काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
३२३
| सूर्यवंशी | सूरियस | मार्डिक | मर्डूक |
|---|---|---|---|
| क्षत्रिय | खेत | अप् | अप्सु |
| अत्रि | अत्तिस् | तमस् | त्यामत |
| मित्र | मिश्र | पुरोहित | पटेसिस |
| शरद् | सरदी | श्रेष्ठि | सेठ |
| रवि | रा | तैमात | तियामत् |
भारत¹ के समान मिश्र में लिङ्गपूजन तथा बैल का आदर और बेबिलोनिया में पृथ्वी की पूजा इत्यादि बहुत से समान सभ्यता के संबन्ध मिलते हैं।
ईरान के प्राचीन मूलग्रन्थ जेन्दावस्ता के चार भागों में एक भाग वेन्दिदाद नामक है, उसमें भैषज्यसम्बन्धी विषय दिये हुए हैं। उसमें सामा वंशोत्पन्न थ्रित नाम का वैद्य सर्वप्रथम था। उसने रोगनिवृत्ति के लिये अपने अहुरोमज्डा नामक देवता की प्रार्थना करके सोम (चन्द्रमा) के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होने वाली दस हजार ओषधियों को प्राप्त किया। हओम (सोम) वनस्पतियों का राजा था। उस थ्रित नामक वैद्य द्वारा क्षथ्रवैर्य तथा सहरवर से रोग निवृत्ति के उपायों को जानकर तथा शस्त्रचिकित्साविज्ञान को प्राप्त करके ज्वर, कास, शिरोरोग, क्षय आदि रोगों को दूर करने के वृत्तान्त तथा ओषधियों के निर्माण के पण्डित, सुशील तथा रोगियों को प्रसन्न करने वाले वैद्यों से भवितव्यता इत्यादि की शिक्षा को ग्रहण करने के वृत्तान्त मिलते² हैं। जेन्दावस्ता तथा वैदिकसाहित्य की आलोचना करने पर ज्ञात होता है कि दोनों के देवताओं के विषय में शब्दों का सादृश्य केवल देवताओं के नामों के विषय में ही नहीं है अपितु उनमें आई हुई गाथाओं के अनुवाद से प्रतीत होता है कि उनमें संस्कृत शब्दों की भी बहुत सी समानताएं मिलती हैं। भारत के प्राचीन सम्प्रदाय की तरह यहां भी अग्नि की उपासना, होम, इष्टि, याग, आदि बहुत से विषय मिलते हैं जिनका पहले (पृ. ७८) वर्णन किया जा चुका है। हओम शब्द वाले सोम की प्रशंसा, उसका ओषधियों का राजा होना यथा यज्ञ में उपयोग आदि बहुत से विषय इसमें मिलते हैं। जेन्द तथा संस्कृत भाषा में निम्न समान शब्द³ मिलते हैं—
| संस्कृत | जेन्द | संस्कृत | जेन्द |
|---|---|---|---|
| सरस्वती | हरह्यति | असुर | अहुर |
| सप्तसिन्धु | हप्तहिन्दु | देव | दैव |
| सोम | हओम | विश्वेदेव | विश्योदैव |
| नासत्य | नाहत्य | नराशंस | नैयोंसंघ |
| अर्यमन् | एर्यमन् | वायु | वयु |
| विवस्वत् | विवङ्ध्वत् | वृत्रहा | वेरेथ्रघ्न |
| काव्यउशनस् | कवउस | दानव | दानव |
| अध्वर्यु | रथ्वी | इष्टि | इशित |
| आहुति | आजू इति | होता | जओता |
| बर्हिः | वरेश्मन् | आप्री | आफ्री |
| गाथा | गाथा | पशु | पशु |
| अथर्वन् | अथ्रवन् | अहि | अज़ि |
| यज्ञ | यस्न | अपांनपात् | अपनंपात् |
१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १४२-१४३ में देखें।
३२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
इत्यादि बहुत से शब्द समान रूप एवं समान छाया वाले मिलते हैं। इस विषय में (Gatha by J. M. Chatterjji & Yasna by L. Mills) में विशेष निरूपण किया गया है। वेदों के समान अवेस्ता में भी ३३ प्रधान देवताओं की गणना की गई है। उपर्युक्त वर्णनों से प्रतीत होता है कि प्राचीन इरान तथा भारत के सम्बन्ध मिश्र, असीरिया, बेबिलोनिया आदि देशों की अपेक्षा भी घनिष्ठ थे।
चीन देश में भी प्राचीन भैषज्य के विषय में पहले (पृ. ७७) निर्देश किया जा चुका है। उस देश के सब से प्राचीन भैषज्य ग्रन्थ का समय ईस्वी पूर्व २५९७ बतलाया¹ गया है। चीन देश में भारतीय बौद्ध धर्म के प्रभाव, बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाले भारतीयों का वहां जाना, भारतीय ग्रन्थों का वहां प्राचीन काल से प्रचार, महाभारत तथा प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में चीन देश के चीनांशुक (रेशम-Silk) आदि का वर्णन, तन्त्रग्रन्थों में चीनी आचार (सभ्यता) का निर्देश, कौटिलीय अर्थशास्त्र में चीन देश से आई हुई वस्तुओं पर शुल्कव्यवस्था (Duty) का निर्देश इत्यादि बहुत से पारस्परिक व्यवहार के साधनों के मिलने से, वैदिक काल में चीन देश का किस नाम से व्यवहार होता था इसका ज्ञान न होने पर भी यह स्पष्ट है कि चीन नाम वाले देश का भारत से तथा भारत का चीन से परस्पर परिचय, यातायात तथा वाणिज्य संबन्ध प्राचीन काल से ही था। काश्यपसंहिता में भी चीन देश का उल्लेख मिलता है। चीन तथा भारत के रास्ते में काराशर नामक स्थान पर वर्तमान प्राचीन कूच भाषा में भी भारतीय औषध वाचक शब्दों की समानता के मिलने का पहले (पृ. ७८) वर्णन किया जा चुका है।
प्राचीन भारत का अन्य देशों के साथ संबन्ध
उपर्युक्त वर्णन के अनुसार असीरिया, बेबिलोनिया, मेसोपोटेमिया, मिश्र आदि प्राचीन उन्नत देशों और शाखा-प्रशाखारूप में वर्तमान पाश्चात्य जातियों में, यहां तक की अमेरिका गत रेड इण्डियन (Red Indians) और चीन आदि दूर देशों में भी आजतक मिलने वाली वस्तुओं में भारतीय ग्रन्थ, भूगर्भ से मिले हुए विषय, आचार-व्यवहार तथा आयुर्वेदीय भैषज्य विद्या की समानता दिखाई देती है। जिस प्रकार आथर्वण सम्प्रदाय में प्रायः भूतप्रक्रिया एवं मान्त्रिक प्रक्रिया से युक्त चिकित्सा मिलती है उसी प्रकार का चिकित्सा सम्प्रदाय प्रायः सभी प्राचीन देशों तथा जातियों में मिलता है। सब देशों में इस प्रकार की असाधारण समानताएं केवल काकतालीय² न्याय से ही नहीं हो सकती हैं। इस प्रकार प्राचीन भारत तथा अन्य प्राचीन देशों में बहुत से स्थानों पर मिलने वाली समानताएं परस्पर साक्षात् अथवा परम्परा से (Direct of Indirect) उनके परिचय, सम्पर्क तथा व्यवहार को सूचित करती है।
प्राचीन भारत का प्राचीन काल से ही अन्य देशों के साथ सम्बन्ध होने का अनेक विद्वानों³ ने उल्लेख किया है। मिश्र तथा उसके समीप के अन्य आनों में भी भारत के वाणिज्य संबन्ध के होने का तत्कालीन (A. D. 100) मिश्र के पेरिप्लस⁴ (Periplus) नामक विद्वान् ने भी उल्लेख किया है। सर विलियम जोन्स (Sir William Jones), मेजर
१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १४३ में देखें।
२. कोई बात जब एकदम अचानक (Purely accidental occurance) हो जाय तब उपर्युक्त कहावत प्रयुक्त होती है। जैसे एक कौवा अचानक आ जाता है और उसी समय ताल का फल भी अचानक ही उसके सिर पर गिर पड़ता है। दोनों घटनाएं अपने आप में बिलकुल सहसा हुई हैं। (काकस्यागमनं यादृच्छिकं तालस्य पतनं च। तेन तालेन पतता काकस्य वधः कृतः। एवमेव देवदत्तस्य तत्रागमनं दस्यूनां चोपनिपातः। तैश्च तस्य वधः कृतः। तत्र यो देवदत्तस्य दस्यूनां च समागमः स काकतालसमागमसदृशः)—अनुवादक
३. ३-४ की टि. सं. उपो. पृ. १४४ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३२५
विलफोर्ड (Major Wilford) लुइस् ज्याकोलिओट् (Louis Jacolliot) आदि¹ विद्वानों ने भी प्रतिपादन किया है कि मिश्र में सभ्यता, कला तथा स्मृति आदि का ज्ञान भारत से ही गया था।
‘पाश्चात्य विद्वान् आधे मन से स्वीकार करते हैं कि भारतीय भेषज्य विद्या का प्रभाव ग्रीस देश की चिकित्सा पर पड़ा है। मिश्र, पर्शिया तथा अरब द्वारा भारतीय चिकित्सा विज्ञान ग्रीस में पहुंचा है तथा इन देश वालों ने भी इसे भारत से प्राप्त किया है’ इसप्रकार अपना मत प्रकट करते हुए जे. जे.² मोदी ने वाइज् नामक विद्वान् का मत दिया है कि ‘सब देशों की चिकित्सा पद्धतियों का मूल एक ही है। पाथागोरस अथवा हिपोक्रिटस के पूर्वजों ने ग्रीसदेश में जिस चिकित्सा विज्ञान का सर्वप्रथम ग्रहण किया था वह मिश्र देश के विद्वानों की सहायता से ही प्राप्त किया था तथा मिश्र वालों ने भी इसे रहस्यपूर्ण पूर्व देश से प्राप्त किया था’। इस विषय में मोनियर विलियम्स³ (M. Monier Weillams) नामक विद्वान् का भी कहना है कि प्राचीन यूरोप के राष्ट्रों की उन्नति से पूर्व ही भारत ने ज्योतिष, गणित, विज्ञान तथा भेषज्य आदि विद्याओं में उन्नति कर ली थी। सभ्यता तथा ज्ञान के तत्त्व का प्रारम्भ पूर्वदेश में हुआ था तथा वहीं से ही वह पश्चिम दिशा में फैला था। इसके विपरीत वह पश्चिम से पूर्वदेशों में नहीं फैला है।
१. सर विलियम जोन्स ने रायल एशियाटिक सोसाइटी की रिपोर्ट में यह विश्वास व्यक्त किया है कि मिश्र बहुत प्राचीन काल में भारतीय आर्यों का उपनिवेश था। मेज़र विल्फोर्ड सरीखे लेखकों का मत था कि पुराणों का ‘मिश्रस्थान’ मिश्र से भिन्न नहीं था। दूसरी ओर इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला है कि मिश्रवासियों ने भारत का प्रवास किया हो। इस प्रकार के प्रमाणों से कई यूरोपीय लेखकों ने जिनमें लुइस् जेकोलियट् प्रधान है—यह स्थापना की है कि मिश्र ने यूनान को सभ्यता का पाठ पढ़ाया और यूनानियों से रोम को सभ्यता का दान मिला। मिश्रने अपनी कला, संस्कृति और विज्ञान भारत से प्राप्त किया। मिश्र की चिकित्सा प्रणाली में ऐसा कोई तत्त्व नहीं है जो आयुर्वेद में न हो लेकिन इसके विपरीत आयुर्वेद में जो कुछ है उसका बहुत बड़ा अंश मिश्र की चिकित्सा प्रणाली में नहीं है।
(Short History of Aryan Medical Science P. 194-195)
२. ऐसा प्रतीत होता है कि यूनानी ओषधियों पर भारतीय ओषधियों के प्रभाव को आधे दिल से स्वीकार किया गया है तथा यह स्वीकार करते हुए वह मिश्र, इरान तथा अरब के माध्यम से यूनानी चिकित्सा पर भारत के अप्रत्यक्ष (Indirect) प्रभाव को भूल गया प्रतीत होता है। अब यह सिद्ध हो चुका है कि यूनानी चिकित्सा विज्ञान अपने ज्ञान के लिये बहुत अंश तक इन देशों की ऋणी हैं.......और इस प्रकार वह चिकित्सा संबन्धी ज्ञान के लिये भारत की ऋणी है। हिपोक्रिटस तथा पाथागोरस ने यूनानी चिकित्सा पर भारत के अप्रत्यक्ष प्रभाव का वर्णन किया है.......। डॉ. वाइज ने अपनी पुस्तक ‘Hindu System of Medicine’ में लिखा है कि इन सम्पूर्ण चिकित्सा पद्धतियों का कोई एक सामान्य स्त्रोत है......यूनानी तत्त्ववेत्ताओं (दार्शनिकों) को मिश्र के महात्माओं से सहायता प्राप्त हुई थी तथा इन मिश्र के महात्माओं ने अपना बहुत कुछ ज्ञान पूर्व के किसी रहस्यपूर्ण देश से प्राप्त किया था।
(Fourth Indian Oriental Conference Vol. II P. 426)
३. (a) यूरोप के बहुत से अतिप्राचीन राष्ट्रों द्वारा विविध विज्ञानों के परिचय और प्रयोग को जानने से पर्याप्त पहले ही हिन्दू लोगों ने ज्योतिष शास्त्र, बीजगणित, अंकगणित, वनस्पतिशास्त्र और चिकित्सा शास्त्र में विशेष उन्नति करली थी। व्याकरण में तो उनकी उच्चता का संकेत करने की आवश्यकता ही नहीं है।
(M. Monier Williams)
(संस्कृत इंगलिश डिक्शनरी पृ. सं. २१)
(b) सभ्यता और ज्ञान के तत्त्वों का उद्गम सदा प्राची से ही हुआ है। उनका प्रसार भी प्राची से प्रतीची की ओर हुआ है, न कि पश्चिम से पूर्व की ओर।
(संस्कृत इंगलिश डिक्शनरी पृ. सं. २३.)
| ३२६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
|---|
प्राचीन समय में सिन्धु नदी के पार के देशों को भी सम्मिलित करके तात्कालिक केन्द्र तक्षशिला१ तथा शरावती आदि के आसपास के देशों से पूर्व में आसाम तथा उत्तर में चोल आदि देशों तक एकात्म्य रूप से अत्यन्त प्राचीन काल से प्रतिष्ठित भारत के पश्चिम में स्थित मिश्र आदि पड़ोसी देशों से परम्पर यातायात, सम्पर्क तथा परिचय आदि के न होने में कौनसी बड़ी भारी दूरी बाधक थी ?
