्वरूप होते हैं, दन्तोद्भेद के समय क्या २ उपद्रव होते हैं, इन उपद्रवों की क्या चिकित्सा
२४ का.सं.