काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]
शिरःशूल, दवथु (आंखों में जलन अथवा श्वथु-छींक), अङ्गग्रहकफोत्क्लेद (कफ के कारण जी मचलाना) ज्वर, तृष्णा, विड्भेद (अतिसार), मूत्र की रुकावट, स्तनों में स्तम्भ (अकड़ान) स्त्राव (Discharge) होते हैं और चारों ओर शिराओं का जाल (Veinulas) दिखाई देता है । तथा शोथ (Inflamation), शूल (Pain), रुजा (स्पर्शाक्षमता Tenderness) तथा दाह (Burning senation) के कारण स्तन का स्पर्श नहीं किया जा सकता । बुद्धिमान चिकित्सक इसे स्तनकीलक (स्तनविद्रधि-Mammary abscess) कहते हैं । इसका यह नाम इस लिये है कि यह कील की तरह कठिन होकर अङ्गों में बाधा पहुँचाता हुआ विद्यमान रहता है ।
एष पित्तात्मना शीघ्रं पाकं भेदं च गच्छति ।
कफाच्चिरं क्लेशयति वातादाशु निवर्तते (विवर्धते) ।।
शाखाशिरोभिस्तु यदि विमार्गान्न प्रपद्यते । आकृष्यमाणं बालेन क्षिप्रं निर्धावति स्तनात् ।।
निर्दुह्यमानमुत्पीडाद्वज्रं सक्षीरशोणितम् । अथवाऽभ्येति सहसा प्रत्यक्षं चोपलभ्यते ।।
यदि पित्त की अधिकता हो तो यह स्तन कीलक (Mammary Abscess) शीघ्र ही पक जाता है तथा पककर फूट जाता है । कफ के कारण यह चिरकाल तक कष्ट देता है तथा वायु के कारण शीघ्र ही बढ़ जाता है । बालक के द्वारा स्तनपान के समय आकृष्ट होता (चूसा जाता) हुआ यदि वह शाखा तथा शिर आदि के द्वारा विपरीत मार्गों में न चला जाय तो स्तन के द्वारा शीघ्र ही बाहर निकल जाता है । अथवा यदि उत्पीडन करके (दबाकर) दोहन किया जाय तो वह 'वज्र' दुग्ध तथा रक्त के साथ सहसा प्रत्यक्ष रूप से बाहर निकल आता है ।
वक्तव्य—आधुनिक विज्ञान के अनुसार स्तनकीलक को Mammary Abscess या Abscess of the Breast कहा जा सकता है जो बढ़कर Cancer का रूप धारण कर सकता है । यह स्तनकीलक या अन्य कोई भी स्तनरोग साधारणतया गर्भवती या प्रजाता स्त्रियों को ही प्रायः होता है । सुश्रुत संहिता के निदान स्थान में स्तन रोगों का वर्णन करते हुए कहा है—धमन्यः संवृतद्वारा कन्यानां स्तनसंश्रिताः । दोषाविसरणात्तासां न भवन्ति स्तनामयाः ।। तासामेव प्रजातानां गर्भिणीनां च ताः पुनः । स्वभावदेव विवृता जायन्ते संभवन्त्यतः ।। सक्षीरौ वाऽप्यदुग्धौ वा प्राप्य दोषः स्तनौ स्त्रियाः । रक्तं मांसं च संदूष्य स्तनरोगाय कल्पते ।। प्रसव या गर्भावस्था से पूर्व स्त्रियों में स्तन-संश्रित दुग्धवह स्रोतस् (Lacteals) संकुचित होते हैं अतः उनमें दोषों का प्रवेश नहीं हो सकता है । गर्भावस्था में या प्रसव के बाद वे स्वयमेव विस्तृत हो जाती है इसलिये उनमें स्तनरोग होने की संभावना प्रायः बनी रहती है ।
घृतपानं प्रथमतः शस्यते स्तनकीलके । स्रोतांसि मार्दवं स्नेहाद्यान्ति वज्रं च च्याव्यते ।।
निर्दोहो मर्दनं युक्त्या पायनं च गलेन च ।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३३ तमं पत्रम् ।)
शीताः सेकाः प्रलेपाश्च विरेकः पथ्यभोजनम् ।।
स्त्रावणं चाविदग्धस्य दोषदेहव्यपेक्षया । स्य पाटनं कुर्यान्मृजां विद्रधिवच्च तत् ।।
स्तनकीलक की चिकित्सा—स्तनकीलक की चिकित्सा में सर्व प्रथम घृतपान कराना चाहिये । इस प्रकार स्नेह से स्रोत मृदु हो जाते हैं तथा 'वज्र' निकल जाता है । इसके लिये युक्ति पूर्वक रोहन (दूध निकाल देना) मर्दन, तथा गले (मुंह) से ओषधि का पान कराना चाहिये । फिर शीतसेक (Cold Compress) प्रलेप, विरेचन तथा पथ्य भोजन देना चाहिये । दोष तथा शरीर (इन दोनों के बल) को दृष्टि में रखते हुए अविदग्ध (अपक्व) विकार का स्त्रावण करना चाहिये और पके हुए का विद्रधि की तरह पाटन (Open or Incision) करना चाहिये ।
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दन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् १५
परवृद्धितभोक्त्री च परालालिततर्पणा । परवेश्मरता धात्री मुच्यते स्तनकीलकात् ।।
जो धात्री दूसरे के यहां हितकारक (पथ्य) भोजन करती है, दूसरे के यहां जिसका लालन पालन (पोषण) एवं तर्पण होता है, तथा जो दूसरे के घर में रहती है—वह स्तनकीलक नामक रोग से मुक्त हो जाती है। अर्थात् उपर्युक्त प्रकार की धात्री को स्तनकीलक नामक रोग नहीं होते हैं।
दर्शनीयौ स्तनौ पीनौ सुजातौ संहतौ समौ ।
सुकरौ पर्यकीलौ च दृष्ट्वा त्वीक्ष(त्विच्छ)न्ति दुर्हृदः ।।
ततो रुजामवाप्नोति कार्यं तन्त्रावचारणम् ।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति क्षीरोत्पत्तिर्नामाध्याय ऊनविंशतितमः ॥१९॥
जिस माता या धात्री के स्तन दर्शनीय (सुन्दर) मोटे, सुन्दर आकृति वाले, उत्तम संघात वाले हों तथा दोनों स्तन आकार में समान, सुन्दर और आगे से गोल, घुण्डीदार होते हैं, उन्हें देखकर दुष्ट जन ईर्ष्या करते हैं (अर्थात् उनकी नज़र लग जाती है)। इससे धात्री या माता रुग्ण हो जाती है। इसमें तान्त्रिक प्रक्रियाओं का प्रयोग करना चाहिये।
परिहृत्याममांसं तु निशि नेयं चतुष्पथम् ।।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तथ्यमृषिपत्न्यः प्रहर्षिताः । प्रशंसुर्महात्मानं कश्यपं लोकपूजितम् ।।
उस स्त्री को कच्चा मांस काटकर रात्रि को चौराहे पर ले जाना चाहिये। इस तथ्य वचन को सुनकर ऋषि पत्निय बहुत प्रसन्न हुई तथा लोक पूजित महात्मा कश्यप की प्रशंसा की। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति क्षीरोत्पत्तिर्नामाध्याय ऊनविंशतितमः ॥१९॥
विंशतितमोऽध्यायः
अथातो दन्तजन्मिकमध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम दन्तजन्मिक (दांतो की उत्पत्ति का जिसमें वर्णन हो) अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
अथ खलु भगवन् देहिनां जातानामभिवर्धमानानां कतिषु मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते, निषिक्ताश्च कियता कालेन मूर्तीभवन्ति, मूर्तीभूताश्च कदोद्भिद्यन्ते, कानि चैषां पूर्वरूपाणि, के चोपद्रवाः, कश्चैषामुपक्रमः, किञ्च दन्तजन्म प्रशस्तमप्रशस्तं च किं, कस्माच्च स्वमङ्गमभिवर्धमानं प्राणसंशयाय भवति, कियन्तश्च दन्ताः, कतिचैषां द्विजाः, कियता च कालेन पतन्ति, पतिता वा जायन्ते, दन्तसंपदसंपच्च कीदृशीति ।।३।।
भगवन् ! प्राणियों के उत्पन्न होकर बढ़ते हुये कितने मासों में दांतों का निषेचन होता है (अर्थात् मसूड़ों के अन्दर दांत बैठते हैं), निषेचन के कितने समय बाद वे मूर्तरूप धारण करते हैं, मूर्तरूप होने के बाद कब प्रकट होते (फूटते) हैं, दांतों के निकलने के क्या पूर्वरूप होते हैं, दन्तोद्भेद के समय क्या २ उपद्रव होते हैं, इन उपद्रवों की क्या चिकित्सा
२४ का.सं.
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है, कौनसी दन्तोत्पत्ति प्रशस्त तथा कौनसी अप्रशस्त मानी गई है, तथा क्यों दांत अपने निश्चित परिमाण से अधिक बढ़कर प्राणों के लिये भय (संकट) उत्पन्न कर देता है, दांतों की संख्या कितनी होती है, इनमें से द्विज (दो बार होने वाले) कितने हैं, ये कितने समय में गिरते हैं तथा गिरकर पुनः निकल आते हैं, कौन से दन्तसंपत् तथा कौन से असंपत् होते हैं।
अथोवाच भगवान् कश्यपः–इह खलु नृणां द्वात्रिंशद्दन्ताः, तत्राष्टौ सकृज्जाताः स्वरूढदन्ता भवन्ति, अतः शेषा द्विजाः। यावत्स्वेव च मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते तावत्स्वहःसूद्भिद्यन्ते। यावत्स्वेव च मासेषु जातस्य सत उद्भिद्यन्ते तावत्स्वेवे च वर्षेषु पतिताः पुनरुद्भिद्यन्ते। तत्र मध्ये द्वावुत्तरौ राजदन्तसंज्ञौ भवतः, तौ पवित्रौ, तस्मात्ताभ्यां खण्डे न श्राद्धमर्हति, अपवित्रो हि सः। तयोरुभयतः पार्श्वयोरपि वस्त्रौ(?), तयोरपि दंष्ट्रे, शेषाः स्वरूढा हानव्या इति चोच्यन्ते; तथाऽधस्तात् ।।४।।
भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—मनुष्यों के ३२ दांत होते हैं, इनमें आठ सकृज्जात (केवल एक वार उत्पन्न होने वाले) तथा उसी अपने स्वरूप में ही बढ़ने वाले होते हैं। शेष (२४) द्विज¹ हैं। जितने मास में दांतो का निषेचन होता है उतने ही दिनों में वे फूट आते हैं (अर्थात् यदि चार मास में दांत निषिक्त होते हैं तो चार दिन में वे फूटकर बाहर निकल आते हैं) और बच्चे के उत्पन्न होने के बाद जितने मास में दांत फूटते (निकलते) हैं उतने ही वर्षों में गिरकर वे पुनः निकल आते हैं (अर्थात् यदि छठे मास में दांत निकलते हों तो वे छठे वर्ष में गिरकर पुनः [स्थायी दांत] निकल आते हैं)। ऊपर की पंक्ति में बीच के दो दांतों का नाम राजदन्त (मध्य त्रोटक-Central Incisers) होता है, उनको पवित्र माना गया है, इसलिये उनके खण्डित हो जाने पर मनुष्य श्राद्ध के योग्य नहीं रहता अर्थात् वह किसी का श्राद्ध नहीं कर सकता है, क्योंकि वह अपवित्र हो जाता है। उन दोनों (राजदन्त) के पार्श्व में दोनों ओर वस्त्र (Lateral Incisers) होते हैं, और इनके दोनों ओर दंष्ट्रा (शीवनकीलक, Canine या Eye teeth) होते हैं। (इस प्रकार ये ६ हुए) शेष स्वरूढ (अपने उसी स्वरूप में बढ़ने वाले) हानव्य अर्थात् हनुप्रदेश में होने वाले (चर्वण दन्त—Bicuspids or molars) कहाते हैं (अर्थात् ये १० हुवे) इसी प्रकार नीचे की पंक्ति में भी समझना चाहिये (अर्थात् २० हानव्य और १२ शेष हुवे इस प्रकार कुल ३२ दांत होते हैं)।
वक्तव्य—आधुनिक मतानुसार भी दन्तोद्भेद दो प्रकार का माना गया है। (१) बाल्यावस्था (Infancy) में तथा (२) किशोरावस्था (Childhood) में। दांतो के प्रथम समुदाय (Set) को “दूध के दांत” (Milk teeth या Primary Dentition) कहते हैं तथा दूसरे को “स्थायी दांत” (Secondary Dentition) कहते हैं।
प्रथम समुदाय के दांत (दूध के दांत) बच्चे के उत्पन्न होने के कई मास पूर्व मसूड़ों के अन्दर बीज रूप से (Germs) विद्यमान होते हैं। धीरे २ उनमें अस्थिनिर्माण (Ossification) प्रारंभ होता है तथा दांतों की आकृति बनकर बढ़ते हुवे मसूड़ों को विदीर्ण करके बाहर फूट आते हैं। इसी को हम दन्तोद्भेद या Teething कहते हैं। इस संहिता के उपर्युक्त प्रकरण में इन्हीं तीनों अवस्थाओं के लिये क्रमशः निषिक्त, मूर्तिमान् तथा उद्भेदन शब्द दिये गये हैं। इस विषय में Birch की Management and medical treatment of children in India नामक पुस्तक के ७५ पृष्ठ पर लिखा है—The germs of the first (milk or temporary) set have existed within the jaw for Several months before birth, but they are at no time covered with true bone, As ossification advances, the tooth rises and pressing upwards causes absorption of its
१. द्विज=(द्विजायन्ते-दो बार उगने वाले) अर्थात् दूध के दांत-Milk teeth, क्योंकि दूध के दांत एक बार गिर कर दोबारा उगते हैं।
दन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् १७
capsule and the gum, till by their removal the tooth makes its appearance. This upward progress, in its later stages, is what we mean when we talk of ''teething''
दूध के दांत निम्न क्रम से निकलते हैं—
१. निचले मध्य के त्रोटक (Lower central Incisers) ५ से दस मास २. ऊपर के चारों त्रोटक (upper central & lateral Incisers) ८ से १२ मास ३. निचले पार्श्व के त्रोटक (Incisers) तथा निचले और ऊपर के प्रथम चर्वण (Ist molars) १२ से १४ मास ४. निचले तथा ऊपर के शीवन या कीलक (Canine या Eye teeth) १६ से २२ मास ५. निचले तथा ऊपर के दूसरे चर्वण (2nd molars) २४ से ३० मास
इस प्रकार इन २० दांतों के निकलने के साथ २-१/२ वर्ष की अवस्था तक प्रथम दन्तोद्भेद (Primary Dentition) पूर्ण हो जाता है। इसके बाद दांतों का दूसरा समुदाय (स्थायी दांत या Secondary Dentition) प्रारंभ होता है। प्रथम समुदाय के दांतों के समान दूसरे समुदाय के दांत भी जन्म से पूर्व ही मसूड़ों में बीजरूप से स्थित होते हैं परन्तु ये प्रथम की अपेक्षा भी अधिक गहरे होते हैं। Birch की पूर्वोक्त पुस्तक में ही आगे लिखा है—Strange as it may appear, the germs of the second set also existed in the jaw before birth, more deeply seated than those of the milk teeth.