वैदिक काल में भुज्यु आदि के अन्य द्वीपों में जाने, पिता द्वारा देश से निकाल दिये गये अनुद्रुह्यु तथा तुर्वसु के अन्य द्वीपों में जाकर नये वंश का प्रवर्तन तथा पाण्डवों द्वारा दूर-दूर देशों में भी विजय आदियों के वृत्तान्त के मिलने से भारतीयों का अन्य देशों में आवागमन प्रतीत होता है। ऋग्वेद आदियों में भी सामुद्रिक नावों का उल्लेख तथा प्राचीन ग्रन्थों में सामुद्रिक व्यापारियों की शुल्कव्यवस्था का उल्लेख मिलता है। वेद में अन्य देशों में जाने वाले एक पृथक् श्रेणी के रूप में विद्यमान व्यापारियों का 'पणि' नाम से निर्देश मिलता है। ए. सी. दास२ का कहना है कि इन्हीं व्यापारियों ने ही पश्चिम एशिया, ग्रीस, मिश्र तथा सेमेटिक प्रदेशों में भारतीय प्रभाव डाला है। महाजनक तथा शङ्ख३ नामक जातकों में भी भारतीय व्यापारियों के सिंहल, बेबिलोनिया, तथा सुवर्णभूमि (दक्षिण पूर्व एशिया) आदि प्रदेशों में जाने का उल्लेख मिलता है। कालिदास ने भी रघु को लक्ष्य करके पारसीक४ देश (पार्शिया) तक स्थल मार्ग से जाने का उल्लेख किया है। बाद में भी चीन से खोतान घाटी के रास्ते स्थलमार्ग से भारत में आये हुए फाहियान नामक चीनी यात्री के सीलोन (लंका) से जलमार्ग के द्वारा अपने देश चीन को लौटने के, ग्रीस तथा रोम में जलमार्ग से ही सुविधापूर्वक पहुँच सकने वाले भारतीय हाथी तथा शेर आदियों के ले जाने के वृत्तान्त से, पश्चिम दिशा में भी भारत से शीघ्र लौटने वाले यवनराज अलेक्जेण्डर की महान् सेना के लिये पर्याप्त नौकाओं की उपस्थिति के अनुसन्धान से तथा मिश्र, मेसोपोटेमिया आदि देशों में जलमार्ग के ही अनुकूल होने से यह स्पष्ट है कि भारत क पाश्चात्य देशों के साथ प्राचीन काल से ही परस्पर यातायात, परिचय तथा सम्पर्क आदि का व्यवहार अवश्य था।
धन्वन्तरि आदियों की प्राचीनता
भारतीय आयुर्वेद रूपी स्त्रोत के मूल उद्गम का अनुसन्धान करने पर प्रतीत होता है कि उपलब्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थों के आचार्य रूप में निर्दिष्ट धन्वन्तरि, दिवोदास, काश्यप, आत्रेय, अग्निवेश, भेड तथा सुश्रुत आदियों का समय अर्वाचीन नहीं है। धन्वन्तरि का महाभारत, हरिवंशपुराण अन्य पुराणों (पृ. २९), मिलिन्दपह्हो नामक पालीग्रन्थ (पृ. ३०) तथा अयोधर जातक (पृ. ३१) आदि में उल्लेख मिलने से, भीमसेन के पुत्र दिवोदास का हरिवंश, महाभारत तथा काठकसंहिता में और प्रतर्दन के पिता के रूप में दिवोदास का कौषीतकि ब्राह्मण, कौषीतकि उपनिषत् (पृ. २९) कात्यायनीय ऋक्सर्वानुक्रम (पृ. ३०) तथा महाभाष्य में निर्देश होने से, दिवोदास द्वारा स्थापित वाराणसी का महावग्ग आदि में उल्लेख मिलने से (पृ. २९-३०) मारीच कश्यप का महाभारत, ऋक्सर्वानुक्रम, बृहद्देवता (पृ. १८) तथा अथर्व सर्वानुक्रम में निर्देश होने से, भेड द्वारा निर्दिष्ट गान्धार के नग्नजित् का ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण में (पृ. ५२) निर्देश होने से, भेड का आत्रेय के शिष्य तथा गान्धार के नग्नजित् के साथी के रूप में निर्देश होने से, आत्रेय का मारीचकश्यप द्वारा, वाक्योद्धार सहित आचार्य रूप में भेड द्वारा तथा कृष्णात्रेय नाम से महाभारत में निर्देश होने से तथा भारद्वाज का भी महाभारत में निर्देश होने से ये भारद्वाज, धन्वन्तरि, दिवोदास, आत्रेय, मारीचिकश्यप, नग्नजित् दारुवाह तथा वार्योविद आदि परस्पर सन्निकृष्ट संबन्ध होने से उपनिषत् कालीन आचार्य प्रतीत होते हैं जिसका पहले भी कई स्थानों पर निर्देश किया जा चुका है। उपनिषदों के विषय में विचार करने पर कौषीतकि तथा ऐतरेय का समय चिन्तामणि विनायक वैद्य महोदय ने ईस्वी पूर्व २५०० वर्ष तथा ज्योतिष गणना के अनुसार दीक्षित ने ईस्वी पूर्व १८५०-२९०० निश्चित किया है। पाली तथा
१. १-४ की टि. सं. उपो. पृ. १४५ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३२७
महावग्ग के लेख, सिंहल तथा ब्रह्मदेश की गाथाओं और तिब्बतीय मूल लेखों के अनुसार आत्रेय के ही जीवक के गुरु होने में प्रमाणों के न मिलने से, आत्रेय के तक्षशिला के उत्थान के बाद में होने पर पाञ्चाल तथा गङ्गाद्वार के आसपास के प्रदेशों में घूम-घूम कर उपदेश देने वाले आत्रेय के द्वारा विद्यापीठ के रूप में प्रसिद्ध तक्षशिला का अवश्य उल्लेख होना चाहिये था, परन्तु उसके नाम का भी निर्देश न होने से तथा मारीच कश्यप द्वारा नाम का उल्लेख होने से आत्रेय पुनर्वसु के प्राचीन ही सिद्ध होने से तिब्बतीय कथाओं के अनुसार जीवक के गुरु आत्रेय को बुद्धकालीन मानने की शङ्का ठीक नहीं है। जीवक के गुरु के आत्रेय होने पर भी वह गोत्रनाम से व्यवहृत कोई अन्य आत्रेय भी हो सकता है। जे. जे.१ मोदी सुश्रुत का समय ईस्वी पूर्व १५०० तथा डोरोथिया च्यापलिन ने धन्वन्तरि का समय हिपोक्रिटस के समय से १२०० वर्ष पूर्व माना२ है। श्रीयुत अक्षयकुमार मजूमदार ने विदेह के राजा जनक का समय ईस्वी पूर्व २५००, अगस्त्य का समय ईस्वी पूर्व २२००, जाबाल का समय ईस्वी पूर्व २०००, जाजलि का ईस्वी पूर्व १९००, पैल का ईस्वी पूर्व १८००, कवथ का ईस्वी पूर्व १८००, धन्वन्तरि का ईस्वी पूर्व १६००, भीमस्थ के पुत्र दिवादास का ईस्वी पूर्व १५०० तथा चरक और सुश्रुतसंहिता के समय क्रमशः ईस्वी पूर्व १४०० तथा १५०० माने हैं३। F. E. Keay४ का कथन है कि 'भारत में भैषज्य विद्या भी बहुत प्राचीन काल से ही उन्नत थी'। जे. सी.५ चटर्जी का मत है कि ईस्वी पूर्व १५०० से ५०० तक धर्म, दर्शन, विज्ञान, कला, सङ्गीत तथा भैषज्य विद्या में कोई भी दूसरा राष्ट्र भारत की तुलना तथा स्पर्धा करने योग्य नहीं था।
मिश्र देश के विद्वानों तथा हिपोक्रिटस के लेखों के समान प्राचीन धन्वन्तरि, आत्रेय तथा कश्यप आदियों के मूल ग्रन्थों में पीछे संस्करण के समय कुछ अर्वाचीन विषयों के प्रवेश के मिलने पर भी, जिस प्रकार प्राचीन मन्दिरों को नूतन शिल्प आदि के द्वारा जीर्णोद्धार करने पर भी उन्हें सर्वांश में नूतन नहीं कहा जा सकता उसी प्रकार यहां भी उनकी प्राचीन मौलिकता में कोई व्याघात नहीं पहुंचता है।
प्राचीन काल में सुमेरिया तथा मिश्र देशों की उस उन्नत सभ्यता के मिलने से उसका सहयोगी भारत उस समय मोह निद्रा में सोया हुआ हो, इसकी सम्भावना नहीं हो सकती। मिश्र देश के भूगर्भ से मिले हुए शवों के शरीरों में
१. शल्यतन्त्र (क्रियात्मक शारीर) के विषय में लिखते हुए श्री जे.जे. मोदी महाशय लिखते हैं कि भारतीय शल्यशास्त्र के पिता सुश्रुताचार्य ईसा से १५ वीं सदी पूर्व हो गये हैं। (F. J. O. C. Vol. II P. 415-16.)
२. भारतीय चिकित्सा शास्त्र के संस्थापक धन्वन्तरि ने हिपोक्रेटस से कोई १२०० वर्ष पूर्व यह घोषित किया था कि आरोग्य भावात्मक वस्तु है और रोग नकारात्मक। इस नकारात्मक से भावात्मक की ओर जाने की समस्या को हल करने के लिये ही धन्वन्तरि ने बीड़ा उठाया था।
(Some Aspect of Hindu Medical Treatment
P. 11 by (Dorothea Chaplin)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १४६ में देखें।
४. धर्मशास्त्र (कानून शास्त्र) की तरह चिकित्सा शास्त्र का भारतवर्ष में पर्याप्त पहले ही विकास हो चुका था।
(Ancient Indian Education P. 42 By F.E. Keay)
५. तथ्य तो यह है कि १५०० ई. पू. से ५०० ई. पू. तक में भारतीय लोग धर्म, अध्यात्म, दर्शन, विज्ञान, कला, संगीत और चिकित्साशास्त्र में इतने अधिक आगे बढ़ गये थे कि अन्य कोई जाति इनकी स्पर्धा में नहीं खड़ी हो सकती थी और ज्ञानविज्ञानों की इन शाखाओं में से किसी में भी उनका मुकाबला कोई नहीं कर सकता था।
(J. C. Chatterji-The wisdom of the Hindus Edited
by Brian Brown P, 25.)
२२ का.सं.
