भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३०९

अलेक्जेण्डर द्वारा भारतीय विज्ञान का प्रसार

जो भी राष्ट्र उन्नति करना चाहता है वह विद्या आदि से समृद्ध तत्कालीन अन्य राष्ट्रों का दूर से अध्ययन करता है तथा अपने देश के गौरव को बढ़ाने के लिये उस देश के विज्ञानों को ग्रहण करने का प्रयत्न करता है। उन्नत देशों की विद्या के परिचय, भाषा-विज्ञान तथा उनके अनुभूत सफल प्रयोगों के बाद श्रद्धा तथा विश्वास की अधिकता होने पर उनके ग्रन्थों का ग्रहण किया जाता है, उनके विद्वानों का सम्मान किया जाता है तथा उनकी प्रक्रियाओं को भी स्वीकार कर लिया जाता है। उन्नत अवस्था में पहुंची हुई भारतीय चिकित्सा विज्ञान के श्रवण, आलोकन, ज्ञानपर्यालोचन तथा आदर से पूर्व भी ग्रहण करने के लिये ग्रीक आदि प्राचीन विद्वानों का भारत में आना देखकर हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। विजिगीषु (विजय की इच्छा वाला) राष्ट्र जिन्हें जीतना चाहता है उन राष्ट्रों के बल, वीर्य तथा सभ्यता आदि की परिस्थितियों को पहले अच्छी प्रकार देखकर ही अपने पैर बढ़ाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार अलेक्लेण्डर के आने से पूर्व भी संभवतः भारतीय परिस्थितियों का सम्यक् अध्ययन करने के लिये बहुत से ग्रीक विद्वान् भारत में आये हों अथवा भारत में रहने वाले यूनानियों ने भारत के विषय में यूनानियों को पूर्ण ज्ञान करा दिया हो। विजय की इच्छा से भारत में आकर तथा


के सादृश्य सच्चे हैं। B. J. Urwick ने अपने नवीन ग्रन्थ ‘Message of plato’ में दिखलाया है कि अफलातून की पुस्तकों में विशेषकर Republic-ऐसे सादृश्य बहुत अधिक हैं। Ideas का सिद्धान्त वेदान्त का ही सरलरूप है। १० वें अध्याय के अन्त में आने वाला 'पाम्फीलियन एड् का स्वप्न' बिलकुल ही भारतीय रंग में रंगा हुआ है। Republic में वर्णित समाज के तीन वर्ग-संरक्षक, व्यवस्थापक और व्यवसायी भारतीय स्मृतिकारों के तीन वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं। चन्द्रगुप्त के दरबार में स्थित यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने भी यही कहा है—अनेक बातों में हिन्दुओं के नीतिनियम यूनानियों से मिलते जुलते हैं। उदाहरणार्थ यह विश्वास कि विश्व की सृष्टि और प्रलय काल का निश्चित है, और यह कि पृथ्वी का आकार वर्तुल है, यह नियामक और निर्माता। परमात्मा ही इसकी व्याख्या कर सकता है, विश्व के प्रारम्भिक तत्व अनेक हैं लेकिन आप् (जल) तत्त्व ही पहला तत्व है जिससे विश्व की रचना हुई है, यह कि चार तत्वों के अलावा एक और तत्व है जिससे आकाश तारे आदि बने हैं, और यह कि पृथ्वी ब्राह्माण्ड के केन्द्र में स्थित है। इसी प्रकार जन्म तथा आत्मा एवं अन्य भी अनेक विषयों में भारतीयों के विचार यूनानी विचारों से मेल खाते हैं। अफलातून की तरह ही वे भी आत्मा की अमरता और परलोक में दिये जाने वाले दण्डों के अनेक किस्से कहते हैं। प्रायः इन सादृश्यों को दैवयोग अथवा विचारों का स्वतन्त्र विकास कहकर उनकी उपेक्षा की जाती रही है। हीरोडोट्स ने स्पष्ट ही कहा है कि यूनान में पुनर्जन्म का सिद्धान्त मिश्र से आया है लेकिन उस युग में भारत और यूनान का संबन्ध था यह सिद्ध करने वाला कोई समसामयिक प्रमाण अब तक नहीं मिल सका है। लेकिन यह प्रमाणाभाव की युक्ति बहुत ही निर्बल युक्ति है और अभी हाल में यूसेबियस (Eusebius) का एक महत्वपूर्ण संदर्भ मेरी दृष्टि में आया है जो J. A. M. Crindle द्वारा (जो कि Cambridge History of India Book I Chapter XVI के लेखक हैं) नजर अन्दाज कर दिया गया है। सन्दर्भ इस प्रकार है—

'गायक एरिष्टोजेनस् भारतीयों के विषय में यह कहानी कहता है। एक भारतीय 'अथेन्स' में सुकरात से मिला और उससे पूछने लगा कि तुम्हारे दर्शन का कार्य क्या है। सुकरात ने उत्तर दिया 'मानवीय चरित्र और कार्य को समझना'। इस पर भारतीय हँस पड़ा और कहने लगा कि कोई मनुष्य तब तक मानवीय प्रकृति और कार्य (Phenomena) को कैसे समझ सकता है जब तक कि उसे दैवीय चरित्र और कार्यों का ज्ञान न हो'।

इस कथा का भाव स्पष्ट है। यूसेबियस ने इसे प्रामाणिक कहा है। गायक एरिष्टोजेनिस् अरस्तू का शिष्य था और स्वरों के विषय में प्रामाणिक लेखक था। उसका काल ३३० ई. पू. है। इसलिये हम निःसंकोच मान सकते हैं कि ई. पू. चौथी सदी में भी अथेन्स में भारतीय थे जो यूनानी बोल लेते थे और जिन्होंने वस्तुतः सुकरात से दार्शनिक चर्चा की थी। इससे भारत और यूनान के पारस्परिक संबन्ध के विषय में हमें अपने विचारों में कुछ परिवर्तन करना होगा।

(Amrit Bazar Patrika, 1936.)