स्थायी दांत निम्न क्रम से निकलते हैं—
१. प्रथम पश्चात्-चर्वण या त्रिमूली (1 st. molars)—५ से ७ वर्ष २. मध्य के त्रोटक (Central Incisers)—६-१/२ से ८ वर्ष ३. पार्श्व के त्रोटक (Lateral Incisers)—७ से ९ वर्ष ४. प्रथम चर्वण या द्विमूली (1 st. Bicuspids)—९ से ११ वर्ष ५. द्वितीय चर्वण या द्विमूली (2 nd. Bicuspids)—१० से १२ वर्ष ६. शीवन या कीलक (Canines or Eye teeth)—११ से १४ वर्ष ७. द्वितीय पश्चात् चर्वण या त्रिमूली (2 nd. molars)—११ से १४ वर्ष ८. तृतीय पश्चात् या चर्वण या त्रिमूली या ज्ञानदन्त (3 rd. molars or wisdom teeth)—१६ से २१ वर्ष या उससे भी बाद में।
इस प्रकार ज्ञानदन्त (Wisdom teeth) के निकालने के साथ-साथ दांतों की ३२ संख्या पूरी हो जाती है तथा दन्तोद्भेद का कार्य भी पूर्ण हो जाता है।
तत्र कुमारीणामाशूतरमल्पाबाधकरं च दन्तजन्म, सुषिरत्वादंशानां मृदुस्वभावाच्च; प्रकृष्टकालमाबाधाबहुलं तु कुमाराणामाचक्षते, घनत्वादंशानां स्थिरस्वभावाच्च। दन्तानां निषेकमूर्त्तित्वोद्भेदवृद्धिपतनपुनर्भावनिवृत्ति-स्थितिपरिक्षयचलनपतनदृढ़दुर्बलता जातिविशेषात्निषेकात् स्वभावान्मातापित्रोरनुकरणात् स्वकर्मविशेषाच्चेत्याचक्षते महर्षयः; तथाऽन्येऽपि शरीरवृद्धिह्रासगुणदोषप्रादुर्भावाः ॥५॥
लड़कियों के दांत जल्दी निकलते हैं तथा कष्ट भी कम होता है क्योंकि उनके दांत सुषिर (सच्छिद्र) एवं मृदु होते हैं। लड़कों के दांत देर में निकलते हैं तथा कष्ट भी अधिक होता है क्योंकि उनके दांत घन (ठोस) तथा स्थिर (दृढ़) होते हैं। दांतों का निषेक, मूर्तरूप होना, प्रकट होना, वृद्धि, पतन (गिरना) गिरकर पुनः न निकलना, स्थिर रहना (जमे रहना), क्षीण होना हिलना, गिरना, दृढ़ता, एवं दुर्बलता इन सब बातों में जाति की विशेषता, निषेक, स्वभाव, माता-
१८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् दन्तजन्मिकाध्यायः २०]
पिता का अनुकरण (Hereditary) तथा अपने प्राक्तन कर्मों की अपेक्षा होती है ऐसा प्राचीन महर्षि कहते हैं, तथा अन्य भी शरीर की वृद्धि ह्रास, गुण, दोष उत्पन्न होते हैं।
वक्तव्य—Dr. Donald Paterson अपनी पुस्तक “Sick children” के १४ पृष्ठ पर इस विषय में लिखते हैं कि—“Many abnormalities in the appearance of teeth and the type teeth cut will appear to be hereditary and there can be no doubt that good teeth run in families” अर्थात् दांतों के बहुत से विकार तथा उनके निकलने के बहुत से विकृत तरीके आनुवंशिक प्रतीत होते हैं। सुन्दर दांत निःसन्देह एक पारिवारिक देन है। अर्थात् यदि माता पिता के दांत अच्छे होते हैं तो प्रायः सन्तति के दांत भी अच्छे होते हैं।
नृणां तु चतुर्थादिषु मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते। तत्र सदन्तजन्म च, पूर्वमुत्तरदन्तजन्म च, विरलदन्तजन्म च, हीनदन्तता च, अधिकदन्तता च, करालदन्तता च, विवर्णदन्तता च, स्फुटितदन्तता चामङ्गल्या भवति। तत्र शान्त्यर्थं मारुतीमिष्टिं निर्वपेत्, स्थालीपाकमनाहिताग्नेः प्राजापत्यमित्येके, तथाऽन्येष्वपि स्वाङ्गोनाधिकभावेषु, तथा तद्घोरं प्रशाम्यति ॥६॥
पुरुषों के चौथे मास में दांत निषिक्त हो जाते हैं। सदन्तजन्य (दांतों से सहित जन्य), पहले ऊपर के दांतों का निकलना (साधारणतया सबसे पहले निचले तथा मध्य के त्रोटक Incisers निकलने चाहिये), दांतों का विरल (दूर २—Scattered) होना, दांतों का कम होना, दांतों की संख्या अधिक होना, दांतों का कराल¹—भयंकर (लम्बे) होना, दांतों का मैला होना, तथा दांतों का स्फुटित होना (खिरना) अदि ये सब अशुभ माने गये हैं। इनकी शान्ति के लिये मारुती इष्टि (यज्ञ) करे। कुछ लोग कहते हैं कि अनाहिताग्नि पुरुषों की स्थालीपाक (पुरोडाश) प्रजापत्य इष्टि से करे। इसी प्रकार अन्य अङ्गों के कम या अधिक होने पर ऐसा ही करे जिससे वह अनिष्ट शान्त हो जाता है।
चतुर्विधं तु दन्तजन्माचक्षते सामुद्रं, संवृतं, विवृतं, दन्तसंपदिति। तत्र सामुद्रं क्षयि, नित्यसंपातात्, संवृतमधन्यं मलिष्ठं, विवृतं वीतम नित्यलालोपहतमसंछन्नदन्तत्वादाशुदन्तवैवर्ण्यकरमासन्नाबाधमिति ॥७॥
चार प्रकार की दांतों की उत्पत्ति मानी गई है—(१) सामुद्र (२) संवृत (३) विवृत (४) दन्तसंपत्। इनमें 'सामुद्र' बच्चों के दांतों के क्षय की अवस्था में होते हैं क्योंकि उनके दांत सदा गिरते रहते हैं। संवृत-अधन्य (अप्रशस्त) है, इसमें दांत मैले होते हैं। विवृत-जिसमें नित्य लालास्राव (Saliva) होता रहता है तथा होठों द्वारा दांतों के पूरे ढके न जाने के कारण दांत मैले हो जाते हों तथा उनमें सदा रोग होते रहते हों ॥७॥
चतुर्थे तु मासि दन्ता निषिक्ता दुर्बला भवन्त्याशुक्षयिणश्चामयबहुलाश्च, पञ्चमे स्यन्दनाश्च प्रहर्षिणश्चामयबसुलाश्च षष्ठे प्रतीपाश्च मलग्राहिणश्च विवर्णाश्च घुणदन्ताश्च भवन्ति, सप्तमे द्विपुटाः स्फोटिनश्च राजिमन्तश्च खण्डाश्च रूक्षाश्च विषमाश्रोन्नतश्च भवन्ति, तथाऽष्टमे मासि सर्वगुणसंपन्ना भवन्ति। पूर्णता समता घनता शुक्लता स्निग्धता श्लक्ष्णता निर्मलता निरामयता किञ्चिदुत्तरोन्नतता, दन्तबन्धनानां च समता रक्तता स्निग्धता बृहद्वनस्थिरमूलता चेति दन्तसंपदुच्यते। हीनोल्बणसितासिताऽप्रविभक्तदन्तबन्धनत्वमप्रशस्तमृषयो वदन्ति। तत् स्वभावादन्तोदूखलकेषु यच्छोणितं गर्भे निषिक्तं तदेव जातस्य समतोऽभिवर्धमानस्य क्रमेण .....................................। (इति ताडपत्रपुस्तके ३४ तमं पत्रम्।)
१. शनैः प्रकुरुते यत्र दन्ताश्रितोऽनिलः । करालान्विकटान्दन्तान्स करालो न सिध्यति । (भा.प्र. मध्यमखण्ड चि. ७२)
२. शीतरूक्षप्रवाताम्लस्पर्शनासाहाः द्विजाः । तत्र स्युर्वातपित्ताभ्यां दन्तहर्ष; स कीर्तितः ॥ (भा.प्र. मध्यमखण्ड चि. ६८)
दन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् ९९
चतुर्थ मास में निषिक्त हुवे २ दांत दुर्बल, शीघ्र गिरने वाले तथा बहुत से रोगों से युक्त होते हैं, पांचवे मांस में निषिक्त हुए २ दांत हिलने वाले, हर्ष¹ एवं अन्य रोगों से युक्त होते हैं, छठे में निषिक्त हुवे २ दांत प्रतीप-टेढ़े, मैले, विवर्ण तथा कीड़ों से खाये हुवे (Carious) होते हैं, सातवें में निषिक्त हुए २ दांत दो पुट-जड़ वाले (इकट्ठे दो दांत निकलना), चटकनेवाले (खिरने वाले) रेखा युक्त, टूटे हुवे, रूक्ष, विषम (समान न होना) तथा आगे को उभड़े हुवे होते हैं, और ८ वें मास में निषिक्त हुए २ दांत सर्वगुण सम्पन्न होते हैं। दांतों की पूर्णता, समानता, कठोरता सफेदी स्निग्धता, चिकनापन, निर्मल होना, नीरोग होना, तथा दूध के दांतों का कुछ उन्नत-बड़े होना (जिससे वे निचले दातों को ढकलें) तथा दन्तबन्धन (मसूड़ों) का समान, लाल, स्निग्ध तथा बड़े घन एवं स्थिर मूल वाले होना (अर्थात् उनमें दांत अच्छी प्रकार जमे हुवे हों) ये दन्तसंपत् (दातों के गुण) कहलाते हैं। दांतों का हीन (कम होना), उल्बण (अधिक होना), सित-एक दम सफेद होना (स्थायी दांतों का रंग हल्का पीलापन-Yellowish tint-लिये हुवे सफेद होना चाहिये), असित-काले, तथा मसूड़ों का अलग २ न होना (प्रत्येक दांत का मसूड़ा अस्पष्ट अलग दिखाई देना चाहिये), अप्रशस्त माने गये हैं। दांतों के गढ़ों (Pits) में गर्भ के समय जो रक्त स्वाभाविक रूप से निषिक्त होता है वही रक्त¹ उत्पन्न होकर समान रूप से बढ़ने वाले व्यक्ति में क्रम से..... (दांतों को उत्पन्न करता)।
(ताडपत्र पुस्तक में ३४ वा (पृष्ठ²)
वक्तव्य—यह ग्रन्थ खण्डित रूप से मिलता है इस लिये बीच २ में इसके पृष्ठ लुप्त हैं। इस अध्याय में भी पूर्वोक्त विवरण के बाद पृष्ठों के लुप्त होने से अध्याय को यहीं अधूरा ही समाप्त कर देना पड़ा है। यदि यह अध्याय पूरा होता तो संभवतः अध्याय के उपक्रम में कहे हुए कई महत्व पूर्ण प्रश्नों की इसमें विवेचना मिलती। अस्तु, उस विषय में तो जब तक इसका खण्डित शेषांश कहीं से उपलब्ध न हो तब तक हमें अपनी जिज्ञासा को शान्त रखना ही पड़ेगा। फिर भी हम पाठकों के ज्ञान के लिये आधुनिक विज्ञान की गवेषणाओं के आधार पर यथा संभव प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे।
बच्चों के दांत निकलने का समय ऐसा होता है जिसमें बच्चों को बहुत से रोग हो जाया करते हैं। दांतो के उद्गम के विषय में आधुनिक विद्वानों के परस्पर बिलकुल विपरीत दो सिद्धान्त हमारे दृष्टिगोचर होते हैं (१) दांतों के निकलने के समय बच्चे को निश्चित रूप से बहुत से रोग घेर लेते हैं (२) दांतो का उद्गम दांतों के निकलने के सिवाय और किसी बात (रोग आदि) का उत्तरदायी नहीं है। Donald Paterson अपनी पुस्तक Sick Children के १५ पृष्ठ पर लिखते हैं—“Two extreme theories of dentition are advanced. (i) that there are myriads of diseases and upsets definitly due to cutting the teeth. (2) that teething is responsible for nothing but the cutting of teeth”.
