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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

३३४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

पाश्चात्य देशों में गये हुए भारतीय भिक्षुक अथवा चिकित्सकों की सन्तति प्रतीत होती है। पोकाक¹ ने भी इसी आशय के विचार प्रकट किये हैं। अन्य देशों के इतिहासों में भी बहुत ऐसे व्यक्ति निलीन अवस्था में मिल सकते हैं। अन्य देशों के इतिहासों में भी बहुत से ऐसे भारतीय नाम मिलते हैं जो कि उन-उन देशों की भाषाओं के कारण विकृत होकर उन-उन देशों के व्यक्तियों के ही नाम प्रतीत होते हैं। जिस प्रकार विद्वानों के कथनानुसार कलोनस (Kalonos) नामक भारतीय व्यक्ति कल्याण प्रतीत होता है उसी प्रकार इतिहास में अन्य भी बहुत से भारतीय व्यक्ति हो सकते हैं जो अपरिचित तथा अन्य देश के प्रतीत होते हैं चरक, सुश्रुत, काश्यप तथा भेड आदियों के ग्रन्थों में आये हुए तथा अन्य भी प्राचीन आचार्यों के नामों का निर्वचन, पर्यालोचन तथा विषयानुसन्धान करने पर भी देश, काल तथा स्वरूप के अनुसार आयुर्वेद की पूर्वावस्था का थोड़ा बहुत परिचय मिल सकता है। किन्तु विस्तारमय से अब हम अधिक नहीं लिखते हैं।

वैदिक साहित्य मूलक भारतीय भैषज्य

वैदिक साहित्य में मान्त्रिक प्रक्रियाओं के मिलने पर भी अकेली भेषज प्रक्रिया के भी उदाहरण कम नहीं हैं। अपितु बहुत से असाधारण विषय ऋग्वेद में भी मिलते हैं और अथर्ववेद में तो शारीरिक ओषधियां, शस्त्रचिकित्सा, रोगनिर्देश, रोगोपचार इत्यादि भैषज्य संबन्धी विषय ओतप्रोत रूप से मिलने का पूर्व (पृ. ५-८) निर्देश किया जाचुका है। वैदिक मन्त्रों से ३६० अस्थियों² तथा सैकड़ों हजारों सिराओं³ (हिरा) और धमनियों का पौर्वकालिक ज्ञान स्पष्ट है। शतपथ⁴ ब्राह्मण में ३६० अस्थियों का वर्णन मिलता है। वैदिक याग (यज्ञ) प्रक्रिया के पाशुकविभाग में न केवल पशुओं का अपितु मनुष्यों के भी बलि में भिन्न-भिन्न अवयवों के पृथक्करण तथा जोडने का वर्णन मिलने से तद्विषयक ज्ञान स्पष्ट प्रकट होता है। चर्बी तथा हृदय के निकालने में हस्तकुशलता भी विज्ञान को बढ़ाने वाले अभ्यास को सूचित करती है। वैदिक विषयों के पण्डित कीथ तथा म्याकडोनल⁵ आदियों ने भी लिखा है कि 'अथर्व वेद के दशम काण्ड के द्वितीयसूक्त में शारीरिक अस्थियों का सुन्दर एवं आनुक्रमिक वर्णन मिलता है। वैदिक काल के भारतीयों को प्रारंभ में शरीर तथा शारीरिक विज्ञान से संबद्ध विषयों का ज्ञान था।

ऋग्वेद, अथर्ववेद तथा यजुर्वेद के मन्त्रों के अनुसार बहुत सी ओषधियों के ज्ञान तथा उपयोग का वर्णन पहले किया जा चुका है। विकृत तथा भग्न अवयवों के रोहण तथा सन्धान के लिये ओषधियों की प्रार्थना अथर्ववेद⁶ में मिलती है। ऋग्वेद में सोम का ओषधियों के राजा के रूप में वर्णन भी अनेक स्थानों पर मिलता है। सोम संबन्धी यज्ञ की प्रक्रिया के प्रारंभ होने के साथ ही सोम का प्रधान ओषधि के रूप में परिचय मिलता है। बहुत से मन्त्रों से अश्विनीकुमारों के वैद्य होने तथा सोम और अश्विनीकुमारों के पारस्परिक घनिष्ठ संबन्ध का ज्ञान होता है। सुश्रुत में भी अनेक स्थानों पर सोम का ओषधि रूप में निर्देश मिलता है। सोम का याज्ञिक तथा भेषजसंस्थाओं से विशेष संबन्ध होने से भी यह विद्या प्राचीन सिद्ध होती है। अथर्ववेद में कुछ ओषधि के वर्णन कारक सूक्त⁷ में कुछ ओषधि का प्राचीनकाल में इक्ष्वाकु काम्य तथा वस द्वारा ज्ञान होने के निर्देश से प्रतीत होता है कि प्राचीन काल से ही ओषधियों का अन्वेषण तथा ज्ञान बहुत से लोगों को था। इतना ही नहीं, अपितु वैदिक मन्त्रों से उस समय हजारों ओषधियों तथा सैकड़ों वैद्यों के होने का ज्ञान भी मिलता है। और वैदिक काल में ही नहीं, अपितु 'या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा' इत्यादि वैदिक मन्त्रों से भी ज्ञात होता है कि तीनों युगों से पूर्व भी ओषधियों का ज्ञान था।


१. १-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५२-१५३ देखें।
५. वैदिक कालीन भारतीय लोगों की अभिरुचि पर्याप्त पहले ही शारीर शास्त्र के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की ओर आकृष्ट हो गई थी। अथर्ववेद के एक मन्त्र में मानवशरीर के विविध अङ्गों का वर्णन बड़ी सूक्ष्मता और पूर्णता के साथ उपलब्ध होता है।
६. ६-७ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५३ में देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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वैदिक नक्षत्र इष्टि में शतभिषक् नामक नक्षत्र का तथा याज्या, अनुवाक्या और तैत्तिरीय¹ मन्त्रों में वरुण तथा शतभिषक् नक्षत्र का सैकड़ों ओषधियों को पूर्ण करके आयुष्य को देने वाले के रूप में उल्लेख मिलता है । इसलिये इस मन्त्र के अनुसार सैकड़ों ओषधियों को देने वाले इस नक्षत्र का उस नाम से व्यवहार प्राचीन प्रतीत होता है । वहीं दूसरे ब्राह्मण वाक्यों में शतभिषक् का एक अन्य निर्वचन² दिया है कि ‘असुरप्रहारशतस्य चिकित्सने देवानामाराेग्यलब्धिर्यस्मिन्नक्षत्रे बभूव स एव शतभिषक् इति’ अर्थात् जिस नक्षत्र में चिकित्सा द्वारा असुरों के सैकड़ों प्रहारों से देवताओं को आरोग्य लाभ हुआ हो वह शतभिषक् नक्षत्र है । कृत्तिका आदि नक्षत्रों का काल गणना से भी अत्यन्त प्राचीन सिद्ध होता है । उनमें से एक नक्षत्रवाचक शतभिषक् छन्द का वैदिक काल में भी अनुसन्धान करने पर प्रतीत होता है कि लाखों ओषधियों, उनके उपयोग तथा लाभों का अत्यन्त प्राचीनकाल से ही ज्ञान था ।

उपनिषदों³ में भी आध्यात्मिक प्रक्रियाओं में नाडी आदि का ज्ञान मिलता है । योगमार्ग में भी शारीरिक प्राणवह सूक्ष्म नाडियों का अनेक प्रकार का ज्ञान तथा आन्तरिक वायु के इच्छानुसार सञ्चार तथा निरोध आदि में कुशलता का वर्णन मिलता है । तान्त्रिक पद्धति में भी षट्चक्रभेदन, भिन्न-भिन्न स्थानों से वर्णों की उत्पत्ति, मूर्धभाग में कान, आंख, नाक आदि से संबन्ध रखने वाली इन्द्रियों का ज्ञान कराने वाली नाडियों का अनुसन्धान, ज्ञानवहा नाडियों का केन्द्रस्थानीय गुरुपद (प्रधानस्थान) में कुण्डलिनी से उत्पन्न हुई जीवशक्ति के संयोग से लाभ तथा आस्वादन आदि आन्तरिक ज्ञान के होने का वर्णन मिलने से इस विषय में उनका अन्तर्मुखी ज्ञान प्रकट होता है । महेञ्जोदारो के भूगर्भ में उपलब्ध योगावस्था की मूर्तियों की रचना को देखकर भी प्रतीत होता है कि यौगिक आन्तरिक क्रियाओं का विज्ञान प्राचीन था । वसन्त⁴ जी. रेले (V. G. Rale) ने वैदिक मन्त्रों में आये हुए आन्तर नाडी चक्र तथा उनके अधिष्ठातृदेवों के विषय में बहुत सा प्रकाश डाला है ।

याज्ञवल्क्य⁵ स्मृति में योग के द्वारा शरीर की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए विवरण सहित ३६० अस्थियों, प्राणों के आयतन, ७०० शिराओं, ९०० स्नायुओं, २०० धमनियों, ५०० मांसपेशियों, रसों के परिमाण वाले केश, रोम आदि तथा हृदय से निकली हुई ७२ हजार नाडियों का निरूपण करके इस विज्ञान को योग के लिये उपयोगी बतलाया है । रामायण तथा महाभारत में भी शस्त्र वैद्यक के विषय के होने का निर्देश किया जा चुका है । कौटिलीय अर्थशास्त्र में भी शस्त्र वैद्यक से संबन्धित बहुत से विषय मिलते हैं । उसके चौदहवें औपनिषद अधिकरण में परघात, अद्भुत उत्पत्ति वाली भैषज्य, मन्त्रयोग तथा अपनी सेना के नाश के प्रतीकार संबन्धी बहुत सी ओषधियों के प्रयोग दिये हुए हैं ।

वेद संसार के सब साहित्यों में श्रेष्ठ माना जाता है । पूर्व निर्दिष्ट प्राचीनतम हितीति (Hittites) तथा मित्तानी (Mittani) जातियों के पारस्परिक सन्धिशिलालेख में नासत्य, मित्र, वरुण तथा इन्द्र आदि वैदिक देवताओं के साक्षिरूप में उल्लेख का अनुसन्धान करने पर उस समय अपनी प्रतिज्ञा के पालन में साक्षिरूप से किये गये वैदिक देवताओं के उल्लेख से वैदिक सभ्यता की केवल तात्कालीनता ही सूचित नहीं होती है अपितु उस समय तथा उतने दूर अन्य भाषा तथा अन्य जातियों के शिलालेख में भी वैदिक देवताओं के साक्षिरूप में निर्देश तथा उद्धरण के मिलने से वैदिक सभ्यता की सर्वोपरिभाव से प्रतिज्ञा तथा प्रचार के साथ-साथ पूर्वपरम्परा द्वारा अनुवृत्ति तथा अत्यन्त प्राचीनता भी सूचिता होती है । और इतना ही नहीं अपितु ऋग्वेद आदि वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर आये हुए भैषज्य विद्या के प्राचीन आचार्य नासत्यों का भी इस शिलालेख में उल्लेख होने से भैषज्य विज्ञान की भी प्राचीनता सूचित होती है ।

इसके अतिरिक्त वैदिक यज्ञों में अश्वमेध की बड़ी प्रतिष्ठा समझी जाती थी । प्राचीन इतिहास में अनेक शक्तिशाली राजाओं द्वारा चारों ओर के राजाओं को वश में करके अपने गौरव के बढ़ाने तथा पारलौकिक कल्याण की प्राप्ति के लिये इस यज्ञ के अनुष्ठान का अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है । वैदिककाल से प्रवर्तित इस यज्ञ की अन्ततोगत्वा वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक पुष्यमित्र द्वारा भी किया गया था जिससे उसकी बहुत प्रतिष्ठा बढ़ गई । समुद्रगुप्त के शिलालेख में भी इस यज्ञ का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया गया है । इस यज्ञ का प्रायः श्रुतियों की सभी शाखाओं, संहिताओं, ब्राह्मणग्रन्थों


१. १-५ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५४ में देखें ।

३३६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

तथा श्रौतसूत्रों में निर्देश मिलता है। इस अश्वमेध के समय राजाओं की परिषद् में महर्षियों के सम्मुख वर्ष भर गाई जानेवाली भिन्न-भिन्न गाथाओं में तीसरे दिन भेषज विद्या के कीर्तन किये जाने का आश्वलायन १ तथा शाङ्ख्यायन २ सूत्र में भी निर्देश मिलता है। मैक्समूलर ३ (Moxmuller) का भी कहना है कि अश्वमेध में भेषज विद्या का कीर्तन किया जाता था चरणव्यूहकार ने ऋक्, यजु, साम तथा अथर्व प्रस्थानों की सैकड़ों तथा हजारों शाखाओं के विभक्त होने का प्रतिपादन किया है। कालक्रम से बहुत सी शाखाओं के नष्ट हो जाने पर भी आजतक अनेक शाखाएं उपलब्ध होती हैं। कुछ अन्य शाखाओं के जो श्रौत एवं स्मार्त सूत्र उपलब्ध होते हैं उनसे उन-उन मूल श्रुति शाखाओं के विलोप होने का अनुमान होता है। ये वेद आनुश्रविक प्रक्रिया से उन-उन शाखाओं के रूप में अत्यन्त प्राचीन काल से असंख्य आर्य महर्षियों के भावनाओं, हृदयों तथा मुखों में ओतप्रोत हुए अपनी चारों और फैली हुई गौरवपूर्ण स्थिति को सूचित करते हैं इस प्रकार के वैदिक सम्प्रदाय में अश्वमेध सदृश महत्त्वपूर्ण यज्ञ के अङ्गरूप में भेषज संबन्धी आख्यान का गान होता था। इससे श्रुतियों की अध्ययन तथा अध्यापन प्रक्रिया, निरन्तर पारायण तथा अभ्यास, याज्ञिक कल्प, प्रयोग, चर्चा, अनुष्ठान तथा ऋत्विक् आदियों के द्वारा आर्ष विचारों में चारों ओर से ओतप्रोत होने के कारण मन्दिर आदियों में मिलने वाले कुछ भैषज्यसंबन्धी लेखों तथा कहीं-कहीं मिलनेवाले शिलालेखों में आये हुए भैषज्य संबन्धी विषयों से पूर्व प्रतिष्ठित वैद्यक सभ्यता के उदय के साथ-साथ भारतीय भैषज्य-प्रस्थान के महत्त्व व्यापक स्थिति तथा प्राचीनता सिद्ध होती है। इस प्रकार नाना शाखा-प्रशाखाओं में फैले हुए ऋक्, अथर्व आदियों में भी इसके विषयों के व्याप्त होने से, याज्ञिक प्रक्रियाओं में भी इसका कीर्तन होने से तथा आयुर्वेद नाम से वैदिक प्रस्थान के प्राचीन काल से ही विभक्त होने से प्राचीन भारतीय वैदिक मूलरूपी स्त्रोत से परम्परा द्वारा प्रवृत्त इस भारतीय भैषज्य विज्ञान की प्राचीनता निश्चित रूप से प्रकट होती है। कोलब्रुक (Mr. Colebrooke) नामक विद्वान् ने इसके विषय में कहा है कि—'The Hindoos were teachers and not learners' अर्थात् हिन्दु सदा गुरु रहे हैं न कि शिष्य। तथा मोनियर विलियम्स ने कहा है कि— 'Is not the case........' (मूल उपोद्घात पृ. ११२ देखें) सभ्यता एवं प्रकाश के प्रथम अङ्कूर सदा पूर्व में ही उदित हुए हैं तथा पूर्व से पश्चिम की ओर ही सदा उनका प्रचार हुआ है न कि पश्चिम से पूर्व की ओर।

