भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ] सूत्रस्थानम् ११

क्षीरविकारविशेषानभिसमीक्ष्य मात्रां कालं चेति क्षीरविशोधनानि। इसी प्रकार सुश्रुत. सू. अ. ३८ में स्तन्यशोधन के लिये वचादि, हरिद्रादि तथा मुस्तादि तीन गण दिये हैं—वचामुस्तातिविषाभभयाभद्रदारूणि नागकेशरं चेति। हरिद्रादारुहरिद्राकलशीकुटजबीजानि मधुकं चेति ॥ एतौ वचाहरिद्रादी गणौ स्तन्यविशोधनौ। मुस्ताहरिद्रादारुहरिद्रा-हरीतक्यामलकविभीतककुष्ठहैमवतीवचापाठाकटुरोहिणीशार्ङ्गेष्टातिविषाद्राविडीभल्लातकानि चित्रकश्चेति। एष मुस्त्रादिको नाम्ना गणः श्लेष्मविपूदनः । योनिदोषहरः स्तन्यशोधनः पाचनस्तथा ॥

पटोलादि गण—सुश्रुत सू. अ. ३८ में कहा है—पटोलचन्दनकुचन्दन मूर्वा गुडूची पाठा कटुरोहिणी चेति।

सक्षौद्रः कफसंसृष्टे सघृतः शेषयोर्भवेत् । नेत्येके श्लेष्मणः स्थानात् क्षीरं हि कफसंभवम् ॥

उपर्युक्त कषाय कफ से दूषित हुए दूध के लिये मधु के साथ तथा शेष दोनों (वात तथा पित्त) से दूषित में घृत के साथ देना चाहिये। कुछ विद्वानों का मत है कि इसे घृत के साथ नहीं देना चाहिये क्योंकि घृत श्लेष्मा (कफ) का स्थान है तथा दुग्ध कफ से उत्पन्न हुआ है।

मसूरः षष्टिका मुद्गाः कुलत्थाः शालयो घृतम् । गव्यमाजं पयः काले लवणं चाप्यनौद्भिदम् ।। आहारविधिरुद्दिष्टः स्तन्यशोधनकालिकः । गुर्वन्नस्नेहमांसानि दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ।।

दुग्ध शोधन काल में मसूर, षष्टिक (सांठी के चावल), मूंग, कुलथी, शालि चावल, घृत, गोदुग्ध, अजादुग्ध और अनौद्भिद (कृत्रिम) लवण आदि आहार का सेवन करना चाहिये तथा गुरु अन्न, स्निग्ध द्रव्य, मांस एवं दिवास्वप्न का त्याग कर देना चाहिये।

वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में क्षीरशोधन काल में निम्न आहार विधि दी गई है—पानाशनविधिस्तु दुष्टक्षीराया यवगोधूमशालिषष्टिकमुद्गहरेणुककुलत्थसुरासौवीरकतुषोदकमैरेयमेदकलशुनकरञ्जप्रायः स्यात्, क्षीरदोषविशेषांश्चावेक्ष्यावेक्ष्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात् ।। यव गोधूम आदि के सेवन के साथ २ दूध के दोषों की परीक्षा करके उन २ दोषों के अनुसार ही अन्नपान के उस २ विधान का पालन करना चाहिये।

शोधनाद्वा स्वभावाद्व्वा यस्याः क्षीरं विशुष्यति । तस्याः क्षीरप्रजनने प्रयतेत विचक्षणः ।।

विद्वान् वैद्य को चाहिये कि उपर्युक्त शोधनों द्वारा अथवा स्वभाव से ही जिस स्त्री का दूध सूख जाता है उसके क्षीरजनन (दुग्धवृद्धि) का प्रयत्न करे।

मधुराण्यन्नपानानि द्रवाणि लवणानि च । मद्यानि सीधुवर्ज्यानि शाकं सिद्धार्थकादृते ।। वराहमहिषादूर्ध्वं मांसानां च रसो हितः । लशुनानां पलाण्डूनां सेवनं शयनं सुखम् ।। (क्रोधाध्व) भयशोकानामायासानां च वर्जनम् । अ....या भवति वत्स इति क्षीरविवर्धनम्¹ ।।

आगे दुग्धवृद्धि के लिये बहुत से प्रयोग दिये गये हैं। मधुर अन्नपान, द्रवपदार्थ, लवण, सीधुरहित मद्य, सिद्धार्थक (श्वेत सरसों) से भिन्न शाक, सूअर तथा महिष (भैंसे) को छोड़कर अन्य पशुओं का मांसरस, लशुन, पलाण्डु सुखपूर्वक शयन करना, क्रोध, मार्गगमन, भय, शोक तथा अन्य परिश्रम के कार्यों का परित्याग-दुग्धरहित स्त्री के लिये सभी क्षीरवर्धक उपाय हैं।

वक्तव्य—सीधु-गन्ने के रस से बनाई हुई मद्य (Spirit distilled from sugar cane juice) को सीधु कहते हैं। यह पक्व एवं अपक्व भेद से दो प्रकार की होती है। भावप्रकाश में कहा है—इक्षोः पक्ववैः रसैः सिद्धः सीधुः पक्वरसश्च


१. अपया या भवेत्तस्या एतत् क्षीरविवर्धनम्, इति पाठश्चेत् साधु ।