उपर्युक्त बात मुख्य रूप से ‘दूध के दांतों’ के विषय में ही है। अस्तु, आपाततः इनमें से कोई भी सिद्धान्त ठीक हो, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि शिशु प्रसव (Childbirth) के समान दांतो का उद्गम स्वास्थ्यावस्था होने पर भी किसी २ में विकृत (रोग की) अवस्था धारण कर लेता है तथा उस अवस्था में उसे नाना प्रकार के रोग घेर लेते हैं। परन्तु दन्तोद्भेद पर लोग बच्चों के रोगों की जिम्मेदारी बहुत अधिक डाल देते हैं। दन्तोद्भेद के समय होने वाले प्रत्येक-छोटे से लेकर बड़े तक-उपद्रव की जिम्मेवारी दन्तोद्भेद पर ही थोप दी जाती है। आयुर्वेद के ग्रन्थों में इस विषय में लिखा है—पृष्ठभंगे विडालानां बर्हिणां शिखरोद्गमे। दन्तोद्भेदे च बालानां न हिं किंचिन्न दूयते॥ वास्तव में हमें दन्तोद्भेद पर इतनी अधिक जिम्मेवारी नहीं डालनी चाहिये। हां, कुछ विकृति अवश्य हो जाती हैं। बच्चों के वातसंस्थान (Nervous
१. Birch की पूर्वोक्त पुस्तक के ८१ पृष्ठ पर लिखा है-“Teeth are built out of blood” रक्त से दांत बनते हैं।
२. ताडपत्रपुस्तक में इससे आगे दो पृष्ठ खण्डित है।
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System) में कुछ विकार उत्पन्न हो जाते हैं जिससे बच्चा चिड़चिड़ा तथा कमजोर अवश्य हो जाता है। इसके अतिरिक्त और कोई रोग हो यह आवश्यक नहीं है। यदि बच्चे के भोजन एवं परिधान (कपड़ों) की ओर ध्यान रखा जाय तो बच्चे को साधारण तथा कोई कष्ट नहीं होता है। बच्चों का निम्न उपद्रव मुख्यरूप से हो जाते हैं—
१. ज्वर—किसी-किसी बच्चे को दन्तोद्भेद के समय ज्वर हो जाया करता है।
२. वमन—कभी-कभी बच्चों को दन्तोद्भेद के समय वमन प्रारंभ हो जाते हैं। यह अवस्था विशेष रूप से तब होती है जब कि बच्चा लगभग १-१, १/२ वर्ष का हो जाता है। इस समय तक वह केवल दूध या अन्य तरल भोजन ही ले रहा होता है। अब बच्चे को धीरे-धीरे ठोस भोजन (Solid) देना प्रारंभ किया जाता है। इस समय बच्चे के मसूड़े बहुत नरम होते हैं, कठोर भोजन को चबाने से उसके दांतों में दर्द होता है इसलिये वह उस भोजन को आधा चबाया हुवा ही निगल जाता है वह बिना चबाया हुवा भोजन उसे पचता नहीं और परिणाम स्वरूप उसे वमन हो जाता है जिसमें कि कठोर भोजन का अंश ही मुख्यरूप से निकलता है। यह वमन दन्तोद्भेद के बाद स्वयं शान्त हो जाती है।
अतिसार—दन्तोद्भेद के समय बच्चे को अतिसार भी लग जाते हैं। इसमें मल पतला अवश्य होता है परन्तु उसका रंग ठीक होता है तथा उसमें बिना पचा हुआ अंश नहीं होता। भोजन में परिवर्तन करने से भी मल की संख्या में कोई विशेष अन्तर नहीं होता तथा इस अतिसार से बच्चे के भार में भी कोई कमी नहीं होती है।¹ कुछ लोगों का विचार है कि दन्तोद्भेद के समय अतिसार एक स्वाभाविक एवं लाभप्रद प्रक्रिया है। परन्तु यह धारणा ठीक नहीं है। Birch की पूर्वोक्त पुस्तक के ७८ पृष्ठ पर स्पष्ट लिखा है कि “Diarrhoea is never a good thing, it is always a bad sign” अर्थात् अतिसार कभी भी अच्छा नहीं है यह सदा बुरा लक्षण है। सामान्य लोग घरों में कहा करते हैं कि दन्तोद्भेद के समय होने वाले अतिसार को नहीं रोकना चाहिये। परिणाम यह होता है कि जब बच्चा दिन प्रति-दिन दुर्बल होता जाता है तब चिकित्सक को बुलाते हैं जो कि अतिसार को रोकने का प्रयत्न करता है परन्तु तब तक वह रोगी असाध्यावस्था को पहुंच चुका होता है। अन्त में वह अभागा बच्चा आक्षेप (Convulsions) के द्वारा अपनी इहलीला को समाप्त कर देता है। परन्तु इसका दोष भी लोग चिकित्सक को ही देते हैं और कहते हैं कि दस्तों को रोकने से वह दिमाग में पहुंच गया है (It went to head) और इसी लिये बच्चा मर गया है। अपने इस अज्ञान को हमें दूर करने का अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।
कास बच्चे को इस समय खांसी भी हो जाती है। परन्तु खांसी का कारण प्रायः दन्तोद्भेद न होकर दूसरा ही होता है। बच्चे को लालास्राव बहुत हुआ करता है। दिन में तो यह स्राव स्वाभाविक रूप से मुंह से बाहर को गिरता रहता है। परन्तु जब बच्चा रात्रि में या दिन में सोता है तब वह स्राव बाहर न निकल कर अन्दर गले में जाकर स्वरयन्त्र के मुंह को बन्द कर देता है जिससे बच्चा बार २ खांसता है।
आक्षेप (Convulsions)—दन्तोद्भेद के समय साधारणतया आक्षेप नहीं होते परन्तु यदि बच्चे को Ricket² हो या कोई अन्य मानसिक दुर्बलता हो तो उसे आक्षेप हो जाया करते हैं।
पामा (Eczema)—इस समय बच्चों को पामा तथा खुजली भी हो जाया करती है। साथ ही प्रायः शीत पित्त के दाग (urticarial Rashes) भी हो जाया करते हैं।
पूर्वरूप—मुंह से लालास्राव होना, मसूड़ों का सूजना तथा वेदना युक्त होना, तथा वस्तुओं को काटने की इच्छा करना ये दन्तोद्भेद के पूर्व रूप होते हैं।
१. देखें—Donald Paterson की Sick children का पृष्ठ १५।
२. Ricket—बच्चों का एक रोग है जिसमें विटामिन डी (Vitamin-D) की कमी से उनकी हड्डियां कमजोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं।
चूडाकरणीयाध्यायः २१] सूत्रस्थानम् २१
उपक्रम—दन्तोद्भेद के उपद्रव यदि विशेष प्रबल रूप धारण न करलें तो विशेष उपक्रम की आवश्यकता नहीं होती है, दांतो के निकलने के बाद वे स्वयं शान्त हो जाते हैं। कहा भी है—दन्तोद्भेदेषु रोगेषु न बालमतियन्त्रयेत् । स्वयमेवोपशाम्यन्ति जातदन्तस्य ये गदाः ।। परन्तु यदि उपद्रव अधिक गंभीर हो जांय तो उस २ उपद्रव का उपाय अवश्य सावधानी से करना चाहिये। साधारणतया बच्चे का भोजन ठीक करने का प्रयत्न करना चाहिये। बच्चे को ठीक अनुपात में विटामिन, शुद्ध वायु, सूर्य की धूप तथा उपर्युक्त भोजन मिलने की पूर्ण व्यवस्था रखनी चाहिये। दन्तोद्भेद के समय बच्चे के मसूड़ों पर मधु में मिलाकर सुहागे की खील, उंगली में लगाकर ग्लिसरीन या नींबू का टुकड़ा रगड़ना चाहिये, इससे दांत सुखपूर्वक निकल आते हैं। दन्तोद्भेद के समय बच्चे के भोजन की मात्रा घटाकर १/४ कर देना चाहिये तथा उस कम की हुई भोजन की मात्रा को शुद्ध जल द्वारा पूरा करना चाहिये। प्रयत्न करना चाहिये कि बच्चे को कोष्ठबद्धता (Constipation) न रहे, एतदर्थ १/२ ग्रेन मुग्धरस (Grey powder) दिन में दो बार देकर पेट साफ कर देना चाहिये। मुंह में चूसने के लिये बच्चे को कोई कड़ी चीज देनी चाहिये जिससे उसके हनु (Jaw) की वृद्धि (विकास) पूर्ण रूप से हो सके।
एकविंशतितमोऽध्यायः ।
............................. रोहिणी स्वयङ्गुप्तामूलं द्वे हरिद्रे बृहतीफलरसैर्धृतार्धवत् पचेत्, पच्यमानेऽपामार्गं चावपेत् । सिद्धेन कर्णपालीमहन्यहनि प्रक्षयेद्दिमृद्दीयाच्च, आशु वर्धते पीना समा च पाली भवति । मधूच्छिष्टसर्जरसयववत्सकैरण्डान्यन्तर्धूमं दग्ध्वा तेन भस्मना म्रक्षितां कर्णपालीं विमृद्दीयात्, आशु वर्तते पीना समा च पाली भवतीति ।
.............................
