भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]

शिरःशूल, दवथु (आंखों में जलन अथवा श्वथु-छींक), अङ्गग्रहकफोत्क्लेद (कफ के कारण जी मचलाना) ज्वर, तृष्णा, विड्भेद (अतिसार), मूत्र की रुकावट, स्तनों में स्तम्भ (अकड़ान) स्त्राव (Discharge) होते हैं और चारों ओर शिराओं का जाल (Veinulas) दिखाई देता है । तथा शोथ (Inflamation), शूल (Pain), रुजा (स्पर्शाक्षमता Tenderness) तथा दाह (Burning senation) के कारण स्तन का स्पर्श नहीं किया जा सकता । बुद्धिमान चिकित्सक इसे स्तनकीलक (स्तनविद्रधि-Mammary abscess) कहते हैं । इसका यह नाम इस लिये है कि यह कील की तरह कठिन होकर अङ्गों में बाधा पहुँचाता हुआ विद्यमान रहता है ।

एष पित्तात्मना शीघ्रं पाकं भेदं च गच्छति ।
कफाच्चिरं क्लेशयति वातादाशु निवर्तते (विवर्धते) ।।
शाखाशिरोभिस्तु यदि विमार्गान्न प्रपद्यते । आकृष्यमाणं बालेन क्षिप्रं निर्धावति स्तनात् ।।
निर्दुह्यमानमुत्पीडाद्वज्रं सक्षीरशोणितम् । अथवाऽभ्येति सहसा प्रत्यक्षं चोपलभ्यते ।।

यदि पित्त की अधिकता हो तो यह स्तन कीलक (Mammary Abscess) शीघ्र ही पक जाता है तथा पककर फूट जाता है । कफ के कारण यह चिरकाल तक कष्ट देता है तथा वायु के कारण शीघ्र ही बढ़ जाता है । बालक के द्वारा स्तनपान के समय आकृष्ट होता (चूसा जाता) हुआ यदि वह शाखा तथा शिर आदि के द्वारा विपरीत मार्गों में न चला जाय तो स्तन के द्वारा शीघ्र ही बाहर निकल जाता है । अथवा यदि उत्पीडन करके (दबाकर) दोहन किया जाय तो वह 'वज्र' दुग्ध तथा रक्त के साथ सहसा प्रत्यक्ष रूप से बाहर निकल आता है ।

वक्तव्य—आधुनिक विज्ञान के अनुसार स्तनकीलक को Mammary Abscess या Abscess of the Breast कहा जा सकता है जो बढ़कर Cancer का रूप धारण कर सकता है । यह स्तनकीलक या अन्य कोई भी स्तनरोग साधारणतया गर्भवती या प्रजाता स्त्रियों को ही प्रायः होता है । सुश्रुत संहिता के निदान स्थान में स्तन रोगों का वर्णन करते हुए कहा है—धमन्यः संवृतद्वारा कन्यानां स्तनसंश्रिताः । दोषाविसरणात्तासां न भवन्ति स्तनामयाः ।। तासामेव प्रजातानां गर्भिणीनां च ताः पुनः । स्वभावदेव विवृता जायन्ते संभवन्त्यतः ।। सक्षीरौ वाऽप्यदुग्धौ वा प्राप्य दोषः स्तनौ स्त्रियाः । रक्तं मांसं च संदूष्य स्तनरोगाय कल्पते ।। प्रसव या गर्भावस्था से पूर्व स्त्रियों में स्तन-संश्रित दुग्धवह स्रोतस् (Lacteals) संकुचित होते हैं अतः उनमें दोषों का प्रवेश नहीं हो सकता है । गर्भावस्था में या प्रसव के बाद वे स्वयमेव विस्तृत हो जाती है इसलिये उनमें स्तनरोग होने की संभावना प्रायः बनी रहती है ।

घृतपानं प्रथमतः शस्यते स्तनकीलके । स्रोतांसि मार्दवं स्नेहाद्यान्ति वज्रं च च्याव्यते ।।
निर्दोहो मर्दनं युक्त्या पायनं च गलेन च ।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३३ तमं पत्रम् ।)
शीताः सेकाः प्रलेपाश्च विरेकः पथ्यभोजनम् ।।
स्त्रावणं चाविदग्धस्य दोषदेहव्यपेक्षया । स्य पाटनं कुर्यान्मृजां विद्रधिवच्च तत् ।।

स्तनकीलक की चिकित्सा—स्तनकीलक की चिकित्सा में सर्व प्रथम घृतपान कराना चाहिये । इस प्रकार स्नेह से स्रोत मृदु हो जाते हैं तथा 'वज्र' निकल जाता है । इसके लिये युक्ति पूर्वक रोहन (दूध निकाल देना) मर्दन, तथा गले (मुंह) से ओषधि का पान कराना चाहिये । फिर शीतसेक (Cold Compress) प्रलेप, विरेचन तथा पथ्य भोजन देना चाहिये । दोष तथा शरीर (इन दोनों के बल) को दृष्टि में रखते हुए अविदग्ध (अपक्व) विकार का स्त्रावण करना चाहिये और पके हुए का विद्रधि की तरह पाटन (Open or Incision) करना चाहिये ।

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