काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३०७
थी। पाथागोरस की विद्या के संबन्ध में अनुसन्धान करने पर मानवशरीर में मानसिक तथा शारीरिक रोगों की निवृत्ति के लिये संगीत आदि साधनों का उपयोग आकृति परीक्षा के द्वारा शरीर के आन्तरिक विकारों का ज्ञान, पशुमांसभक्षण अहितकारी होने से उसके न खाने में श्रेय, आरोग्य तथा पथ्य का महत्व, शारीरिक शक्तिवृद्धि के उपायों का अनुसन्धान, प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति के विषम होने से सबके लिये आहार व्यवस्था एक समान न होकर प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न होना, इत्यादि विषय¹ मिलते हैं। पाथागोरस के जितने भी आदेश मिलते हैं उनमें शरीर को स्वस्थ रखने के लिये अपने अनुकूल पथ्यसेवन आदि नियमों के पालन को विशेषस्थान दिया² गया है। पाथागोरस के सम्प्रदाय में रोग-निवृत्ति के लिये ओषधियों के प्रयोग की अपेक्षा पथ्य तथा आहार विहार के नियमों के पालन पर ध्यान दिया जाता था और यदि ओषधियों का प्रयोग किया भी जाता तो अन्त प्रयोग (Internal use) की अपेक्षा यथाशक्ति लेप आदि बाह्य शारीरिक उपचारों पर विशेष ध्यान³ दिया जाता था। ईस्वी पूर्व ५३० में पाथोगोरस के क्रोटन नामक स्थान में पहुंच कर उपदेश देने पर वहां के तीन सौ व्यक्तियों द्वारा उसके उपदेश के अनुसार औषधप्रयोग कोक छोड़ कर पथ्य तथा आहार विहार के पालन से स्वास्थ्य रक्षा करने को शपथ⁴ लेने का उल्लेख मिलता है। अनेक देशों में घूमते हुए मिश्र देश में पहुंचकर पाथागोरस ने वहां आगन्तुओं को चकित करनेवाले भेषज्यविद्या के विशेष प्रचार को देखकर बहुत आश्चर्य⁵ प्रकट किया, क्रोटन नामक प्रदेश में पाथागोरस के साथ विद्यमान पाथागोरस के सम्प्रदाय वाले मीलो नामक व्यक्ति के जंवाई डेमोकेडिस (Demokedes) द्वारा प्रवर्तित भैषज्यविषयक सम्प्रदाय के ईस्वी पूर्व तृतीय-चतुर्थ शताब्दी में प्रचलित⁶ होने के ग्रोट्स (Grotes) नामक विद्वान् द्वारा निर्देश होने के अनुसार भैषज्य शास्त्र संबन्धी उपदेशों को देने वाला, उसके उपदेशों को ग्रहण करने वाले व्यक्तियों द्वारा आदर किया जाने वाला, मिश्र में भैषज्य विद्या की उन्नति को देखकर प्रसन्न होने वाला तथा भैषज्य सम्प्रदाय के प्रवर्तक डेमोकेडिस को अपने शिष्यरूप में स्वीकार करनेवाला पाथागोरस भैषज्यविज्ञान का भी
१. पाथागोरस के प्रार्थना संघ, तापसोचित आत्मनिरीक्षण, असंयत वासनाओं को वश में करने के लिये संगीत प्रयोग, उसकी मुख की आकृति से विचारों और वासनाओं को ताड़ जाने की शक्ति उसका आहार संयम और शारीरिक शक्ति के प्रति उसकी अत्यधिक जागरूकता—ये सब प्रसिद्ध हैं। यह भी कहा जाता है कि वह पशुमांस भक्षण के छोड़ देने की शिक्षा देता था। इसका पुनर्जन्म के सिद्धान्त से गहरा संबन्ध है और हम मान सकते हैं कि उसने यह मन अपनाया होगा जैसा कि उसके बाद एम्पेडोक्लिस ने किया।
(History of Greece Vol. IV P. 322 by. Grotes.)
२. फिर भी दूसरी ओर यह भी सर्वथा संभव लगता है कि आहार, शिक्षण और अध्ययन के ये नियम संगठन के अन्य सदस्यों पर लागू नहीं होते थे। (History of Greece Vol. IV P. 322 Grotes.)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२७ में देखें।
४. पाथागोरस के कुछ खास शिष्यों ने-जो कि संख्या में तीन सौ के लगभग थे-एक प्रकार की प्रतिज्ञा से अपने को पाथागोरस के साथ और परस्पर एक दूसरे के साथ दृढ़ सम्बन्ध में बांध लिया। इस संगठन के चिह्न के रूप में उन्होंने विशिष्ट आहार, कर्मकाण्ड और व्रत अपना लिये थे। (History of Greece Vol. IV P. 329. Grotes)
५. पाथागोरस के समय मिश्र की वैद्यक की इतनी उन्नति हो गई थी कि एक जिज्ञासु यात्री का ध्यान आकृष्ट कर सके। उसके सिद्धान्तों का श्रेणीकरण और विभाजन हो गया था। उनके चिकित्सा व्यवसाय के नियम निर्धारित हो गये थे।
(Herodotus II 84, Aristotle politics III. 10. 4. History of Greece Vol. IV P. 325-Grotes).
६. औषध विज्ञान तथा शल्यचिकित्सा में जब पाथागोरस के शिष्य मिलो का दामाद डिमोकेड्स प्रसिद्ध हो रहा था तब पाथागोरस् क्रोटन में विद्यमान था। (History of Greece Vol. IV P. 327-Grotes)