कर्णपाली की वृद्धि के उपाय—रोहिणी (कुटकी) कौंच की जड़, हरिद्रा, दारुहरिद्रा तथा कटेरी के रस में इनसे आधे परिमाण में घृत डालकर पकावे। पकती हुई अवस्था में ही इसमें अपामार्ग का चूर्ण डाल दे। इस सिद्ध घृत से कर्णपाली (लौर—Lobule) को प्रतिदिन रगड़े तथा मालिश करे। इससे कर्णपाली शीघ्र बढ़ती है तथा मोटी और समान (स्पर्श में समान—चिकनी) होती है। उपर्युक्त घृत से स्निग्ध हुई कर्णपाली पर मोम, राल, जौ, इन्द्रजौ तथा एरण्ड के पत्तों को अन्तर्धूम विधि से जलाकर उस भस्म को उस पर लगावे (Dust करे)। इससे कर्णपाली शीघ्र बढ़ती है तथा मोटी और चिकनी भी हो जाती है।
वक्तव्य—कर्णपाली बढ़ाने के लिये सुश्रुत सू. अ. १६ में निम्न योग दिये हैं—१. अथास्याप्रदुष्टस्याभिवर्धनार्थंप्रयत्य्ङ्गः । तद्यथा-गोधाप्रतुदविष्किरानूपौदकवसामज्जानी पयः सर्पिस्तैलं गौरसर्षपजं च यथालाभं संभृत्यार्कलर्कबलातिबलानन्ता-पामार्गाश्वगन्धाविदारिगन्धा क्षीरशुक्लाजलशूकमधुरवर्गपयस्याप्रतिवापं तैलं वा पाचयित्वा स्वनुगुप्तं निदध्यात् । स्वेदितोन्मर्द्दितं कर्णं स्नेहेनैतेन योजयेत् । अथानुपद्रवः सम्यग्बलवांश्च विवर्धते ।। स्वेद और मालिश किये हुए कान पर उपर्युक्त ओषधियों से सिद्ध किये हुए तैल का प्रयोग करने से कर्णपाली वृद्धि को प्राप्त होती है। २. यवाश्वगन्धाष्ट्याह्नैस्तैलैश्चोद्वर्तनं हितम् । ३. शतावर्यह्वगन्धाभ्यां पयस्यैरण्डजीवनैः । तैलं विपक्वं सक्षीरमभ्यङ्गात् पलिवर्धनम् ।। ४. ये तु कर्णा न वर्धन्ते स्वेदस्नेहोपपादिताः । तेषामपाङ्गदेशे तु कुर्यात् प्रच्छानमेव तु ।। उपर्युक्त स्नेहन, स्वेदन अभ्यङ्ग आदि के द्वारा यदि कर्णपाली की वृद्धि न हो तो अपाङ्गदेश (कर्णपुत्रिका के थोड़ा नीचे) छिद्र करना चाहिये।
तत्र श्लोकाः ।
नाभिश्रराजपुत्राणामन्येषां वा महात्मनाम् । कर्णान् विध्येत् सुखप्रेप्सुरिह लोके परत्र च ।।
२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चूडाकरणीयाध्यायः २१]
आमच्छेदेऽत्ययो ह्यत्र कुवेधाद्ग्रोपजायते । अभिषक् तत्र मन्दात्मा किं करिष्यत्यशास्त्रवित् ।।
इह लोक तथा परलोक में सुख को चाहने वाले अज्ञानी वैद्य को राजपुत्रों अथवा अन्य बड़े लोगों के कानों का वेध नहीं करना चाहिये । आमच्छेद (कच्चे वेध) अथवा कुवेध (गलत तरीके से वेध) करने पर यदि कोई उपद्रव हो जाय तो शास्त्रों को न जानने वाला, मन्दबुद्धि तथा अज्ञानी वैद्य क्या करेगा ।
कदा वेध्यं कथं वेध्यं कुत्र वेध्यं कथं व्यधः ।
हितोऽहितोऽत्ययः कश्च तत्राज्ञः किं प्रपत्स्यते ।।
तस्माद्भिषक् सुकुशलः कर्णं विध्येद्विचक्षणः । शिशोर्हर्षप्रमत्तस्य धर्मकामार्थसिद्धये ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति चूडाकरणीयोऽध्याय एकविंशतितमः ।।२१।।
कर्णवेधन कब, कैसे, तथा कहां करना चाहिये ? किस प्रकार का वेध हितकर तथा अहितकर है ? इसके उपद्रव क्या हैं ? इत्यादि बातों का मूर्ख वैद्य को कुछ पता नहीं होता । इसलिये अत्यन्त कुशल एवं निपुण चिकित्सक को धर्म, काम तथा अर्थ (धन) की प्राप्ति के लिये हर्ष से युक्त शिशु के कर्ण का वेधन करना चाहिये । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
**वक्तव्य—**भारत में साधारणतया सब प्रदेशों में उत्पत्ति के पश्चात् बालकों के कानों के वेधन की प्रथा प्रचलित है । कर्णवेधन से बहुत से रोग नहीं हो पाते हैं—ऐसा प्राचीन ऋषियों का विश्वास था । हमारे चिकित्सा ग्रन्थों एवं धर्मशास्त्रों में अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है । सुश्रुत में कर्णवेधन की विधि अत्यन्त विस्तार से दी हुई है । वहां उसकी विधि के साथ २ उसका प्रयोजन, उपद्रव, तथा चिकित्सा आदि का भी वर्णन मिलता है । सुश्रुत सू. अ. १६ में कहा है—'रक्षाभूषणनिमित्तं बालस्य कर्णौ विध्येते । तौ षष्ठे मासि सप्तमे वा शुक्लपक्षे प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनं धात्र्यङ्के कुमारधराङ्के वा कुमारमुपवेश्य बालक्रीडनकैकैः प्रलोभ्याभिसान्त्वयन् भिषग् वामहस्तेनाकृष्य कर्णं दैवकृते छिद्र आदित्यकरावभासिते शनैः शनैर्दक्षिणहस्तेनर्जु विध्येत्, प्रतनुकं सूच्या, बहलमारया, पूर्वं दक्षिणंकुमारस्य, वामं कुमार्याः, ततः पिचुवर्ति प्रवेशयेत् ।। इससे प्रतीत होता है कि कर्णवेधन का उद्देश्य बालकों की ग्रहबाधाओं से रक्षा करना तथा उनमें आभूषण पहनाना है । कहा भी है-कर्णव्यधे कृते बालो न ग्रहैरभिभूयते । भूष्यते तु मुखं यस्मात् कार्यस्तत् कर्णयोर्व्यधः ।। कर्णवेधन छठे या सातवें मास में किया जाता है । डल्हण के अनुसार कर्णवेधन के लिये छटा या सातवां महीना जन्म से न लेकर भाद्रपद से लेना चाहिये । तदनुसार माघ या फाल्गुन मास आता है । यह शिशिर ऋतु है । इस ऋतु में कर्णवेधन का मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि उस समय व्रण में पाक (Suppuration) का डर बहुत कम होता है तथा व्रण का रोपण भी शीघ्र हो है । इसीलिये धर्मशास्त्रों में जो कर्णवेधन का विधान दिया है वह छठे या सातवें मास में नहीं दिया है अपितु तीसरे या पांचवें वर्ष में दिया है । कात्यायन गृह्यसूत्र १-२ का वचन है-‘‘कर्णवेधो वर्षे तृतीये पञ्चमे वा’’ । कर्णपाली के बीच में एक स्वाभाविक पतला सा छिद्र होता है उसी में वेध करना चाहिये क्योंकि उस स्थान पर शिरा, धमनी नाड़ी आदि नहीं होती हैं तथा इस भाग में तरुणास्थि भी नहीं होती है । यहां केवल fibrous tissue तथा थोड़ी वसा होती है । इसी स्थान को दैवकृत छिद्र शब्द से कहा गया है । वेधन के बाद छिद्र में एक पतला सा धागा डाल दिया जाता है जिससे वह छिद्र बन्द न हो जाय ।
**उपद्रव—**विपरीत कर्णवेधन से तीन प्रकार के उपद्रव हो सकते हैं । (१) रक्तस्राव-धमनी आदि के बिंध जाने से होता है (२) वेदना-यह नाडी (Nerve) के बिंध जाने से होती है (३) ज्वर इत्यादि-व्रण में सफाई आदि के न होने
स्नेहाध्यायः २२] सूत्रस्थानम् २३
से जीवाणुओं के प्रवेश (Infection) से ज्वर आदि रोग हो जाते हैं। इसलिये पहले से ही अच्छी प्रकार स्थान देखकर वेधन करे तथा व्रण में जीवाणुओं का प्रवेश न हो सके-इसका प्रयत्न करे। इस अध्याय का नाम चूड़ाकरणीय अध्याय है जैसा कि अध्याय के अन्त में लिखे वाक्य "इति चूडाकरणीयोऽध्याय एक विंशतितमः" से स्पष्ट है। यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित है इसलिये संभवतः इसके खण्डित अंश में चूड़ाकर्म का प्रकरण दिया हो। चूड़ाकर्म या चूड़ाकरण से अभिप्राय प्रथम बार बालक के सिर के बालों को कटवाने से है जिसे केशच्छेदन या मुण्डन संस्कार कहते हैं। यह बालक के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त (निषेकादिश्मशानान्तो नित्यं यस्योदितो विधिः) किये जाने वाले वैदिक संस्कारो, में से आठवां सस्कार है। आश्वलायन गृह्यसूत्र १/१७/१ के अनुसार यह संस्कार तृतीय वर्ष में किया जाता है। कहा भी है- "तृतीये वर्षे चौलम्'। पारस्कर गृह्यसूत्र २/१/१ के अनुसार यह प्रथम वर्ष में किया जाता है कहा है— सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम्' ।
इति चूडाकरणीयोऽध्याय एकविंशतितमः ॥२१॥
द्वाविंशतितमोऽध्यायः
अथातः स्नेहाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम स्नेहाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
स्नेहो द्वियोनिरुक्तश्चतुर्विकल्पश्चराचरसमुत्थः। सर्पिर्मज्जवसाख्यं खगमृगजलजप्रभवमाहुः ॥३॥
तैलानि चौद्भिदेभ्यस्तिलचूतसर्षपबिभीतबिल्वेभ्यः । एरण्डातसिशिग्रुमधूकमूलककरञ्जेभ्यः ॥४॥
स्नेह की दो योनियां (उत्पत्ति स्थान या कारण) कहीं गई हैं। तथा चर और अचर उत्पत्ति वाले इसके चार विकल्प माने गये हैं। इनमें से घृत, मज्जा, तथा वसा तीनों पक्षी, पशु तथा जल के (अर्थात् सब प्रकार के) प्राणियों से उत्पन्न होते हैं। तथा चौथा स्नेह (तैल) तिल, आम्र, सरसों, बहेड़ा, बिल्व, एरण्ड, अलसी, सुहांजना, महुआ, मूली, तथा करञ्ज आदि उद्भिदों (वनस्पतियों) से प्राप्त होता है।
**वक्तव्य—**चरक सू. अ. १३ में कहा है—स्नेहानां द्विविधा सौम्य ! योनिः स्थावरजङ्गमा । स्नेह के स्थावर और जंगम (चर-अचर) भेद से दो प्रकार के उत्पत्ति स्थान माने गये हैं। वही आगे पुनः कहा है-तिलः पियालाभिषुकौ विभीतकश्चित्राभवैरण्डमधूकसर्षपाः । कुसुम्भबिल्वारुकमूलकातसौनिकोचकाक्षोडकरञ्जशिग्रुकाः ।। स्नेहाश्च याः स्थावरसंज्ञिता तथा स्युर्जङ्गमा मत्स्यमृगाः सपक्षिणाः । तेषां दधिक्षीरघृतामिषं वसा नेहेषु मज्जा च तथोपदिश्यते ।। इस प्रकार तैल साधारणतया स्थावर तथा घृत, वसा और मज्जा जंगम स्नेह माने गये हैं। साधारणतया इसलिये कहा है कि तैल भी मछली आदि से प्राप्त किया जाता है।
घृततैलवसामज्जां पूर्वः पूर्वो वरोऽन्ये (न्ये) भ्यः । मुख्यं घृतेषु गव्यं संस्कारात् सर्वसात्म्याच्च ॥५॥
घृत, तैल, वसा तथा मज्जा इनमें से यथा पूर्व अगले से श्रेष्ठ माना गया है अर्थात् घृत तैल से, तैल वसा से तथा वसा मज्जा से श्रेष्ठ है। घृतों में भी संस्कार तथा सबके लिये सात्म्य होने के कारण गोघृत मुख्य माना गया है।
**वक्तव्य—**संस्कार से अभिप्राय संस्कार के अनुवर्तन से है अर्थात् यह अपने गुणों को त्यागे बिना ही संस्कारार्थ डाली गई अन्य ओषधियों के गुणों को अपने अन्दर धारण करता है। अन्य स्नेहों में ये गुण नहीं हैं। वे संस्कारार्थ डाली
२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
गई अन्य ओषधियों के संसर्ग से अपने गुणों को त्याग देते हैं। चरक में भी घृत को सब स्नेहों से श्रेष्ठ माना है। परन्तु वहां गोघृत का विशेष परिगणन नहीं किया गया है अपितु सामान्य रूप से ही घृत के गुण लिखे हैं। कहा है—सर्पिस्तैल वसा मज्जा सर्वस्नेहोत्तमा मताः। एभ्यश्चैवोत्तमः सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ॥ घृत की सर्वोत्तमता को दिखाते हुए अष्टाङ्ग संग्रह में कहा है—माधुर्यादविदाहित्वाज्जन्माद्येव च शीलनात्। अर्थात् उसकी श्रेष्ठता के मधुर, अविदाहि एवं जन्म से ही घृत का निरन्तर प्रयोग—ये तीन हेतु अधिक दिये हैं। जन्म से जिस वस्तु का सेवन किया जाता है वह सात्म्य हो जाती है इसी लिये प्रकृत संहिता के उपर्युक्त श्लोक में 'सर्वसात्म्याच्च' विशेषण दिया गया है।