भारतीय भूगर्भ के अनुसार प्राचीन भैषज्यविषयक विमर्श

जिस भारत की प्राचीन सभ्यता मिश्र, मेसोपोटामिया आदि प्राचीन देशों की सभ्यता के साथ सादृश्य रखती हुई उनसे भी आगे बढ़ी हुई है उस भारत के महेञ्जोदारो प्रदेश की खुदाई में मिले हुए प्राचीन निवास स्थान, स्नानागार तथा मलप्रणाली आदि की स्थापत्य विद्या के पण्डितों द्वारा भी प्रशंसित प्राचीन निर्माण कला से पांच हजार वर्ष पूर्व भी भारतीय स्वास्थ्य विज्ञान (Hygenic condition) का पूर्णरूप से परिचय मिलता है, वहीं खुदाई में एक काले रंग का बड़ गोला सा मिला है जिसका अनुसन्धान एवं परीक्षा करके डॉ. सनाउल्ला नामक रसायनाचार्य (Chemist) तथा डॉ. हमीद ने कहा है कि–‘यह शिलाजीत का पत्थर है जो कि पर्वतीय प्रदेश से वहां आया है, यह मूत्ररोग आदि में प्रयुक्त होता है तथा विशेषरूप से यह औषध कार्य में ही प्रयुक्त होता है’। जान ४ मार्शल ने भी परीक्षकों के इस प्रकार के परिणामों के सहित इसका विवरण प्रकाशित किया है। इस प्रकार वहां शिलाजीत के मिलने से भैषज्य विद्या पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। धन्वन्तरि, आत्रेय तथा कश्यप आदियों ने भी अनेक स्थानों पर शिलाजीत के उपयोग का निर्देश किया है। नावनीतक में भी इसका प्रयोग दिया हुआ है। जिस शिलाजीत की उत्पत्ति उस प्रदेश में नहीं होती अपितु दूर के पर्वतीय प्रदेशों से उसे लाया गया है, उसका भैषज्य के रूप में प्राचीन आचार्यों ने भी निर्देश किया है। तथा उसके रसायन कल्प एवं महिमा का भारतीय आयुर्वेद में वर्णन है। चिरकाल तक भूगर्भ में दबने से नष्ट हुई ओषधियों का न मिलना स्वाभाविक ही है परन्तु भाग्यवश जो कोई ओषधि अथवा वस्तु मिली भी है, उस असाधारण वस्तु के चिरकाल के बाद मिलने से भारतीय प्राचीन वैद्यक का गौरव ही बढ़ता है। इतने प्राचीन समय में और कौन से वैद्यक चिह्नों के प्राप्त होने की आशा


१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १५५ में देखें।
४. DK प्रदेश VS तथा प्रदेश में पाया गया कोयले जैसे काले पदार्थ का टुकड़ा बहुत दिनों तक एक समस्या बना रहा........

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३३७

की जा सकती है। वहीं भूगर्भ से वहां उत्पन्न न होकर हिमालय में उत्पन्न होने वाले हरिणों के सींगों के अनेक ढेर मिलते हैं। आथर्वण¹ संहिता में हरिण के सींगों का क्षेत्रिय (क्षय, कुष्ठ, अपस्मार आदि) रोग के प्रतीकारार्थ उपयोग मिलने से तथा वैदिक काल में भी भेषजरूप से उसके उपयोग का उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि यहां मिलने वाले हरिण के सींगों का, ओषधि रूप में प्रयोग करने के लिये ही संग्रह किया गया होगा। हरिण के सींगों को आजकल भी भारतीय वैद्य ओषधियों में प्रयुक्त करते हैं। इस विषय में जान मार्शल ने भी लिखा है कि हरिण के सींगों का ओषधियों अथवा वाणिज्य के लिये संग्रह किया गया होगा।

वहां पर बहुत से धातु अथवा मिट्टी के खिलौने भी मिले हैं। काश्यपसंहिता के जातकर्मोत्तरीय अध्याय में तथा चरक के जातिसूत्रीय अध्याय में भी बालकों के विनोद तथा बुद्धि के विकास के लिये अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों की आकृति वाले खिलौनों का वर्णन मिलता है। खिलौनों का आयुर्वेद के साथ संबन्ध होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस प्रकार इतिहास के अनुसार भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान पांच हजार वर्ष से प्राचीन सिद्ध होता है।

भिन्न-भिन्न देशों के प्राचीन भैषज्य के विमर्श की आवश्यकता

यहां यह कह देना आवश्यक है कि जिस प्रकार महेञ्जोदारी की खुदाई का अनुसन्धान करने से भारतीय सभ्यता पांच हजार वर्षों से प्राचीन सिद्ध होती है उसी प्रकार प्राचीन लेख तथा वस्तु आदियों के चिह्नों के मिलने से मिश्र, बेबिलोनिया, सीरिया तथा चीन आदि देशों की सभ्यता भी चार-पांच हजार वर्ष प्राचीन निश्चित होती है। इन प्राचीन सभ्य तथा उन्नत देशों में प्राचीन काल में भी ज्ञान-विज्ञान की विशेषता अवश्य रही होगी तथा जीवन के लिये उपयोगी व्यावहारिक भैषज्य विद्या का होना तो और भी आवश्यक है। प्राचीन उन्नत देशों के भैषज्यसम्बन्धी अपने पूर्व स्रोत भी होंगे। पेपरी नामक त्वक्पत्र में पल्लीरुधिर, सूअर आदियों के मांस तथा भेद, कच्छप-मस्तिष्क तथा मनुष्य शुक्र आदि बहुत सी ऐसी असाधारण ओषधियां मिलती हैं जिनका भारतीय आयुर्वेद सम्प्रदाय में निर्देश नहीं मिलता है। इस प्रकार की ओषधियां उसी देश के प्राचीन स्रोतों से निकली हुई प्रतीत होती हैं। इसी प्रकार अन्य देशों में भी बहुत से ऐसे असाधारण विषय हो सकते हैं जो उसी देश के प्राचीन सम्प्रदाय से निकले हुए प्रतीत होते हैं। बाह्लीक भिषक् काङ्कायन का निर्देश होने से यह कहा जा सकता है कि अन्य भी बहुत से विदेशी चिकित्सक भारतीयों द्वारा तथा भारतीय चिकित्सक विदेशियों द्वारा ज्ञात थे। काश्यपसंहिता के खिलभाग के सूतिकोपक्रमणीय अध्याय में दिये हुए 'वैदेश्याश्च प्रयच्छन्ति विविधा म्लेच्छजातयः' उल्लेख से प्रतीत होता है कि इस ग्रन्थ के आचार्य को भी भारत से बाहर की बहुत सी म्लेच्छ जातियों का ज्ञान था। म्लेच्छ शब्द महाभारत तथा हरिवंश आदि प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलता है। ययाति की कथा में पिता की आज्ञा का पालन न करने से तुर्वसु तथा अनुर्दुह्यु का शाप के कारण वेदबाह्य म्लेच्छ जातियों के वंशप्रवर्तक के रूप में उल्लेख किया गया है। कोशकार के 'प्रत्यन्तो म्लेच्छदेशः स्यात्' इस उल्लेख के आधार पर संभवतः भारत की सीमाओं पर स्थित देश के म्लेच्छों की ओर यह निर्देश प्रतीत होता है। पाणिनीय धातुपाठ में भी 'म्लेच्छ' धातु दी हुई है। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने 'तेऽसुराः हेलयो हेलय इति पराबभूवुस्तस्मान्म्लेच्छा मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्'


भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के कैमिस्ट श्री सनाउल्ला महोदय उस काले पदार्थ की जांच करने में कृतकार्य हुए हैं। यह स्याही का टुकड़ा नहीं है। यह एक प्राचीन ओषधि है जिसे शिलाजीत कहते हैं और जो आजकल भारत में खूब प्रयोग में लाई जाती है और अनेक रोगों को अच्छा करती है। अजीर्ण, मधुमेह तथा यकृत् एवं प्लीहा के रोगों के लिये यह अतिशय उपयोगी है। यह हृदय की प्रक्रिया को नियमित करती है तथा श्वाससंस्थान के लिये हितकारी है। यह उत्तेजक और कफनिस्सारक है।
डॉ. हमीद द्वारा किया गया इस पदार्थ का विश्लेषण प्रथम परिशिष्ट में दिया गया है। यह काला शिलाजीत चट्टानों में से निकलता है जो कि महेंजोदारों में पाये गये हैं। यह हिमालय की अधोवर्ती, मध्यवर्ती और ऊपर की पर्वत श्रेणियों में पाया जाता है। Mohenjedaro & the Indus Civilization Vol. II by John Marshall.

१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १५६ में देखें।

३३८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

में असुरों का म्लेच्छ जाति के रूप में उल्लेख किया है। सिन्धु नदी के किनारे उपलब्ध वस्तुओं में अनेक समानताओं के कारण ईरानियन् तथा असीरियन् आदि प्राचीन म्लेच्छ जातियों का भारतीयों के साथ परस्पर परिचय का ज्ञान होने से संभवतः उस समय प्रसिद्ध ईरानियन् तथा असीरियन् आदि भारत से बाहर की विविध उन्नत म्लेच्छ जातियों का म्लेच्छ शब्द से निर्देश किया गया हो। इन विदेशी म्लेच्छ जातियों का उल्लेख इस संहिता के खिलभाग में होने से प्रतीत होता है कि जीवक अथवा वात्स्य के समय अन्यदेशीय चिकित्साओं का भी ज्ञान होने से संभवतः उसने ऐसा निर्देश किया हो। चरक के विमान स्थान में भी 'विविधानि हिषजां शास्त्राणि प्रचरन्ति लोके' के द्वारा उस समय व्यवहार में अनेक चिकित्सा पद्धतियों के प्रचार का निर्देश किया गया है। आजकल सौरचिकित्सा (सूर्य चिकित्सा), जलचिकित्सा, भैषज्यचिकित्सा तथा शस्त्रचिकित्सा आदि अनेक चिकित्साओं के प्रचार के समान उस समय भारत तथा विदेशों में भी अन्य प्रक्रियाओं के द्वारा भी भैषज्य प्रचार का ज्ञान होता है। वैदिक काल से प्रवृत्त भारतीय आयुर्वेद सम्प्रदाय के भारतीय ही सिद्ध होने पर भी कालक्रम से न्यूनाधिक रूप में भारतीय विषयों का विदेशी सम्प्रदायों में तथा विदेशी विषयों का भारतीय सम्प्रदाय में अनुप्रवेश हो गया प्रतीत होता है। भिन्न-भिन्न प्राचीन देशों की चिकित्साओं के यथावत् अनुसन्धान के बिना केवल सामान्य ज्ञान के आधार पर यह कहना कठिन है कि उनके तत्कालीन भैषज्य-संबन्धी ज्ञान का क्या स्वरूप था तथा उनकी चिकित्सा के विषय अपने ही देश के असाधारण प्राचीन स्त्रोत से निकले हुए थे अथवा अन्यदेशीय स्रोतों से उनका उद्गम हुआ था। भिन्न-भिन्न स्थानों पर मिलने वाले भिन्न-भिन्न विषयों को देखकर हम केवल अनुमान ही कर सकते हैं। इस विषय का निश्चित ज्ञान कुछ नहीं हो सकता है। प्राचीन देशों के प्राचीन विषयों को लेकर यदि पृथक्-पृथक् प्रत्येक की यथावत् आलोचना की जाय तो संभवतः हमें कुछ परिणाम निकालने में सहायता मिल सकती है कि उस समय अमुक-अमुक अंशों में इन सम्प्रदायों में समानता थी, तथा अमुक अंश में विषमता थी। समान विषयों का भी अमुक सम्प्रदाय से अमुक का उद्गम हुआ था तथा अमुक-अमुक विषय उस-उस सम्प्रदाय के अपने ही थे। कालक्रम से प्राचीन देशों की पूर्व परिस्थिति का यथावत् ज्ञान कराने वाले बहुत से चिन्हों के लुप्त हो जाने से सम्पूर्णरूप से ज्ञान होना यद्यपि कठिन है तथापि जो अवशिष्ट चिह्न उपलब्ध होते हैं उनके आधार पर भी उनकी अन्तः स्थिति का बहुत कुछ ज्ञान हो सकता है। मिश्र में प्राचीन भैषज्य संबन्धी त्वक्पत्र तथा रोगप्रतीकार व्यवस्थापत्र (Prescription forms) आदि उपलब्ध हुए हैं, असीरिया में हेमुर्वन् राजा के समय के भैषज्य विषयक तेरह शिलालेख मिले हैं, इरान के प्राचीन अवेस्ता नामक ग्रन्थ के वेन्दिदाद, यश्न तथा यश्त प्रकरणों में भैषज्य संबन्धी विषय मिलते हैं तथा ब्रिटिश म्यूज़ियम के संग्रहालय में रखे हुए सुमेरिया प्रदेश के भूगर्भ से निकली हुई ईंटों पर खुदे हुए जो शिलालेख मिले हैं उनमें भी भैषज्य संबन्धी विषय मिलते हैं। चीन में भी प्राचीन भैषज्य संबन्धी विषय मिलते हैं। इसी प्रकार अन्वेषण करने पर अन्य भी बहुत से विषय मिल सकते हैं। सब ओर दृष्टिपात किये बिना केवल अपने सम्प्रदाय अथवा चिकित्सापद्धति को ही मौलिक कहने से व्यक्ति वास्तविकता पर नहीं पहुंच सकता। इसलिये इस समय आवश्यकता इस बात की है कि प्राचीन इतिहास, महेञ्जोदारो के भूगर्भ से निकली वस्तुओं तथा प्राचीन विचारों को सामने रखकर पांच हजार से अधिक वर्षों की सभ्यता वाले तथा प्राचीन काल में भी परस्पर परिचय, यातायात तथा सम्पर्क वाले भारत, मिश्र, इरान, चाल्डिया, बाहीक, बेबिलोनिया, सीरिया तथा चीन आदि प्राचीन देशों के जितने भी भैषज्य सम्बन्धी विषय मिले हैं अथवा मिलते रहते हैं उन सब को सामने रखकर तथा भारतीय प्राचीन आयुर्वेद की परिस्थिति का भी अनुसन्धान करके समानता तथा विषमता की तुलना की दृष्टि से यह देखना चाहिये कि कहाँ के कौन से विषय कहां है, कौन सा विषय कहां से प्रतिफलित हुआ है तथा किस विषय का प्रभाव अथवा आलोक किस विषय पर पड़ा है इत्यादि। दूसरे देशों के आलोक को धारण करने वाले तथा अर्धवयस्क ग्रीक वैद्यक के भारतीय वैद्यक पर प्रभाव की शंका बिलकुल निर्मूल है।

