भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 371

क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९] सूत्रस्थानम् ९३

शुद्ध क्षीर के लक्षण—बालक के बल, अङ्ग तथा आयु अव्याहत (निर्बाध) हों, वह रोगों से रहित (स्वस्थ) होकर सुख पूर्वक वृद्धि को प्राप्त होता हो तथा शिशु एवं धात्री को कोई कष्ट न हो तो दूध को शुद्ध समझना चाहिये।

वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में शुद्ध स्तन्य के निम्न भौतिक गुण दिये हैं—प्रकृतवर्णगन्धरसस्पर्शमुदपात्रे दुह्यमानमुदकं व्येति, प्रकृतिभूतत्वात्, तत्पुष्टिकरोमारोग्यकरञ्चेति स्तन्यसम्पत्। जिसका वर्ण गन्ध, रस तथा स्पर्श स्वाभाविक हों और जो जलयुक्त पात्र में दुहा जाने पर जल के साथ मिलकर एक हो जाय वह दूध शुद्ध होता है। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—अथास्याः स्तन्यमप्सु परीक्षेत, तच्चेच्छीतलममलं तनु शङ्खावभासमप्सु न्यस्तमेकाभावं गच्छत्यफेनिलमतन्तुमन्नोत्प्लवते न सीदति वा तच्छुद्धमिति विद्यात्। तेन कुमारस्यारोग्यं शरीरोपचयो बलवृद्धिश्च भवति। यही लक्षण सुश्रुत निदान स्थान में भी दिया है—यत्क्षीरमुदके क्षिप्तमेकीभवति पाण्डुरम्। मधुरं चाविवर्णं च प्रसन्नं तद्विनिर्दिशेत्॥

संभवन्ति महारोगा अशुद्धक्षीरसेवनात्। तेषामेवोपशान्तिस्तु शुद्धक्षीरनिषेवणात् ।।

अशुद्ध दूध के सेवन से बालक को कई बड़े २ रोग हो जाते हैं। शुद्ध दूध के सेवन से वे ही रोग शान्त हो जाते हैं। अर्थात् शिशु दूध पर ही आश्रित होता है। यदि दूध दोष-युक्त होगा तो उसे अनेक प्रकार के रोग हो जायेंगे। यदि दूध शुद्ध होगा तो सब रोग शान्त हो जाते हैं।

तृणं कीटं तुषं शूकं मक्षिकाऽङ्गमलाष्टकम् (ङ्गानि लोष्टकः)।
केशोर्णास्थ्यादिकं विद्याद्वज्रमित्युपचारतः ।।

वज्र का लक्षण—तृण, कीट (कीड़े) तुष (धान के छिलके) शूक (ऊर्णादि भक्षक कीट), मक्खियों के शरीर के अवयव तथा लोष्ठ (पत्थर), केश, इन तथा अस्थि आदि ये सब उपचार से वज्र कहलाते हैं।

सहान्नपानेन यदा धात्री वज्रं समश्नुते। पच्यमानेन पाकेन ह्यन्नत्वान्न पच्यते ।।
अपच्यमानं विक्किन्नं वायुना समुदीरितम्। रसेन सह संपृक्तं याति स्तन्यवहाः सिराः ।।
सर्वस्रोतांसि हि स्त्रीणां विवृतानि विशेषतः। तत् पयोधरमासाद्य क्षिप्रं विकुरुते स्त्रियाः ।।

स्तनरोगों का कारण—जब धात्री अन्नपान (खाने पीने) के साथ 'वज्र' को खाजाती है तो वह वज्र अन्न न होने से (foreign body होने से) पच्यमानावस्था अथवा पाकावस्था में नहीं पचता है। न पचा हुआ वह 'वज्र' क्लेद को प्राप्त हुआ २ वायु से धकेला जाकर रस के साथ मिलकर स्तन्यवहा शिरा (mammary ducts) में पहुँच जाता है। इससे स्त्रियों के सब स्रोत बन्द हो जाते हैं इस प्रकार वह स्त्री के स्तनों में पहुंचकर शीघ्र ही विकार उत्पन्न करता है। अर्थात् जब स्त्री किसी ऐसे विजातीय द्रव्य का सेवन कर लेती है जो वास्तव में शरीर के लिये सात्म्य न हो तब वह विजातीय द्रव्य (foreign body) होने से शरीर में पचता नहीं है तथा वह रसवाहिनी स्रोतों के मार्ग बन्द कर देता है। इस प्रकार वह मल स्तनों में पहुंचकर विकार उत्पन्न कर देता है।

रूपाणि पीतवज्रायाः प्रवक्ष्याम्यत उत्तरम्। अजीर्णमरतिग्लानिर्निमित्तं व्यथाऽरुचिः ।।
पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च शिरोरुग् द(क्ष) वथुग्रहः। कफोत्क्लेदो ज्वरस्तृष्णा विड्भेदो मूत्रसंग्रहः ।।
स्तम्भः स्रावश्च कुचयोः सिराजालने संतः। शोथशूलरुजादाहैः स्तनः स्प्रष्टुं न शक्यते ।।
स्तनकीलकमित्याहुर्भिषजस्तं विचक्षणाः। कीलवत् कठिनोऽङ्गेषु बाधमानो हि तिष्ठति ।।

अब मैं 'पीतवज्रा' (जिसने बज्र का सेवन कर लिया है) स्त्री के लक्षणों का वर्णन करूँगा। पीतवज्रा के लक्षण—उस स्त्री को अजीर्ण, अरति, ग्लानि, बिना कारण के शरीर में पीडा, अरुचि, पर्वभेद (सन्धियों में पीडा), अङ्गमर्द,