विनिहन्ति पित्तमनिलं पीतं सर्पिः कफं न च चिनोति।
जनयति बलाग्निमेधाः शोधयति शुक्रं च योनिं च ।।६।।
घृत के सामान्य गुण—घृत सेवन किया जाने पर पित्त तथा वायु का शमन करता है परन्तु कफ का संचय नहीं करता। यह बल, अग्नि और बुद्धि को बढ़ाता है तथा शुक्र और योनि का शोधन करता है। चरक निदान स्थान के प्रथम अध्याय में कहा है—स्नेहात्वात् शमयति शैत्यात्पित्तं नियच्छति। घृतं तुल्यगुणं दोषं सस्कारात्तु जयेत् कफम्।। उपर्युक्त श्लोक द्वारा घृत के अन्य गुण दिये गये हैं। सुश्रुत सू. अ. ४५ में घृत के निम्न सामान्य गुण दिये गये हैं—घृतं तु मधुरं सौम्यं मृदु शीतवीर्यमल्पाभिष्यन्दिस्नेहनमुदावर्त्तोन्मादापस्मारशूलज्वरानाहवातपित्तप्रशमनमग्निदीपनं स्मृतिमतिमेधा-कान्तिस्वरलावण्यसौकुमार्यौजस्तेजोबलकरमायुष्यं वृष्यं मेध्यं वयःस्थापनं गुरु चक्षुष्यं श्लेष्माभिवर्धनं पाप्मालक्ष्मीप्रशमनं विषहरं रक्षोघ्नं च।।
उष्णं कफानिलघ्नं स्वरवर्णकरं तनुस्थिरीकरणम्। भग्नच्युतसन्धानं धातुव्रणशोधनं तैलम् ।।७।।
तैलों के सामान्य गुण—तैल उष्ण, कफ तथा वायु का नाशक (उष्ण एवं स्निग्ध होने से), स्वर तथा वर्ण को निखारने वाला, शरीर को स्थिर-दृढ़ करनेवाला, भग्न (Fracture) एवं च्युत (सन्धिभ्रंश-Dislocation) को ठीक करनेवाला तथा धातु एवं व्रण का शोधक है। चरक सूत्रस्थान के स्नेहाध्याय में तैलों के निम्न गुण दिये हैं-मारुतघ्नं न च श्लेष्मवर्धनं बलवर्धनम्। त्वच्यमुष्णं स्थिरकरं तैलं योनिविशोधनम्।। सुश्रुत सूत्रस्थान में भी तैलों के बहुत से गुण दिये हुए हैं। उन्हें वहीं देखना चाहिये।
मज्जावसे विशेषाद्वातघ्ने वृष्यसंमते चैव। बलिनां तत्सात्म्यानां प्रजाबलायुः स्थिरीकरणे ।।८।।
मज्जा तथा वसा के सामान्य गुण—मज्जा तथा वसा विशेषकर वातघ्न हैं, ये वृष्य माने गये हैं तथा बलवान् एवं जिन्हें ये सात्म्य हों-उन पुरुषों में सन्तानोत्पत्ति, बल एवं आयु को स्थिर करते हैं। चरक सू. अ. १३ में इनके निम्न गुण दिये हैं—विद्धभग्नाहतभ्रष्टयोनिकर्णशिरोरुजि। पौरुषोपचये स्नेहे व्यायामे चेष्यते वसा ।। बलशुक्ररसश्लेष्म मेदोमज्जविवर्धनः। मज्जा विशेषतोऽस्थां च बलकृत्स्नेहने हितः ।। अर्थात् इनका प्रयोग मुख्य रूप से बल एवं वीर्यवृद्धि के लिये होता है।
नित्यानित्यात्मविधौ तिलतैलघृते बुधः प्रयुञ्जीत।
एरण्डशङ्खिनीभ्यां स्त्रंसनमन्यद्रसायनं नास्ति ।।९।।
ज्ञानी मनुष्य को दैनिक व्यवहार में प्रतिदिन तिलतैल तथा घृत का प्रयोग करना चाहिये। तथा एरण्ड और शङ्खिनी (श्वेत अपराजिता) के तैल द्वारा होनेवाले विरेचन से बढ़-कर दूसरा कोई रसायन नहीं है। अर्थात् दैनिक प्रयोग के लिये घृत अथवा तिलों का तैल ही काम में लेना चाहिये। जहाँ विरेचन देने का उद्देश्य हो वहाँ एरण्ड तथा शङ्खिनी के तेल का प्रयोग करना चाहिये।
स्नेहाध्यायः १२] सूत्रस्थानम् २५
मज्जावसे वसन्ते, प्रावृषि तैलं, पिबेच्छरदि सर्पिः।
सर्पिर्वा सर्वेषां सर्वस्मिञ्छक्यते पातुम् ॥१०॥
स्नेहों के सेवन काल—मज्जा तथा वसा का वसन्त ऋतु में, तैल का प्रावृट् में तथा घृत का शरद् ऋतु में सेवन करना चाहिये। अथवा घृत का सब व्यक्ति सब ऋतुओं में सेवन कर सकते हैं।
वक्तव्य—वसन्त, प्रावृट् तथा शरद् साधारण ऋतुयें कहाती हैं। इनमें न सर्दी अधिक पड़ती है; न गरमी तथा न वर्षा। शोधन की दृष्टि से ही इन तीनों ऋतुओं का परिगणन किया गया है। क्योंकि स्नेहन के बाद स्वेदन तथा फिर पञ्चकर्म द्वारा शोधन कराया जाता है। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २५ में निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है—तैलं प्रावृषि वर्षान्ते सर्पिरन्यौ तु माधवे। सर्वं सर्वस्य च स्नेहं युज्याद् भास्वति निर्मले॥ ऋतौ साधारणे ........................॥ अर्थात् स्नेहपान साधारण ऋतुओं में ही किया जाता है। अधिक सर्दी, गर्मी एवं वर्षा में स्नेहपान साधारणतया निषिद्ध है। आत्ययिक अथवा शीघ्रकारी व्याधियों के लिये शास्त्रों में इसके अपवाद भी दिये हैं।
अनुपानमुष्णमुदकं घृतस्य, तैलस्य यूषमिच्छन्ति।
मज्जवसयोस्तु मण्डं, सर्वेषां कश्यपः पूर्वम् ॥११॥
स्नेहों के अनुपान-घृत का अनुपान उष्ण उदक है (घृत के पश्चात् उष्ण जल पीना चाहिये), तैल का यूष तथा मज्जा और वसा का अनुपान मण्ड है। अथवा भगवान् कश्यप के मत में पहला अर्थात् उष्णजल सब स्नेहों का अनुपान हो सकता है। चरक में इसी अभिप्राय को निम्न श्लोकों में प्रकट किया गया है—जलमुष्णं घृते पेयं, यूषस्तैलेऽनुशस्यते। वसामज्जोस्तु मण्डः स्यात्सर्वेषूष्णमथाम्बु वा॥ स्नेहों के अनुपान के रूप में उष्णोदक के प्रयोग के विषय में सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—उष्णोदकानुपानस्तु स्नेहानामथ शस्यते। ऋते भल्लातकस्नेहात्स्नेहात्तोवरकात्तथा॥ अर्थात् उसने भिलावे और तुवरक (Chaulmoogra oil) के तेल में अनुपान रूप में उष्णोदक का निषेध किया है। इनके बाद शीतल जल का ही प्रयोग करना चाहिये।
शूलकफानिलतृष्णाहिक्कारोचकविबन्धगुल्मघ्नम्। व्रणधातुमृदूकरणं दीपनमुष्णोदकमुशन्ति ॥१२॥
उष्णजल के गुण—उष्णजल--शूल, कफ, वायु, तृष्णा, हिक्का, अरुचि, मलबन्ध तथा गुल्म का नाशक है। यह व्रण और धातुओं को मृदु करता है तथा दीपन है।
पादावशेषसिद्धं तद्दोषघ्नैः शृतं जलं मुख्यम्। पेयं कवलग्राहं स्नेहं हि तथा विलाययति ॥१३॥
उष्णोदक की अनुपानविधि—भिन्न २ दोषों को नष्ट करनेवाले द्रव्यों से शृत बनाकर (पकाकर) चतुर्थांश शेष रहने पर उस जल का पान करना चाहिये तथा कवल धारण करना चाहिये। इससे सेवन किये हुए स्नेह का विलय हो जाता है।
वक्तव्य—कवल से अभिप्राय मुँह में पानी लेकर कुल्ले (गरारे-Gargles) करने से है। कहा भी है—सुखं संचार्यते या तु मात्रा सा कवलग्रहा। असंचार्या तु या मात्रा गण्डूषः स प्रकीर्तितः॥ अर्थात् यदि जल केवल मुँह में धारण किया जाय तो उसे गण्डूष कहते हैं। यह दोनों में अन्तर है।
पयसि दधनि मधुमये तूक्ते नोष्णोदकं भवेत् पथ्यम्।
पित्ते रक्तस्रावे गर्भच्यवने च गर्भदाहे च ॥१४॥
उष्णोदक अनुपान का निषेध—दूध, दही तथा मधु युक्त द्रव्य के सेवन के बाद तथा पित्तप्रकोप, रक्तस्राव (Haemorrhage) गर्भच्युति (Abortion) तथा गर्भदाह में उष्णोदक का अनुपान नहीं करना चाहिये।
| २६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | स्नेहाध्यायः २२] |
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ओदनविलेपिकाभ्यां रसमांसक्षीरदधियवागूभिः । काम्बलिकसूपयूषैः पेयाशनभक्ष्यविकृतीभिः ।।१५।।
स्नेहप्रयोग इष्टः सोर्ध्वाधः कर्मभिः खला(डा)भ्यङ्गैः । चक्षुर्वदनश्रोत्रैर्धारणयोगश्च सात्म्यज्ञैः ।।१६।।
स्नेहों की प्रविचारणाएँ—१. ओदन २. विलेपी ३. मांसरस ४. मांस ५ क्षीर (दूध) ६. दही ७. यवागू ८. काम्बलिक ९. सूप १०. यूष ११. पेया १२. अशन तथा १३. भक्ष्य की विकृतियाँ १४. ऊर्ध्वकर्म (वमन) १५. अधःकर्म (विरेचन) १६. खल या खड १७. अभ्यङ्ग (मालिश) १८ जिन्हें सात्म्य हों वे चक्षु (नेत्रतर्पण) १९. वदन (गण्डूष) तथा २०. श्रोत्र (कर्णतेल) द्वारा धारण करके स्नेह का प्रयोग कर सकते हैं।
वक्तव्य—उपर्युक्त विधियों से स्नेह का प्रयोग किया जा सकता है। चरक में इनके लिये प्रविचारणा शब्द दिया गया है। चरक में इनका निम्न रूप में वर्णन किया गया है—ओदनश्च विलेपी च रसो मांसं पयो दधि । यवागूः सूपशाकौ च यूषः काम्बलिकः खडः ।। शक्तवस्तलपिष्टं च मद्यं लेहास्तथैव च। भक्ष्यमभ्यञ्जनं बस्तिस्तथा चोत्तरबस्तयः ।। गण्डूषः कर्णतैलं च नस्यं कर्णाक्षितर्पणम् । चतुर्विंशतिरित्येताः स्नेहस्य प्रविचारणाः ।। अर्थात् चरक में इनकी संख्या २४ दी है। इससे प्रतीत होता है कि काश्यपसंहिता की अपेक्षा चरक में विकसित प्रक्रिया मिलती है। इनमें आये हुए ओदन विलेपी आदि की परिभाषाएँ निम्न हैं—अन्नं पञ्चगुणे साध्यं विलेपी तु चतुर्गुणे। मण्डश्चतुर्दशगुणे यवागूः षड्गुणेऽम्भसि ।। सिक्थकै रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता । यवागूर्बहूसिक्था स्याद्विलेपी विरलद्रवा ।। अर्थात् ओदन सिद्ध करने के लिये चावलों को पाँच गुने जल में पकाकर द्रव भाग निकाल दिया जाता है। विलेपी में चावलों की अपेक्षा चौगुना जल डालकर पकाया जाता है। मण्ड बनाने के लिये १४ गुना तथा यवागू के लिये ६ गुना जल में चावलों को पकाना चाहिये। सूप-द्रवरूप पकाई हुई दाल को सूप कहते हैं। इसमें दाल की अपेक्षा १४ या १८ गुना जल देकर पकाया जाता है। चतुर्थांश जल शेष रहने पर उतार लिया जाता है। यूष-इसके लिये दाल को पोटली में बाँधकर १८ गुने जल में पकाया जाता है। जल आधा शेष रहने पर पोटली को निकाल लें। अवशिष्ट द्रव यूष कहलाता है। खड, काम्बलिक आदि का लक्षण—पिशितेन रसस्तत्र यूषो धान्यैः खडः फलैः । मूलैश्च तिलकल्काम्लप्रायः काम्बलिकः स्मृतः ।। अर्थात् फलों से जो द्रव तैयार किये जाते हैं उन्हें खड तथा मूलों से प्रायः तिलकल्क और अनारदाने आदि की खटाई देकर जो द्रव तैयार किया जाता है उसे काम्बलिक कहते हैं।
पित्तानिलप्रकृतयः स्नेहं रात्रौ पिबेयुरुष्णे च ।
श्लेष्माधिको दिवोष्णे निर्मलसूर्ये लघुत्वे च ।।१७।।
अपवाद तथा दोषभेद से स्नेहपान का काल-पित्त और वातप्रकृति वालों को आत्ययिक रोग में यदि गर्मी में भी स्नेहपान करना पड़े तो रात्रि में करना चाहिये। तथा जिसमें कफ अधिक हो उन्हें आत्ययिक रोग में यदि स्नेहपान आवश्यक हो तो दिन की गर्मी में जब कि सूर्य निर्मल हो तथा शरीर लघु हो तब करायें। चरक में भी बिलकुल यही वर्णन मिलता है—वातपित्ताधिके रात्रावुष्णे चापि पिबेन्नरः । श्लेष्माधिके दिवा शीते पिबेच्चामलभास्करे ।। अष्टाङ्गसंग्रह में निम्न वर्णन मिलता है—सर्वं सर्वस्य च स्नेहं युञ्ज्याद् भास्वति निर्मले। ऋतौ साधारणे, दोषसाम्येऽनिलकफे कफे ।। दिवा, निश्यनिले पित्ते संसर्गे पित्तवत्यपि । त्वरमाणे तु शीतेऽपि दिवा तैलं च योजयेत् ।। उष्णोऽपि रात्रौ सर्पिश्च दोषादीन् वीक्ष्य चान्यथा ।। सुश्रुत चि. अ. ३१ में भी कहा है—शीतकाले दिवानेहमुष्णकाले पिबेन्निशि । वातपित्ताधिको रात्रौ वातश्लेष्माधिको दिवा ।। अर्थात् उपर्युक्त साधारण कालों के अतिरिक्त यदि आवश्यकता पड़े तो इनसे भिन्न कालों में भी अनुकूल समय देखकर स्नेहपान कराया जा सकता है।