(५) उपसंहार

प्राचीन आचार्यों का गौरव

विद्वानों को यह ज्ञात ही है कि प्राचीन समय में धन्वन्तरि, कश्यप तथा आत्रेय आदियों द्वारा विचारों की कसौटी

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३३९

पर कस कर उज्ज्वल किये हुये सिद्धान्तरूपी रत्नों को आजकल पाश्चात्त्य विज्ञान की चमक से चकाचौंध दृष्टि वाले विद्वान् भी अत्यन्त संमान के साथ देखते हैं। इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन महर्षियों का विज्ञान सागर कितना अगाध था जिसमें आज भी रत्नों की कमी नहीं है। ये अत्युच्च ग्रन्थ ही भारत की प्राचीन विभूतियां हैं। आजकल मिलने वाले सब निबन्धों में इन्हीं ग्रन्थों की ही प्रधानता दिखाई देती है। सूक्ष्म दृष्टि से विषयों का अनुसन्धान करने पर इन ग्रन्थों के प्रत्येक वाक्य सार एवं निष्कर्ष पूर्ण तथा सूत्रमय दिखाई देते हैं जिन्हें परिष्कृत बुद्धि वाले विद्वान् अपने प्रवचनों से विशाल विषय का रूप दे सकते हैं। इनमें से परिश्रम करने वाले लोग भूगर्भ से नाना रत्नों के समान असंख्य सिद्धान्त रत्नों को ढूंढ कर निकाल लेते हैं। प्राचीन समय में मिलने वाले इस प्रकार के सुसंस्कृत विचारों से तत्कालीन विचारों की उन्नति का सम्यक् ज्ञान होता है परन्तु उसके बाद विचारों की वृद्धि का एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता है। शल्यचिकित्सा का सुश्रुतसंहिता के बाद वाग्भट आदि दो तीन विद्वानों ने लेशरूप से ही निर्देश किया है तथा उसमें भी सौश्रुतविज्ञान की ही आंशिक छाया दिखाई देती है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी जीवक के समय तक यह विज्ञान हमें दिखाई देता है। इतनी उन्नत अवस्था में पहुंचा हुआ यह विज्ञान सहसा कहां लुप्त हो गया है ? इसका कारण संभवतः शस्त्रक्रिया में लेशमात्र विपरीतता से भी अनर्थ की संभावना हो, अथवा शस्त्र क्रिया के भीषण होने के कारण उसे छोड़ दिया गया हो, शान्तिप्रिय ब्राह्मणों द्वारा उसकी उपेक्षा की गई हो या धर्मशास्त्रकारों द्वारा चिकित्सावृत्ति की निन्दा की होने के कारण, अध्यात्मवाद की दृष्टि से इसमें हिंसा के दिखाई देने से अथवा अहिंसावाद और दशपारमिता¹ सिद्धान्त के विकसित होने से इसका लोप हो गया है। यह नहीं कहा जा सकता कि इनमें से कौनसा कारण सामने आया जिससे सर्वोपकारी वह विज्ञान, वह हस्तकौशल-वह उपदेश परम्परा तथा वह उपकरणों का परिष्कार इत्यादि द्रुतगति से ह्रास को प्राप्त होता हुआ विद्वत्समाज के हाथ से निकल कर आजकल भारत में विद्याविज्ञान से शून्य नापित जाति (नाइयों) में लेशरूप से मिलता है। धन्वन्तरि सदृश पूर्वाचार्यों द्वारा उन्नत की हुई वह प्राचीन विद्या आजकल ऐसे व्यक्तियों के हाथों में पड़कर उत्तरोत्तर ह्रास को प्राप्त होती हुई दीप निर्वाण के समान समाप्ति की प्रतीक्षा कर रही है। गुणग्राही तथा उन्नत पाश्चात्त्य विद्वानों ने आजकल अपने अथक विचारों, परिष्कारों तथा नये-नये प्रयोगों एवं अनुभवों से परिवर्तित एवं रूपान्तरित करके, शल्यविद्या, गर्भभैषज्य, बालभैषज्य, कायचिकित्सा तथा विकृतिविज्ञान में विशेष रूप से उन्नति करली है, जिससे आजकल अपने प्राचीन विद्याबल एवं पूर्वगौरव को भूले हुए भारत में भी चारों ओर फैली हुई पाश्चात्त्यचिकित्सा के विज्ञानयुक्त कुशलता से उपकार हो रहा है। केवल शल्यचिकित्सा को ही यह अवस्था नहीं है अपितु शालाक्य आदि अन्य विज्ञान तो उत्पन्न होते ही जीर्ण-शीर्ण हो गये थे। हां, कायचिकित्सा में अवश्य बाद में भी भैषज्य विद्या के हजारों पण्डित उत्पन्न हुए हैं तथा सैकड़ों वैद्यक ग्रन्थ लिखे गये हैं जिन्हें यदि एकत्र किया जाय तो आज भी एक विशाल ग्रन्थराशि मिल सकती है। परन्तु आत्रेय आदि महर्षियों के समय आन्तरिक विज्ञान के बल से उत्पन्न हुए जिन सिद्धान्तों एवं विचारों के कारण आयुर्वेद उन्नत एवं समृद्ध हुआ था, वैसे उन्नत एवं नवीन विचार उसके बाद प्रकाशित नहीं हुए हैं। केवल प्राचीन सिद्धान्तों को ही भङ्गीभेद से दिखाकर अथवा नवीन अनुभूत ओषधियों द्वारा संबधित करके प्राचीन ग्रन्थों के केवल अनुवाद अथवा संग्रहरूप में नवीन शरीरों को धारण करके भिन्न-भिन्न निबन्ध हमारे सामने उपस्थित होते हैं। जहां तक भैषज्य का प्रश्न है हम देखते हैं कि नवीन योगौषधियों के आबिष्कार तथा नवीन अनुभवों के अनुसार ग्रन्थों के निर्माण द्वारा धातु तथा रस ओषधियों में वृद्धि होती हुई दिखाई देती है। आजकल भी आयुर्वेद के वैद्य सब स्थानों पर इसी के मार्ग को ग्रहण करके उसके उपयोग तथा प्रयोग से सफलता प्राप्त कर रहे हैं और यदि हम यह कहें कि यही विषय आयुर्वेद के अन्य प्रस्थानों के नाम की भी रक्षा कर रहा है तो यह कोई अत्युक्ति नहीं होगी। प्राचीन महर्षियों के समान उसके बाद के वैद्य भी यदि अपने विचार विमर्श के अनुसार नये-नये सिद्धान्तों का आविष्कार करते, प्राचीन सिद्धान्तों का परिष्कार कर, अपूर्ण अंशों को पूर्ण करते, अपने अनुभव के अनुसार नये-नये संस्कार करते, उच्च विचारों वाले प्रौढ


१. दश पारमिता—बौद्ध धर्मग्रन्थों में बुद्धत्व प्राप्ति के लिये दश गुणों की पराकाष्ठा तक पहुंचना आवश्यक बताया गया है। ये दस गुण ‘पारमिता’ कहलाते हैं। पारमिता का अर्थ है उच्चतम अवस्था या पूर्णता (Perfections) जिससे मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है। ये निम्न दस हैं—१. दान २. शील ३. शान्ति ४. वीर्य ५. ध्यान ६. प्रज्ञा ७. उपाय ८. प्रणिधान ९. बल १०. ज्ञान।

३४० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

निबन्धों की पुनः-पुनः रचना करते तो भारतीय आयुर्वेद भी इतने समय में उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता। आजकल बहुत से विद्वान् वैद्य कालवश तथा उपेक्षा से ह्रास को प्राप्त हुए भारतीय आयुर्वेद के प्राचीन गौरव को दृष्टि में रखते हुए उसके प्रचार तथा परिष्कार के लिये नवीन विचारपूर्ण निबन्धों, प्रचार संस्थाओं, परिष्कृत मार्गों तथा औषध निर्माणशालाओं के द्वारा प्रयत्न में लगे हुए दिखाई देते हैं। आजकल श्रीयुत गणनाथ सेन जी द्वारा प्रत्यक्ष शारीर तथा सिद्धान्त निदान का निर्माण करके प्राचीन शारीरिक अवयव तथा रोगनिदान के विषय में बहुत से विशेष विचार प्रकट किये गये हैं। इसी प्रकार कविरत्न श्रीयामिनी भूषण राय ने रोगविनिश्चय, शालाक्य, विष तथा प्रसूति के विषय में छोटे-छोटे तन्त्रों का निर्माण किया है तथा डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे ने नेत्र चिकित्सा के विषय में कोई ग्रन्थ लिखा है। इन संस्कृत भाषा के नवीन निबन्धों को देखकर बहुत आशा दिखाई देती है। जराजीर्ण हुई भी यह भारतीय आयुर्वेद विद्या जागरूक; सूक्ष्म बुद्धि वाले तथा उद्योगी भारतीय एवं विदेशी विद्वानों के सहयोग रूपी रसायन से ही संभवतः च्यवन ऋषि के समान पुनः यौवन को प्राप्त करले। समयवश बहुत से विषयों में वैज्ञानिक प्रकृति, परिष्कृत रासायनिक प्रक्रियाओं, नवीन आविष्कृत दूरवीक्षण तथा अन्तर्वीक्षण आदि विशेष यन्त्रों, भिन्न-भिन्न देशों के विद्वानों के साथ साक्षात् अथवा लेख, निबन्ध आदि के द्वारा विमर्श, शारीरिक अवयवों की सूक्ष्म दृष्टि तथा नवीन विचार युक्त सैकड़ों निबन्धों के प्रकाशन के कारण आजकल पाश्चात्त्य विद्वानों द्वारा उन्नत तथा अनेक शाखायुक्त भैषज्य विद्या की आलोचना करते हुए प्राचीन भारतीय आयुर्वेद विद्या कुछ लोगों की आजकल स्थूल एवं बालक्रीडा भले ही प्रतीत हो, किन्तु प्राचीन समय में जब कि विचार विमर्श के लिये दुर्गम नदी, वन, पर्वत आदि के व्यवधान के कारण एक दूसरे देश में जाना दुष्कर था उस समय वन के मृग आदि पशुओं के साथ रहने वाले धन्वन्तरि, कश्यप, आत्रेय आदि प्राचीन आचार्यों द्वारा यन्त्र आदि भौतिक साधनों के अभाव में केवल अपनी प्रणिधान शक्ति एवं आन्तरिक बुद्धि के सहारे जो विचार आविष्कृत किये गये थे उनका आधुनिक उन्नत विज्ञान के द्वारा परिष्कृत दृष्टि वाले विद्वान् आज भी जो आदर करते हैं, वह कोई कम गौरव की बात नहीं है। भारतीय तथा अन्य विद्वान् भी चिरकाल तक उनकी इस कृपा के लिये ऋणी रहेंगे। उन प्राचीन आचार्यों का हमें सैकड़ों बार अभिनन्दन करना चाहिये।

प्राचीन ग्रन्थों का लोप तथा उनकी रक्षा

देवयुग से ही लेकर आर्यों का यह विज्ञान-प्रवाह संहिता, ब्राह्मण, उपनिषत्, सूत्र, तन्त्र, भाष्य, टीका, उपटीका तथा निबन्धरूप अनेक शाखाओं द्वारा बहता हुआ तथा ऋषियों, आचार्यों और निबन्धलेखक की विचार धाराओं से पुष्ट होता हुआ मानव समाज का निरन्तर कल्याण कर रहा है। इसीलिये आजकल उस विज्ञान के सैकड़ो विभाग मिलते हैं तथा प्रत्येक विभाग के अनेक प्राचीन आचार्य तथा तारतम्य के अनुसार उनके विभिन्न विचार दृष्टिगोचर होते हैं। परन्तु आर्यों के मूल सर्वस्वभूत आद्यविज्ञान रूप महाकल्पतरु वेद की भी अनेक शाखायें अङ्ग तथा उपाङ्ग भी बहुत कुछ विच्छिन्न होकर विलुप्त हो गये हैं। बहुत सी शाखाओं के तो नाम भी शेष नहीं रहे हैं तथा किन्हीं-किन्हीं का संहिता, ब्राह्मण तथा सूत्र आदियों में कहीं-कहीं निर्देश मिलता है। इसी प्रकार प्राचीन महर्षि आदि आचार्यों के उपदेश रूप लेख भी लुप्त हो चुके हैं। किन्हीं-किन्हीं मतों का केवल नाम मात्र मिलता है तथा बहुतों के नाम भी लुप्त हो गये होंगे।