३२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
कपालभेद के सन्धान के चिह्न मिलते हैं जिनका आजकल के अत्यन्त कुशल शल्यचिकित्सकों द्वारा भी समर्थन किया जाता है। ऐतिहासिकों के अनुसार मिश्र देश में विक्रमसंवत् के प्रारम्भ से २५० वर्ष पूर्व (B. C. 301) शल्य विद्या की उन्नत अवस्था तथा उसके २०० वर्ष बाद उसी के अनुसार ग्रीस देश में भी शल्य विद्या के उदय का उल्लेख मिलता है सुश्रुत के शल्य विज्ञान में अन्य देशों की शल्य विद्या की छाया न मिलने से सुश्रुत का समय अन्ततोगत्वा भी २६०० वर्ष से अर्वाचीन सिद्ध न होने से तथा पाश्चात्य विद्वानों द्वारा भी इस मत का समर्थन किया जाने से प्रतीत होता है कि अन्य देशों से पूर्व ही सुश्रुत के समय भारतीय शल्य विद्या प्रौढावस्था में पहुंची हुई थी। काश्यपसंहिता तथा आत्रेयसंहिता में भी शल्य विद्या का उल्लेख होने से इससे पूर्व भी उसके प्रचार के होने का परिचय मिलता है। महावग्ग तथा जीवक के इतिहास में भी कपालभेदन तथा आन्त्रवेधन आदि शल्यप्रस्थानीय तथा प्रस्थानान्तरीय भैषज्यों में भारत में विशेष कुशलता दिखाई देती है। उससे पूर्व भी रामायण तथा महाभारत के युद्धों में जब घायल व्यक्तियों के शरीरों में चुभे हुए बाण आदि शल्यों को निकालने की आवश्यकता होती थी उस समय भी उनको निकालने का ज्ञान होने से शल्योद्धरण विद्या नाम से शल्यविद्या की उपस्थिति की सूचना मिलती है। इतना ही नहीं अपितु आयुर्वेदीय प्रवाह के निरन्तर प्राचीन उद्गम की आलोचना करने पर हम देखते हैं कि अथर्ववेद तथा ऋग्वेद में भी भग्नसंधान आदि शल्य विषय उपलब्ध होते हैं।
प्रत्येक देश तथा काल में भारतीय स्त्रोतों की व्याप्ति
इस आयुर्वेद विज्ञान में केवल धन्वन्तरि, आत्रेय, कश्यप तथा भेड आदि—जिनके कि ग्रन्थ उपलब्ध हैं—वे ही मूल आचार्य नहीं हैं अपितु पीछे एक-एक प्रस्थान के आचार्य कश्यप, आत्रेय तथा सुश्रुत आदियों द्वारा कुछ पूर्व आचार्यों का नाम पूर्वक निर्देश किया गया है तथा कुछ को बिना नाम के 'परे' 'अपरे, इत्यादि शब्दों से ही सूचित किया गया है। प्राचीन भारद्वाज तथा आश्विन आदि भी संहिताओं के कर्ताओं के रूप में प्रसिद्ध हैं। आजकल कालक्रम से आश्विन आदि संहिताओं के न मिलने पर भी उनका विषय तथा उनके वचनों के उद्धरण आदि ताडपत्रीय ज्वरसमुच्चय आदि प्राचीन वैद्यक ग्रन्थों में मिलते हैं। आयुर्वेद के ग्रन्थों से अश्वि, इन्द्र, भरद्वाज आदि मूल आचार्यरूप में तथा उन्हीं की परम्परा के द्वारा इस सम्प्रदाय का प्रसार हुआ मिलता है। अश्वि, इन्द्र आदियों का वेदों में भी वैद्य के रूप में उल्लेख किया गया है। इस सम्प्रदाय परम्परा के कारण भारतीय स्त्रोत अत्यन्त उन्नत अवस्था में है। वैदिक काल से ही आयुर्वेद का उदय तथा उसकी समृद्धि प्रकट होती है। इस प्रकार अत्यन्त प्राचीन काल से ही वैदिक विज्ञान रूपी विशाल शैली से निकल कर यह आयुर्वेद रूपी स्त्रोत भिन्न-भिन्न आचार्यों की विचार धाराओं से वृद्धि को प्राप्त होता हुआ अनेक देशों एवं कालों में व्याप्त हो गया। यह भारतीय स्त्रोत वंशाङ्कुरों के समान केवल उपरिभाव से ही विद्यमान नहीं था अपितु नाना देशों के अनेक आचार्यों का अनुसन्धान करने पर चारों ओर फैला हुआ मिलता है।
डल्लण ने काङ्कायन का सुश्रुत के सतीर्थ्य (सहाध्यायी) के रूप में निर्देश किया है। आत्रेय ने इसका 'बाहीकभिषक्' तथा 'बाहीकभिषजां वर:' इत्यादि पदों द्वारा बाहीक देश के उत्कृष्ट वैद्य के रूप में निर्देश किया है। मारीच कश्यप ने भी नामपूर्वक इसका मत दिया है। इस प्रकार यह काङ्कायन भी उस समय के लोगों द्वारा ज्ञात दूसरे देश का प्राचीनतम आचार्य प्रतीत होता है। बाहीक देश के मुख्य वैद्य रूप में प्रसिद्ध इस काङ्कायन का दिवोदास के शिष्य के रूप में निर्देश होने से प्रतीत होता है कि भारतीय भैषज्य विद्या न केवल भारत में ही अपितु अन्य देशों में भी आदर्शरूप में प्रचलित थी, तथा यह भी ज्ञात होता है कि भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान अन्य देशों से भी लोग इस विद्या की प्राप्ति के लिये जिज्ञासु एवं शिष्यरूप में यहां आते थे। यदि उसे दिवोदास का शिष्य न भी माना जाय तो भी भारतीय प्राचीन आचार्यों द्वारा उसके मत का निर्देश कियां होने से उनका परस्पर परिचय तो स्पष्टरूप से था ही।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३२९
सुश्रुत के लेख से ज्ञात होता है कि न केवल काङ्कायन अपितु औषधेनवष वैतरण, औरभ्र, पौष्कलावत, करवीर्य, गोपुररक्षित तथा भोज आदि भी दिवोदास के शिष्य थे। अयोधर नामक पालीजातक में बुद्ध के पूर्वजन्म के उल्लेख में अतीत वैद्य धन्वन्तरि के साथ मिलनेवाले सुश्रुत के सतीर्थ्य भोज तथा वैतरण का उल्लेख भी इनके प्राचीन संबन्ध को सिद्ध करता है। इस प्रकार प्रतीत होता है कि ये औषधेनव आदि आचार्य प्राचीन काल के तथा विभिन्न देशों के थे।
पौष्कलावत, करवीर्य तथा औरभ्र आदि आचार्यों के विषय में विचार
प्राचीन आचार्यों के नाम प्रायः पिता, माता, आचार्यगोत्र, देश अथवा किन्हीं असाधारण गुणों के अनुसार होते थे। इसलिये प्राचीन व्यक्तियों के नामों को देखकर यह स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि इनके नामों का मूल (आधार) क्या है। इसलिये पौष्कलावत आदि नाम भी किसी देश अथवा व्यक्ति विशेष के अनुसार 'तत्र जातः' अथवा 'तत्र भवः' अर्थ में प्रयुक्त किये गये प्रत्ययों सहित बने हुए प्रतीत होते हैं।
पुष्कलावत नाम का कोई भी व्यक्ति भारतीय इतिहास में नहीं मिलता है। किन्तु यह शब्द देश विशेष के बोधक के रूप में मिलता है। इसलिये 'पुष्कलावत नामक देश में होने वाले' इस अर्थ को लेकर देश के अनुसार यह नाम प्रयुक्त किया गया प्रतीत होता है विष्णुपुराण¹ के अनुसार पौष्कलावत भरत के पुत्र पुष्कल द्वारा स्थापित देश है। बाल्मीकि रामायण² में भी इसका उल्लेख मिलता है। वेदों में आये हुए आसन्दीवत्, पस्त्यावत्, शर्यणावत् इत्यादि तथा महाभारत के वारणावत् आदि नामों के सदृश होने से यह पौष्कलावत भी भारत के पश्चिम विभाग का कोई प्राचीन देश प्रतीत होता है। गान्धार राज्य की प्राचीन राजधानी का यह नाम था। अलेक्जेण्डर के आगमन के समय भी यह नगरी गान्धार में प्रधानरूप से विद्यमान थी। एरियन्-स्ट्रैबो तथा टालेमी आदि बहुत से प्राचीन ग्रीक विद्वानों द्वारा भी सिन्धु के समीप महानगरी के रूप में इसका उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि यह ग्रीक लोगों द्वारा विशेषरूप से परिचित तथा उल्लिखित³ थी। यह पौष्कलावत नामक आचार्य उसी देश का प्रतीत होता है। सुश्रुत द्वारा विशेषरूप से शल्यप्रधान⁴ तन्त्र के कर्ता के रूप में इसका निर्देश होने से प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में गान्धार देश की भी शस्त्रचिकित्सा में प्रतिष्ठा थी।
करवीर्य शब्द भी 'करवीर देश में होने वाले' अर्थ का सूचक प्रतीत होता है। करवीरपुर⁵ का दृषद्वती के किनारे पर होने का उल्लेख मिलता है। कालिका पुराण में भी करवीरपुर का उल्लेख है। दृषद्वती वेद में भी प्रसिद्ध थी। करवीर पुर में होने के अनुसार उसका यह होने से इस आचार्य का यह स्थान प्रतीत होता है। अथवा शस्त्रचिकित्सक होने से हाथ में कुशलतारूप वीर्य को धारण करने के (हस्तकुशल) कारण भी संभवतः इस आचार्य का यह (करवीर्य) नाम हो।
इसके अतिरिक्त ईरानदेश के प्राचीन अवेस्ता ग्रन्थ के वेन्दिदाद नामक भैषज्य प्रकरण में उस देश की शल्य चिकित्सा के मूल आचार्य का क्षथ्रवैर्य नाम से उल्लेख मिलता है। आजकल व्यवहृत होने वाले वेन्दिदाद शब्द का प्राचीन स्वरूप 'विदैवोदात'⁶ कहा जाता है। वैदिकसम्प्रदाय में सुन्दर भावों के बोधक सुर, देव आदि शब्दों में विपरीत (असुन्दर) अर्थ को सूचित करने के लिये असुर तथा विदेव आदि प्रयोग मिलते हैं। उसी न्याय से दैवोदात शब्द में 'दिव' शब्द के साथ 'वि' शब्द लगाकर भैषज्य विद्याविभाग का बोधक 'विदैवोदात' शब्द दिवोदास सम्प्रदाय का ही अपभ्रंश रूप हो सकता है। थ्रित नामक वैद्य ने अहुरमज्ड से ओषधियों तथा क्षथ्रवैर्य और सोहरवर से कायचिकित्सा तथा शस्त्रचिकित्सा में शिक्षाग्रहण की, इस उल्लेख से उस देश में शस्त्रचिकित्सा का प्रारंभ करने वाला क्षथ्रवैर्य⁷ सिद्ध होता है। थ्रि नामक वैद्य के भी आचार्यरूप में निर्दिष्ट क्षथ्रवैर्य तथा सोहरवर कौन हैं—इस पर विचार करने पर हम देखते हैं कि विदैवोदात शब्द में दिवोदास शब्द का सादृश्य होने से उसके साहचर्य से चिकित्सा विज्ञान में सोहरवर की सुश्रुत से तथा
१. १-७ की टि. सं. उपो. पृ. १४८ में देखें।
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शल्यचिकित्सा विज्ञान के प्रारंभिक क्षथ्रवैर्य की दिवोदास के शिष्य, शल्यप्रस्थान के आचार्य तथा सुश्रुत के सतीर्थ्य करवीर्य से शब्दों तथा कार्यों में समानता दिखाई देती है। भारत के प्राचीन आचार्यों के निर्देशानुसार बाह्लीकभिषक् कांकायन का भारत से परिचय की तरह वेन्दिदाहा के लेख के अनुसार दिवोदास, सुश्रुत, करवीर्य आदि भारतीय आचार्यों का इरान से परिचय प्रकट होता है। अवेस्ता नामक ग्रन्थ में भारतीय शब्दों तथा विषय की समानता का पूर्व वर्णन किया जा चुका है। उसमें आये हुए रोगों में भी हमें निम्न समानताएं मिलती हैं—
| अथर्ववेद | अवेस्ता | अर्थ |
|---|---|---|
| तक्मन् | तफ्नु | ज्वर |
| अप्वा | अजह्व | अपवाह |
| पामा (सुश्रुत में भी) | पामन् | चर्मरोग |
| शीर्षक्तिः | सारस्त्य | शिरोरोग |
| सारणः | सारन¹ |
इसी प्रकार कुरुघ (दुष्टव्रण), दुरूक् (अश्मरी), अघोस्ति (शीर्णास्थि), दङ्गु (ज्व) र इत्यादि शब्द भी क्रमशः कुरुक्, दृषत्, अस्थि तथा दाह आदि संस्कृत शब्दों के अपभ्रंश प्रतीत होते हैं। अन्य भी बहुत से शब्दों में समानता तथा प्रतिच्छाया मिलती है। अवेस्ता में मानसिक तथा शारीरिक दो प्रकार² के स्वास्थ्य का वर्णन मिलता है। सुश्रुत में भी 'पुनश्च द्विविधाः—शारीरा, मानसाश्च' (सू. अ. २४) द्वारा द्वैविध्य का उल्लेख किया गया है। अवेस्ता में मन्त्र (मन्त्र), उर्वर (उर्वीरुह) तथा केरेत (कर्तिका, कर्तरी अथवा करपत्र) द्वारा मन्त्र, वानस्पतिक ओषधियां तथा शस्त्ररूप तीन प्रकार के रोगनिवर्तन³ के उपायों का वर्णन किया है। भारतीय भैषज्य सम्प्रदाय में भी ये ही मन्त्र, ओषधि एवं शस्त्ररूप तीन रोगप्रतीकार के उपाय मिलते हैं। अवेस्ता में 'गौकिरन'⁴ शब्द (जिसका बाद में गोकार्त रूप हो गया है) का प्रधान औषधवृक्ष के रूप में निर्देश किया गया है जो कि अश्वगन्धा के संस्कृत पर्याय गोकर्ण शब्द की विकृति प्रतीत होती है। अश्वगन्धा का आयुर्वेद में भी बहुत माहात्म्य लिखा गया है। दोनों सम्प्रदायों में सोम का यज्ञ तथा ओषधि दोनों रूपों में उपयोग मिलता है। अवेस्ता में भैषज्यविज्ञान, वैद्य, रोग तथा रोगनिवृत्ति के उपाय आदि चिकित्सा के चार⁵ पादों का वर्णन मिलता है। आयुर्वेद में भी धन्वन्तरि⁶, कश्यप, आत्रेय तथा भेड आदियों ने थोड़े बहुत भेद के साथ भैषज्यविज्ञान, वैद्य, रोगी एवं परिचारकरूप चतुष्पाद सिद्धान्त का ही वर्णन किया है। थ्रित द्वारा अहुरमज्द से विषप्रतीकार के लिये ‘विसचित्त’ तथा शल्यचिकित्सा के लिये सौवर्णाग्र छुरिका प्राप्त करने का वर्णन⁷ मिलता है। ‘विसचित्त’ शब्द में
१. सारण तथा सारन शब्दों में शाब्दिक समानता होते हुए भी, अथर्ववेद में अतिसार तथा अवेस्ता में शिरोरोग का बोधक होने से अर्थ में भेद है।
२. २-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १४९ में देखें।
५. यह एक अद्भुत संकेत है कि भारतीय चिकित्साशास्त्र के भी चार पाद बताये गये हैं। उनकी गणना चिकित्सक, रोग, औषध और परिचारक के रूप में की गई है जब कि हिपोक्रेटस ने केवल तीन ही भाग किये हैं।
(de morb, vulg i L.) E. R. E. Vol. IV P. 759 by L. C. Casartelli.
६. इसकी टि. सं. उपो (पृ. १४९ में देखें।
७. (a) क्षथ्रवैर्य धातुओं का प्रथम प्रयोग करने वाला था। उसने एक चाकू प्राप्त किया जिसका कि आधार एवं प्रान्त भाग सोने के बने हुए थे। इस प्रकार चाकू (शस्त्र) से चिकित्सा करने वाला वह प्रथम व्यक्ति था। इसी प्रकार वनस्पतियों द्वारा चिकित्सा करने वाला भी वही प्रथम व्यक्ति था।
(Zendavesta Part I (S. B. E. Vol IV.), P. 227.)
(b) E. R. E. Vol. IV P. 758.
