भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् ३०८

आदर करनेवाला, ज्ञाता तथा प्रवर्तक प्रतीत होता है। भारत से दार्शनिक विषयों के ग्रहण तथा मिश्र की भेषज्य विद्या के दर्शन का उल्लेख होने से भारत तथा मित्र में जानेवाले पाथागोरस को भेषज्य विद्या का ज्ञान मिश्र तथा भारत दोनों देशों से हुआ प्रतीत होता है। इस प्रकार ग्रोट्स द्वारा निर्दिष्ट उसके उपदेशों में दिये हुए स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों के भारतीय आयुर्वेद में मिलने से तथा हिपोक्रिटस के भेषज्य विज्ञान में भी भारतीय वैद्यक विषयों की समानता के दिखाई देने से प्रतीत होता है कि भारत के साथ अपने संबन्ध का वर्णन करने वाले पाथागोरस ने साक्षात् अथवा परम्परा से भारतीय विज्ञान के द्वारा ग्रीस देशीय भेषज्य विज्ञान को प्रारंभ किया था।

इसके अतिरिक्त हिपोक्रिटस से कुछ समय पूर्व ग्रीस में विद्यमान तीन चिकित्सा सम्प्रदायों में से एक सम्प्रदाय के प्रवर्तक एम्पीडोक्लिस का भी इरान तथा भारत के आसपास के प्रदेशों में जाने तथा भारतीय दार्शनिक विद्या को ग्रीस में ले जाने का पी. सी. १ राय ने वर्णन किया है। भारत में पाञ्चभौतिक तथा चातुर्भौतिकवाद भी प्रारम्भ से ही मिलते हैं। एम्पीडोक्लिस द्वारा ग्रीस में चतुर्भूतवाद का अभूतपूर्व नया प्रचार तथा नवीन भेषज्य सम्प्रदाय का भी प्रारंभ किया जाना मिलता है। हिपोक्रिटस द्वारा उस चातुर्भौतिक शरीरवाद का ही प्रत्याख्यान (खण्डन) मिलता है तथा उसके द्वारा प्राचीन तीनों सम्प्रदायों में आवापोद्वाप विधि तथा परिष्कार के द्वारा संस्कार करके अपने सम्प्रदाय का उद्भव प्रकट किया गया है। इस प्रकार हिपोक्रिटस के पूर्ववर्ती एम्पीडोक्लिस द्वारा भारत में आकर साक्षात् रूप से अथवा इरान देश के द्वारा भारतीय दर्शन विद्या के समान दार्शनिक विषयों से सम्मिश्रित भेषज्य विद्या का भी ग्रहण किया गया प्रतीत होता है। इसके द्वारा भी ग्रीस में पहुँचा हुआ भारतीय चिकित्सा विज्ञान हिपोक्रिटस के हृदय में सङ्क्रान्त हो सकता है। ऊपर लिखे हुए विद्वानों के नाम केवल उपलक्षणमात्र हैं। इसी प्रकार अन्य भी ऐसे कई ग्रीक विद्वान् हो सकते हैं जिनके द्वारा भारतीय विद्या साक्षात् रूप से अथवा इरान आदि देशों के मार्ग से होती हुई पाश्चात्य देशों में पहुँची हो। प्राचीन इतिहास में उनके नाम नहीं मिलते हैं इसलिये इस विषय में स्पष्ट उल्लेख के बिना कुछ नहीं कहा जा सकता।

पूर्वकाल में ही नहीं, अपितु हिपोक्रिटस के पश्चात् भी भारतीय व्यवहार के दर्शन के लिये आये हुए इविमेरस (Evemerus) का उदाहरण मिलने से प्रतीत होता है कि पूर्वपरम्परागत भारतीय सभ्यता का अध्ययन करने के लिये इससे पूर्व भी बहुत से ग्रीक विद्वान् भारत में आये होंगे तथा उनके द्वारा बहुत सी भारतीय सभ्यता उनके देश में पहुँची होगी।

भारतीय विद्वानों का ग्रीस में जाना

केवल ग्रीस देश वालों का ही प्राचीन भारत में आगमन का वर्णन नहीं मिलता है अपितु भारतीय विद्वान् एवं वैद्यों का भी पश्चात् देशों में जाने, उनसे ज्ञान ग्रहण करने, उनका आदर तथा उनको उपदेश देने के वृत्तान्त इतिहास में मिलते हैं। ईस्वी पूर्व ३३० सामयिक प्रसिद्ध गायक अरिष्टाटल के शिष्य अरिष्टोक्सेनस (Aristoxenus) नामक विद्वान् के लेख के अनुसार ग्रीसदेश की राजधानी एथेन्स में साक्रिटीज नामक (Socrates B. C. 469-399) प्रसिद्ध दार्शनिक के साथ अध्यात्म विषय में उनके सिद्धान्तों का उपहास के रूप में खण्डन करते हुए किसी भारतीय के अध्यात्म विषयक संभाषण के मिलने से तथा (Eusebius) नामक विद्वान् द्वारा भी किये गये इस संवाद के उल्लेख को देखकर प्रतीत होता है कि ईस्वी पूर्व चतुर्थ शताब्दी से पूर्व भी भारतीयों का यूनानियों (ग्रीकों) के साथ परिचय था। इस प्रकार H. G. Rawlinson^२ द्वारा प्रकाशित लेख से भी प्रतीत होता है कि अलेक्जेण्डर के भारत में आने से पूर्व भी भारतीय विद्वानों का ग्रीस में जाना, ग्रीस भाषा का ज्ञान तथा ग्रीक विद्वानें के साथ विचार विमर्श विद्यमान था।


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. १२८ में देखें। २. यूनानी और भारतीय दार्शनिक चिन्तन में जो अद्भुत सादृश्य मिलता है उसकी ओर ग्रेब आदि अनेक मनीषी बार-बार विद्वानों का ध्यान आकृष्ट करते रहे है। एलेटिक और सांख्य सम्प्रदायों तथा औरफिजम (Orphism) और बौद्धधर्म