यदि हम आजकल किसी भी विषय के किसी एक भी उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थ का अध्ययन करें तो उससे हमें बहुत से प्राचीन आचार्य, उनके द्वारा ज्ञात ग्रन्थ तथा विशेष-विशेष मतों के केवल नामोल्लेख मिलते हैं। यास्क के निरुक्त से अन्य भी बहुत से वेदों के अर्थ करने वालों का ज्ञान होता है। इसी प्रकार पाणिनि के सूत्रों से शाकल्य, गालव, गार्ग्य आपिशलि, काश्यप तथा स्फोटायन आदि प्राचीन वैयाकरणाचार्यों का तथा पाराशर्य, कर्मन्द, शिलालि, कृशाश्व आदि भिक्षु, नट तथा सूत्र आदि अन्य प्रस्थानों के आचार्यों का, कौटिलीय अर्थशास्त्र से पराशर, उशनस्, विशालाक्ष, कौणप, दन्त, भरद्वाज, वातव्याधि, बाहुदन्ती, पुत्रपिशुन आदि प्राचीन अर्थशास्त्रियों का, सायन के वेदभाष्य से मेधातिथि, शाकपूणि तथा अग्निस्वामी आदि प्राचीन वेद के व्याख्याताओं का, पूर्वोत्तर-मीमांसासूत्र से आश्मरथ्य, काशकृत्स्न, औडुलोमि, बादरी आदि प्राचीन वेदोपनिषत् के मीमांसकों का बोध होता है। इसीप्रकार उपलब्ध श्रौत स्मार्त दर्शन, ज्योतिष आदि के ग्रन्थों से भी हजारों संहिताओं, तन्त्र, सूत्र, व्याख्यान तथा निबन्धों के रचयिता महर्षि आदि तथा भिन्न-भिन्न विषयों के

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३४१

आचार्यों के केवल नाम मात्र का बोध होता है। बहुत से भारतीय दार्शनिक तथा बौद्धग्रन्थ चीन तथा तिब्बती भाषाओं में अनूदित हुए केवल छायारूप में मिलते हैं। केवल हजार वर्ष प्राचीन बौद्धग्रन्थ भी सैकड़ों नष्ट हो चुके हैं। इस प्रकार की रोमहर्षण घटनाएं श्रुति, स्मृति, आगम, वेदाङ्ग, उपाङ्ग दर्शन, आदि में अथवा बौद्ध एवं जैन सम्प्रदायों में कहां नहीं मिलती हैं। इस आयुर्वेद में भी आत्रेय, सुश्रुत, भेड तथा काश्यप आदि की उपलब्ध संहिताओं के उल्लेख से काप्य, वायोर्विद, वामकं, वैदेह, काङ्कायन, हिरण्याक्ष, शौनक, पाराशर्य, गार्ग्य, माठर, कौत्स, मौद्गल्य, कुशिक, सुभूति, मार्कण्डेय, करवीर्य आदि बहुत से प्राचीन आयुर्वेद के आचार्यों का बोध होता है जिनमें से कइयों के स्थान-स्थान पर वचन तथा मत उद्धृत मिलते हैं। उन आचार्यों के वे ग्रन्थ कहां लुप्त हो गये हैं। यदि वे सब ग्रन्थ उपलब्ध हो सकें तो एक विशाल आयुर्वेदीय ग्रन्थराशि तैयार हो सकती है। केवल दो तीन उपलब्ध ग्रन्थों का ही अच्छी प्रकार अवगाहन करने से प्रतिभा एवं ज्ञान से उज्ज्वल सैकड़ों तत्त्वपूर्ण उपदेशों का ज्ञान मिलता है। इस प्रकार नाना प्रस्थानों में विभक्त प्राचीन आचार्यों के सब ग्रन्थ यदि मिल सकें तो विद्वानों को कितना लाभ हो सकता है। करुणामय प्राचीन महर्षियों द्वारा विचारधारा रूपी रस से विज्ञान कल्पतरु को बढ़ाने के कारण हम उनके यद्यपि अनुगृहीत हैं तथापि पूर्ण परिपक्व फलों से हम वञ्चित ही हैं।

प्राचीन काल से ही समय-समय पर होने वाले प्राकृतिक, वैकृतिक, तथा आकस्मिक क्षोभों, एक दूसरे राष्ट्रों के परस्पर होने वाले युद्ध आदि नैतिक उपद्रवों, बारम्बार होनेवाले विदेशी शासकों के विध्वंसकारक आक्रमणों, साम्प्रदायिक सघर्षों, तक्षशिला, नालन्दा तथा विक्रमशिला आदि के विशाल पुस्तकालयों के भस्मसात् एवं धूलिसात् होने तथा जल, अग्नि आदि के विप्लवों से हजारों प्राचीन ग्रन्थ लुप्त हो चुके हैं। न केवल प्राचीन काल में अपितु आजकल भी प्राचीन विद्यास्थानों में ग्रामीण पर्णशालाओं (चटशालाओं) में स्थित सैकड़ों ग्रन्थों के अग्नि के उत्पात से क्षणभर में नष्ट हो जाने से तथा बहुत से प्राचीन विद्वानों द्वारा संगृहीत ग्रन्थों के भी अब उनके परिवार तथा संतति में संरक्षक के अभाव से, अनास्था से तथा भट्टी, नदी प्रवाह, बाजारों में फैलने, भूगर्भ एवं धूलराशि में अनिश्चित काल तक पड़े रहने से, पुराने होकर जीर्ण-शीर्ण हो जाने से तथा दीमक आदि कीड़ों से खाये जाने के कारण बचे हुए ग्रन्थ भी उत्तरोत्तर नष्ट होते जा रहे हैं। इस सबको देखकर किस विद्यानुराग का हृदय दुःख से नहीं फटने लगता। अनेक विज्ञानों से पूर्ण इस प्राचीन कोश का इस प्रकार से नष्ट हो जाना बड़े दुःख की बात है।

इस प्राचीन विद्या को नाश से बचाने के लिये आजकल सैकड़ों प्रयत्नशील, गुणग्राही एवं दयालु भारतीय तथा पाश्चात्त्य विद्वान् इधर-उधर घूम-घूम कर अन्वेषण करते हुए विनाशोन्मुख बहुत से प्राचीन ग्रन्थों को ढूंढ-ढूंढ कर निकाल रहे हैं। खोटाङ् प्रदेश के भूगर्भ से निकले हुए बावर मैन्युस्क्रिप्ट नाम से प्रसिद्ध नावनीतक आदि बहुत से प्राचीन लेख आजकल खण्डित अवस्था में मिले हैं। बहुत से लोग चीन, तिब्बत आदि देशों में जाकर वहां मिलने वाले मूल लेखों तथा अनुवादों से कुछ ग्रन्थों को उपस्थित करते हैं। इन लोगों का प्रयत्न अत्यन्त प्रशंसनीय है। अब विनाशोन्मुख प्राचीन विद्या की रक्षा एकमात्र गुणग्राही विद्वान् तथा श्रीमान् (धनी) व्यक्ति ही कर सकते हैं। धनीमानी लोगों का कर्तव्य है कि जो प्राचीन ग्रन्थ अभी तक अवशिष्ट हैं उनको परिश्रम से भी ढूंढ़कर प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।

पुरातन वस्तुएं बाह्य तथा पुरातन लेख प्राचीन समय की अन्तः परिस्थिति को सूचित करती हैं। अतीत समय की अवस्था को जानने के लिये इनके अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है। प्राचीन काल की जो भी वस्तुएं तथा लेख आदि उपलब्ध होते हैं उनमें न्यूनाधिक भाव से कुछ न कुछ प्राचीनता की झलक मिलती ही है। थोड़े बहुत समय के पौर्वापर्य वाले प्राचीन सभ्यता के समान सूत्रों में बंधे हुए असीरिया, बेबिलोनिया, सुमेरिया, तथा मित्र आदि प्राचीन जातियों के पाश्चात्त्य देशों में भी काल धर्म से होने वाले अलेक्जेण्ड्रिया के विशाल पुस्तकालय के अग्निकाण्ड आदि तथा समय-समय पर होने वाले राजनैतिक तथा साम्प्रदायिक विप्लवों से उनकी बहुत सी प्राचीन ऐतिहासिक वस्तुएं नष्ट हो गई हैं तथापि उनमें अनेक वस्तुओं तथा लेखों के साथ-साथ शवों के मिलने से, कहीं-कहीं पिरामिड (Pyramids) एवं स्तूप आदियों में इतिहास के मिलने से तथा कहीं-कहीं ईंटें, शिलाओं तथा धातुओं में चिरकालीन ग्रन्थ तथा इतिवृत्तों के मिलने से प्राचीन काल से प्रचलित एवं स्थान-स्थान पर मिलने वाले प्राचीन लक्षणों से असीरिया, बेबिलोनिया, सुमेरिया तथा मिश्र आदि प्राचीन देश की आनुक्रमिक प्राचीन सभ्यता के समय-निर्धारण के साथ-साथ उनके प्राचीन विषयों का ज्ञान

३४२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

भी सुगमता से हो सकता है। परन्तु इसके अतिरिक्त भारत में प्राचीन काल से ही आहिताग्नि अथवा लौकिक अग्नि के द्वारा शवों को जलाने की प्रथा होने से अन्य अवशिष्ट वस्तुओं को भी वितरित कर देने से मन्दिरों के भी बार-बार होने वाले विप्लवों के कारण लुप्त हो जाने से प्राचीन समय में आनुश्रविक पद्धति (गुरु से मौखिक रूप में शिक्षा ग्रहण करना) की प्रथा के कारण संहिता, सूत्र आदि प्राचीन ग्रन्थों के लेखन की रुचि की विरलता के कारण तथा बाद में भोजपत्र और ताडपत्र आदियों पर लिखे हुए लेखों के भी समय-समय पर होने वाले पारस्परिक एवं वैदेशिक संघर्षों के कारण बहुत कुछ जल जाने तथा नष्ट हो जाने से, आजकल भारतीय इतिवृत्त के अनुसन्धान के लिये खोतान, कासगर आदि स्थानों में हुई खुदाई तथा चीन, तिब्बत आदि में मिलने वाले लेखों के अनुसन्धान से भारतीय पुरातन इतिवृत्त के बहुत कम लक्षण मिलने से, पुराण आदि कथाओं के मिलने पर भी महाभारत के गणेशोपाख्यान के समान बीच-बीच में अनुप्रविष्ट अर्वाचीन विषयों, आलङ्कारिक दृष्टि से प्रविष्ट अतिशयोक्तियों तथा भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के हस्तक्षेपों से अपने-अपने अनुसार प्राचीन के लोप तथा परिवर्तन से उसे मलिन (विकृत) कर देने से तथा प्राचीन अंशों को भी अन्य देशों के लेखों, शिलालेखों तथा भूगर्भ से उपलब्ध विज्ञान आदि के साथ समानता होने से आजकल महेञ्जोदारो की खुदाई से उपलब्ध पर्याप्त प्रमाणों के मिलने से पूर्व भारत की प्राचीन परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होना अत्यन्त कठिन था। परन्तु आजकल महेञ्जोदारो तथा हरप्पा की खुदाई में मिलने वाले भिन्न-भिन्न विषयों से प्राचीन भारतीय परिस्थिति पर बहुत सा प्रकाश पड़ता है। भारत में महेञ्जोदारो तथा हरप्पा के समान गङ्गा के किनारे और भी बहुत से प्राचीन प्रदेश मिल सकते हैं। तथा कालक्रम से अनुसन्धान के उपायों के उन्नत होने से ज्यों-ज्यों खुदाई में और पदार्थ तथा लेख आदि प्रकाश में आते जायेंगे तथा ज्यों-ज्यों कालक्रम से हरप्पा तथा महेञ्जोदारों में मिलने वाले प्राचीन अनिश्चित अक्षरों एवं लिपि के पढ़े जाने से प्राचीन विषय प्रकट होते जायेंगे, त्यों-त्यों प्राचीन भारतीय पुरावृत्त और भी स्पष्ट होता जायगा।

अन्त में हम पाठकों की सेवा में निवेदन करना चाहते हैं कि आजकल मुद्रणयन्त्रों के बहुत प्रचार हो जाने से भारत तथा अन्य देशों में भी प्रचलित, नवोपलब्ध तथा बहुत से अप्रकाशित भारतीय ग्रन्थ भी प्रकाश में आ गये हैं इस प्रकार एक-एक पुस्तक की हजारों प्रतियां होकर घर-घर में प्रचलित हो जाती हैं जिससे प्रचलित ग्रन्थों का भी विशेषरूप से प्रचार हो जाता है, अप्रकाशित ग्रन्थों का सर्वसाधारण में प्रकाश हो जाता है, अन्वेषण तथा लेखन के परिश्रम के बिना ही अल्पव्यय से ही अधिक लाभ हो जाता है तथा अपने पूर्वजों द्वारा भी बहुत से अदृष्ट एवं अश्रुत प्राचीन ग्रन्थ सहसा ही देखने को तथा अध्ययन करने को मिल जाते हैं। यह यद्यपि सन्ताप का विषय है परन्तु आजकल के मुद्रण में स्याही के दृढ़ होने पर भी दुर्बल पत्रों पर प्रकाशित ग्रन्थ दृढ़ ताडपत्रों पर लिखे हुए ग्रन्थों की तुलना में चिरस्थायी नहीं होते हैं। इसीलिये आजकल सौ वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तकों के भी वर्ण विकृत हो जाते हैं तथा वे स्वयं भी जीर्ण शीर्ण हो जाती हैं। मुद्रण कला की सुलभता के कारण लेखनकला उत्तरोत्तर ह्रास को प्राप्त हो रही है। पदच्छेद की स्पष्टता तथा शुद्धि (Accuracy) के कारण मन को आकर्षित करने वाली मुद्रित पुस्तकों के सुलभ होने से विद्यमान लिखित पुस्तकों के संरक्षण का ध्यान भी कम होता जा रहा है। मुद्रित हुई उन्हीं पुस्तकों का पुनर्मुद्रण संभव है जो प्रायः अध्ययन तथा अध्यापन के काम में आती हैं। जो विशेष काम में नहीं आती हैं। उनका पुनर्मुद्रण नहीं होता है। ऐसे बहुत से ग्रन्थ आजकल दुर्लभ हो गये हैं। ऐसे ग्रन्थों को मुद्रित हुआ जानकर कोई लिखता भी नहीं तथा एक वार मुद्रण हो जाने से उनका पुनर्मुद्रण भी नहीं होता। इसप्रकार दोनों ओर से वञ्चित हुए ये ग्रन्थ उत्तर होते हुए भी पूर्व मुद्रित पुस्तक की आयु के समाप्त हो जाने पर सौ दो सौ वर्षों में सहसा समाप्त हो जाती है। कालक्रम से अन्य भी बहुत प्राचीन आनुश्रविक विषय नष्ट हो गये हैं तथा यह शंका होने लगती है कि प्राचीन आचार्यों के गौरव का स्मरण कराने वाले अन्य भी ग्रन्थ कहीं हमारे हाथ से निकल कर नाम मात्र शेष न रह जायें। इसलिये इस भावी आशंका को पहले से ही ध्यान में रख कर प्रकाशकों का कर्तव्य है कि जिन ग्रन्थों की रक्षा करना आवश्यक हो उनकी कुछ प्रतियां सुदृढ़ एवं स्थायी पत्रों पर प्रकाशित करने की प्रवृत्ति बढ़ानी चाहिये जिससे वे शीघ्र नष्ट न हो सकें। पुस्तकालयों में भी उन्हीं दृढ़ प्रतियों को ही अत्यन्त सुरक्षा पूर्वक रखना चाहिये। तथा संहिता, ब्राह्मण, सूत्र, भाष्य आदि कुछ ऐसे ग्रन्थ जो हमारी प्राचीनता के सर्वस्व समझे जाते हैं (चाहे वे हमारी व्यावहारिक अध्ययन परम्परा में प्रविष्ट हों चाहे न हों) उनको किसी भी व्यय पर ताडपत्र अथवा अन्य सुदृढ़ पत्रों पर उत्तम स्याही से लिखकर यत्नपूर्वक पुस्तकालयों में रखना चाहिये जिससे दृढ़ पत्रों पर लिखे