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
विषचिकित्सा अथवा ‘विषकृत्य’ शब्द की झलक दिखाई देती है। भारतीय सम्प्रदाय में भी कर्णवेधन संस्कार के लिये सुवर्णसूचि तथा चूडाकर्म संस्कार में सुवर्णयुक्त उत्तर का विधान मिलता है। सुश्रुत में शल्यचिकित्सा में प्रयुक्त होने वाले शस्त्रों के विषय में लिखा है कि ‘तानि (शस्त्राणि) प्रायशो लौहानि भवन्ति’। इसकी व्याख्या में लिखा है कि ‘लोहाः पञ्च सुवर्णादयः’ अर्थात् सुवर्ण आदि पांच धातुओं के द्वारा सुवर्ण का प्रमुखरूप से निर्देश किया है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार उनके ‘त्रित’ नामक प्रथम वैद्य के भी आचार्यरूप में निर्दिष्ट क्षथ्रवैर्य शब्द में करवीर्य, क्षेत्रवीर्य, क्षतवीर्य इत्यादि भारतीय संस्कृत शब्दों की समानता दिखाई देने से यह भारतीय सम्प्रदाय का करवीर्य या अन्य कोई भारतीय आचार्य के समान प्रतीत होता है।
तूङ्ग्हाङ् स्थान में हार्नले नामक विद्वान् द्वारा उपलब्ध लेखों में जीवक के प्रति दिये गये बुद्ध के भेषज्यसम्बन्धी उपदेशों में संस्कृत के साथ प्राचीन ईरानी भाषा का भी अनुवाद उपलब्ध होने से प्रतीत होता है कि प्राचीन इरान ने भारतीय भेषज्य का ग्रहण किया था तथा उसका आदरपूर्वक अपनी भाषा में अनुवाद किया था।
अवेस्ता में भेषज्य प्रस्थान के उद्भावक के रूप में थ्रित तथा रोगनिवृत्ति की प्रार्थना करनेवाले त्रैतान का निर्देश है। इसीप्रकार वेद में भी त्रित तथा त्रैतन का उल्लेख मिलता है जिससे कुछ विद्वानों¹ की राय है कि शब्दों के सादृश्य के कारण वेद तथा अवेस्ता में आये हुए ये एक ही व्यक्ति हैं। ऋग्वेद में त्रैतन का एक बार ही उल्लेख होने पर भी मारने की इच्छा से दीर्घतमस ऋषिको जल तथा अग्नि में गिराने वाले तथा उसके अङ्गों को काटने वाले दासजाति² वाले का निर्देश होने से, वह अश्वियों द्वारा पुनः रक्षा किये गये भी दीर्घतमस ऋषि के प्रतिपक्षी के रूप में मिलने वाला त्रैतन प्रतीत होता है। परन्तु वैदिक लेख के अनुसार उसका भेषज्य से संबन्ध नहीं मिलता है। त्रित का ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में अनेक वार उल्लेख होने पर भी कहीं-कहीं यह त्रित शब्द अग्नि आदि देवता परक मिलता है। जहां यह त्रित शब्द मानव भावों को सूचित करता है वहां कहीं-कहीं सूक्तद्रष्टा ऋषि के रूप में उसका उल्लेख मिलता है। बृहद्देवता तथा यास्क की निरुक्ति में भी उसका ऋषि के रूप में उल्लेख मिलता है। इन स्थलों पर इसका अर्थ भिन्न प्रतीत होता है। जहां वेद के ‘आप्यः आप्य्यः त्रितः’ तथा अवेस्ता के ‘आथ्व्यः त्रितः’ में समानता दिखाई देती है वहां त्रित का परिवेदन (दुःख), दुःस्वप्न, स्वर्णकार, मालाकार आदि दुष्कृत मार्जन स्थानी के रूप में भी उल्लेख मिलने³ से वैदिक सम्प्रदाय में सुरों के लिये असुरों की तरह हेयरूप में ग्रहण होने से यह त्रित भी विपक्षी प्रतीत होता है। त्रित तथा थ्रित की एकात्म्यता होने से वैदिक आश्विन भेषज्य सम्प्रदाय की तरह ईरानी थ्रित भेषज्य सम्प्रदाय का समय भी प्राचीन सिद्ध होता है। परन्तु वेद में त्रित का कहीं भी भेषज्य संबन्ध नहीं मिलता है। मार्टिन⁴ (Martin) नामक विद्वान् का कहना है कि तैत्तिरीय संहिता में एक स्थान पर (१. ८. १०. २) आयुष्य के दाता के रूप में त्रित की प्रार्थना के मिलने से वैदिक त्रित में भी भेषज्य संबन्ध दिखाई देता है। तथापि त्रित शब्द की अग्निपरक व्याख्या दी होने से तथा राजसूय का प्रकरण होने से वहां भी त्रित का भेषज्य सम्बन्ध स्पष्ट नहीं मिलता है। इस विषय में और विचार की आवश्यकता है।
औरभ्र शब्द ‘उरभ्रस्यापत्यम्’ अथवा ‘उरभ्रे भवः’ अर्थ के अनुसार व्यक्ति अथवा देशवाचक उरभ्र शब्द से बना हुआ प्रतीत होता है। उरभ्र नामक कोई व्यक्ति अथवा देश प्राचीन भारत में नहीं मिलता है। वेद में उरभ्र तथा उरण शब्द मेष (भेड़) के बोधक के रूप में प्रसिद्ध हैं। वेद में भी सिन्ध में बहने वाली ऊर्णावती नदी का उल्लेख मिलता है। गान्धार तथा उससे उत्तर के देशों में प्राचीन काल से ही मेषों के प्राचुर्य का वर्णन मिलता है। उसी प्राचुर्य के कारण ही संभवतः नदी का नाम भी ऊर्णावती था। ‘अध्वर्यवो य उरणं जघान’ इस ऋग्वेद के मन्त्र में (२. १४. ४) इन्द्र द्वारा मारे हुए उरण नामक असुर का उल्लेख मिलता है। बेबिलोन देश के प्राचीन नगरों में एक 'उर' नाम का नगर मिलता है जो चाल्डियनों के समय अब्राहम का प्रधान स्थान तथा सुमेरियनों के ईस्वी पूर्व ३००० वर्ष पूर्व सेमेटिक सत्ता के प्रारंभ
१. १-४ की टि. सं. उपो. पृ. १५० में देखें।
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में सारगान वंशजों के अनन्तर 'उरगुर' अथवा 'उर एन गर' नामक राजा के समय प्रधान उर नगर था वह बेबिलोन समय के अन्त तक धार्मिक तथा वाङ्मय विषयों के लिये प्रसिद्ध था। उर नगर में 'उरनम्मु'१ (Ur Nammu B. C 2300-2200) तथा बर्सिन (Bursin) नामक राजाओं के शिलालेख प्राप्त हुए हैं। असीरिया की पूर्वजातियां असुर के रूप में मिलती हैं। इन्द्र द्वारा मारा हुरा उरण नामक असुर संभवतः इसी देश का था। उरभ्र आदि शब्दों में उर शब्द के आने से इसी देश से संबन्ध प्रतीत होता है। ए. सी.२ दास ने लिखा है कि 'उर' देश में भारतीय शालवृक्ष की लकड़ियां प्राप्त हुई हैं। यदि इस देश के वाचक उर शब्द से ही उरभ्र शब्द बना हो तो काङ्क्षायन द्वारा बाह्लीक देश के समान दिवोदास के शिष्य उरभ्र द्वारा यह उर प्रदेश भी भारतीय प्रभाव से युक्त प्रतीत होता है।
कुछ लोग गोपुर रक्षित नाम से निर्दिष्ट गोपुर तथा रक्षित दो भिन्न-भिन्न आचार्य मानते हैं। कुछ लोग संयुक्त (गोपुररक्षित) नाम से एक ही व्यक्ति मानते हैं। दक्षिण के शिल्प ग्रन्थ में गोपुर का निर्देश होने से तथा आजकल भी दाक्षिणात्य देशों में गोपुर की विशेष प्रसिद्धि होने से गोपुर नाम से व्यवहृत आचार्य संभवतः दाक्षिणात्य प्रतीत होता है। किन्तु रामायण तथा महाभारत में गोपुर का पुरद्वार के रूप में मिलने से इतने से ही देश का निर्धारण करना सम्भव नहीं है। अथवा यह भी सम्भव है कि गोपुर नामक अन्य अज्ञात नगर के सम्बन्ध से भी गोपुररक्षित नाम का व्यवहार किया गया हो।
प्राचीन भोजदेश के कान्यकुब्ज (कन्नौज) देशस्थित भागीरथी के दक्षिण तट पर १५-१६ कोस के घेरे में फैले होने का वर्णन३ मिलता है। दिवोदास के शिष्य भोज का संभवतः इसी देश के अनुसार यह नाम था।
'उपधेनोरपत्यम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार औषधेनव शब्द मिलता है। औषधेनव नाम का आचार्य अन्यत्र नहीं मिलता है। किन्तु 'उपगोरपत्यमौपगवः' पाणिनीय सूत्र के इस उदाहरण में महाभाष्यकार ने उपगु के अपत्य रूप में औपगव का निर्देश किया है। विष्णुपुराण में मिथिला के राजा सीरध्वज के भाई काशीराज कुशध्वज के वंश में किसी उपगु का निर्देश मिलता है। उपगु नाम का वसिष्ठ गोत्र में उत्पन्न एक ऋषि भी मिलता है। औरव कौत्स राजा के पुरोहित सौश्रवस के पंचविंश ब्राह्मण (१४. ६. ८) में उपगु का वर्णन मिलता है। महाभाष्य के (४. १. ३. ९०) 'औपगवेर्यूनश्छात्रा औपगवीयाः' इस निर्देश से औपगव छात्र सम्प्रदाय का प्रवर्तक प्रतीत होता है। यह प्रसिद्ध औपगव ही सम्भवतः औषधेनव हो क्योंकि पर्यायवाची शब्दों द्वारा व्यवहार करने की भी प्राचीन पद्धति मिलती है। यह औषधेनव कौन तथा किस प्रदेश का रहने वाला है यह निश्चित नहीं कहा जा सकता।
यद्यपि दृढ प्रमाणों के अभाव में केवल इन तर्कों के आधार पर कुछ निश्चित नहीं किया जा सकता तथापि उपर्युक्त आचार्यों के नाम भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान दूर विदेशों में भी सम्भवतः धान्वन्तर सम्प्रदाय के आलोक के प्रसार में द्वारभूत हैं अर्थात् इनके द्वारा धान्वन्तर सम्प्रदाय का विदेशों में प्रसार हुआ है। इस प्रकार केवल धान्वन्तर सम्प्रदाय के ही नहीं अपितु अन्य विभागीय भैषज्य विज्ञान के आलोक के लिये भी इसी प्रकार के द्वार होंगे। इससे अधिक क्या कहा जाय कि ऋग्वेद में भी प्रयुक्त होने वाले वैद्यक वाचक भिषक् तथा औषध वाचक भेषज शब्दों के विकृतरूप बिजिष्क (Bejishka) तथा भेषज (Beshaj) शब्द इरान देश की पर्शुभारती (पहलवी) भाषा में तथा बिझिष्क (Bzhishk) तथा बेझश्क (Bzhshkel) शब्द अर्मिनियन भाषा में मिलने का पहले निर्देश किया जा चुका है। जब वैद्य एवं औषध वाचक प्रधान शब्द प्राचीन काल में दूर विदेशों में पहुंचे हुए थे तब विद्या के विषय भी चारों ओर फैले हुए हों तो इसमें क्या आश्चर्य है। वाडेल४ नामक विद्वान् ने सुमेरियन देश के प्राचीन मुद्राओं पर साङ्केतिक अक्षरों में लिखे हुए उस देश के शब्दों तथा भारतीय शब्दों में निम्न समानता प्रदर्शित की है—
१. १-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५१ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
३३३
| वृगु | भृगु | अस्सि | अश्वि |
| वर्गव | भार्गव | गल्ह | गालव |
| गुर्गु | गर्ग | गुधिया | गाधि |
| हनक | जनक | सुसिन | सुषेण |
| सख | शक्र | एमद्गल | मुद्गल |
| इन्दुरु | इन्द्र | उर्वस् | हर्यश्व |
और तो और धन्वन्तरि तथा दिवोदास का भी वहां उद्भव दिखाया गया है। उस देश के प्राचीन राजाओं का ईस्वी संवत् के प्रारम्भ से लगभग २-३ हजार वर्ष पूर्व होना बतलाया गया है। पूर्वनिर्दिष्ट (पृ. १४) शालिहोत्र के ग्रन्थ में आयुर्वेद के आचार्यों के निर्देश में गालव का उल्लेख होने से तथा चरक के प्रारम्भ में भी आयुर्वेद के प्रवर्तकों में उसका नाम मिलने से गालव भी आयुर्वेद के आचार्य रूप में मिलता है। महाभारत में भी गालव का काशीराज दिवोदास के साथ सहवास तथा मारीच कश्यप के आश्रम के द्रष्टा के रूप में पहले (पृ. १८) निर्देश किया जा चुका है। महाभारत के अनुसार अश्वप्राप्ति के प्रसङ्ग में उसके दूर-दूर देशों में पर्यटन का निर्देश है। सुमेरियन प्रदेशीय प्राचीन मुद्रा में आये हुए गल्ह के साथ वाडेल ने गालव की समानता दिखाई है। मुद्गल तथा मौद्गल्य आदि भी भारत में वैद्याचार्यों के रूप में मिलते हैं। वाडेल के कथनानुसार सुमेरियन प्रदेश के एमद्गल के साथ वैद्यविद्या के ज्ञान का सूचक ‘अजू’ शब्द दिया हुआ है। इस प्रकार यदि गल्ह और गालव तथा एमद्गल और मुद्गल की परम्पर एकात्म्यता हो तो यह मानना पड़ेगा कि सुमेरियन प्रदेश में भी भारतीय आयुर्वेदाचार्यों का प्रभाव पहुँचा हुआ था। परन्तु अत्यन्त प्राचीन होने से प्राचीन मुद्राओं के अक्षरों के भी एक मत से निश्चित न होने से तथा उनमें आये हुए संभावित गालव, जनक, धन्वन्तरि तथा दिवोदास आदि में भैषज्य विषय के संबन्ध के न मिलने से पूर्ण अनुसन्धान के बिना केवल इतने के आधार पर निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। इस काश्यपसंहिता के भोजनकल्पाध्याय (पृ. २०६) में सात्म्याशन प्रकरण में काश्मीर, चीन, अपरचीन आदि देशों के साथ बाह्लीक, दासेरक, शातसार तथा रामण आदि देशों का भी उल्लेख मिलता है, किसी¹ किसी का विचार है कि दासेरक देश मालवा प्रान्त में है। किन्तु महाभारत² में अनेक स्थलों पर दासेरक का उल्लेख होने पर भी मालवा का पृथक् उल्लेख मिलने से दासेरक मालवा से पृथक् कोई अन्य ही देश प्रतीत होता है। शातसार देश का कोई परिचय नहीं मिलता है। तथापि बाह्लीक तथा रामण देश के साथ दिये होने से दासेरक तथा शातसार भी उनके समीप के ही कोई देश प्रतीत होते हैं। रामण देश अरमे³निया (Armenia) देश को बतलाया गया है। रामण पर्वत का उल्लेख जेन्दावस्ता में भी मिलता है। महाभारत⁴ में अनेक उत्तर की जातियों के निर्देश में हूण, पारसीक तथा चीन आदि के साथ रमण जाति का तथा निषेध देश के उत्तर में रमणवर्ष का निर्देश मिलता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अरमेनिया देश तक भी भारतीय प्राचीन आचार्यों का परिचय था। अलेक्जेण्डर द्वारा साथ ले जाये गये तथा अशोक के समय इधर-उधर भेजे गये विद्वानों के नामों का इतिहास में कुछ पता नहीं लगता है। ईसामसीह के समय मिश्रदेश में ‘थेराप्यूत’ नामक कुछ भिक्षुवृत्ति वाले विरक्त रहते थे। जिनकी शिक्षा का प्रभावयीशुक्रीष्ट (ईसा मसीह) पर भी पड़ा है। ये पूर्व देश के व्यक्ति धर्मोपदेश के साथ-साथ चिकित्सा भी किया करते थे जिनके नाम से पाश्चात्य चिकित्सा में ‘थेराप्यूटिक्स (Therapeutics) नाम से एक विशेष विभाग भी है। इन थेराप्यूतों का जीवन भारतीय थेरो (स्थविर) भिक्षुओं के समान था। जयचन्द्र⁵ विद्यालंकार ने भारतीय इतिहास के ग्रन्थ में लिखा है कि ये ‘थेराप्यूत’ अशोक के समय
१. १-५ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५२ में देखें।
३३४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
पाश्चात्य देशों में गये हुए भारतीय भिक्षुक अथवा चिकित्सकों की सन्तति प्रतीत होती है। पोकाक¹ ने भी इसी आशय के विचार प्रकट किये हैं। अन्य देशों के इतिहासों में भी बहुत ऐसे व्यक्ति निलीन अवस्था में मिल सकते हैं। अन्य देशों के इतिहासों में भी बहुत से ऐसे भारतीय नाम मिलते हैं जो कि उन-उन देशों की भाषाओं के कारण विकृत होकर उन-उन देशों के व्यक्तियों के ही नाम प्रतीत होते हैं। जिस प्रकार विद्वानों के कथनानुसार कलोनस (Kalonos) नामक भारतीय व्यक्ति कल्याण प्रतीत होता है उसी प्रकार इतिहास में अन्य भी बहुत से भारतीय व्यक्ति हो सकते हैं जो अपरिचित तथा अन्य देश के प्रतीत होते हैं चरक, सुश्रुत, काश्यप तथा भेड आदियों के ग्रन्थों में आये हुए तथा अन्य भी प्राचीन आचार्यों के नामों का निर्वचन, पर्यालोचन तथा विषयानुसन्धान करने पर भी देश, काल तथा स्वरूप के अनुसार आयुर्वेद की पूर्वावस्था का थोड़ा बहुत परिचय मिल सकता है। किन्तु विस्तारमय से अब हम अधिक नहीं लिखते हैं।
