भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]


स। आमैस्तैरैव यः सीधुः स च शीतरसः स्मृतः ॥ इसी प्रकार शार्ङ्गधर संहिता में भी कहा है—ज्ञेयः शीतरसश्शीधुरपक्वमधुरद्रवैः । सिद्धः पक्वरसश्शीधुरसपक्वमधुरद्रवैः ॥

वटादीनां च वृक्षाणां क्षीरिकायाश्च वल्कलम् । पाक्यः कषायः क्वथितः क्षीरं तेन पुनः शृतम् ॥ पाक्यं गुडविडोपेतं सघृतं शालिमाशयेत् । अपि शुष्कस्तनीनां तत् क्षीरोपजननं परम् ॥

वटादि वृक्ष एवं क्षीरी वृक्षों की छाल का क्वाथ बनाकर उसमें यवक्षार डालें। अब इसमें क्षीर (दूध) डालकर पुनः पकाया जाय। इसमें पाक्य (पांशुलवण या सौवर्चल लवण), गुड, विडलवण और घृत मिलाकर शालि चावलों का सेवन करने से शुष्कस्तनी (जिनका दूध सूख गया है) स्त्रियों के भी दूध आ जाता है ।

शालिषष्टिकदर्भाणां कुशगुन्द्रेत्कटस्य च । सारिवावीरणेक्षूणां मूलानि कुशकाशयोः ॥ पेयानि पूर्वकल्पेन श्रेष्ठं क्षीरविवर्धनम् । स्वभावनष्टे शुष्के वा दुष्टे साध्वीक्षिते हितम् ॥

इसी प्रकार शालिधान्य, षष्टिक-धान्य, दर्भ, कुश, गुन्द्रा (जलज दर्भ), इत्कट (तृण भेद अथवा शर) सारिवा, वीरण (खस) इक्षु, कुश तथा काश की जड़ें लेकर उनके साथ दुग्ध का संस्कार करके पूर्वोक्तानुसार क्वाथ बनाकर सेवन करना दूध के बढ़ाने का श्रेष्ठ उपाय माना गया है । उपर्युक्त प्रयोगों से स्वभाव से ही नष्ट, शुष्क अथवा दृष्टि दोष (नजर लगने) से दूषित हुआ दुग्ध पुनः शुद्ध रूप में प्रवृत्त होने लगता है ।

वक्तव्यक्षीरीवृक्ष—न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थपारीषप्लक्षपादपाः । चरक शा. अ. ८ में दुग्धवर्धक ओषधियां निम्न दी हैं—क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि ग्राम्यानूपौदकानि च शाकधान्यमांसानि द्रवमधुराम्लभूयिष्ठाश्चाहाराः क्षीरिण्यश्चौषधयः क्षीरपानं चानायासश्चेति, वीरणशालिषष्टिकेश्क्षुवालिका दर्भकुशकाशगुन्द्रेत्कटमूलकषायाणां च पानमिति क्षीरजननान्युक्तानि । इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में कहा है—क्रोधशोकावात्सल्यादिभिश्च स्त्रियाः स्तन्यनाशो भवति । अथास्याः क्षीरजननार्थं सौमनस्यमुत्पाद्य यवगोधूमशालिषष्टिकमांसरससुरासौवीरकपपिण्याकलशुनमत्स्यकसेरुकशृङ्गाटकबिसविदारीकन्दमधुकशताव- रीनलिकालाबूकालशाकप्रभृतीनि विदध्यात् ।। घोष के मैटिरिया मैडिका में लिखा है—An injection of placental extract increases the secretion of milk, so does pituitary extract. The secretion of milk is also influenced by various other factors and reflexes. It is possible that the nerve supply of the mammary glands is different from other glands. Thus pilocarpin, which increases the secretion of other glands, has no effect on the secretion of milk. Prolactin preparations have been used to increase secretion of milk. Urea is supposed to be a true galactagog. पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान में Placente extract, Pituitary extract तथा Urea मुख्य रूप से दुग्ध-वर्धक ओषधियां मानी गई हैं । स्तन्यवर्धन के लिये उपर्युक्त सब ओषधियां प्रयोग में लाई जाती हैं परन्तु वास्तव में स्तन्यप्रवृत्ति का मुख्य कारण (Factor) मानसिक है अर्थात् माता या धात्री का बालक के प्रति प्रेम या आकर्षण मुख्य कारण है । यदि धात्री को बालक के प्रति प्रेम या आकर्षण नहीं है तो उपर्युक्त सब उपाय लगभग व्यर्थ सिद्ध होते हैं । इसलिये सुश्रुत के निदान स्थान अ. १० में कहा है कि शुक्र प्रवृत्ति के समान स्तन्यप्रवृत्ति भी मानसिक भावों पर आश्रित है—आहाररसयोनित्वादेवं स्तन्यमपि स्त्रियाः । तदेवापत्य संस्पर्शाद् दर्शनात् स्मरणादपि ॥ ग्रहणाच्च शरीरस्य शुक्रवत्संप्रवर्तते ॥ स्नेहो निरन्तरस्तत्र प्रस्त्रवे हेतुरुच्यते ॥ जब माता प्रेम से बालक को देखती है अथवा उसे गोद में उठाती है तब उसके स्तनों की ओर रक्त का प्रवाह बढ़कर उनसे दुग्ध का स्त्राव होने लगता है ।

अव्याहतबलाङ्गायुररोगो वर्धते सुखम् । शिशुधात्र्योरनापत्तिः शुद्धक्षीरस्य लक्षणम् ॥