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | ३४३


हुए सात-आठ सौ वर्ष की आयु वाले तथा ताडपत्र पर लिखे हुए हजारों वर्षों की आयुवाले आजकल उपलब्ध ग्रन्थों की तरह ये भी चिरकाल तक सुरक्षित रह सकते हैं। भोजपत्र पर लिखित पिप्पलादशाखा संहिता की केवल एक अवशिष्ट प्रति से ही हमें आजकल उस शाखा का ज्ञान होता है। चिरकाल से विलुप्त प्रमाणवार्तिक ताडपत्र रूपी कवच में सुरक्षित रखा हुआ हजारों वर्षों के बाद भी पुनरुज्जीवित अवस्था में उपलब्ध हुआ है। भूगर्भ से निकले हुए ईंटों पर खुदे हुए लेखों तथा शिलालेखों से उन तीन हजार वर्ष प्राचीन लोगों की सभ्यता का ज्ञान होता है जिनका नाम भी लुप्त हो चुका था। इतना ही नहीं आजकल महेञ्जोदारो तथा हरप्पा में मिलने वाली मुद्राएं पांच हजार वर्ष प्राचीन सभ्यता को प्रकाश में लाकर भारत के प्राचीन गौरव को बढ़ा रही हैं। अस्तु, इतना हो चाहे न हो परन्तु इतना तो निश्चित है कि ताडपत्र पर लिखे हुए लेख हजारों वर्ष तक नष्ट नहीं हो सकते। यह काश्यप संहिता भी ताडपत्रों पर लिखी होने के कारण ही इतने समय के व्यवधान के बाद भी विनाश से बचकर अब प्रकाशित हो सकी है। अन्त में मैं आशा करता हूँ कि ग्रन्थों के चिरसंरक्षण का यह साधन विद्वानों एवं धनी-मानी व्यक्तियों को अवश्य पसन्द आयगा। इसके साथ मैं अपने वक्तव्य को समाप्त करता हूं।

नेपाल ग्रन्थमाला का प्रथम प्रकाशन

अनेक पदवियों से विभूषित नेपाल के महाराजा श्री श्री श्री युद्ध शमशेर जंगबहादुर के विद्यानुराग तथा अपने देश में उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थों के प्रकाशन की रुचि के अनेक अभिनन्दनों के साथ उपोद्घात सहित यह काश्यपसंहिता नेपाल ग्रन्थमाला के प्रथम प्रकाशन के रूप में प्रकाशित हो रही है।

कृतज्ञता प्रकाशन

इस उपोद्घात में जिन भी प्राचीन अर्वाचीन, प्राच्य तथा पाश्चात्त्य विद्वानों के ग्रन्थों अथवा विचारों को मैंने उद्धृत किया है उनका मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। कृतज्ञता प्रकाशन के अतिरिक्त उनके ऋण से उऋण होने का और कोई उपाय मुझे नहीं सूझता है। इस ग्रन्थ के प्रकाशन तथा संशोधन में श्री मान्यवर आचार्य यादव जी त्रिकम जी महाराज ने जो परिश्रम एवं सहायता की है उन्हें मैं सम्मानपूर्वक बहुत धन्यवाद देता हूँ। पं. सोमनाथ शर्मा ने इस उपोद्घात में प्रूफ संशोधन आदि के द्वारा असाधारण सहयोग दिया है उन्हें भी मैं बार-बार धन्यवाद देता हूँ। अन्त में डॉ. गोकुलचन्द तथा मास्टर इन्द्रबिहारी शरण को भी मैं धन्यवाद देना नहीं भूल सकता जिन्होंने अंग्रेजी ग्रन्थों के स्थल एवं उद्धरण निकाल कर दिये हैं।

अन्त में निवेदन है कि इस प्रकार के गहन विषय पर विचार करने के लिये केवल आयुर्वेदिक तथा अन्य संस्कृत ग्रन्थों का ही परिशीलन आवश्यक नहीं है अपितु भारतीयों के समान ग्रीस, मिश्र तथा इरान आदि आदि अन्य देशों के इतिहास अनेक भाषा तथा विषय, प्राच्य एवं पाश्चात्त्य विद्वानों के ग्रन्थाकार तथा प्रकीर्ण लेखरूप भिन्न-भिन्न विचारों का अनुसन्धान, ऊहापोह, अन्तर्दृष्टि से वस्तुओं का यथार्थज्ञान इत्यादि बहुत से साधनों की आवश्यकता है। इन सब साधनों द्वारा गन्तव्य मार्ग पर चलने का दुःसाहस करने वाले मुझ अकिंचन के इन टूटे-फूटे कुछ शब्दों के द्वारा अभिलक्षित स्थान पर किस प्रकार पहुंचा जा सकता है। दुर्बल अङ्गों से इस दुर्गम मार्ग पर चलना दुःसाहस ही प्रतीत होता है। तथापि ‘नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः’ इस न्याय के अनुसार यथाशक्ति उचित मार्ग में वाणी के विनियोग तथा सरस्वती देवी की सेवा समझ कर ही आयुर्वेद का परिशीलन न किये हुए होने पर भी आयुर्वेद के प्रकाशक प्राचीन महर्षियों का ध्यान करके केवल इस मुद्रण के अवसर पर ही साहित्य की दृष्टि से यथावसर आयुर्वेद के ग्रन्थों तथा इस संहिता का अध्ययन करने से जो विचार उत्पन्न हुए हैं उन्हें, एक अनभ्यस्त व्यक्ति के लिये होने वाली स्वाभाविक त्रुटियों के लिये क्षमा याचना करता हुआ, विद्यानुरागी एवं गुणग्राही विद्वानों के विनोद एवं वैद्यों के प्रोत्साहन के लिये इस उपोद्घात पुष्पाञ्जलि के रूप में आप लोगों के करकमलों में सादर समर्पित करता हूं।

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अनुवादक—
सत्यपाल आयुर्वेदालङ्कार

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२३ का.सं.

परिशिष्ट

ज्वरसमुच्चय में काश्यपसंहिता के मिलने वाले श्लोक—

ज्वर के विषय में अनेक प्राचीन ऋषियों के वचनों का संग्रहरूप एक 'ज्वरसमुच्चय' नामक प्राचीन ग्रन्थ हैं मेरे पुस्तकालय में इस पुस्तक की ताडपत्र पर लिखी हुई दो प्रतिय हैं इनमें से एक प्राचीन अक्षरों में लिखी हुई तथा अपूर्ण है जिसके अन्त में लेख का समय ४४ नैपाली संवत्सर दिया हुआ है। दूसरी जो है वह पूर्ण है तथा नेवार (नैपाली) अक्षरों में लिखी हुई है। लिपि को देख कर वह आठ सौ वर्ष प्राचीन प्रतीत होती है। पुस्तक रूप में लिखे जाने का समय ही जब इतना प्राचीन है तब उसके निबन्ध का समय तो और भी प्राचीन होना चाहिए। इसमें आश्विन, भरद्वाज, कश्यप, चरक, सुश्रुत, भेड, हारीत, भोज, जतूकर्ण, कपिलबल आदि प्राचीन आचार्यों के ही नाम निर्देश पूर्वक ज्वरविषयक श्लोक संगृहीत हैं। अर्वाचीन आचार्यों के वचनों के उद्धरण न दिये होने से भी यह ग्रन्थ प्राचीन सिद्ध होता है। इसमें काश्यप के भी बहुत से ज्वरविषयक वचन दिये हुए हैं जो इस काश्यपसंहिता के विशेषकर पूर्वभाग तथा कुछ खिलभाग में प्रायः उसी रूप में मिलते हैं। जो यहां नहीं मिलते हैं वे ही संभवतः इस संहिता के त्रुटित भाग में आ गये हों। कहीं कहीं थोड़ा बहुत पाठभेद भी मिलता है। उदाहरण के लिये ज्वरसमुच्चय में दिये हुए पाठभेदों को मोटे अक्षरों में रखकर तथा मुद्रित काश्यपसंहिता के पृष्ठों का साथ में निर्देश करके ज्वरसमुच्चय में उद्धृत इस संहिता के श्लोक नीचे दिये जाते हैं—

'पूर्वोद्भवनिमित्तेन योऽपरो जायते गदः । तमुपद्रवमित्याहुरतीसारो यथा ज्वरे ।।
....... हिक्काश्च प्रवर्द्धन्ते ......' ।। (मूल उपोद्धात पृ. १६३ देखें)

मूल ताडपत्रीय काश्यपसंहिता के १९२ पृष्ठ के लुप्त होने से उसके स्थान पर इस मुद्रित पुस्तक में एक टिप्पणी (Foot Note) दी हुई है कि त्रुटित भाग का विषय मधुकोश व्याख्या में उद्धृत भालुकितन्त्र के श्लोकों से समानता रखता है। उसी त्रुटित (खण्डित) पृष्ठ के सन्निपातों के भेदविषयक श्लोक ज्वरसमुच्चय में कहीं कहीं कश्यप नाम से दिये हुए हैं। उस खण्डित पृष्ठ के आगे तथा पीछे के पृष्ठों के श्लोकों के भी ज्वरसमुच्चय में मिलने से बीच के श्लोक भो वे ही होने चाहिये। बीच के विलुप्त भाग के श्लोकों में कुछ निम्न श्लोक खण्डरूप में मिले हैं—

'तस्य शीतज्वरो निद्रा क्षुत्तृष्णा पार्श्वसङ्ग्रहः । .................... सन्निपातः सुदारुणः ।।'
(मूल उपोद्धात पृ. १६३-१६४ देखें)

इसके बाद मुद्रित पुस्तक से सादृश्य रखने वाले श्लोक ज्वरसमुच्चय में निम्न मिलते हैं—

'सर्वस्रोतोभवं त्वस्य रक्तपित्तं प्रकुप्यति । ................... देवामृतोपमम् ।।'
(मूल उपोद्धात पृष्ठ १६४-१६५ देखें)

इस प्रकार प्राचीन ज्वरसमुच्चय में अनेक स्थानों पर इस काश्यपसंहिता के उद्धरण तथा संवादों के मिलने से प्रतीत होता है कि उस समय तक काश्यपसंहिता का प्रचार तथा आदर था और यह प्रामाणिक समझी जाती थी। जिस ग्रन्थ में केवल प्राचीन ऋषियों के ही वचन संगृहीत हों उसमें काश्यपसंहिता के न केवल पूर्व भाग अपितु खिलभाग के भी उद्धरणों के मिलने से यह खिलभाग भी प्राचीन ही प्रतीत होता है।

॥ श्रीः ॥

श्रीकाश्यपसंहिता

वा

वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् ।

(कौमारभृत्यम्)


सूत्रस्थानम्

१........................ । ....................... ॥
किंवा लेहयितव्यं च किंवा लेहितलक्षणम् । अतिलेहितदोषाः के के च दोषा अलेहिते ।।
मन्दलीढस्य किं रूपं गुणदोषाश्च तत्र के । के लेहनोद्भवा रोगाः कश्च तेषामुपक्रमः ।।
एतन्मे भगवन् सर्वं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः । सुख (खं) दुःखं हि बालानां दृश्यते लेहनाश्रयम् ।।

भगवन् ! बालकों को किस वस्तु का लेहन कराना चाहिये ? सम्यक् लेहित के क्या लक्षण हैं ? अतिलेहित तथा अलेहित के क्या दोष हैं ? मन्दलीढ़ का क्या स्वरूप है तथा उसके गुण और दोष क्या हैं ? लेहन से उत्पन्न होने वाले रोग कौन २ से हैं तथा उनकी चिकित्सा क्या है ? इत्यादि सब बातों का आप मुझे यथार्थ उपदेश दीजिये क्योंकि बालकों के सुख और दुःख (स्वास्थ्य एवं रोग) लेहन पर ही आश्रित हैं।

वक्तव्य—यह ग्रन्थ पूर्ण रूप से नहीं मिला है इस ग्रन्थ का प्रारम्भ ही २९वें पृष्ठ से होता है। इससे पूर्व के २८ पृष्ठों में किन २ विषयों का समावेश था—यह कहना कठिन है। सूत्रस्थान के इस अध्याय में इस लेहन सम्बन्धी प्रश्न से पूर्व भी कुछ अन्य प्रश्न जीवक द्वारा अवश्य किये गये होंगे क्योंकि यह अध्याय इस लेहन सम्बन्धी प्रश्न से पूर्व खण्डित है। यह अध्याय एकान्तरूप से यहीं से ही प्रारम्भ नहीं होता है। आगे भगवान् कश्यप द्वारा दिये गये उत्तरों