वैदिक साहित्य मूलक भारतीय भैषज्य
वैदिक साहित्य में मान्त्रिक प्रक्रियाओं के मिलने पर भी अकेली भेषज प्रक्रिया के भी उदाहरण कम नहीं हैं। अपितु बहुत से असाधारण विषय ऋग्वेद में भी मिलते हैं और अथर्ववेद में तो शारीरिक ओषधियां, शस्त्रचिकित्सा, रोगनिर्देश, रोगोपचार इत्यादि भैषज्य संबन्धी विषय ओतप्रोत रूप से मिलने का पूर्व (पृ. ५-८) निर्देश किया जाचुका है। वैदिक मन्त्रों से ३६० अस्थियों² तथा सैकड़ों हजारों सिराओं³ (हिरा) और धमनियों का पौर्वकालिक ज्ञान स्पष्ट है। शतपथ⁴ ब्राह्मण में ३६० अस्थियों का वर्णन मिलता है। वैदिक याग (यज्ञ) प्रक्रिया के पाशुकविभाग में न केवल पशुओं का अपितु मनुष्यों के भी बलि में भिन्न-भिन्न अवयवों के पृथक्करण तथा जोडने का वर्णन मिलने से तद्विषयक ज्ञान स्पष्ट प्रकट होता है। चर्बी तथा हृदय के निकालने में हस्तकुशलता भी विज्ञान को बढ़ाने वाले अभ्यास को सूचित करती है। वैदिक विषयों के पण्डित कीथ तथा म्याकडोनल⁵ आदियों ने भी लिखा है कि 'अथर्व वेद के दशम काण्ड के द्वितीयसूक्त में शारीरिक अस्थियों का सुन्दर एवं आनुक्रमिक वर्णन मिलता है। वैदिक काल के भारतीयों को प्रारंभ में शरीर तथा शारीरिक विज्ञान से संबद्ध विषयों का ज्ञान था।
ऋग्वेद, अथर्ववेद तथा यजुर्वेद के मन्त्रों के अनुसार बहुत सी ओषधियों के ज्ञान तथा उपयोग का वर्णन पहले किया जा चुका है। विकृत तथा भग्न अवयवों के रोहण तथा सन्धान के लिये ओषधियों की प्रार्थना अथर्ववेद⁶ में मिलती है। ऋग्वेद में सोम का ओषधियों के राजा के रूप में वर्णन भी अनेक स्थानों पर मिलता है। सोम संबन्धी यज्ञ की प्रक्रिया के प्रारंभ होने के साथ ही सोम का प्रधान ओषधि के रूप में परिचय मिलता है। बहुत से मन्त्रों से अश्विनीकुमारों के वैद्य होने तथा सोम और अश्विनीकुमारों के पारस्परिक घनिष्ठ संबन्ध का ज्ञान होता है। सुश्रुत में भी अनेक स्थानों पर सोम का ओषधि रूप में निर्देश मिलता है। सोम का याज्ञिक तथा भेषजसंस्थाओं से विशेष संबन्ध होने से भी यह विद्या प्राचीन सिद्ध होती है। अथर्ववेद में कुछ ओषधि के वर्णन कारक सूक्त⁷ में कुछ ओषधि का प्राचीनकाल में इक्ष्वाकु काम्य तथा वस द्वारा ज्ञान होने के निर्देश से प्रतीत होता है कि प्राचीन काल से ही ओषधियों का अन्वेषण तथा ज्ञान बहुत से लोगों को था। इतना ही नहीं, अपितु वैदिक मन्त्रों से उस समय हजारों ओषधियों तथा सैकड़ों वैद्यों के होने का ज्ञान भी मिलता है। और वैदिक काल में ही नहीं, अपितु 'या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा' इत्यादि वैदिक मन्त्रों से भी ज्ञात होता है कि तीनों युगों से पूर्व भी ओषधियों का ज्ञान था।
१. १-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५२-१५३ देखें।
५. वैदिक कालीन भारतीय लोगों की अभिरुचि पर्याप्त पहले ही शारीर शास्त्र के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की ओर आकृष्ट हो गई थी। अथर्ववेद के एक मन्त्र में मानवशरीर के विविध अङ्गों का वर्णन बड़ी सूक्ष्मता और पूर्णता के साथ उपलब्ध होता है।
६. ६-७ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५३ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
३३५
वैदिक नक्षत्र इष्टि में शतभिषक् नामक नक्षत्र का तथा याज्या, अनुवाक्या और तैत्तिरीय¹ मन्त्रों में वरुण तथा शतभिषक् नक्षत्र का सैकड़ों ओषधियों को पूर्ण करके आयुष्य को देने वाले के रूप में उल्लेख मिलता है । इसलिये इस मन्त्र के अनुसार सैकड़ों ओषधियों को देने वाले इस नक्षत्र का उस नाम से व्यवहार प्राचीन प्रतीत होता है । वहीं दूसरे ब्राह्मण वाक्यों में शतभिषक् का एक अन्य निर्वचन² दिया है कि ‘असुरप्रहारशतस्य चिकित्सने देवानामाराेग्यलब्धिर्यस्मिन्नक्षत्रे बभूव स एव शतभिषक् इति’ अर्थात् जिस नक्षत्र में चिकित्सा द्वारा असुरों के सैकड़ों प्रहारों से देवताओं को आरोग्य लाभ हुआ हो वह शतभिषक् नक्षत्र है । कृत्तिका आदि नक्षत्रों का काल गणना से भी अत्यन्त प्राचीन सिद्ध होता है । उनमें से एक नक्षत्रवाचक शतभिषक् छन्द का वैदिक काल में भी अनुसन्धान करने पर प्रतीत होता है कि लाखों ओषधियों, उनके उपयोग तथा लाभों का अत्यन्त प्राचीनकाल से ही ज्ञान था ।
उपनिषदों³ में भी आध्यात्मिक प्रक्रियाओं में नाडी आदि का ज्ञान मिलता है । योगमार्ग में भी शारीरिक प्राणवह सूक्ष्म नाडियों का अनेक प्रकार का ज्ञान तथा आन्तरिक वायु के इच्छानुसार सञ्चार तथा निरोध आदि में कुशलता का वर्णन मिलता है । तान्त्रिक पद्धति में भी षट्चक्रभेदन, भिन्न-भिन्न स्थानों से वर्णों की उत्पत्ति, मूर्धभाग में कान, आंख, नाक आदि से संबन्ध रखने वाली इन्द्रियों का ज्ञान कराने वाली नाडियों का अनुसन्धान, ज्ञानवहा नाडियों का केन्द्रस्थानीय गुरुपद (प्रधानस्थान) में कुण्डलिनी से उत्पन्न हुई जीवशक्ति के संयोग से लाभ तथा आस्वादन आदि आन्तरिक ज्ञान के होने का वर्णन मिलने से इस विषय में उनका अन्तर्मुखी ज्ञान प्रकट होता है । महेञ्जोदारो के भूगर्भ में उपलब्ध योगावस्था की मूर्तियों की रचना को देखकर भी प्रतीत होता है कि यौगिक आन्तरिक क्रियाओं का विज्ञान प्राचीन था । वसन्त⁴ जी. रेले (V. G. Rale) ने वैदिक मन्त्रों में आये हुए आन्तर नाडी चक्र तथा उनके अधिष्ठातृदेवों के विषय में बहुत सा प्रकाश डाला है ।
याज्ञवल्क्य⁵ स्मृति में योग के द्वारा शरीर की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए विवरण सहित ३६० अस्थियों, प्राणों के आयतन, ७०० शिराओं, ९०० स्नायुओं, २०० धमनियों, ५०० मांसपेशियों, रसों के परिमाण वाले केश, रोम आदि तथा हृदय से निकली हुई ७२ हजार नाडियों का निरूपण करके इस विज्ञान को योग के लिये उपयोगी बतलाया है । रामायण तथा महाभारत में भी शस्त्र वैद्यक के विषय के होने का निर्देश किया जा चुका है । कौटिलीय अर्थशास्त्र में भी शस्त्र वैद्यक से संबन्धित बहुत से विषय मिलते हैं । उसके चौदहवें औपनिषद अधिकरण में परघात, अद्भुत उत्पत्ति वाली भैषज्य, मन्त्रयोग तथा अपनी सेना के नाश के प्रतीकार संबन्धी बहुत सी ओषधियों के प्रयोग दिये हुए हैं ।
वेद संसार के सब साहित्यों में श्रेष्ठ माना जाता है । पूर्व निर्दिष्ट प्राचीनतम हितीति (Hittites) तथा मित्तानी (Mittani) जातियों के पारस्परिक सन्धिशिलालेख में नासत्य, मित्र, वरुण तथा इन्द्र आदि वैदिक देवताओं के साक्षिरूप में उल्लेख का अनुसन्धान करने पर उस समय अपनी प्रतिज्ञा के पालन में साक्षिरूप से किये गये वैदिक देवताओं के उल्लेख से वैदिक सभ्यता की केवल तात्कालीनता ही सूचित नहीं होती है अपितु उस समय तथा उतने दूर अन्य भाषा तथा अन्य जातियों के शिलालेख में भी वैदिक देवताओं के साक्षिरूप में निर्देश तथा उद्धरण के मिलने से वैदिक सभ्यता की सर्वोपरिभाव से प्रतिज्ञा तथा प्रचार के साथ-साथ पूर्वपरम्परा द्वारा अनुवृत्ति तथा अत्यन्त प्राचीनता भी सूचिता होती है । और इतना ही नहीं अपितु ऋग्वेद आदि वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर आये हुए भैषज्य विद्या के प्राचीन आचार्य नासत्यों का भी इस शिलालेख में उल्लेख होने से भैषज्य विज्ञान की भी प्राचीनता सूचित होती है ।
इसके अतिरिक्त वैदिक यज्ञों में अश्वमेध की बड़ी प्रतिष्ठा समझी जाती थी । प्राचीन इतिहास में अनेक शक्तिशाली राजाओं द्वारा चारों ओर के राजाओं को वश में करके अपने गौरव के बढ़ाने तथा पारलौकिक कल्याण की प्राप्ति के लिये इस यज्ञ के अनुष्ठान का अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है । वैदिककाल से प्रवर्तित इस यज्ञ की अन्ततोगत्वा वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक पुष्यमित्र द्वारा भी किया गया था जिससे उसकी बहुत प्रतिष्ठा बढ़ गई । समुद्रगुप्त के शिलालेख में भी इस यज्ञ का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया गया है । इस यज्ञ का प्रायः श्रुतियों की सभी शाखाओं, संहिताओं, ब्राह्मणग्रन्थों
१. १-५ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५४ में देखें ।
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तथा श्रौतसूत्रों में निर्देश मिलता है। इस अश्वमेध के समय राजाओं की परिषद् में महर्षियों के सम्मुख वर्ष भर गाई जानेवाली भिन्न-भिन्न गाथाओं में तीसरे दिन भेषज विद्या के कीर्तन किये जाने का आश्वलायन १ तथा शाङ्ख्यायन २ सूत्र में भी निर्देश मिलता है। मैक्समूलर ३ (Moxmuller) का भी कहना है कि अश्वमेध में भेषज विद्या का कीर्तन किया जाता था चरणव्यूहकार ने ऋक्, यजु, साम तथा अथर्व प्रस्थानों की सैकड़ों तथा हजारों शाखाओं के विभक्त होने का प्रतिपादन किया है। कालक्रम से बहुत सी शाखाओं के नष्ट हो जाने पर भी आजतक अनेक शाखाएं उपलब्ध होती हैं। कुछ अन्य शाखाओं के जो श्रौत एवं स्मार्त सूत्र उपलब्ध होते हैं उनसे उन-उन मूल श्रुति शाखाओं के विलोप होने का अनुमान होता है। ये वेद आनुश्रविक प्रक्रिया से उन-उन शाखाओं के रूप में अत्यन्त प्राचीन काल से असंख्य आर्य महर्षियों के भावनाओं, हृदयों तथा मुखों में ओतप्रोत हुए अपनी चारों और फैली हुई गौरवपूर्ण स्थिति को सूचित करते हैं इस प्रकार के वैदिक सम्प्रदाय में अश्वमेध सदृश महत्त्वपूर्ण यज्ञ के अङ्गरूप में भेषज संबन्धी आख्यान का गान होता था। इससे श्रुतियों की अध्ययन तथा अध्यापन प्रक्रिया, निरन्तर पारायण तथा अभ्यास, याज्ञिक कल्प, प्रयोग, चर्चा, अनुष्ठान तथा ऋत्विक् आदियों के द्वारा आर्ष विचारों में चारों ओर से ओतप्रोत होने के कारण मन्दिर आदियों में मिलने वाले कुछ भैषज्यसंबन्धी लेखों तथा कहीं-कहीं मिलनेवाले शिलालेखों में आये हुए भैषज्य संबन्धी विषयों से पूर्व प्रतिष्ठित वैद्यक सभ्यता के उदय के साथ-साथ भारतीय भैषज्य-प्रस्थान के महत्त्व व्यापक स्थिति तथा प्राचीनता सिद्ध होती है। इस प्रकार नाना शाखा-प्रशाखाओं में फैले हुए ऋक्, अथर्व आदियों में भी इसके विषयों के व्याप्त होने से, याज्ञिक प्रक्रियाओं में भी इसका कीर्तन होने से तथा आयुर्वेद नाम से वैदिक प्रस्थान के प्राचीन काल से ही विभक्त होने से प्राचीन भारतीय वैदिक मूलरूपी स्त्रोत से परम्परा द्वारा प्रवृत्त इस भारतीय भैषज्य विज्ञान की प्राचीनता निश्चित रूप से प्रकट होती है। कोलब्रुक (Mr. Colebrooke) नामक विद्वान् ने इसके विषय में कहा है कि—'The Hindoos were teachers and not learners' अर्थात् हिन्दु सदा गुरु रहे हैं न कि शिष्य। तथा मोनियर विलियम्स ने कहा है कि— 'Is not the case........' (मूल उपोद्घात पृ. ११२ देखें) सभ्यता एवं प्रकाश के प्रथम अङ्कूर सदा पूर्व में ही उदित हुए हैं तथा पूर्व से पश्चिम की ओर ही सदा उनका प्रचार हुआ है न कि पश्चिम से पूर्व की ओर।
भारतीय भूगर्भ के अनुसार प्राचीन भैषज्यविषयक विमर्श
जिस भारत की प्राचीन सभ्यता मिश्र, मेसोपोटामिया आदि प्राचीन देशों की सभ्यता के साथ सादृश्य रखती हुई उनसे भी आगे बढ़ी हुई है उस भारत के महेञ्जोदारो प्रदेश की खुदाई में मिले हुए प्राचीन निवास स्थान, स्नानागार तथा मलप्रणाली आदि की स्थापत्य विद्या के पण्डितों द्वारा भी प्रशंसित प्राचीन निर्माण कला से पांच हजार वर्ष पूर्व भी भारतीय स्वास्थ्य विज्ञान (Hygenic condition) का पूर्णरूप से परिचय मिलता है, वहीं खुदाई में एक काले रंग का बड़ गोला सा मिला है जिसका अनुसन्धान एवं परीक्षा करके डॉ. सनाउल्ला नामक रसायनाचार्य (Chemist) तथा डॉ. हमीद ने कहा है कि–‘यह शिलाजीत का पत्थर है जो कि पर्वतीय प्रदेश से वहां आया है, यह मूत्ररोग आदि में प्रयुक्त होता है तथा विशेषरूप से यह औषध कार्य में ही प्रयुक्त होता है’। जान ४ मार्शल ने भी परीक्षकों के इस प्रकार के परिणामों के सहित इसका विवरण प्रकाशित किया है। इस प्रकार वहां शिलाजीत के मिलने से भैषज्य विद्या पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। धन्वन्तरि, आत्रेय तथा कश्यप आदियों ने भी अनेक स्थानों पर शिलाजीत के उपयोग का निर्देश किया है। नावनीतक में भी इसका प्रयोग दिया हुआ है। जिस शिलाजीत की उत्पत्ति उस प्रदेश में नहीं होती अपितु दूर के पर्वतीय प्रदेशों से उसे लाया गया है, उसका भैषज्य के रूप में प्राचीन आचार्यों ने भी निर्देश किया है। तथा उसके रसायन कल्प एवं महिमा का भारतीय आयुर्वेद में वर्णन है। चिरकाल तक भूगर्भ में दबने से नष्ट हुई ओषधियों का न मिलना स्वाभाविक ही है परन्तु भाग्यवश जो कोई ओषधि अथवा वस्तु मिली भी है, उस असाधारण वस्तु के चिरकाल के बाद मिलने से भारतीय प्राचीन वैद्यक का गौरव ही बढ़ता है। इतने प्राचीन समय में और कौन से वैद्यक चिह्नों के प्राप्त होने की आशा
