काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३०४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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रूप से भारतीय वैद्यक में अवश्य मिलनी चाहिये थीं, परन्तु ऐसा दिखाई नहीं देता है। प्रत्युत इसके विपरीत पूर्वोक्त वर्णन के अनुसार भारतीय असाधारण विषय, भारतीय शब्दों की छाया तथा कहीं-कहीं स्पष्टरूपेण भारतीय नाम से ही किये गये उल्लेख के प्राचीन ग्रीक वैद्यक में मिलने से भारतीय भैषज्य विज्ञान का थोड़ा बहुत आलोक प्राचीन ग्रीक वैद्यक पर अवश्य पड़ा प्रतीत होता है।
नालन्दा विश्वविद्यालय में अमुक रोगों में अमुक शस्त्र चिकित्सा की जाती थी—इस प्रकार प्रतिपादन करके (Dorothea¹ Chaplin) नामक विद्वान् लिखता है कि भारतीय आयुर्वेद के शरीरशास्त्र में कोई भी विदेशो शब्द नहीं मिलता है प्रत्युत पाश्चत्य वैद्यक में शारीरिक अवयवों के निर्देश करनेवाले बहुत से शब्दों में भारतीय प्राचीन शब्दों की छाया दिखाई देती है।
यवनों द्वारा भारतीय विषयों का ग्रहण
Encyclopedia² Britanica में लिखा है कि ‘ग्रीक चिकित्सा में उस देश की मिनोयन (Minoan) नामक जाति के स्वच्छता के नियमों के, मैसेपोटेमिया, असीरिया, मिश्र, इरान तथा भारत आदि देशों से शरीर रचना विज्ञान का, भूत प्रेत आदियों द्वारा रोगों की उत्पत्ति का ओषध निर्माण विद्या का, आयुर्वेद के समान अनेक ओषधियों का तथा शल्यसम्बन्धी शस्त्रविज्ञान के मिलने से उसकी उत्पत्ति के चार स्त्रोत थे, परन्तु इनमें से कितना अंश किसका है यह नहीं कहा जा सकता’। इस प्रकार इनमें कितना अंश किसका है, इसका ज्ञान न होने पर यह स्पष्ट है कि इरानी वैद्यक की तरह भारतीय वैद्यक के भी कुछ विषयों का ग्रीक वैद्यक में प्रतिसंक्रमण हुआ है।
ग्रीस देश में किस-किस समय, किस-किस देश से तथा भैषज्य विद्या सम्बन्धी किन-किन विषयों का प्रतिसंक्रमण हुआ है, इसका यथावत् निरूपण कर सकना दुष्कर होने पर भी भारत से इस विषय के ज्ञान के लिये जो संभावनाएं मिलती हैं उन पर हम प्रकाश डालेंगे।
हिपोक्रिटस से प्राचीन हेराक्लिटस³ (Heracleitus) नामक दार्शनिक द्वारा ईस्वी पूर्व ५०४ में लिखित पुस्तक
१. हमें अपनी चिकित्सा पद्धति अरब के द्वारा हिन्दुओं से मिली है। आयुर्वेद के ग्रन्थों में ऐसे नाम बिलकुल नहीं मिलते हैं जो किसी विदेशी अभिजन को सूचित करते हों....। १७ वीं सदी तक यूरोपीय चिकित्सा पद्धति हिन्दुओं की चिकित्सा पद्धति पर आधारित थी......। भारतीय (आयुर्वेदिक) और यूरोपीय शरीर रचना विज्ञान की पारिभाषिक शब्दावलि की तुलना करने से यह बात स्पष्ट हो जायेगी।
मस्तिष्क के विभाग—शिरोब्रह्म और शिरोविलोम।
तुलना कीजिये—
| शिरोब्रह्म | Cerebrum | (सैरीब्रम) |
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| शिरोबिलोम | Cerebellum | (सैरोबेलम) |
| हृत् या हृद् | Heart | (हार्ट्) |
| महाफल | (महा-मेग्ना Magna) | मेग्नावेकी |
इस प्रकार हम देखते हैं कि आयुर्वेद न अपरिष्कृत शास्त्र है और न नीमहकीमी है। इसके विपरीत शायद वही संसार की सबसे प्राचीन और सबसे अधिक शास्त्रीय चिकित्सा पद्धति है। अब भी उसमें अनेक ऐसी जानकारियां हैं जो यूरोप के किसी भी अध्यवसायी चिकित्सक के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती हो।
(Some Aspects of Hindu Medical Treatment by Darothea Chaplin P. 7-8)
२. यूनानी चिकित्सा के तीन स्रोत हैं—(१) मिनोयन जाति, (२) मेसोपोटामिया, (३) मिश्र। इरानी तथा भारतीय स्त्रोत भी यूनानी चिकित्सा के कुछ अंश में देन हैं। परन्तु यह देन किस मात्रा में है तथा उसका स्वरूप क्या है—इस विषय में अभी निश्चय-पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता है।
(E. B. Vol. XV P. 198)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२५ में देखें।