१. वृद्धजीवकीय तन्त्र की उपलब्ध ताडपत्र पुस्तक के आदि अन्त तथा मध्य में खण्डित होने से इसमें २९ से प्रारंभ कर के २६४ तक पृष्ठ हैं। तथा २९ से लेकर २६४ तक के पृष्ठों में भी बीच बीच में ३०-३२, ३५, ३६, ४०, ४७, ४८, ५०-७४, ७७, ७८, ८०, ८२, ८३, ८६, ८८, ९१, ९३, ११३, ११५, ११६, ११९, १२१, १२४, १२७, १२९, १३१, १३४, १३५, १४२, १५५-१६६. १९२, २३५, २४७, २४९, २५१,२५२ २५४-२५८ तथा २६० पृष्ठ खण्डित हैं। इस प्रकार बीच २ में खण्डित होने से अपूर्ण अंशों को बिन्दुओं द्वारा सूचित किया गया है। विद्यमान पृष्ठों में भी कुछ जीर्ण होने से तथा कुछ स्याही के लुप्त हो जाने से पढ़े नहीं जा सकते हैं—उन्हें भी बिन्दुमाला द्वारा सूचित किया गया है। पाठकों को इस ग्रन्थ को इस बात को ध्यान में रखते हुए ही पढ़ना चाहिये कि यह ग्रन्थ मूल पुस्तक के २९वें पृष्ठ से ही प्रारंभ हुआ है।

२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लेहाध्यायः ? ]

को देखते हुए भी प्रतीत होता है कि इसमें लेहन के अतिरिक्त बालकों की प्रकृति आदि के सम्बन्ध में भी अन्य बहुत से प्रश्न किये गये होंगे।

इस अध्याय का मुख्य विषय लेहन है। बालकों के स्वास्थ्य, बल एवं बुद्धि की वृद्धि के लिये प्राचीन काल में बालकों को अनेक प्रकार के योग लेहन (अवलेह) के रूप में चटाने की परम्परा थी। जिस प्रकार आजकल बालकों के स्वास्थ्य एवं बुद्धि के लिये अनेक प्रकार की जन्मघुटियों का प्रयोग किया जाता है उसी प्रयोजन के लिये प्राचीन काल में इन लेहन योगों का प्रचलन था। इन लेहन योगों में स्वर्ण का विशेष स्थान था। स्वर्ण विशेषरूप से मेधावर्धक होता है। इसीलिये सद्यः जात बालक को भी मधु के साथ स्वर्ण चटाने का विधान मिलता है। बालकों के लिये प्रतिदिन व्यवहार में आने वाले इन लेहन योगों को दक्षिण भारत में ‘उरमरुन्द’ कहते हैं।

इति पृष्टो महाभागः कश्यपो लोकपूजितः । प्रश्नं प्रोवाच निखिलं प्रजानां हितकाम्यया ।।

इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर लोक पूजित एवं ऐश्वर्यशाली भगवान् कश्यप ने लोगों के हित की कामना से उपर्युक्त प्रश्नों का पूर्ण रूप से उत्तर दिया।

यदन्नपानं प्रायेण गर्भिणी स्त्री निषेवते । रसो निर्वर्तते तादृक् त्रिधा चास्याः प्रवर्तते ।।

गर्भिणी स्त्री प्रायः जिस प्रकार के अन्नपान का सेवन करती है उससे वैसा ही रस बनता है तथा वह रस तीन प्रकार से काम में आता है १. उस रस का एक भाग माता (गर्भिणी स्त्री) के शरीर के पोषण में २. एक भाग गर्भ (Foetus) के पोषण में तथा ३. एक भाग स्तनों की पुष्टि के लिये प्रयुक्त होता है।

**वक्तव्य—**गर्भवती स्त्री जिस भोजन का सेवन करती है उससे स्वयं उसके शरीर का तो पोषण होता ही है अपितु अपरा (Placenta) द्वारा गर्भ का भी पोषण होता है। सुश्रुत में कहा है—“गर्भस्य खलु रसनिमित्ता ..... परिवृद्धिर्भवति”। इसकी टीका में डल्हण ने लिखा है—“रसनिमित्तेति मातुरिति शेषः”। इसके साथ २ गर्भिणी के स्तनों की भी पुष्टि होती है। सुश्रुतसंहिता शारीरस्थान अध्याय ४ में कहा है—“शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोधरावभिप्रतिपद्यते, तस्माद् गर्भिण्यः पीतोन्नतपयोधरा भवन्ति' इसकी टीका में डल्हण करता है—‘स्तनाश्रयमेव कफोपरञ्जितं स्तन्यतामुपगतं प्रसूतायाः पुनराहाररसेनाप्याय्यते'। चरक शा. अ. ६ में भी कहा है-‘स च सर्वरसवानाहारः स्त्रियास्त्रिधा रसः प्रतिपद्यते स्वशरीरपुष्टये स्तन्याय गर्भवृद्धये च’।

मातृपुष्ट्यर्थमेकांशो द्वितीयो गर्भपुष्टये । तृतीयः स्तनपुष्ट्यर्थं, नार्या गर्भस्तु पुष्यति ।।
तादृक्प्रकृतयस्तस्माद्गर्भात् प्रभृति देहिनः । वातपित्तकफस्थूणास्तिस्रः प्रकृतयश्च ताः ।।

नारी के गर्भ की जिस विधि से पुष्टि होती है, प्रारंभ (गर्भ) से ही मनुष्यों की उसी प्रकार की प्रकृतियां बन जाती हैं। ये प्रकृतियां मुख्य रूप से तीन प्रकार की—१. वातस्थूणा २. पित्तस्थूणा तथा ३. श्लेष्मस्थूणा होती हैं।

**वक्तव्य—**वास्तव में गर्भ को जिस ढंग का पोषण मिलता है उसी प्रकार की आगे उसकी प्रकृति बन जाती है। सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः । प्रकृतिर्जायते तेन ......। गर्भावस्था से ही प्रकृति का निर्माण होता है। उसे बदलना अत्यन्त कठिन है। “यः स्वभावो हि यस्यास्ति तस्यासौ दुरतिक्रमः । श्वायदि क्रियते राजा किं स नाश्नात्युपानहम्’ ।। (हितोपदेश)।

आयुर्वेद के सिद्धान्तानुसार वात, पित्त, तथा कफ इन तीनों दोषों पर ही शरीर की स्थिति है। जिस प्रकार तीन स्तम्भों से मकान की स्थिति है उसी प्रकार ये तीनों दोष समावस्था में विद्यमान होकर शरीर का धारण करते हैं। इसी लिये यहां वात, पित्त तथा कफ का स्थूण शब्द से निर्देश किया गया है। सुश्रुत सूत्रस्थान २१ अध्याय में भी स्थूण शब्द

लेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम् ३

का इसी अर्थ में प्रयोग किया गया है—"वातःपित्तश्लेष्माण एव देहसंभव हेतवः। तैरेवाव्यापन्नैरधोमध्योर्ध्वसन्निविष्टै शरीरमिदं धार्यते ऽगारमिव स्थूणाभिस्तिसृभिरतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके" । इस शरीर रूपी मकान के लिये वात, पित्त तथा श्लेष्मा तीन स्थूण (स्तम्भों) का कार्य करते हैं। उन्हीं वात पित्त कफ रूपी तीन स्तम्भों पर यह मकान स्थित है। वे ही स्थूण (स्तम्भ) जब विकृत हो जाते हैं तब शरीर के नाश का कारण होते हैं। इसी लिये शरीर की मुख्य रूप से ये ही तीन प्रकृतियां कही गई हैं।

वातिकाः पैत्तिकाः केचित् कफिनश्चैव देहिनः । द्वन्द्वप्रकृतयश्चान्ये समस्थूणास्तथाऽपरे ।। अरोगास्तु समस्थूणा वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः ।

कुछ व्यक्ति वातप्रकृति, कुछ पित्तप्रकृति तथा कुछ श्लेष्मप्रकृति के होते हैं। कुछ व्यक्ति द्वन्द्व (दो दोषों का संयोग) प्रकृति तथा कुछ समस्थूण प्रकृति के होते हैं। इनमें से समस्थूण प्रकृति के व्यक्ति स्वस्थ होते हैं तथा वातिक आदि प्रकृति के मनुष्य सदा रोगी ही होते हैं।

वक्तव्य—वास्तव में प्रकृतियां मुख्यरूप से उपर्युक्त तीन ही होती हैं परन्तु उन्हीं दोषों के परस्पर संसर्ग से वे सात प्रकार की हो जाती हैं। यथा—१. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४. वातपैत्तिक ५. वातश्लैष्मिक ६. पित्तश्लैष्मिक तथा ७. सम प्रकृति (जिसमें वात पित्त तथा श्लेष्मा समानरूप से विद्यमान हों)। सुश्रुत में भी सात प्रकार की प्रकृतियां मानी गई हैं-सप्तप्रकृतयो भवन्ति दोषैः पृथकद्विशः समस्तैश्च। तथा चरक सू. अ. ७ के निम्न श्लोक में भी- समपित्तानिलकफाः केचिद्गर्भादिमानवाः। दृश्यन्ते वातलाः केचित्पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा।। 'तथा' शब्द से द्वन्द्वज का ग्रहण करते उपर्युक्त सात ही प्रकृतियां मानी गई हैं। इस सात प्रकार की प्रकृतियों में से समस्थूणा (सम) प्रकृति वाले व्यक्ति स्वस्थ माने गये हैं। तथा शेष वात आदि प्रकृति वाले सब व्यक्ति नित्य आतुर (रोगी-अस्वस्थ) माने गये हैं।

उपर्युक्त सातों प्रकार की प्रकृतियां होते हुए भी वास्तव में वे ही व्यक्ति पूर्णरूप से स्वस्थ माने जाते हैं जिनमें तीनों दोष समावस्था में विद्यमान होते हैं। समावस्था से यह अभिप्राय नहीं है कि वात पित्त तथा कफ तीनों दोष समान परिमाण में विद्यमान हों अपितु समावस्था से तात्पर्य यह है कि तीनों दोषों को जिस अनुपात (Proportion) में होना चाहिये उसी अनुपात में हों। वातिक पैत्तिक आदि वास्तव में प्रकृतियां नहीं हैं अपितु जिस व्यक्ति में जिस दोष की प्रधानता होती है उसे स्थूलरूप में वही नाम दे दिया गया है। वास्तव में वे अमुक २ दोषों की वृद्धावस्था ही समझनी चाहिये। इन्हें प्रकृति कहना उपयुक्त नहीं है। किसी भी दोष की वृद्धयवस्था सदा रोग को ही सूचित करती है। दोषों की समावस्था ही स्वास्थ्य है। विकारो धातुवैषम्य साम्यं प्रकृतिरुच्यते। सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च।। (चरक सू.अ. ९) दोषों की समावस्था को ही प्रकृति माना है। यहां कई लोग शंका उपस्थित करते हैं कि कोई भी व्यक्ति समवातपित्तकफ नहीं हो सकते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के आहार में थोड़ी बहुत विषमता अवश्य होती है और माता के आहार रस के अनुसार ही व्यक्तियों की प्रकृतियों का निर्माण होता है। इसलिये माता के आहार के विषम होने से गर्भ कभी भी समधातुप्रकृति नहीं हो सकता है। अतः किसी न किसी दोष की प्रधानता होकर कोई व्यक्ति वातप्रकृति, कोई पित्तप्रकृति तथा कोई श्लेष्मप्रकृति के ही होते हैं। इसलिये “वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः” यह कहना उचित नहीं है। भगवान् आत्रेय चरक संहिता के विमान स्थान में इस तर्क का खण्डन करते हुए कहते हैं कि—समवातपित्तश्लेष्माणं ह्यरोगमिच्छन्ति भिषजः, यतः प्रकृतिश्चारोग्यं, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः, सा चेष्टरूपा, तस्मात् सन्ति समवातपित्तश्लेष्मप्रकृतयः। न तु खलु सन्ति वातप्रकृतयः, पित्तप्रकृतयः श्लेष्मप्रकृतयो वा, तस्य तस्य किल दोषस्याधिकभावान्सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणां, न च विकृतेषु दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुप पद्यते, तस्मान्नैताः प्रकृतयः सन्ति, सन्ति तु खलु वातलाः, पित्तलाः श्लेष्मलाश्च, अप्रकृतिस्थास्तु ते ज्ञेयाः”। चिकित्सक लोग समवातपित्तकफ पुरुष को ही नीरोग अथवा स्वस्थ मानते हैं। प्रकृति को

४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लेहाध्यायः ? ]

ही आरोग्य कहते हैं। आरोग्य के लिये ही भेषज की प्रवृत्ति होती है। कहा भी है—चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते। प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते। समवातपित्तकफधातु वाले पुरुष हो सकते हैं तथा होते हैं। वास्तव में वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक प्रकृति नहीं होती है। वह तो दोषों की प्रधानता होने से दोषप्रकृति ही है तथा इसे अप्रकृति (रुग्णावस्था) ही जानना चाहिये। इसीको दृष्टि में रखते हुए कहा गया है—“वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः” चरकसंहिता सू. अ. ७ में भी बिलकुल ऐसा ही वर्णन किया गया है—तेषामनातुराः पूर्वे वातलाद्याः सदाऽऽतुराः॥ इन वातिक प्रकृति आदि वाले मनुष्यों को हम उपचार रूप से ही स्वस्थ कह सकते हैं वस्तु-तस्तु इनमें अमुक २ दोष की प्रधानता होने से ये विकृति ही हैं।

एताः प्रकृतयः प्रोक्ता देहिनां वृद्धजीवक ! ।। एता आश्रित्य तत्त्वज्ञो भेषजान्युपकल्पयेत्।
य एता वेद तत्त्वेन न स मुह्यति भेषजे ।।

हे वृद्धजीवक ! ये मनुष्यों की प्रकृतियां कही गई हैं। तत्त्वज्ञ चिकित्सक को चाहिये कि इन प्रकृतियों के अनुसार ही ओषधियों की कल्पना करे। जो चिकित्सक इन प्रकृतियों को तत्त्वपूर्वक जानता है अथवा उन्हें ध्यान में रखता है वह चिकित्सा कार्य में कभी भी व्यामूढ़ (मोहित) नहीं होता है।