१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १५५ में देखें।
४. DK प्रदेश VS तथा प्रदेश में पाया गया कोयले जैसे काले पदार्थ का टुकड़ा बहुत दिनों तक एक समस्या बना रहा........
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३३७
की जा सकती है। वहीं भूगर्भ से वहां उत्पन्न न होकर हिमालय में उत्पन्न होने वाले हरिणों के सींगों के अनेक ढेर मिलते हैं। आथर्वण¹ संहिता में हरिण के सींगों का क्षेत्रिय (क्षय, कुष्ठ, अपस्मार आदि) रोग के प्रतीकारार्थ उपयोग मिलने से तथा वैदिक काल में भी भेषजरूप से उसके उपयोग का उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि यहां मिलने वाले हरिण के सींगों का, ओषधि रूप में प्रयोग करने के लिये ही संग्रह किया गया होगा। हरिण के सींगों को आजकल भी भारतीय वैद्य ओषधियों में प्रयुक्त करते हैं। इस विषय में जान मार्शल ने भी लिखा है कि हरिण के सींगों का ओषधियों अथवा वाणिज्य के लिये संग्रह किया गया होगा।
वहां पर बहुत से धातु अथवा मिट्टी के खिलौने भी मिले हैं। काश्यपसंहिता के जातकर्मोत्तरीय अध्याय में तथा चरक के जातिसूत्रीय अध्याय में भी बालकों के विनोद तथा बुद्धि के विकास के लिये अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों की आकृति वाले खिलौनों का वर्णन मिलता है। खिलौनों का आयुर्वेद के साथ संबन्ध होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस प्रकार इतिहास के अनुसार भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान पांच हजार वर्ष से प्राचीन सिद्ध होता है।
भिन्न-भिन्न देशों के प्राचीन भैषज्य के विमर्श की आवश्यकता
यहां यह कह देना आवश्यक है कि जिस प्रकार महेञ्जोदारी की खुदाई का अनुसन्धान करने से भारतीय सभ्यता पांच हजार वर्षों से प्राचीन सिद्ध होती है उसी प्रकार प्राचीन लेख तथा वस्तु आदियों के चिह्नों के मिलने से मिश्र, बेबिलोनिया, सीरिया तथा चीन आदि देशों की सभ्यता भी चार-पांच हजार वर्ष प्राचीन निश्चित होती है। इन प्राचीन सभ्य तथा उन्नत देशों में प्राचीन काल में भी ज्ञान-विज्ञान की विशेषता अवश्य रही होगी तथा जीवन के लिये उपयोगी व्यावहारिक भैषज्य विद्या का होना तो और भी आवश्यक है। प्राचीन उन्नत देशों के भैषज्यसम्बन्धी अपने पूर्व स्रोत भी होंगे। पेपरी नामक त्वक्पत्र में पल्लीरुधिर, सूअर आदियों के मांस तथा भेद, कच्छप-मस्तिष्क तथा मनुष्य शुक्र आदि बहुत सी ऐसी असाधारण ओषधियां मिलती हैं जिनका भारतीय आयुर्वेद सम्प्रदाय में निर्देश नहीं मिलता है। इस प्रकार की ओषधियां उसी देश के प्राचीन स्रोतों से निकली हुई प्रतीत होती हैं। इसी प्रकार अन्य देशों में भी बहुत से ऐसे असाधारण विषय हो सकते हैं जो उसी देश के प्राचीन सम्प्रदाय से निकले हुए प्रतीत होते हैं। बाह्लीक भिषक् काङ्कायन का निर्देश होने से यह कहा जा सकता है कि अन्य भी बहुत से विदेशी चिकित्सक भारतीयों द्वारा तथा भारतीय चिकित्सक विदेशियों द्वारा ज्ञात थे। काश्यपसंहिता के खिलभाग के सूतिकोपक्रमणीय अध्याय में दिये हुए 'वैदेश्याश्च प्रयच्छन्ति विविधा म्लेच्छजातयः' उल्लेख से प्रतीत होता है कि इस ग्रन्थ के आचार्य को भी भारत से बाहर की बहुत सी म्लेच्छ जातियों का ज्ञान था। म्लेच्छ शब्द महाभारत तथा हरिवंश आदि प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलता है। ययाति की कथा में पिता की आज्ञा का पालन न करने से तुर्वसु तथा अनुर्दुह्यु का शाप के कारण वेदबाह्य म्लेच्छ जातियों के वंशप्रवर्तक के रूप में उल्लेख किया गया है। कोशकार के 'प्रत्यन्तो म्लेच्छदेशः स्यात्' इस उल्लेख के आधार पर संभवतः भारत की सीमाओं पर स्थित देश के म्लेच्छों की ओर यह निर्देश प्रतीत होता है। पाणिनीय धातुपाठ में भी 'म्लेच्छ' धातु दी हुई है। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने 'तेऽसुराः हेलयो हेलय इति पराबभूवुस्तस्मान्म्लेच्छा मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्'
भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के कैमिस्ट श्री सनाउल्ला महोदय उस काले पदार्थ की जांच करने में कृतकार्य हुए हैं। यह स्याही का टुकड़ा नहीं है। यह एक प्राचीन ओषधि है जिसे शिलाजीत कहते हैं और जो आजकल भारत में खूब प्रयोग में लाई जाती है और अनेक रोगों को अच्छा करती है। अजीर्ण, मधुमेह तथा यकृत् एवं प्लीहा के रोगों के लिये यह अतिशय उपयोगी है। यह हृदय की प्रक्रिया को नियमित करती है तथा श्वाससंस्थान के लिये हितकारी है। यह उत्तेजक और कफनिस्सारक है।
डॉ. हमीद द्वारा किया गया इस पदार्थ का विश्लेषण प्रथम परिशिष्ट में दिया गया है। यह काला शिलाजीत चट्टानों में से निकलता है जो कि महेंजोदारों में पाये गये हैं। यह हिमालय की अधोवर्ती, मध्यवर्ती और ऊपर की पर्वत श्रेणियों में पाया जाता है। Mohenjedaro & the Indus Civilization Vol. II by John Marshall.
१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १५६ में देखें।
३३८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
में असुरों का म्लेच्छ जाति के रूप में उल्लेख किया है। सिन्धु नदी के किनारे उपलब्ध वस्तुओं में अनेक समानताओं के कारण ईरानियन् तथा असीरियन् आदि प्राचीन म्लेच्छ जातियों का भारतीयों के साथ परस्पर परिचय का ज्ञान होने से संभवतः उस समय प्रसिद्ध ईरानियन् तथा असीरियन् आदि भारत से बाहर की विविध उन्नत म्लेच्छ जातियों का म्लेच्छ शब्द से निर्देश किया गया हो। इन विदेशी म्लेच्छ जातियों का उल्लेख इस संहिता के खिलभाग में होने से प्रतीत होता है कि जीवक अथवा वात्स्य के समय अन्यदेशीय चिकित्साओं का भी ज्ञान होने से संभवतः उसने ऐसा निर्देश किया हो। चरक के विमान स्थान में भी 'विविधानि हिषजां शास्त्राणि प्रचरन्ति लोके' के द्वारा उस समय व्यवहार में अनेक चिकित्सा पद्धतियों के प्रचार का निर्देश किया गया है। आजकल सौरचिकित्सा (सूर्य चिकित्सा), जलचिकित्सा, भैषज्यचिकित्सा तथा शस्त्रचिकित्सा आदि अनेक चिकित्साओं के प्रचार के समान उस समय भारत तथा विदेशों में भी अन्य प्रक्रियाओं के द्वारा भी भैषज्य प्रचार का ज्ञान होता है। वैदिक काल से प्रवृत्त भारतीय आयुर्वेद सम्प्रदाय के भारतीय ही सिद्ध होने पर भी कालक्रम से न्यूनाधिक रूप में भारतीय विषयों का विदेशी सम्प्रदायों में तथा विदेशी विषयों का भारतीय सम्प्रदाय में अनुप्रवेश हो गया प्रतीत होता है। भिन्न-भिन्न प्राचीन देशों की चिकित्साओं के यथावत् अनुसन्धान के बिना केवल सामान्य ज्ञान के आधार पर यह कहना कठिन है कि उनके तत्कालीन भैषज्य-संबन्धी ज्ञान का क्या स्वरूप था तथा उनकी चिकित्सा के विषय अपने ही देश के असाधारण प्राचीन स्त्रोत से निकले हुए थे अथवा अन्यदेशीय स्रोतों से उनका उद्गम हुआ था। भिन्न-भिन्न स्थानों पर मिलने वाले भिन्न-भिन्न विषयों को देखकर हम केवल अनुमान ही कर सकते हैं। इस विषय का निश्चित ज्ञान कुछ नहीं हो सकता है। प्राचीन देशों के प्राचीन विषयों को लेकर यदि पृथक्-पृथक् प्रत्येक की यथावत् आलोचना की जाय तो संभवतः हमें कुछ परिणाम निकालने में सहायता मिल सकती है कि उस समय अमुक-अमुक अंशों में इन सम्प्रदायों में समानता थी, तथा अमुक अंश में विषमता थी। समान विषयों का भी अमुक सम्प्रदाय से अमुक का उद्गम हुआ था तथा अमुक-अमुक विषय उस-उस सम्प्रदाय के अपने ही थे। कालक्रम से प्राचीन देशों की पूर्व परिस्थिति का यथावत् ज्ञान कराने वाले बहुत से चिन्हों के लुप्त हो जाने से सम्पूर्णरूप से ज्ञान होना यद्यपि कठिन है तथापि जो अवशिष्ट चिह्न उपलब्ध होते हैं उनके आधार पर भी उनकी अन्तः स्थिति का बहुत कुछ ज्ञान हो सकता है। मिश्र में प्राचीन भैषज्य संबन्धी त्वक्पत्र तथा रोगप्रतीकार व्यवस्थापत्र (Prescription forms) आदि उपलब्ध हुए हैं, असीरिया में हेमुर्वन् राजा के समय के भैषज्य विषयक तेरह शिलालेख मिले हैं, इरान के प्राचीन अवेस्ता नामक ग्रन्थ के वेन्दिदाद, यश्न तथा यश्त प्रकरणों में भैषज्य संबन्धी विषय मिलते हैं तथा ब्रिटिश म्यूज़ियम के संग्रहालय में रखे हुए सुमेरिया प्रदेश के भूगर्भ से निकली हुई ईंटों पर खुदे हुए जो शिलालेख मिले हैं उनमें भी भैषज्य संबन्धी विषय मिलते हैं। चीन में भी प्राचीन भैषज्य संबन्धी विषय मिलते हैं। इसी प्रकार अन्वेषण करने पर अन्य भी बहुत से विषय मिल सकते हैं। सब ओर दृष्टिपात किये बिना केवल अपने सम्प्रदाय अथवा चिकित्सापद्धति को ही मौलिक कहने से व्यक्ति वास्तविकता पर नहीं पहुंच सकता। इसलिये इस समय आवश्यकता इस बात की है कि प्राचीन इतिहास, महेञ्जोदारो के भूगर्भ से निकली वस्तुओं तथा प्राचीन विचारों को सामने रखकर पांच हजार से अधिक वर्षों की सभ्यता वाले तथा प्राचीन काल में भी परस्पर परिचय, यातायात तथा सम्पर्क वाले भारत, मिश्र, इरान, चाल्डिया, बाहीक, बेबिलोनिया, सीरिया तथा चीन आदि प्राचीन देशों के जितने भी भैषज्य सम्बन्धी विषय मिले हैं अथवा मिलते रहते हैं उन सब को सामने रखकर तथा भारतीय प्राचीन आयुर्वेद की परिस्थिति का भी अनुसन्धान करके समानता तथा विषमता की तुलना की दृष्टि से यह देखना चाहिये कि कहाँ के कौन से विषय कहां है, कौन सा विषय कहां से प्रतिफलित हुआ है तथा किस विषय का प्रभाव अथवा आलोक किस विषय पर पड़ा है इत्यादि। दूसरे देशों के आलोक को धारण करने वाले तथा अर्धवयस्क ग्रीक वैद्यक के भारतीय वैद्यक पर प्रभाव की शंका बिलकुल निर्मूल है।
(५) उपसंहार
प्राचीन आचार्यों का गौरव
विद्वानों को यह ज्ञात ही है कि प्राचीन समय में धन्वन्तरि, कश्यप तथा आत्रेय आदियों द्वारा विचारों की कसौटी
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३३९