तृण्मूर्च्छान्मादादीन् पूर्वो लभते विपर्ययेण पिबन् ।
आनाहारुचिपर्वण्युच्छूलं च समृच्छते शेषः ।।१८।।
स्नेहाध्यायः १२] सूत्रस्थानम् २७
इनमें पूर्व अर्थात् पित्त और वातप्रकृति वाले पुरुष को विपरीत काल में अर्थात् अधिक गर्मी में स्नेहपान कराने से तृष्णा, मूर्छा तथा उन्माद हो जाता है। तथा शेष अर्थात् कफ प्रकृति वाले पुरुष को अधिक सर्दी में स्नेहपान कराने से आनाह, अरुचि तथा पर्वशूल हो जाता है।
स्नेहाच्छपाने त्रिविधा तु मात्रा ह्रस्वाऽथ मध्या महती तृतीया ।
ह्रस्वा दिनार्धेन, दिनेन मध्या, जीर्यत्यहोरात्रवशात् प्रधाना ॥१९॥
अच्छस्नेह की मात्रा—अच्छ (केवल-शुद्ध) स्नेहपान की तीन प्रकार की मात्रा मानी गई हैं। १. ह्रस्व (minimum) २. मध्यम (medium) ३. महान् (maximum)। ह्रस्व मात्रा आधे दिन (६ घण्टे) में, मध्यम मात्रा दिन भर (१२ घण्टे) में, तथा प्रधान मात्रा अहोरात्र (२४ घण्टे) में जीर्ण होती है। चरक में भी केवल शब्दों के भेद से यही अभिप्राय निम्न रूप में प्रकट किया गया है—अहोरात्रमहः कृत्स्नमर्धाहं च प्रतीक्षते । प्रधाना मध्यमा ह्रस्वा स्नेहमात्रां जरां प्रति ॥ इति तिस्रः समुद्दिष्टा मात्राः स्नेहस्य मानतः ॥ सुश्रुत ने ५ प्रकार की स्नेह की मात्राएँ बताई हैं—या मात्रा परिजीर्येत चतुर्थभागगतेऽहनि । सा मात्रा दीपयत्यग्निमल्पदोषे च पूजिता ॥ या मात्रा परिजीर्येत तथार्धदिवसे गते । सा वृष्या बृंहणी चैव मध्यदोषे च पूजिता ॥ या मात्रां परिजीर्येत चतुर्भागावशेषिते । स्नेहनीया च या मात्रा बहुदोषे च पूजिता । या मात्रा परिजीर्येत्तु तथा परिणतेऽहनि । ग्लानिर्मूर्छामदान् हित्वा सा मात्रा पूजिता भवेत् ॥ अहोरात्रादसन्दुष्टा या मात्रा परिजीर्यति । सा तु कुष्ठ विषोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी ॥ अर्थात् जो मात्रा क्रमशः एक, दो, तीन, चार तथा आठ प्रहर में जीर्ण हो।
दीप्ताग्नयो बलिनः स्नेहनित्या उन्मादिनो धृतिविण्मूत्रसक्ताः ।
गुल्मार्दिताश्चाहिदष्टा विरूक्षा वैसर्पिणः प्रवरां ते पिबेयुः ॥२०॥
स्नेह की उत्तममात्रा किन्हें देनी चाहिये—जिनकी जाठराग्नि दीप्त है, जो बलवान् हैं, जो प्रतिदिन स्नेह का प्रयोग करते हैं, जिन्हें उन्माद रोग हो, जिनकी धृति (धारण शक्ति) कमजोर हो, जिन्हें मल एवं मूत्र कठिनता से आता हो, जो गुल्मरोग से पीडित हों, जो सर्प द्वारा दष्ट हों, जिनकी प्रकृति रूक्ष हो तथा जिन्हें विसर्प रोग हो-उन्हें स्नेह की उत्तम मात्रा पीनी चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—प्रभूतस्नेहनित्या ये क्षुत्पिपासा सहा नराः । पावकश्चोत्तमबलो येषां ये चोत्तमा बले ॥ गुल्मिनः सर्पदष्टाश्च वीसर्पोपहताश्च ये । उन्मत्ताः कृच्छ्रमूत्राश्च गाढवर्चस एव च ॥ पिबेयुरुत्तमां मात्रां ।
प्रमेहकुष्ठानिलशोणितारुचिविचर्चिकास्फोटविशेषु कण्डौ ।
मृदौ तथाऽग्नौ प्रवदन्ति मध्यां बले च मध्या अशने च ये स्युः ॥२१॥
स्नेह की मध्यम मात्रा किन्हें देनी चाहिये—प्रमेह, कुष्ठ, वातरक्त, अरुचि, विचर्चिका (Pemphigus) फोड़े, विषविकार तथा कण्डू (खुजली) के रोगियों में, जिनकी जाठराग्नि मृदु है, जो मध्यबल वाले हैं तथा जो खाने में भी मध्यम हों अर्थात् जो न बहुत अधिक खाते हों और न बहुत कम—उन्हें स्नेह की मध्यम मात्रा देनी चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—अरुष्कास्फोटपिडकाकण्डूपामाभिरर्दिताः । कुष्ठिनश्च प्रमीढाश्च वातशोणितिकाश्च ये ॥ नातिबद्धाशिनश्चैव मृदुकोष्ठास्तथैव च । पिबेयुर्मध्यमां मात्रां मध्यमाश्नापि ये बले ॥
बालेषु वृद्धेषु सुखोचितेषु जीर्णेऽतिसारे ज्वरकासयोश्च ।
येषां हि कोष्ठो न गुणाय रिक्तो मन्दाग्निकाश्ये॑ च कनीयसी स्यात् ॥२२॥
स्नेह की ह्रस्व मात्रा किन्हें देनी चाहिये—बालक, वृद्ध तथा जो सुख के अभ्यासी हैं (अर्थात् जो किसी प्रकार के परिश्रम के कार्य को करने के अभ्यासी नहीं हैं), जीर्ण अतिसारज्वर तथा कासरोग में, कोष्ठ का खाली होना जिनके लिये हितकर न हो अर्थात् कोष्ठ के खाली होने पर जिन्हें कष्ट होता हो, जिनकी जाठराग्नि मन्द हो, तथा जो कृश हों—उन्हें
२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
स्नेह की ह्रस्व मात्रा देनी चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—ये तु वृद्धाश्च बालाश्च सुकुमाराः सुखोचिताः । रिक्तकोष्ठत्वमहितं येषां मन्दाग्नयश्च ये ।। ज्वरातिसारकासाश्च येषां चिरसमुत्थिताः । स्नेहमात्रां पिबेयुस्ते ह्रस्वां ये चावरा बले ।।
दोषानुकर्षिण्यनुसारिणी च यत्नोपचर्या बलवर्धनी च । ज्येष्ठाऽथ मध्या न बलं निहन्ति त्वन्योन्योः(?) स्नेहयते सुखाच्च ।। २३ ।। ह्रस्वा परिहारसुखाऽविकारा वृष्याऽथ बल्याऽप्यनुवर्तनी च । देशं वयःकालबलाग्निसात्म्यान्यालक्ष्यमात्रां मतिमान् विदध्यात् ।। २४ ।।
उपर्युक्त मात्राओं के गुण—स्नेह की उत्तम मात्रा सम्पूर्ण रोगों के मार्गों में जाते हुए दोषों को क्षीण या नष्ट करती है। यह यत्नपूर्वक सेवन करनी चाहिये (अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति आसानी से इस मात्रा का सेवन नहीं कर सकता) यह बल को बढ़ानेवाली है। मध्यम मात्रा—परस्पर एक दूसरे के बल को अधिक कम नहीं करती तथा सुख से स्नेहन कर देती है। ह्रस्व मात्रा—यह परिहार अर्थात् परहेज में सुखकर है (इस मात्रा का सेवन करते हुए परहेज स्वल्प मात्रा में तथा स्वल्प काल तक ही है) यह विकारों उपद्रवों को उत्पन्न नहीं करती तथा वृष्य (वीर्योत्पादक) है, यह बल को बढ़ाती है तथा शरीर में चिरकाल तक रहती है अर्थात् शीघ्र ही बाहर नहीं निकल जाती है। बुद्धिमान वैद्य को चाहिये कि वह देश (जांगल-आनूप आदि), अवस्था (बाल, वृद्ध, युवा आदि), काल (ग्रीष्म, शरद्, वर्षा आदि), अग्निबल तथा सात्म्य को देखकर मात्रा का निर्धारण करे अर्थात् उसे उत्तम, मध्यम और ह्रस्व में से कौन सी मात्रा देनी है—इसका निश्चय करे। इन मात्राओं के गुण चरक में निम्न प्रकार से दिये हैं—उत्तम मात्रा—विकारान् शमय येषां शीघ्रं सम्यक् प्रयोजिता । दोषानुकर्षिणी मात्रा सर्वमार्गानुसारिणी । बल्या पुनर्नवकरी शरीरेन्द्रियचेतसाम् ।। मध्यममात्रा—मात्रैषा मन्दविभ्रंशा न चातिबलहारिणी । सुखेन च स्नेहयति शोधनार्थे च युज्यते ।। ह्रस्वमात्रा—परिहारे सुखा चैषा मात्रा स्नेहनबृंहणी । वृष्या बल्या निराबाधा चिरं चाप्यनुवर्तते ।।
पित्तानिलात्माऽनिलपित्तरोगी क्षामः शिशुर्वर्णबलायुरक्तः (क्षी) । मेधेन्द्रियार्थी विषशस्त्रदाहैरार्ताः पिबेयुर्घृतमेव काले ।। २५ ।।
अब यह बतलाया जायगा कि उपर्युक्त स्नेहों में से कौन सा स्नेह किसके लिये हितकर है। घृत का सेवन किन्हें करना चाहिये—जिनकी पित्त एवं वातप्रकृति हो अथवा जिन्हें पैत्तिक एवं वातिक रोग हों, जो कमजोर हों, जो शिशु हों, जो वर्ण, बल, आयु, मेधा (धारण शक्ति) तथा इन्द्रियों को चाहनेवाले तथा जो विष, शस्त्र एवं दाह से पीडित हों— वे उचित काल में घृत का ही पान करें।
वक्तव्य—'काले' से अभिप्राय घृत के लिये निर्दिष्ट काल अर्थात् शरद् काल से है। पूर्व कहा है—‘पिबेच्छरदि सर्पिः’। चरक में निम्न वर्णन मिलता है—वातपित्तप्रकृतयो वातपित्तविकारिणः । चक्षुष्कामाः क्षताः क्षीणावृद्धाबालास्तथाऽबलाः ।। आयुः प्रकर्षकामाश्च बलवर्णस्वरार्थिनः । पुष्टिकामाः प्रजाकामाः सौकुमार्यार्थिनश्च ये ।। दीप्त्योजः स्मृतिमेधाग्निबुद्धीन्द्रियबलार्थिनः । पिबेयुः सर्पिरार्ताश्च दाहशस्त्रविषाग्निभिः ।। सुश्रुत चि. अ. ३१ में घृत के निम्न गुण दिये हैं—रूक्षक्षतविषार्तानां वातपित्तविकारिणाम्। हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिः पानं प्रशस्यते ।।
प्रवृद्धमेदःकफमांसवाता नाडीकृमिव्याध्यनिलार्तदेहाः । क्रूरानुकोष्ठास्तनुवीर्यकामास्तैलं पिबेयुर्न तु तीव्रकुष्ठे ।। २६ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३७ तमं पत्रम्।)
स्नेहाध्यायः १२] सूत्रस्थानम् २९
तैल का किन्हें सेवन करना चाहिये—जिनमें मेद, कफ, मांस तथा वात बढ़े हुए हों, जो नाडीव्रण, उदरकृमि तथा वातरोग से पीडित हों, जिनके कोष्ठ क्रूर हों, जो तनुता (कृशता-पतलापन) तथा वीर्य को चाहनेवाले हैं—उन व्यक्तियों को तैल का पान करना चाहिये। परन्तु तीव्र कुष्ठ में तैल का पान न करें। चरक सू. अ. १३ में कहा है—प्रवृद्धश्लेष्ममेदस्काश्चलस्थूलगलोदराः । वातव्याधिभिराविष्टा वातप्रकृतयश्च ये ।। बलं तनुत्वं लघुतां दृढतां स्थिरगात्रताम् । स्निग्धश्लक्ष्णतनुत्वक्तां ये च काङ्क्षन्ति देहिनः ।। कृमिकोष्ठाः क्रूरकोष्ठास्तथा नाडिभिर्दिताः । पिबेयुः शीतले काले तैलं तैलोचिताश्च ये ।। यद्यपि तैलपान का काल पहले प्रावृट् ऋतु बतलाया है परन्तु आत्ययिक विकारों में शीतकाल में भी तैल (स्नेह) पान कराया जा सकता है। इसीलिये अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २५ में कहा है—निश्यनिले पित्ते संसर्गे पित्तवत्यपि । त्वरमाणे तु शीतेऽपि दिवा तैलं च योजयेत् ।।
(इति ताडपत्र पुस्तके ३७ तमं पत्रम्)
संशुष्कमेदःकफरक्तशुक्रा वातातपाध्वश्रमरौक्ष्यनित्याः ।
भृशाग्नयो वातनिपीडिताङ्गा वसां पिबेयुर्धृतिधातुकामाः ।।२७।।
वसा का किन्हें सेवन करना चाहिये—जिनके मेद, कफ, रक्त तथा शुक्र (वीर्य) सूख गये हों (क्षीण हो गये हों), जो नित्य वात, आतप (धूप) तथा मार्ग चलने के श्रम एवं रूक्षता को सहते हैं, जिनकी अग्नि तीव्र हो, वायु से जिनके अङ्ग पीडित हों, तथा जो धृति (धारण शक्ति) और धातुओं की वृद्धि चाहते हों उन्हें वसा का पान करना चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—वातातपसहा ये च रूक्षा भाराध्वकर्शिताः । संशुष्करेतोरुधिरा निष्पीतकफमेदसः ।। अस्थिसन्धिशिरास्नायुमर्मकोष्ठमहारुजः । बलवामारुतो येषां खानि चावृत्य तिष्ठति ।। महच्चाग्निबलं येषां वसासात्म्याश्च ये नराः । तेषां स्नेहयितव्यानां वसापानं विधीयते ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३१ में भी कहा है—व्यायामकशिताः शुष्करेतोरक्ता सहारुजः । महाग्निमारुतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ।।