विल (ङ) ङ्गफलमात्रं तु जातमात्रस्य देहिनः। भेषजं मधुसर्पिर्भ्यां मतिमानुपकल्पयेत् ।।
वर्धमानस्य तु शिशोर्मासे मासे विवर्धयेत् । अथामलकमात्रं तु परं विद्वान्न वर्धयेत् ।।

बुद्धिमान् चिकित्सक को चाहिये कि उत्पन्न हुए बालक को विडङ्गफल (वायविडङ्ग) के बराबर (भार में) ओषधि मधु तथा सर्पिस् (असमान मात्रा) के साथ देवे। तथा ज्यों २ शिशु की वृद्धि होती जाय प्रत्येक मास ओषधि की मात्रा भी बढ़ाता जाय परन्तु विद्वान् चिकित्सक आमलक (आंवले) के परिमाण से अधिक ओषधि की मात्रा न बढ़ावे।

**वक्तव्य—**प्राचीन काल में वैज्ञानिक मापतोल का उदय न होने से प्रचलित वस्तुएं ही माप तोल में व्यवहृत होती थीं। इसीलिये बालकों की ओषधि के लिये विडङ्ग तथा आमलक द्वारा ओषधि के परिमाण का निर्देश किया गया है। सुश्रुतसंहिता के शारीरस्थान में ओषध का परिमाण भिन्न ही ढंग से बतलाया गया है—“तत्र मासाद्धूर्ध्वं क्षीरपायाङ्गुलिपर्वद्वयग्रह (ण) संमितामौषधमात्रां विदध्यात्, कोलास्थिसंमितां कल्कमात्रां क्षीरान्नादाय, कोलसंमितामन्नादाय्येति”। यहां बालकों का तीन प्रकार का श्रेणीकरण किया गया है १. क्षीराद २. क्षीरान्नाद ३. अन्नाद। एक वर्ष की उम्र तक बालक क्षीराद, दो वर्ष तक क्षीरान्नाद तथा उससे ऊपर अन्नाद कहलाता है। क्षीराद के लिये उतनी औषध का विधान है जितनी अंगुली के दो पर्व पर लग सके। क्षीरान्नाद के लिये कोलास्थि के बराबर तथा अन्नाद के लिये कोल (बेर) के बराबर (भार में) औषध निर्धारित की गई है। अन्य ग्रन्थों में बालकों को निम्न परिमाण में औषध देने का विधान किया गया है—प्रथमे मासि जातस्य शिशोर्भेषजरक्तिका। अवलेह्या तु कर्तव्या मधुक्षीरसिताघृतैः ।। एकैकां वर्धयेत्तावद्यावत् संवत्सरो भवेत्। तदूर्ध्वं माषवृद्धिः स्यात् यावत् षोडशाब्दिकः :: आजकल बालकों की औषध की मात्रा ज्ञात करने के लिये Young का निम्न फार्मूला व्यवहृत होता है—The rule is to divide the age in years by the age in years plus 12, the resulting quotient is the proper fraction of an adult dose. किसी भी आयु के बालक की मात्रा अवस्था/अवस्था+१२ के द्वारा ज्ञात की जा सकती है। उदाहरण के लिये एक वर्ष के बालक के लिये औषध की मात्रा १/१+१२ अर्थात् पूर्ण मात्रा की १/१३ होगी। इसी प्रकार तीन वर्ष के बालक के लिये ३/३+१२=३/१५ या १/५ मात्रा होनी चाहिये। इससे आगे १२ से १६ वर्ष के बालकों के लिये औषध की मात्रा पूर्णमात्रा का १/२ से २/३ तथा १७ से २० वर्ष तक २/३ से ४/५ मात्रा होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त बालकों की औषध की मात्रा ज्ञात करने

लेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम् ५

के लिये Cowing तथा Dilling के उपाय भी प्रयुक्त किये जाते हैं परन्तु सबसे अधिक प्रचलित Young का फार्मूला ही है जो कि प्रायः व्यवहृत होता है ।।

अक्षीरा जननी येषामल्पक्षीराऽपि वा भवेत् । दुष्टक्षीरा प्रसूता वा धात्री वा यस्य तादृशी ।। दुष्प्रजाताभृशव्याधिपीडितायाश्च त्ये सुताः । वातिकाः पैत्तिका ये च ये च स्युः कफवर्जिताः ।। स्तन्येन ये न तृप्यन्ति पीत्वा पीत्वा रुदन्ति च । अनिद्रा निशि ये च स्युर्ये च बाला महाशनाः ।। अल्पमूत्रपुरीषाश्च बाला दीप्ताग्नयश्च ये । निरामयाश्च तनवो मृद्वङ्गा ये च कर्शिताः ।। वर्चःकर्म न कुर्वन्ति बाला ये च त्र्यहात् परम् । एवंविधाञ्छिशूनाह लेहयेदिति कश्यपः ।।

लेहन किन्हें कराना चाहिये—उन बालकों को जिनकी माता या धात्री के स्तनों में दूध बिलकुल न आता हो, कम आता हो या दूषित हो अथवा जो प्रसूता हो । जो दुष्प्रजाता (जिसे ठीक तरह से प्रसव न हुआ हो) तथा गंभीर रोग से पीड़ित स्त्री के बालक हों, जिनमें वात तथा पित्त दोष की प्रधानता को परन्तु साथ में जो कफदोष से रहित हों, जो दूध पीने के बाद भी तृप्त नहीं होते तथा दूध पीकर भी लगातार रोते रहते हैं, जिन्हें रात्रि में नींद नहीं आती, जो बहुत भोजन करते हों, जिन्हें मूत्र तथा मल कम आता हो, जिनकी अग्नि दीप्त हो, जो रोगशून्य होने पर भी तनु (पतले) मृदु (कमजोर) अङ्गोंवाले तथा कृश हों, जो तीन २ दिन तक मलत्याग नहीं करते, ऐसे बालकों का लेहन करावे-ऐसा भगवान् कश्यप का मत है ।

लेहन से यहां क्या तात्पर्य है इसका पूर्व भी निर्देश किया जा चुका है । बालकों की स्वास्थ्य रक्षा के लिये भिन्न २ ओषधियां तथा स्वर्ण आदि मधु में मिलाकर जो बालकों को चटाई जाती है उन्हें लेहन कहते हैं ।

......... च मन्दाग्निरठरो जनः । निद्रालुर्बहुविण्मूत्रः स्वल्पो यो दृढ़गात्रकः ।। कल्याणमातृकोऽजीर्णी गुरुस्तन्योपसेविता(तः) । सुतः सर्वरसाशिन्या ऊर्ध्वजत्रुरुजान्वितः ।। आमे ज्वरेऽतिसारे च कामलाशोथपाण्डुषु । हृद्रोगश्वासकासेषु गुदबस्त्युदरामये ।। आनाहे गण्डवैसर्पे छर्द्यरोचकयो(र्बले) । ......... हे सर्वग्रहेषु च ।। न लेहयेदलसके नाहन्यहनि नाशितम् । न दुर्दिनपुरोवाते नासात्म्यं नातिमात्रया ।।

लेहन किन्हें नहीं कराना चाहिये—मन्द जठराग्निवाले, निद्रालु, बहुत मल एवं मूत्र का त्याग करने वाले, स्वल्प एवं दृढ़ (कठोर) शरीर वाले, कल्याणमातृक, अजीर्ण के रोगी एवं भारी स्तन्य (दूध) का सेवन करने वाले, सब रसों अथवा आहार रसों का सेवन करने वाली स्त्री के पुत्रों, ऊर्ध्वजत्रु रोगों से युक्त, आमरोग, ज्वर तथा अतिसार में अथवा आमातिसार और ज्वरातिसार में, कामला (पीलिया-Jaundice) शोथ (Dropsy) तथा पाण्डुरोग में, हृद्रोग, श्वास, कास, गुदरोग, बस्तिरोग, एवं उदररोग में, आनाह (Flatulance) गण्डविसर्प, बलवान् छर्दि (वमन) एवं अरुचि (Nausea) में, सब प्रकार के ग्रहरोगों में तथा अलसक रोग में बालकों को लेहन न करावे । इसके अतिरिक्त, प्रतिदिन, भोजन करने के उपरान्त दुर्दिन में तथा सामने से तेज वायु चलती हो तब भी लेहन न करावे । असात्म्य, वस्तु का लेहन तथा अधिक मात्रा में भी लेहन नहीं कराना चाहिये ।

वक्तव्य—कल्याणमातृक-‘कल्याणी माता यस्य’ जिसकी माता कल्याण युक्त हो । कल्याण का अर्थ अक्षय स्वर्ग भी होता है । मेदिनी में कहा है—कल्याणमक्षयस्वर्गे । जिस बालक की माता अक्षय स्वर्ग (मोक्ष) को प्राप्त हो गई है तथा जिसकी विमाता (Step mother) हो । ऐसा बालक कल्याणमातृक कहलाता है । ऊर्ध्वजत्रु-जत्रु से अभिप्राय

६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लेहाध्यायः ? ]

ग्रीवामूल अथवा अंसफलकास्थि (Clavicles-collar-bones) से है। उससे ऊपर के रोगों अर्थात् श्रवण, नयन, मुख, नासिका तथा सिर के रोगों को ऊर्ध्वजत्रुज या शालाक्य रोग कहते हैं।

अलसक—यह विसूचिका का भेद है। इसकी निरुक्ति निम्न प्रकार से की है—'प्रयातिनोर्ध्वं नावन्तात् आहारो न विपच्यते। आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः॥ कफ द्वारा मार्गों के रुक जाने से आहार आमाशय में ही स्थित रहता है। वह न नीचे की ओर आता है और न ऊपर की ओर जाता है। अन्दर ही आलसी की तरह पड़ा रहता है इसीलिये इसे अलसक कहा है। इसके लक्षण निम्न होते हैं' कुक्षिरानह्यतेऽत्यर्थं प्रताम्येत् परिकूजति। निरुद्धो मारुतश्चैव कुक्षाबुपरि धावति॥

सेवितान्यन्नपानानि गर्भिण्या यान्यभ ...... । तानि सात्म्यानि बालस्य तस्मात्तान्युपचारयेत् ।।
देशकालाग्निमात्राणां न च कुर्याद्व्यतिक्रमम् ।

गर्भ के समय गर्भिणी जिस अन्नपान का सेवन करती है बालकों को वे ही सात्म्य होते हैं। इसलिये उन्हीं का सेवक कराना चाहिये। इसमें देश, काल तथा अग्निमात्रा का व्यतिक्रम न करे। अर्थात् सात्म्य होते हुए भी देश, काल तथा अग्निमात्रा का ध्यान रखकर ही उनका सेवन करे अन्यथा सात्म्य होने पर भी वे विपरीतार्थकारी सिद्ध होंगे।

वक्तव्य—बालक को वही अन्नपान विशेष रूप से सात्म्य हो सकता है जिसका गर्भावस्था में माता द्वारा सेवन किया हो। माता के आहार रस से ही गर्भ की पुष्टि होती है। गर्भ के प्रत्येक अवयव में उस आहार रस का प्रभाव व्याप्त हो जाता है। इसीलिये माता जिस प्रकार के आहार का सेवन करती है गर्भस्थ बालक की वैसी ही प्रकृति भी बनती है। सात्म्य से अभिप्राय उस वस्तु से है जो निरन्तर उपयोग में आने से अनुकूल हो गई हो। चरक विमानस्थान अ. १ में कहा है—सात्म्यं नाम तत् यदात्मन्युपशेते, सात्म्यार्थोह्युपशयार्थः।

द्रव्याणां लेहनीयानां विधिञ्चैवोपदेक्ष्यते । विघृष्य धौते दृषदि प्राङ्मुखी लघुनाऽम्बुना ।
आमथ्य मधुसर्पिर्भ्यां लेहयेत् कनकं शिशुम् ।।
सुवर्णप्राशनं ह्येतन्मेधाग्निबलवर्धनम् । आयुष्यं मङ्गलं पुण्यं वृष्यं वर्ण्यं ग्रहापहम् ।।
मासात् परममेधावी व्याधिभिर्न च धृष्यते । षड्भिर्मासैः श्रुतधरः सुवर्णप्राशनाद्भवेत् ।।

अब लेहनीय द्रव्यों की विधि बतलाई जायगी। पूर्व दिशा में मुँह करके धोये हुए पत्थर पर थोड़े से पानी के साथ स्वर्ण को घिस कर उसमें मधु और घृत (असमान मात्रा) मिलाकर बालक को चटावे। यह सुवर्णप्राशन कहलाता है जो कि मेधा (बुद्धि), अग्नि और बल को बढ़ाने वाला है। यह आयु को देने वाला, कल्याणकारक, पुण्यकारक, वृष्य, वर्ण्य (शरीर के वर्ण को ठीक करने वाला) तथा ग्रहबाधाओं को दूर करने वाला है। सुवर्णप्राशन से बालक एक मास के अन्दर मेधायुक्त होता है तथा वह व्याधियों द्वारा आक्रान्त नहीं होता है। और वह ६ मास में श्रुतधर (सुनी हुई बात को धारण करने वाला) हो जाता है अर्थात् उसकी स्मरणशक्ति बहुत बढ़ जाती है।

वक्तव्य—बालक के उत्पन्न होते ही जातकर्मसंस्कार में भी सुवर्णप्राशन का विधान मिलता है। सुश्रुतसंहिता के शारीरस्थान में यह विधि निम्न प्रकार से दी है—'अथ कुमारं शीताभिरद्बिराश्वास्य जातकर्मणि कृते मधुसर्पिरनन्तचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लेहयेत्' बालक को मधु और सर्पिस् (घृत) में मिलाकर अनन्तचूर्ण (सुवर्ण) का लेहन करावे। इसी स्थान पर किसी २ ग्रन्थ में निम्न पाठभेद भी मिलता है—मधुसर्पिरनन्ताब्राह्मीरसेन सुवर्णचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लेहयेत्'। वाग्भट में यह प्राशन (लेहन) विधि भिन्न प्रकार से कही है—'ऐन्द्री ब्राह्मी शंखपुष्पी वचाकल्कं मधुघृतोपेतं हरेणुमात्रं कुशलाभिमन्त्रितं सौवर्णेनाश्वत्थपत्रेण वा मेधायुर्बलजननं प्राशयेद्वा ब्राह्मी वचानन्ता शतावर्यन्यतमचूर्णम्'। यह सुवर्णप्राशन तथा अन्य लेहन बालक के जन्म के बाद तीन चार दिन तक देने का विधान है क्योंकि तीन चार दिन तक

लेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम्

दुग्धवहस्त्रोतस् प्रायः बन्द रहते हैं अतः माता (प्रथम प्रसव में—Primiparas) तीन चार दिन तक बालक को अपने स्तनों से दूध नहीं पिला सकती है । सुश्रुत में कहा है—धमनीनां हृदिस्थानां विवृतत्वादनन्तरम् । चतूरात्रात्त्रिरात्राद्वा स्त्रीणां स्तन्यं प्रवर्तते ।। तस्मात् प्रथमेऽह्नि मधुसर्पिरनन्तामिश्रं मन्त्रपूतं त्रिकालं पाययेत्, द्वितीये लक्ष्मणासिद्धं सर्पिस्तृतीये च । परन्तु यहां उपर्युक्त सुवर्णप्राशन या लेहन से अभिप्राय प्रतीत नहीं होता है जो कि जातकर्म के बाद दो तीन दिन तक दिया जाता है । अपितु यहां निरन्तर सेवन करने के लिये ही इन लेहनों का प्रयोग दिया गया है । जैसे आजकल छोटे शिशुओं को भिन्न २ प्रकार की जन्मघुट्टियों का प्रयोग कराया जाता है उसी तरह बालकों को स्वस्थ रखने के लिये इन लेहों का प्रयोग कराया जाता हुआ प्रतीत होता है ।

आयुष्यम्—आयु की वृद्धि के लिये भी सुवर्ण का प्रयोग कराया जाता है । सुश्रुत चिकित्सास्थान के मेधापुष्कामीय अध्याय में कहा है—अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि आयुष्कामरसायनम् । मन्त्रौषधसमायुक्तं संवत्सरफलप्रदम् ।। बिल्वस्य चूर्णे पुष्ये तु हुतं वारान् सहस्रशः । श्रीसूक्तेन नरः कल्पे ससुवर्णं दिने दिने ।। सर्पिर्मधुयुतं लिह्यादलक्ष्मीनाशनं परम् । इत्यादि ।

ब्राह्मी मण्डूकपर्णी च त्रिफला चित्रको वचा । शतपुष्पाशतावर्यौ दन्ती नागबला त्रिवृत् ।। एकैकं मधुसर्पिर्भ्यां मेधाजननमभ्यसेत् । कल्याणकं पञ्चगव्यं मेध्यं ब्राह्मीघृतं तथा ।।

ब्राह्मी, मण्डूकपर्णी, त्रिफला, चित्रक, वच, सौंफ, शतावरी, दन्ती, नागबला तथा निसोध, इनका पृथक् २ मधु तथा घृत के साथ मेधावृद्धि के लिये प्रयोग करे तथा मेधावर्धक कल्याणकघृत, पञ्चगव्यघृत और ब्राह्मीघृत का भी लेहन करावे ।

वक्तव्य—चरक संहिता के उन्माद चिकित्सा में कल्याणक घृत का निम्न पाठ दिया है इसे अष्टाविंशति घृत भी कहते हैं—विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्वेलवालुकम् । स्थिरा नतं रजन्यौ द्वे सारिवे द्वे प्रियङ्गुकम् ।। नीलोत्पलैलामञ्जिष्ठा दन्तीदाडिमकेशरम् । तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ।। विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठ चन्दनपद्मकौ । अष्टाविंशतिभिः कल्कैरेतैः कर्षसमैर्भिषक् ।। ........... कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च । इसे ही तन्त्रान्तरों में पानीयकल्याणक घृत भी कहा है । इसकी मात्रा १/४ तोला है । चरकसंहिता के ही अपस्मार चिकित्सा में पञ्चगव्य घृत की निर्माणविधि एवं उपयोग निम्न प्रकार से दी है—गोशकृद्रसदध्यम्ल क्षीरमूत्रैः समैर्धृतम् । सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम् वहीं पर ब्राह्मी घृत का निम्न पाठ दिया है—ब्राह्मीरसवचाकुष्ठ शङ्खपुष्पीभिरेव च । पुराणं घृतमुन्मादलक्ष्म्यपस्मारपाप्मजित् ।। इससे आगे अन्य भी कई लेहन योग दिये गये हैं ।

समङ्गा त्रिफला ब्राह्मी द्वे बले चित्रकस्तथा । मधु सर्पिरिति प्राश्यं मेधायुर्बलवृद्धये ।।

मेधा आयु तथा बल की वृद्धि के लिये मञ्जिष्ठा, त्रिफला, ब्राह्मी, दोनों बला (बला और अतिबला) और चित्रक के चूर्ण को समभाग लेकर मधु एवं घृत में मिलाकर प्राशन (लेहन) करना चाहिये ।

कुष्ठं वटाङ्कुरा गौरी पिप्पल्यास्त्रिफला वचा । ससैन्धवैर्घृतं पक्वं मेधाजननमुत्तमम् ।।

कूठ, बढ के अङ्कुर, गौरी (पीत सर्षप) पिप्पली, त्रिफला, वच तथा सेन्धानमक को मिलाकर घृत के साथ घृतपाकविधि से पकाया जाय । यह घृत उत्तम मेधाजनक है ।

ब्राह्मी सिद्धार्थकाः कुष्ठं सैन्धवं सारिवा वचा । पिप्पल्यश्चेति तैः सिद्धं घृतं नाम्नाऽभयं स्मृतम् ।। न पिशाचा न रक्षांसि न यक्षा न च मातरः । प्रबाधन्ते कुमारं तं यः प्राश्रीयादिदं घृतम् ।।

काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लेहाध्यायः ? ]

ब्राह्मी, सरसों, कूठ, सैन्धव, सारिवा (अनन्तमूल) वच तथा पिप्पली से घृतपाक विधि से घृत सिद्ध किया जाय। इसका नाम अभयघृत है। इस घृत के सेवन करने वाले बालक को पिशाच, राक्षस, यक्ष तथा मातृकाएं कोई बाधा (कष्ट) नहीं पहुंचा पाती हैं। अष्टाङ्ग ह. उ. अ. १ में भी अभय घृत का यही पाठ मिलता है—ब्राह्मीसिद्धार्थकवचासारिवाकुष्ठसैन्धवैः। सकणैः साधितं पीतं वाङ्मेधास्मृतिकृद्घृतम्॥ आयुष्यं पापरक्षोघ्नं भूतोन्मादनिबर्हणम्॥

खदिरः पृश्निपर्णी च स्यत्(न्दनः) सैन्धवं बले।
केवुकेति कषायः स्यात् पादशिष्टो जलाढके॥
अर्धप्रस्थं पचेदत्र तुल्यक्षीरं घृतस्य तु। घृतं संवर्धनं नाम लेह्यं मधुयुतं सदा॥
निर्व्याधिर्वर्धते शीघ्रं संसर्पत्याशु गच्छति। पङ्गुमूकाश्रुतिजडा युज्यन्ते चाशु कर्मभिः॥

खदिर, पृश्निपर्णी (पिठवन) स्यन्दन (तिन्दुक अथवा अर्जुन) सैन्धव, दोनों बला (बला और अतिबला) और केबुक (केमुआ-कन्दशाक विशेष)—इनका एक आढक जल में चतुर्थांश कषाय बनावे। इनमें समान मात्रा में दुग्ध तथा आधा प्रस्थ घी डालकर घृतपाकविधि से पकावे। यह संवर्धन नाम का घृत है। इसको सदा मधु के साथ मिलाकर लेहन करे। इसके सेवन से बालक शीघ्र ही व्याधिरहित होकर वृद्धि को प्राप्त होता है, शीघ्र चलने फिरने लगता है तथा पङ्गु (न चलने वाले-लूले), मूक (गूंगे), अश्रुति (न सुनने वाले-बहरे) तथा जड (Idiot) बालक जल्दी उन २ क्रियाओं से युक्त हो जाते हैं अर्थात् इसके प्रयोग से लूले चलने लगते हैं, गूंगे बोलने लगते हैं, बहरे सुनने लगते हैं तथा मूर्ख समझने लगते हैं।

स्वरसस्याढके ब्राह्म्या घृतप्रस्थं विपा^१चयेत्। स(वत्सा)ऽजागोपयसामाढकाढकमावपेत्॥
त्रिफलाऽंशुमती द्राक्षा वचा कुष्ठं हरेणवः। पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम् ॥
त्वक्पत्रबालकोशीरचन्दनोत्पलपद्मकम्। शतावरी नागबला दन्ती पाठा प्रियङ्गुका॥
देवदारु हरिद्रे द्वे जीवनीयाश्च यो गणः। विडङ्गो गुग्गुलुर्जातिः ...........॥
...................। ...................॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २९ तमं पत्रम्^२।)


ब्राह्मी स्वरस—१ आढक। गोघृत—१ प्रस्थ। जिनके बच्चे जीवित हों उन गौ तथा बकरियों का दूध—एक २ आढक। इसमें त्रिफला, अंशुमती (शालिपर्णी), द्राक्षा, वच, कूठ, हरेणु (रेणुका-सुगन्धित द्रव्य), पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, नागर (सोंठ), त्वक् (दालचीनी), पत्र (तेजपत्र), बालक (नेत्रबाला), उशीर (खस), श्वेत-चन्दन, उत्पल (नील कमल), पद्मक (पद्माख अथवा श्वेत-कमल) शतावरी, नागबला, दन्ती, पाठा, प्रियङ्गु, देवदारु, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, जीवनीय गण की ओषधियां, वायविडङ्ग, गुग्गुलु तथा जाति पत्री ...... इत्यादि द्रव्यों का परिभाषानुसार कल्क डालकर घृतपाक करे। इस घृत का लेहन करावे। इससे उपर्युक्त लाभ होते हैं।

जीवनीय गण—चरक में निम्न दिया है—'जीवकर्षभकौ मेदा महामेदा, काकाली, क्षीरकाकोली, मुद्गमाषपर्ण्यौ जीवन्ती मधुकमिति'। इनमें से प्रथम ६ ओषधियां अष्टवर्ग में आती हैं जिनके प्रायः अलभ्य होने से उनके स्थान पर


१. अत्र 'विपाचयेत्' इति मुद्रितपुस्तकपाठः।
२. ३० पत्रतः ३२ पत्रपर्यन्तो ग्रन्थस्ताडपत्रपुस्तके खण्डितः।

क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ] सूत्रस्थानम् ९

क्रमशः विदारीकन्द, शतावरी तथा अश्वगन्धा आदि प्रतिनिधि द्रव्य लिये जाते हैं। क्योंकि कहा भी है—राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः।

नोट—यह अध्याय यहीं मध्य में ही खण्डित हो गया है।


एकोनविंशोऽध्यायः

................... । ........... ॥
......... शकुनी कटुतिक्तके। स्कन्दषष्ठीग्रहौ ज्ञेयौ व्यापन्ने सान्निपातिके।
पूतना स्वादुकटुके शेषाः संसृष्टदोषजाः ॥

वक्तव्य— यह अध्याय भी प्रारंभ में खण्डित है। इस अध्याय में धात्री के दूध के विषय में विशेष विवेचन किया गया है। इसमें धात्री के दूध की वृद्धि तथा उसके शोधन के अनेक प्रकार दिये गये हैं। ग्रहदोषों के कारण भी दूध प्रायः दूषित हो जाता है। सर्वप्रथम इस अध्याय में उन्हीं भिन्न २ ग्रहों से दूषित हुए दूध के लक्षण दिये गये हैं।

ग्रहों से दूषित दूध के लक्षण— यदि दूध का स्वाद कटु एवं तिक्त हो तो उसे शकुनी ग्रह से आक्रान्त (दूषित) समझना चाहिये। यदि दूध दूषित हो तथा उसमें सन्निपात (सब दोषों के सम्मिलित) के लक्षण दिखाई दें तो उस पर स्कन्द एवं षष्ठीग्रह का प्रभाव समझना चाहिये। यदि दूध का स्वाद स्वादु (मधुर) एवं कटु हो तो पूतना का प्रकोप समझना चाहिये। शेष सब प्रकार के दूषित दूधों में सम्मिलित दोषों का प्रभाव होता है।

बहुविण्मूत्रता स्वादौ कषाये मूत्रविग्रहः। तैलवर्णे बली तुल्या घृतवर्णे महाधनः ॥
यशस्वी धूम्रवर्णे तु शुद्धे सर्वगुणोदितः।

भिन्न २ दूषित दूधों का प्रभाव— यदि दूध स्वादु (मधुर) है तो उसे (उस दूध के सेवन करने वाले बालक को) मल तथा मूत्र बहुत होगा। यदि दूध कषाय रस वाला है तो मूत्रग्रह तथा मलग्रह (मूत्र तथा मल की रुकावट) हो जायगा। यदि दूध तैलवर्ण वाला है तो उसका सेवन करने वाला बालक बलवान् होगा। यदि दूध घृतवर्ण वाला है तो बालक स्वर्ण आदि महान् ऐश्वर्ययुक्त होगा। यदि दूध धूम्रवर्ण (धुंधला-धूसरवर्ण) का है तो बालक यशस्वी होगा। तथा यदि दूध बिलकुल शुद्ध (सब प्रकार के दोषों से रहित) है तो उसका सेवन करनेवाला बालक सर्वगुण सम्पन्न होगा।

तस्मात् संशोधनपरा नित्यं धात्री प्रशस्यते ॥

इसलिये नित्य संशोधन में लगी हुई धात्री प्रशस्त मानी गई है। अर्थात् दूध पिलाने वाली धात्री (Wetnurse) का नित्य संशोधन करते रहना चाहिये जिससे उसके दूध का संशोधन हो जाय तथा बालक रोगग्रस्त न हो सके। धात्री के दूध पर ही पूर्णरूप से बालक का स्वास्थ्य निर्भर है। अतः धात्री का वमन विरेचन आदि के द्वारा शोधन आवश्यक है।

कषायपानैर्वमनैर्विरेकैः पथ्यभोजनैः। वाजीकरणसिद्धैश्च स्नेहः क्षीरं विशुध्यति ॥

अब दूषित स्तन्य (दूध) के शोधन के भिन्न २ उपाय लिखे जायेंगे। कषायपान, वमन, विरेचन, पथ्य (हितकारी) भोजन तथा वाजीकरण के लिये अथवा वाजीकरण ओषधियों से सिद्ध किये हुए स्नेहों के सेवन से धात्री का दूध शुद्ध होता है।