पर कस कर उज्ज्वल किये हुये सिद्धान्तरूपी रत्नों को आजकल पाश्चात्त्य विज्ञान की चमक से चकाचौंध दृष्टि वाले विद्वान् भी अत्यन्त संमान के साथ देखते हैं। इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन महर्षियों का विज्ञान सागर कितना अगाध था जिसमें आज भी रत्नों की कमी नहीं है। ये अत्युच्च ग्रन्थ ही भारत की प्राचीन विभूतियां हैं। आजकल मिलने वाले सब निबन्धों में इन्हीं ग्रन्थों की ही प्रधानता दिखाई देती है। सूक्ष्म दृष्टि से विषयों का अनुसन्धान करने पर इन ग्रन्थों के प्रत्येक वाक्य सार एवं निष्कर्ष पूर्ण तथा सूत्रमय दिखाई देते हैं जिन्हें परिष्कृत बुद्धि वाले विद्वान् अपने प्रवचनों से विशाल विषय का रूप दे सकते हैं। इनमें से परिश्रम करने वाले लोग भूगर्भ से नाना रत्नों के समान असंख्य सिद्धान्त रत्नों को ढूंढ कर निकाल लेते हैं। प्राचीन समय में मिलने वाले इस प्रकार के सुसंस्कृत विचारों से तत्कालीन विचारों की उन्नति का सम्यक् ज्ञान होता है परन्तु उसके बाद विचारों की वृद्धि का एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता है। शल्यचिकित्सा का सुश्रुतसंहिता के बाद वाग्भट आदि दो तीन विद्वानों ने लेशरूप से ही निर्देश किया है तथा उसमें भी सौश्रुतविज्ञान की ही आंशिक छाया दिखाई देती है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी जीवक के समय तक यह विज्ञान हमें दिखाई देता है। इतनी उन्नत अवस्था में पहुंचा हुआ यह विज्ञान सहसा कहां लुप्त हो गया है ? इसका कारण संभवतः शस्त्रक्रिया में लेशमात्र विपरीतता से भी अनर्थ की संभावना हो, अथवा शस्त्र क्रिया के भीषण होने के कारण उसे छोड़ दिया गया हो, शान्तिप्रिय ब्राह्मणों द्वारा उसकी उपेक्षा की गई हो या धर्मशास्त्रकारों द्वारा चिकित्सावृत्ति की निन्दा की होने के कारण, अध्यात्मवाद की दृष्टि से इसमें हिंसा के दिखाई देने से अथवा अहिंसावाद और दशपारमिता¹ सिद्धान्त के विकसित होने से इसका लोप हो गया है। यह नहीं कहा जा सकता कि इनमें से कौनसा कारण सामने आया जिससे सर्वोपकारी वह विज्ञान, वह हस्तकौशल-वह उपदेश परम्परा तथा वह उपकरणों का परिष्कार इत्यादि द्रुतगति से ह्रास को प्राप्त होता हुआ विद्वत्समाज के हाथ से निकल कर आजकल भारत में विद्याविज्ञान से शून्य नापित जाति (नाइयों) में लेशरूप से मिलता है। धन्वन्तरि सदृश पूर्वाचार्यों द्वारा उन्नत की हुई वह प्राचीन विद्या आजकल ऐसे व्यक्तियों के हाथों में पड़कर उत्तरोत्तर ह्रास को प्राप्त होती हुई दीप निर्वाण के समान समाप्ति की प्रतीक्षा कर रही है। गुणग्राही तथा उन्नत पाश्चात्त्य विद्वानों ने आजकल अपने अथक विचारों, परिष्कारों तथा नये-नये प्रयोगों एवं अनुभवों से परिवर्तित एवं रूपान्तरित करके, शल्यविद्या, गर्भभैषज्य, बालभैषज्य, कायचिकित्सा तथा विकृतिविज्ञान में विशेष रूप से उन्नति करली है, जिससे आजकल अपने प्राचीन विद्याबल एवं पूर्वगौरव को भूले हुए भारत में भी चारों ओर फैली हुई पाश्चात्त्यचिकित्सा के विज्ञानयुक्त कुशलता से उपकार हो रहा है। केवल शल्यचिकित्सा को ही यह अवस्था नहीं है अपितु शालाक्य आदि अन्य विज्ञान तो उत्पन्न होते ही जीर्ण-शीर्ण हो गये थे। हां, कायचिकित्सा में अवश्य बाद में भी भैषज्य विद्या के हजारों पण्डित उत्पन्न हुए हैं तथा सैकड़ों वैद्यक ग्रन्थ लिखे गये हैं जिन्हें यदि एकत्र किया जाय तो आज भी एक विशाल ग्रन्थराशि मिल सकती है। परन्तु आत्रेय आदि महर्षियों के समय आन्तरिक विज्ञान के बल से उत्पन्न हुए जिन सिद्धान्तों एवं विचारों के कारण आयुर्वेद उन्नत एवं समृद्ध हुआ था, वैसे उन्नत एवं नवीन विचार उसके बाद प्रकाशित नहीं हुए हैं। केवल प्राचीन सिद्धान्तों को ही भङ्गीभेद से दिखाकर अथवा नवीन अनुभूत ओषधियों द्वारा संबधित करके प्राचीन ग्रन्थों के केवल अनुवाद अथवा संग्रहरूप में नवीन शरीरों को धारण करके भिन्न-भिन्न निबन्ध हमारे सामने उपस्थित होते हैं। जहां तक भैषज्य का प्रश्न है हम देखते हैं कि नवीन योगौषधियों के आबिष्कार तथा नवीन अनुभवों के अनुसार ग्रन्थों के निर्माण द्वारा धातु तथा रस ओषधियों में वृद्धि होती हुई दिखाई देती है। आजकल भी आयुर्वेद के वैद्य सब स्थानों पर इसी के मार्ग को ग्रहण करके उसके उपयोग तथा प्रयोग से सफलता प्राप्त कर रहे हैं और यदि हम यह कहें कि यही विषय आयुर्वेद के अन्य प्रस्थानों के नाम की भी रक्षा कर रहा है तो यह कोई अत्युक्ति नहीं होगी। प्राचीन महर्षियों के समान उसके बाद के वैद्य भी यदि अपने विचार विमर्श के अनुसार नये-नये सिद्धान्तों का आविष्कार करते, प्राचीन सिद्धान्तों का परिष्कार कर, अपूर्ण अंशों को पूर्ण करते, अपने अनुभव के अनुसार नये-नये संस्कार करते, उच्च विचारों वाले प्रौढ
१. दश पारमिता—बौद्ध धर्मग्रन्थों में बुद्धत्व प्राप्ति के लिये दश गुणों की पराकाष्ठा तक पहुंचना आवश्यक बताया गया है। ये दस गुण ‘पारमिता’ कहलाते हैं। पारमिता का अर्थ है उच्चतम अवस्था या पूर्णता (Perfections) जिससे मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है। ये निम्न दस हैं—१. दान २. शील ३. शान्ति ४. वीर्य ५. ध्यान ६. प्रज्ञा ७. उपाय ८. प्रणिधान ९. बल १०. ज्ञान।
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निबन्धों की पुनः-पुनः रचना करते तो भारतीय आयुर्वेद भी इतने समय में उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता। आजकल बहुत से विद्वान् वैद्य कालवश तथा उपेक्षा से ह्रास को प्राप्त हुए भारतीय आयुर्वेद के प्राचीन गौरव को दृष्टि में रखते हुए उसके प्रचार तथा परिष्कार के लिये नवीन विचारपूर्ण निबन्धों, प्रचार संस्थाओं, परिष्कृत मार्गों तथा औषध निर्माणशालाओं के द्वारा प्रयत्न में लगे हुए दिखाई देते हैं। आजकल श्रीयुत गणनाथ सेन जी द्वारा प्रत्यक्ष शारीर तथा सिद्धान्त निदान का निर्माण करके प्राचीन शारीरिक अवयव तथा रोगनिदान के विषय में बहुत से विशेष विचार प्रकट किये गये हैं। इसी प्रकार कविरत्न श्रीयामिनी भूषण राय ने रोगविनिश्चय, शालाक्य, विष तथा प्रसूति के विषय में छोटे-छोटे तन्त्रों का निर्माण किया है तथा डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे ने नेत्र चिकित्सा के विषय में कोई ग्रन्थ लिखा है। इन संस्कृत भाषा के नवीन निबन्धों को देखकर बहुत आशा दिखाई देती है। जराजीर्ण हुई भी यह भारतीय आयुर्वेद विद्या जागरूक; सूक्ष्म बुद्धि वाले तथा उद्योगी भारतीय एवं विदेशी विद्वानों के सहयोग रूपी रसायन से ही संभवतः च्यवन ऋषि के समान पुनः यौवन को प्राप्त करले। समयवश बहुत से विषयों में वैज्ञानिक प्रकृति, परिष्कृत रासायनिक प्रक्रियाओं, नवीन आविष्कृत दूरवीक्षण तथा अन्तर्वीक्षण आदि विशेष यन्त्रों, भिन्न-भिन्न देशों के विद्वानों के साथ साक्षात् अथवा लेख, निबन्ध आदि के द्वारा विमर्श, शारीरिक अवयवों की सूक्ष्म दृष्टि तथा नवीन विचार युक्त सैकड़ों निबन्धों के प्रकाशन के कारण आजकल पाश्चात्त्य विद्वानों द्वारा उन्नत तथा अनेक शाखायुक्त भैषज्य विद्या की आलोचना करते हुए प्राचीन भारतीय आयुर्वेद विद्या कुछ लोगों की आजकल स्थूल एवं बालक्रीडा भले ही प्रतीत हो, किन्तु प्राचीन समय में जब कि विचार विमर्श के लिये दुर्गम नदी, वन, पर्वत आदि के व्यवधान के कारण एक दूसरे देश में जाना दुष्कर था उस समय वन के मृग आदि पशुओं के साथ रहने वाले धन्वन्तरि, कश्यप, आत्रेय आदि प्राचीन आचार्यों द्वारा यन्त्र आदि भौतिक साधनों के अभाव में केवल अपनी प्रणिधान शक्ति एवं आन्तरिक बुद्धि के सहारे जो विचार आविष्कृत किये गये थे उनका आधुनिक उन्नत विज्ञान के द्वारा परिष्कृत दृष्टि वाले विद्वान् आज भी जो आदर करते हैं, वह कोई कम गौरव की बात नहीं है। भारतीय तथा अन्य विद्वान् भी चिरकाल तक उनकी इस कृपा के लिये ऋणी रहेंगे। उन प्राचीन आचार्यों का हमें सैकड़ों बार अभिनन्दन करना चाहिये।
प्राचीन ग्रन्थों का लोप तथा उनकी रक्षा
देवयुग से ही लेकर आर्यों का यह विज्ञान-प्रवाह संहिता, ब्राह्मण, उपनिषत्, सूत्र, तन्त्र, भाष्य, टीका, उपटीका तथा निबन्धरूप अनेक शाखाओं द्वारा बहता हुआ तथा ऋषियों, आचार्यों और निबन्धलेखक की विचार धाराओं से पुष्ट होता हुआ मानव समाज का निरन्तर कल्याण कर रहा है। इसीलिये आजकल उस विज्ञान के सैकड़ो विभाग मिलते हैं तथा प्रत्येक विभाग के अनेक प्राचीन आचार्य तथा तारतम्य के अनुसार उनके विभिन्न विचार दृष्टिगोचर होते हैं। परन्तु आर्यों के मूल सर्वस्वभूत आद्यविज्ञान रूप महाकल्पतरु वेद की भी अनेक शाखायें अङ्ग तथा उपाङ्ग भी बहुत कुछ विच्छिन्न होकर विलुप्त हो गये हैं। बहुत सी शाखाओं के तो नाम भी शेष नहीं रहे हैं तथा किन्हीं-किन्हीं का संहिता, ब्राह्मण तथा सूत्र आदियों में कहीं-कहीं निर्देश मिलता है। इसी प्रकार प्राचीन महर्षि आदि आचार्यों के उपदेश रूप लेख भी लुप्त हो चुके हैं। किन्हीं-किन्हीं मतों का केवल नाम मात्र मिलता है तथा बहुतों के नाम भी लुप्त हो गये होंगे।
यदि हम आजकल किसी भी विषय के किसी एक भी उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थ का अध्ययन करें तो उससे हमें बहुत से प्राचीन आचार्य, उनके द्वारा ज्ञात ग्रन्थ तथा विशेष-विशेष मतों के केवल नामोल्लेख मिलते हैं। यास्क के निरुक्त से अन्य भी बहुत से वेदों के अर्थ करने वालों का ज्ञान होता है। इसी प्रकार पाणिनि के सूत्रों से शाकल्य, गालव, गार्ग्य आपिशलि, काश्यप तथा स्फोटायन आदि प्राचीन वैयाकरणाचार्यों का तथा पाराशर्य, कर्मन्द, शिलालि, कृशाश्व आदि भिक्षु, नट तथा सूत्र आदि अन्य प्रस्थानों के आचार्यों का, कौटिलीय अर्थशास्त्र से पराशर, उशनस्, विशालाक्ष, कौणप, दन्त, भरद्वाज, वातव्याधि, बाहुदन्ती, पुत्रपिशुन आदि प्राचीन अर्थशास्त्रियों का, सायन के वेदभाष्य से मेधातिथि, शाकपूणि तथा अग्निस्वामी आदि प्राचीन वेद के व्याख्याताओं का, पूर्वोत्तर-मीमांसासूत्र से आश्मरथ्य, काशकृत्स्न, औडुलोमि, बादरी आदि प्राचीन वेदोपनिषत् के मीमांसकों का बोध होता है। इसीप्रकार उपलब्ध श्रौत स्मार्त दर्शन, ज्योतिष आदि के ग्रन्थों से भी हजारों संहिताओं, तन्त्र, सूत्र, व्याख्यान तथा निबन्धों के रचयिता महर्षि आदि तथा भिन्न-भिन्न विषयों के
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३४१