दीप्ताग्नयो घस्मराः स्नेहनित्याः क्लेशक्षमाः क्रूरकोष्ठानिलार्ताः ।
मज्जानमेतेषु भिषग्विद्ध्यात् स्नेहो भवेत्सात्म्यतो यस्य यो वा ।।२८।।
मज्जा का किन्हें सेवन करना चाहिये—जिनकी अग्नि दीप्त हो, बहुत खानेवाले हों, जो नित्य स्नेह का सेवन करते हों, क्लेशों को सहनेवाले हों, जिनके कोष्ठ क्रूर हों तथा जो वातरोगी हों—उन्हें चिकित्सक को मज्जा का सेवन कराना चाहिये। अथवा जिनको जो भी स्नेह सात्म्य हों उसका सेवन करना चाहिये। चरक सू. अ. १३ में भी कहा है—दीप्ताग्नयः क्लेशसहा घस्मराः स्नेहसेविनः । वातार्ताः क्रूरकोष्ठाश्च स्नेह्मा मज्जानमाप्नुयुः ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि.अ. ३१ में भी कहा हैं—क्रूराशयाः क्लेशसहा वातार्ता दीप्तवह्नयः । मज्जानमाप्नुयुः सर्वे ......... ।।
व्यायाममद्यचिन्तामैथुननित्याः श्रमाध्वकृशदेहाः ।
स्नेह्यास्तथाविधाः स्युर्बलकालवयोग्निसात्म्यज्ञैः ।।२९।।
किनका स्नेहन करना चाहिये—बल, काल, अवस्था, जाठराग्नि तथा सात्म्य को जाननेवालों को चाहिये कि नित्य व्यायाम करनेवाले, नित्य मद्य पीनेवाले, नित्य चिन्ता में लगे रहनेवाले अथवा मस्तिष्क संबन्धी कार्य अधिक करनेवाले, नित्य मैथुन (भोगविलास) में लगे रहने वाले, श्रम तथा मार्ग चलने से कृश देहवाले तथा अन्य भी इसी प्रकार के पुरुषों को स्नेहन करायें। चरक में स्नेहन के योग्य निम्न व्यक्ति दिये हैं—स्वेद्याः शोधयितव्याश्च रूक्षा वातविकारिणः । व्यायाममद्यस्त्रीनित्याः स्नेह्माः स्युर्ये च चिन्तकाः ।। अर्थात् यहाँ स्वेदन एवं संशोधन (वमन-विरेचन) के योग्य पुरुषों को विशेषरूप से गिनाया है। स्वेदन एवं संशोधन से पूर्व स्नेहन का करना अत्यन्त आवश्यक है। कहा भी है—स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमन्तरम् । स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमनन्तरम् ।।
३० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
न स्नेहयेद्गर्भिणीं न प्रसूतां न क्षीरपं नैव दग्धातिवृद्धौ । न श्लेष्मपित्तोपहतान्तराग्निं मूर्च्छारुचिग्लानिभृशामतृट्सु ॥ ३० ॥ बस्तौ न नस्तश्च विधिक्रियायां छर्द्यां ज्वरे विट्प्रकोपे कफे च । बृहत्त्वजाड्येषु गलामयेषु नस्नेहयेत् स्नेहमदात्ययेषु ॥ ३१ ॥ तेषां स्नेहाच्छपानान्ते (त्ते) वर्धन्ते व्याधयो भृशम् । असाध्यतां वा गच्छन्ति स्नेहपानाभिवर्धिताः ॥ ३२ ॥
किनका स्नेहन नहीं करना चाहिये—गर्भिणी, प्रसूता, दूध पीनेवाले बालक, दग्ध (जले हुए), जिनकी अतिवृद्धि हो (जिनके शरीर की आवश्यकता से अधिक वृद्धि हुई है), श्लेष्म एवं पित्त से जिनकी आन्तराग्नि क्षीण हुई है, मूर्च्छा, अरुचि, ग्लानि, अत्यन्त आमदोष तथा प्यास में, बस्ति एवं नस्यकर्म जिस समय किये जा रहे हों, छर्दि (वमन), ज्वर, मलरोग (अतिसार) तथा कफ के प्रकोप में, शरीर की अत्यन्त जड़ता में गले के रोगों में तथा स्नेह के अधिक सेवन से जिन्हें मदात्यय रोग हो जाता हो—उनका स्नेहन न करे इनको केवल स्वच्छ स्नेह का पान कराने से वे व्याधियाँ बढ़ जाती हैं तथा स्नेहपान से बढ़ी हुई व्याधियाँ असाध्य हो जाती हैं।
वक्तव्य—जो नित्य मद्य पीते हैं उनको स्नेहन करना चाहिये परन्तु जिन्हें अधिक मद्य के सेवन से मदात्यय रोग हो गया हो उनका स्नेहन नहीं करना चाहिये। चरक में निम्न पुरुष स्नेहन के अयोग्य गिनाये हैं—अभिष्यण्णाननगुदा नित्यं मन्दाग्नयश्च ये । तृष्णामूर्च्छापरीताश्च गर्भिण्यस्तालुशोषिणः ॥ अन्नद्विषश्छर्दयन्तो जठरामरगार्दिताः । दुर्बलाश्च प्रतान्ताश्च स्नेहम्लाना मदातुराः ॥ न स्नेह्या वर्तमानेषु न नस्तोबस्तिकर्मसु । स्नेहपानात्प्रजायन्ते तेषां रोगाः सुदारुणाः ॥ सुश्रुत चि. ३१ अ. में भी कहा है—विवर्जयेत् स्नेहपानमजीर्णी चोदरी ज्वरी । दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छार्तो मदपीडितः । छर्दार्दितः पिपासार्तः श्रान्तः पानक्लमान्वितः ॥ दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च वान्तो यश्चापि मानवः । अकाले दुर्दिने चैव न च स्नेहं पिबेन्नरः ॥ अकाले च प्रसूता स्त्री स्नेहपानं विवर्जयेत् । स्नेहपानाद्भवन्त्येषां नृणां नानाविधा गदाः ॥ गदा वा कृच्छ्रतां यान्ति न सिध्यन्त्यथवा पुनः ॥ गर्भाशये सशेषा स्यू रक्तक्लेदमलास्ततः । स्नेहं जह्यान्त्रिषेवेत पाचनं रूक्षमेव च ॥
वायोरप्रगुणत्वं रौक्ष्यं खरताऽधृतिर्ज्वलनहानिः । शुष्कग्रथितपुरीषं लक्षणमस्निग्धगात्रस्य ॥ ३३ ॥
अस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण—वायु का अपने गुणों से युक्त न होना अर्थात् अनुलोम न होना, रूक्षता, कर्कशता, अधैर्य (बेचैनी—uneasiness), जाठराग्नि की दुर्बलता, तथा पुरीष (मल) का सूखा और गाँठोंवाला होना—ये अस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १३ में अस्निग्ध के निम्न लक्षण बताये हैं—पुरीषं ग्रथितं रूक्षं, वायुरप्रगुणो, मृदुः । पक्ता, खरत्वं रौक्ष्यं च गात्रस्यास्निग्धलक्षणम् ॥ इसी प्रकार सुश्रुत में भी ये ही लक्षण दिये हैं—पुरीषं ग्रथितं रूक्षं कृच्छ्रादन्नं विपच्यते । उरो विदहते वायुः कोष्ठादुपरि धावति ॥ दुर्वर्णो दुर्बलश्चैव रूक्षो भवति मानवः ॥
धृतिर्मृदुपुरीषत्वं मेधापुष्ट्यग्नितेजसां वृद्धिः । काले शरीरवृत्तिः स्निग्धस्य वदन्ति लिङ्गानि ॥ ३४ ॥
सम्यक् स्निग्ध के लक्षण—रोगी धैर्य (easiness) अनुभव करता है, मल मृदु (नरम) हो जाता है, मेधा, पोषण, जाठराग्नि तथा तेज की वृद्धि होती है और शरीर की सब वृत्तियाँ (कार्य) ठीक समय पर होती रहती हैं—ये सम्यक् स्निग्ध के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १३ में सम्यक् स्निग्ध के निम्न लक्षण दिये हैं—वातानुलोम्य दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् । मार्दव स्निग्धता चाङ्गे स्निग्धानामुपजायते ॥
गौरवजाड्योत्क्लेशाध्मानानि पुरीषमविपक्वम् । अरुचिरपि पाण्डुतन्द्रे वदन्त्यतिस्निग्धलिङ्गानि ॥ ३५ ॥
स्नेहाध्यायः २२] सूत्रस्थानम् ३१
अतिस्निग्ध के लक्षण—शरीर का भारीपन, जड़ता, शरीर या इन्द्रियों का अच्छी प्रकार कार्य न करना, उत्क्लेश (जी मचलाना—Nausca), आध्मान (पेट का वायु के कारण फूलना), कच्चा मल आना (Undigested foeces), अरुचि, पाण्डुता तथा तन्द्रा—ये अतिस्निग्ध के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १३ में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीषस्याविपक्वता। तन्द्रीरुचिरुत्क्लेशः स्यादतिस्निग्धलक्षणम् ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३१ में भी कहा है—भक्तद्वेषो मुखस्रावो गुददाहः प्रवाहिका। पुरीषातिप्रवृत्तिश्च भृशं स्निग्धस्य लक्षणम् ।।
द्रवमितलघूष्णमन्नं काले सात्म्यं बलाग्निरुग्युक्तम्। स्वः स्नेहपानमिच्छन् भुञ्जीत शयीत गुप्तश्च ।।३६।।
स्नेहपान से पूर्व क्या हितकर है—अपने लिये स्नेहपान की इच्छावाले व्यक्ति को चाहिये कि वह द्रव (liquid), मित (मपा हुआ-मात्रा में), लघु, उष्ण, सात्म्य, बल एवं अग्नि से युक्त अन्न को उपयुक्त काल में (जो समय उपयुक्त समझा जाये) खाये तथा एकान्त में शयन करे।
वक्तव्य—यहाँ 'स्वः' के स्थान पर 'श्वः' पाठ होता तो अधिक उपयुक्त था अर्थात् अगले दिन जिसने स्नेहपान करना है उसे पहले दिन उपर्युक्त विधि का पालन करना चाहिये। चरक में कहा है—द्रवोष्णमनभिष्यन्दि भोज्यमन्नं प्रमाणतः। नातिस्निग्धमसंकीर्णं श्वः स्नेहं पातुमिच्छता ।।
उष्णोदकोपचारी जितेन्द्रियः स्यान्निवातशयनस्थः। व्यायामवेगरोधत्यागी स्नेहाच्छपोऽस्वप्नः ।।३७।।
स्नेहपान के पश्चात् क्या हितकर तथा क्या अहितकर है—स्नेह को पीकर (जीर्ण हो जाने पर) तथा पान करते हुए भी दोनों अवस्थाओं में पुरुष को उष्ण जल का सेवन (प्रयोग) करना चाहिये। जितेन्द्रिय होकर (ब्रह्मचर्यपूर्वक) रहना चाहिये। सोने तथा बैठने की जगह ऐसी होनी चाहिये जहाँ सीधी हवा न आती हो। तथा व्यायाम (परिश्रम के कार्य) वेग (मल मूत्र अपानवायु आदि के वेग) क्रोध तथा दिवास्वप्न का त्याग कर देना चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रतिभुञ्जान एव च। उष्णोदकोपचारी स्यात् ब्रह्मचारी क्षपाशयः ।। शकृन्मूत्रानिलोद्गारानुदीर्णींश्च न धारयेत्। व्यायाममुच्चैर्वचनं क्रोधशोकौ हिमातपौ ।। वर्जयेत्प्रवातं च सेवेत शयनासनम्। स्नेहमथ्योपचाराद्धि जायन्ते दारुणाः गदाः ।। इस विधि का पालन स्नेहपान के दिनों में तथा उसके बाद उतने ही दिन और करना चाहिये। इस विषय में चरक सिद्धिस्यान अध्याय १ में कहा है—कालस्तु बस्त्यादिषु याति यावांस्तावन् भवेद्विद्विःपरिहारकालः। अत्यासनस्थानवचांसि पानं स्वप्नं दिवा मैथुनवेगरोधान् ।। शीतोपचारात्तपशोकरोषांस्त्यजेदकालाहितभोजनं च ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—भोज्योन्नं मात्रया पास्यन् श्वः पिबन् पीतवानपि। द्रवोष्णमनभिष्यन्दि नातिस्निग्धमसङ्करम् ।। उष्णोदकोपचारी स्यात् ब्रह्मचारी क्षपाशयः। व्यायामवेगसंरोधशोकहर्षहिमातपान् ।। प्रवातयानापानाध्वभाष्यात्याशनसंस्थितीः। नीचात्युच्चोपधानाहः स्वप्नधूमरजांसि च ।। यान्यहानि पिबेत्तानि तावन्त्यन्यान्यपि त्यजेत् ।।
संस्निह्यति मृदुकोष्ठो नरस्त्रिरात्रेण, सप्तरात्रेण। स्नेहाच्छपानयोगाज्जीवक ! यः क्रूरकोष्ठस्तु ।।३८।।
हे जीवक ! अच्छ स्नेह के पान से मृदु कोष्ठ वाला व्यक्ति तीन दिन में स्निग्ध हो जाता है तथा कठोर कोष्ठ वाला व्यक्ति सात दिन में स्निग्ध होता है। चरक में कहा है—मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निह्यत्यच्छोपसेवया। स्निह्यति क्रूरकोष्ठस्तु सप्तरात्रेण मानवः ।।
द्राक्षापीलुत्रिफलागोरसतप्ताम्बुतरुणमद्यानि । भुक्त्वाऽथ पायसं यो मृदुकोष्ठःस्रंस्य(स)ते नान्यः ।।३९।।
२५ का.सं.