आचार्यों के केवल नाम मात्र का बोध होता है। बहुत से भारतीय दार्शनिक तथा बौद्धग्रन्थ चीन तथा तिब्बती भाषाओं में अनूदित हुए केवल छायारूप में मिलते हैं। केवल हजार वर्ष प्राचीन बौद्धग्रन्थ भी सैकड़ों नष्ट हो चुके हैं। इस प्रकार की रोमहर्षण घटनाएं श्रुति, स्मृति, आगम, वेदाङ्ग, उपाङ्ग दर्शन, आदि में अथवा बौद्ध एवं जैन सम्प्रदायों में कहां नहीं मिलती हैं। इस आयुर्वेद में भी आत्रेय, सुश्रुत, भेड तथा काश्यप आदि की उपलब्ध संहिताओं के उल्लेख से काप्य, वायोर्विद, वामकं, वैदेह, काङ्कायन, हिरण्याक्ष, शौनक, पाराशर्य, गार्ग्य, माठर, कौत्स, मौद्गल्य, कुशिक, सुभूति, मार्कण्डेय, करवीर्य आदि बहुत से प्राचीन आयुर्वेद के आचार्यों का बोध होता है जिनमें से कइयों के स्थान-स्थान पर वचन तथा मत उद्धृत मिलते हैं। उन आचार्यों के वे ग्रन्थ कहां लुप्त हो गये हैं। यदि वे सब ग्रन्थ उपलब्ध हो सकें तो एक विशाल आयुर्वेदीय ग्रन्थराशि तैयार हो सकती है। केवल दो तीन उपलब्ध ग्रन्थों का ही अच्छी प्रकार अवगाहन करने से प्रतिभा एवं ज्ञान से उज्ज्वल सैकड़ों तत्त्वपूर्ण उपदेशों का ज्ञान मिलता है। इस प्रकार नाना प्रस्थानों में विभक्त प्राचीन आचार्यों के सब ग्रन्थ यदि मिल सकें तो विद्वानों को कितना लाभ हो सकता है। करुणामय प्राचीन महर्षियों द्वारा विचारधारा रूपी रस से विज्ञान कल्पतरु को बढ़ाने के कारण हम उनके यद्यपि अनुगृहीत हैं तथापि पूर्ण परिपक्व फलों से हम वञ्चित ही हैं।
प्राचीन काल से ही समय-समय पर होने वाले प्राकृतिक, वैकृतिक, तथा आकस्मिक क्षोभों, एक दूसरे राष्ट्रों के परस्पर होने वाले युद्ध आदि नैतिक उपद्रवों, बारम्बार होनेवाले विदेशी शासकों के विध्वंसकारक आक्रमणों, साम्प्रदायिक सघर्षों, तक्षशिला, नालन्दा तथा विक्रमशिला आदि के विशाल पुस्तकालयों के भस्मसात् एवं धूलिसात् होने तथा जल, अग्नि आदि के विप्लवों से हजारों प्राचीन ग्रन्थ लुप्त हो चुके हैं। न केवल प्राचीन काल में अपितु आजकल भी प्राचीन विद्यास्थानों में ग्रामीण पर्णशालाओं (चटशालाओं) में स्थित सैकड़ों ग्रन्थों के अग्नि के उत्पात से क्षणभर में नष्ट हो जाने से तथा बहुत से प्राचीन विद्वानों द्वारा संगृहीत ग्रन्थों के भी अब उनके परिवार तथा संतति में संरक्षक के अभाव से, अनास्था से तथा भट्टी, नदी प्रवाह, बाजारों में फैलने, भूगर्भ एवं धूलराशि में अनिश्चित काल तक पड़े रहने से, पुराने होकर जीर्ण-शीर्ण हो जाने से तथा दीमक आदि कीड़ों से खाये जाने के कारण बचे हुए ग्रन्थ भी उत्तरोत्तर नष्ट होते जा रहे हैं। इस सबको देखकर किस विद्यानुराग का हृदय दुःख से नहीं फटने लगता। अनेक विज्ञानों से पूर्ण इस प्राचीन कोश का इस प्रकार से नष्ट हो जाना बड़े दुःख की बात है।
इस प्राचीन विद्या को नाश से बचाने के लिये आजकल सैकड़ों प्रयत्नशील, गुणग्राही एवं दयालु भारतीय तथा पाश्चात्त्य विद्वान् इधर-उधर घूम-घूम कर अन्वेषण करते हुए विनाशोन्मुख बहुत से प्राचीन ग्रन्थों को ढूंढ-ढूंढ कर निकाल रहे हैं। खोटाङ् प्रदेश के भूगर्भ से निकले हुए बावर मैन्युस्क्रिप्ट नाम से प्रसिद्ध नावनीतक आदि बहुत से प्राचीन लेख आजकल खण्डित अवस्था में मिले हैं। बहुत से लोग चीन, तिब्बत आदि देशों में जाकर वहां मिलने वाले मूल लेखों तथा अनुवादों से कुछ ग्रन्थों को उपस्थित करते हैं। इन लोगों का प्रयत्न अत्यन्त प्रशंसनीय है। अब विनाशोन्मुख प्राचीन विद्या की रक्षा एकमात्र गुणग्राही विद्वान् तथा श्रीमान् (धनी) व्यक्ति ही कर सकते हैं। धनीमानी लोगों का कर्तव्य है कि जो प्राचीन ग्रन्थ अभी तक अवशिष्ट हैं उनको परिश्रम से भी ढूंढ़कर प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।
पुरातन वस्तुएं बाह्य तथा पुरातन लेख प्राचीन समय की अन्तः परिस्थिति को सूचित करती हैं। अतीत समय की अवस्था को जानने के लिये इनके अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है। प्राचीन काल की जो भी वस्तुएं तथा लेख आदि उपलब्ध होते हैं उनमें न्यूनाधिक भाव से कुछ न कुछ प्राचीनता की झलक मिलती ही है। थोड़े बहुत समय के पौर्वापर्य वाले प्राचीन सभ्यता के समान सूत्रों में बंधे हुए असीरिया, बेबिलोनिया, सुमेरिया, तथा मित्र आदि प्राचीन जातियों के पाश्चात्त्य देशों में भी काल धर्म से होने वाले अलेक्जेण्ड्रिया के विशाल पुस्तकालय के अग्निकाण्ड आदि तथा समय-समय पर होने वाले राजनैतिक तथा साम्प्रदायिक विप्लवों से उनकी बहुत सी प्राचीन ऐतिहासिक वस्तुएं नष्ट हो गई हैं तथापि उनमें अनेक वस्तुओं तथा लेखों के साथ-साथ शवों के मिलने से, कहीं-कहीं पिरामिड (Pyramids) एवं स्तूप आदियों में इतिहास के मिलने से तथा कहीं-कहीं ईंटें, शिलाओं तथा धातुओं में चिरकालीन ग्रन्थ तथा इतिवृत्तों के मिलने से प्राचीन काल से प्रचलित एवं स्थान-स्थान पर मिलने वाले प्राचीन लक्षणों से असीरिया, बेबिलोनिया, सुमेरिया तथा मिश्र आदि प्राचीन देश की आनुक्रमिक प्राचीन सभ्यता के समय-निर्धारण के साथ-साथ उनके प्राचीन विषयों का ज्ञान
३४२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
भी सुगमता से हो सकता है। परन्तु इसके अतिरिक्त भारत में प्राचीन काल से ही आहिताग्नि अथवा लौकिक अग्नि के द्वारा शवों को जलाने की प्रथा होने से अन्य अवशिष्ट वस्तुओं को भी वितरित कर देने से मन्दिरों के भी बार-बार होने वाले विप्लवों के कारण लुप्त हो जाने से प्राचीन समय में आनुश्रविक पद्धति (गुरु से मौखिक रूप में शिक्षा ग्रहण करना) की प्रथा के कारण संहिता, सूत्र आदि प्राचीन ग्रन्थों के लेखन की रुचि की विरलता के कारण तथा बाद में भोजपत्र और ताडपत्र आदियों पर लिखे हुए लेखों के भी समय-समय पर होने वाले पारस्परिक एवं वैदेशिक संघर्षों के कारण बहुत कुछ जल जाने तथा नष्ट हो जाने से, आजकल भारतीय इतिवृत्त के अनुसन्धान के लिये खोतान, कासगर आदि स्थानों में हुई खुदाई तथा चीन, तिब्बत आदि में मिलने वाले लेखों के अनुसन्धान से भारतीय पुरातन इतिवृत्त के बहुत कम लक्षण मिलने से, पुराण आदि कथाओं के मिलने पर भी महाभारत के गणेशोपाख्यान के समान बीच-बीच में अनुप्रविष्ट अर्वाचीन विषयों, आलङ्कारिक दृष्टि से प्रविष्ट अतिशयोक्तियों तथा भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के हस्तक्षेपों से अपने-अपने अनुसार प्राचीन के लोप तथा परिवर्तन से उसे मलिन (विकृत) कर देने से तथा प्राचीन अंशों को भी अन्य देशों के लेखों, शिलालेखों तथा भूगर्भ से उपलब्ध विज्ञान आदि के साथ समानता होने से आजकल महेञ्जोदारो की खुदाई से उपलब्ध पर्याप्त प्रमाणों के मिलने से पूर्व भारत की प्राचीन परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होना अत्यन्त कठिन था। परन्तु आजकल महेञ्जोदारो तथा हरप्पा की खुदाई में मिलने वाले भिन्न-भिन्न विषयों से प्राचीन भारतीय परिस्थिति पर बहुत सा प्रकाश पड़ता है। भारत में महेञ्जोदारो तथा हरप्पा के समान गङ्गा के किनारे और भी बहुत से प्राचीन प्रदेश मिल सकते हैं। तथा कालक्रम से अनुसन्धान के उपायों के उन्नत होने से ज्यों-ज्यों खुदाई में और पदार्थ तथा लेख आदि प्रकाश में आते जायेंगे तथा ज्यों-ज्यों कालक्रम से हरप्पा तथा महेञ्जोदारों में मिलने वाले प्राचीन अनिश्चित अक्षरों एवं लिपि के पढ़े जाने से प्राचीन विषय प्रकट होते जायेंगे, त्यों-त्यों प्राचीन भारतीय पुरावृत्त और भी स्पष्ट होता जायगा।
अन्त में हम पाठकों की सेवा में निवेदन करना चाहते हैं कि आजकल मुद्रणयन्त्रों के बहुत प्रचार हो जाने से भारत तथा अन्य देशों में भी प्रचलित, नवोपलब्ध तथा बहुत से अप्रकाशित भारतीय ग्रन्थ भी प्रकाश में आ गये हैं इस प्रकार एक-एक पुस्तक की हजारों प्रतियां होकर घर-घर में प्रचलित हो जाती हैं जिससे प्रचलित ग्रन्थों का भी विशेषरूप से प्रचार हो जाता है, अप्रकाशित ग्रन्थों का सर्वसाधारण में प्रकाश हो जाता है, अन्वेषण तथा लेखन के परिश्रम के बिना ही अल्पव्यय से ही अधिक लाभ हो जाता है तथा अपने पूर्वजों द्वारा भी बहुत से अदृष्ट एवं अश्रुत प्राचीन ग्रन्थ सहसा ही देखने को तथा अध्ययन करने को मिल जाते हैं। यह यद्यपि सन्ताप का विषय है परन्तु आजकल के मुद्रण में स्याही के दृढ़ होने पर भी दुर्बल पत्रों पर प्रकाशित ग्रन्थ दृढ़ ताडपत्रों पर लिखे हुए ग्रन्थों की तुलना में चिरस्थायी नहीं होते हैं। इसीलिये आजकल सौ वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तकों के भी वर्ण विकृत हो जाते हैं तथा वे स्वयं भी जीर्ण शीर्ण हो जाती हैं। मुद्रण कला की सुलभता के कारण लेखनकला उत्तरोत्तर ह्रास को प्राप्त हो रही है। पदच्छेद की स्पष्टता तथा शुद्धि (Accuracy) के कारण मन को आकर्षित करने वाली मुद्रित पुस्तकों के सुलभ होने से विद्यमान लिखित पुस्तकों के संरक्षण का ध्यान भी कम होता जा रहा है। मुद्रित हुई उन्हीं पुस्तकों का पुनर्मुद्रण संभव है जो प्रायः अध्ययन तथा अध्यापन के काम में आती हैं। जो विशेष काम में नहीं आती हैं। उनका पुनर्मुद्रण नहीं होता है। ऐसे बहुत से ग्रन्थ आजकल दुर्लभ हो गये हैं। ऐसे ग्रन्थों को मुद्रित हुआ जानकर कोई लिखता भी नहीं तथा एक वार मुद्रण हो जाने से उनका पुनर्मुद्रण भी नहीं होता। इसप्रकार दोनों ओर से वञ्चित हुए ये ग्रन्थ उत्तर होते हुए भी पूर्व मुद्रित पुस्तक की आयु के समाप्त हो जाने पर सौ दो सौ वर्षों में सहसा समाप्त हो जाती है। कालक्रम से अन्य भी बहुत प्राचीन आनुश्रविक विषय नष्ट हो गये हैं तथा यह शंका होने लगती है कि प्राचीन आचार्यों के गौरव का स्मरण कराने वाले अन्य भी ग्रन्थ कहीं हमारे हाथ से निकल कर नाम मात्र शेष न रह जायें। इसलिये इस भावी आशंका को पहले से ही ध्यान में रख कर प्रकाशकों का कर्तव्य है कि जिन ग्रन्थों की रक्षा करना आवश्यक हो उनकी कुछ प्रतियां सुदृढ़ एवं स्थायी पत्रों पर प्रकाशित करने की प्रवृत्ति बढ़ानी चाहिये जिससे वे शीघ्र नष्ट न हो सकें। पुस्तकालयों में भी उन्हीं दृढ़ प्रतियों को ही अत्यन्त सुरक्षा पूर्वक रखना चाहिये। तथा संहिता, ब्राह्मण, सूत्र, भाष्य आदि कुछ ऐसे ग्रन्थ जो हमारी प्राचीनता के सर्वस्व समझे जाते हैं (चाहे वे हमारी व्यावहारिक अध्ययन परम्परा में प्रविष्ट हों चाहे न हों) उनको किसी भी व्यय पर ताडपत्र अथवा अन्य सुदृढ़ पत्रों पर उत्तम स्याही से लिखकर यत्नपूर्वक पुस्तकालयों में रखना चाहिये जिससे दृढ़ पत्रों पर लिखे