३२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
मृदु कोष्ठ वाले व्यक्ति को द्राक्षा (अंगूर या मुनक्के का रस) पीलुरस, त्रिफला, गोमूत्र, उष्णजल, नवीन तैयार की हुई मद्य, तथा दूध के सेवन करने से ही विरेचन हो जाता है। परन्तु इनसे क्रूर कोष्ठ व्यक्ति को विरेचन नहीं होता है। चरक सू. अ. १३ में कहा है—गुडमिक्षुरसं यस्तु क्षीरमृल्लोडितं दधि। पायसं कृसरं सर्पिः काश्मर्यत्रिफलारसम्।। द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा। मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते। विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन। भवति क्रूरकोष्ठस्य ग्रहबृत्यल्बणानिला।। सुश्रुत में तीन प्रकार के कोष्ठों का वर्णन किया गया है—तत्र मृदुः क्रूरो मध्य इति त्रिविधः कोष्ठो भवति। तत्र बहुपित्तो मृदु। स दुग्धेनापि विरिच्यते। बहुवातश्लेष्मा क्रूरः स दुर्विरेच्यः। समदोषो मध्यमः, स साधारणः।।
पित्तबहुलेतराल्पा ग्रहणी भवति मृदुकोष्ठानां तस्मात्।
सुविरेच्या मृदुकोष्ठाः प्रायः पित्तं ह्यधोभागि ।।४०।।
मृदु कोष्ठ वाले व्यक्तियों की ग्रहणी में पित्त का आधिक्य होता है तथा इतर दोष (वात और कफ) अल्प मात्रा में होते हैं इसलिये इन्हें विरेचन सुगमता से हो जाता है। क्योंकि पित्त इनके अधोभाग में स्थित होता है। चरक सू. अ. १३ में कहा है—उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता। मृदुकोष्ठस्य तस्मात् स सुविरेच्यो नरः स्मृतः।।
वक्तव्य—ग्रहणी से अभिप्राय क्षुद्रान्त्र का प्रारम्भिक भाग है। इसका परिमाण १२ अंगुल होता है। इसमें अर्धपक्व अन्न को पकाने के लिये पित्ताशय (Gall Bladder) से पाचक पित्त (Bile) तथा अग्न्याशय (Pancreas) से उसका रस पृथक् २ स्रोतों द्वारा आकर एक सम्मिलित मुख (Ampulla of Water) के द्वारा ग्रहणी में पहुँचता है। उनके द्वारा अपक्व अन्न का पाक होकर आगे जाता है इसे पित्तधरा कला भी कहा गया है। सुश्रुत में कहा है—षष्ठी पित्तधरा नाम या कला परिकीर्तिता। पक्वामाशयमध्यस्था ग्रहणी परिकीर्तिता।। इसी प्रकार चरक में भी इसे अग्नि का अधिष्ठान माना गया है। कहा है—अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणात् ग्रहणी मता। नाभेरुपरि सा ह्यग्नि बलोपस्तम्भबृंहिता।। अपक्वं धारयत्यन्नं पक्वंत्यजति चाप्यधः।।
तृण्मूर्छामुखशोषैः शब्दद्वेषाङ्गमर्दजृम्भाभिः। तन्द्रीवाग्देहसादैः स्नेहज्ञा(ज्ञोऽ)जीर्यतीत्याह ।।४१।।
स्नेह के जीर्ण न होने के लक्षण—स्नेह के गुणों को जाननेवाला व्यक्ति प्यास, मूर्छा, मुखशोष, शब्दद्वेष, (किसी प्रकार का शब्द अच्छा न लगना), अङ्गमर्द, जँभाई, तन्द्रा तथा वाणी और देह का अवसाद (खिन्न होना) इन लक्षणों से स्नेह के अजीर्ण को जानता है। अर्थात् उपर्युक्त लक्षणों को देखकर यह जाना जा सकता है कि सेवन किया हुआ स्नेह जीर्ण नहीं हुआ है।
जीर्णाजीर्णविशङ्की केवलमुष्णोदकं पिबेत् तद्धि।
उद्गारस्य विशुद्धिं जनयति भक्ताभिलाषं च।।४२।।
स्नेहाजीर्ण की चिकित्सा—जिस व्यक्ति को सेवन किये हुए स्नेह के जीर्ण होने या न होने की शंका हो वह केवल उष्ण जल पीये। इससे उद्गार (डकार) ठीक हो जाती है तथा भोजन में भी रुचि उत्पन्न होती है।
तैलेऽधिको(के)विदाहः, सर्पिषि मूर्च्छा, वसासु हल्लासः।
मज्जनि गौरवमेषां दोषैरल्पा प्रवृत्तिस्तु ।।४३।।
यदि स्नेहाजीर्ण तैल के आधिक्य से हो तो विदाह (कोष्ठ में जलन), घृत के आधिक्य से हो तो मूर्छा, वसा से हल्लास (जी मचलाना) तथा मज्जा से शरीर का भारीपन होगा। इन व्यक्तियों की (प्रवृद्ध) दोषों के कारण प्रवृत्ति (कार्य में रुचि) भी अल्प होती है।
स्नेहाध्यायः २२] सूत्रस्थानम् ३३
स्नेहाजीर्णे तृष्णा शूलं परिकर्तिका च यस्य स्यात् ।
समतीतजरणकाले तस्य प्रच्छर्दनं श्रेयः ॥४४॥
स्नेह के द्वारा अजीर्ण होने पर जिसे प्यास, शूल तथा परिकर्तनवत् वेदना हो उसे स्नेह के जीर्ण होने के काल के व्यतीत हो जाने पर वमन कराना श्रेयस्कर है। चरक में भी कहा है—अजीर्णे यदि तु स्नेहे तृष्णा स्याच्छर्दयेद्भिषक् । शीतोदकं पुनः पीत्वा भुक्त्वा रूक्षान्नमुल्लिखेत् ।। अर्थात् यदि वमन करने पर भी अजीर्ण लक्षण शान्त न हों तो शीतल जल पीकर पुनः वमन करे। सुश्रुत में उस अवस्था में उष्ण जल से वमन कराने का विधान दिया है—एव चानुपशाम्यन्त्यां स्नेहमुष्णाम्बुना वमेत् ।। इन दोनों के विरोध के परिहार के लिये अष्टाङ्गसंग्रह में लिखा है—अजीर्णे बलवत्यां तु शीतैर्दिग्धाच्छिरो मुखम् । छर्दयेत् तदशान्तौ च पीत्वा शीतोदकं पुनः ।। रूक्षान्नमुल्लिखेत् भुक्त्वा तादृश्यां तु कफानिले समदोषस्य निःशेषं स्नेहमुष्णा बूनोद्धरेत् ।। अर्थात् पित्त प्रकृति वाले पुरुष में शीतल जल तथा कफ वात प्रकृति एवं समदोष पुरुष में उष्ण जल का प्रयोग करे।
उद्गारस्य विशुद्धिः कांक्षा स्थिरता लघुत्वमविषादः ।
बलवागिन्द्रियसंपज्जीर्णे स्नेहे बलसुखे च ॥४५॥
कर्णाक्षिघ्राणबलं स्मृतिकेशौजसां वृद्धिधृतिपुष्टिः । शान्तिस्तद्व्याधीनां भुक्त्वाऽनु स्नेहपीतस्य ॥४६॥
स्नेह के जीर्ण हो जाने के लक्षण—उद्गार (डकार) का साफ आना, भोजन या अन्य कार्यों में रुचि होना, शरीर की स्थिरता, लघुता (हलकापन), अविषाद (खिन्नता न होना), बल, वाणी तथा इन्द्रियों का सम्पत् (श्रेष्ठ गुणों से युक्त होना) तथा बल और सुख की प्राप्ति होती है। तथा स्नेहपान के बाद कान, आँख तथा घ्राणशक्ति बलवान होती है, स्मरणशक्ति, केश, ओज की वृद्धि होती है, धारणशक्ति पुष्ट होती है तथा उन २ व्याधियों की शान्ति हो जाती है। अर्थात् जिन २ व्याधियों के उद्देश्य से स्नेह का सेवन किया गया था, स्नेहपान के बाद वे व्याधियां शान्त हो जानी चाहिये।
पित्तानिलामयघ्नं बस्त्यूरुकटीदृढीकरं वृष्यम् । ऊर्जस्करं श्रमघ्नं विद्यात् स्नेहावपीडं तु ॥४७॥
स्नेह के अवपीडन के गुण—स्नेह का अवपीडन (नासिका में स्नेह का डालना) पित्त तथा वायु के रोगों को नष्ट करता है तथा यह बस्ति, ऊरु एवं कटिप्रदेश को दृढ़ करता है और वृष्य ऊर्जस्कर (बल देनेवाला) तथा श्रम (थकावट) को दूर करने वाला है।
वक्तव्य—अवपीडन से अभिप्राय निचोड़कर रस निकालना है। कहा है—अवपीड्य दीयते यस्मादवपीडस्ततः स्मृतः। कल्कीकृतादौषधाद्यः पीडितो निस्रुतो रसः ।। सोऽवपीडः समुद्दिष्टः तीक्ष्णद्रव्यसमुद्भवः ।। गलरोगे सन्निपाते निद्रायां विषमज्वरे। मनोविकारे कृमिषु युज्यते चावपीडनम् ।। अर्थात् किसी औषधि का रस निकालकर नाक में बूँद २ टपकाने को अवपीडन कहते हैं। सन्निपात आदि रोगों में यह प्रयुक्त होता है।
वर्णस्वरमेधौजःशुक्रायुर्धृतिबलाग्निसंवृद्धिः । विण्मूत्रानिलवृत्तिः सुखेन संभोजनस्नेहात् ॥४८॥
स्नेह के सम्यक् प्रकार सेवन करने से वर्ण, स्वर, मेधा, ओज, शुक्र, आयु, धृति (धारण शक्ति) बल तथा जाठराग्नि की वृद्धि होती है तथा मल, मूत्र एवं वायु सुखपूर्वक सर जाते हैं।
ज्वरपाण्डुकुष्ठशोथास्तृण्मूर्च्छाच्छर्दिरोचकोत्क्लेदाः । ग्रहणीन्द्रियोपघातस्तैमित्यानाहशूलाद्याः ॥४९॥
स्नेह के अपचार अर्थात् विधिपूर्वक सेवन न करने से ज्वर, पाण्डु, कुष्ठ, शोथ, प्यास, मूर्च्छा, छर्दि (वमन), अरुचि उत्क्लेद (जी मचलाना), ग्रहणीरोग अर्थात् संग्रहणी (अथवा ग्रहणी रोग और इन्द्रियोपघात अर्थात् इन्द्रियों का स्वस्थ न होना), स्तैमित्य (जड़ता), आनाह (अफारा) तथा शूल आदि रोग हो जाते हैं। चरक सू. अ. १३ में कहा है—तन्द्रा