भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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प्राप्त किया है। तथा भारतीय चिह्नों के मिलने से भारत का प्रभाव भी सूचित होता है। विद्वानों १ का विचार है कि ग्रीसदेश की चिकित्सा का प्राचीन स्रोत मिश्र के समान भारत भी है।

उत्तर की प्राचीन मूल सभ्यता के शाखा प्रशाखा भेद से सब और फैलने पर पूर्व शाखा द्वारा भारत के समान पश्चिम शाखा के द्वारा ग्रीस आदि देशों में भी भेषज्य विज्ञान प्राचीन काल से ही प्रवृत्त हुआ हो यह भी संभव नहीं है। ग्रीस के प्राचीन महाकवि होमर ओडिसी (Odyssey) नामक ग्रन्थ में देवबल से ही रोगों की उत्पत्ति तथा दैवप्रसाद—पूजा, यज्ञ, मन्त्र, उपासना आदि से रोगों की निवृत्ति का उल्लेख २ मिलता है। इसके इलियड (Iliad) ग्रन्थ में शस्त्रक्रिया की बहुत थोड़ी झलक मिलती है। तथा थ्रोमर ३ के मतानुसार वह भी वहां बेबिलोनिया के प्रभाव से ही आई प्रतीत होती है। उसके दोनों ग्रन्थों में कहीं भी रोग निवृत्ति के लिये ओषधियों का अन्तः प्रयोग (Internal use) नहीं मिलता है। प्राचीन काल की धारणा के अनुसार उसके लेख में रोगों के प्रतीकार के लिये देवों की उपासना तथा मन्त्र आदि का उल्लेख ४ मिलने से, उसीके लेख में देवप्रसाद से ही मिश्र देश द्वारा रोगों को शमन करनेवाली ओषधियों की प्राप्ति ५ के उल्लेख से तथा मिश्र देश के विषय में ही उपर्युक्त बातें लिखकर अपने देश के विषय में कुछ भी न लिखते हुए मौन अवलम्ब कर लेने से स्पष्ट है कि उस समय तक ग्रीस में वैज्ञानिक भेषज्य विद्या का उदय नहीं हुआ था तथा दूसरे देशों से उसकी प्राप्ति भी नहीं हुई थी।

ग्रीस देश की पौराणिक कथाओं (Classical History) में भेषज्य विद्या का वृत्तान्त मिलने पर भी वाइज ६ (Wise) नामक विद्वान् का कहना है कि उसमें आई हुई सम्पूर्ण भेषज्य विद्या प्राचीन स्रोत से ही निकली हुई नहीं है।

भारतीय वैद्यक तथा ग्रीकवैद्यक में मिलने वाली विषयों की बहुत सी समानताओं का पहले ही वर्णन किया जा चुका है। विभिन्न देशों के विद्वानों में केवल दो-तीन विषयों में विचारों की समानता तो आकस्मिक भी हो सकती है। परन्तु अनेक तथा असाधारण विषयों की समानता, एक का दूसरे पर प्रभाव हुए बिना तथा साक्षात् या परम्परा द्वारा परस्पर यातायात आदि के सम्पर्क के बिना संभव नहीं है। अपने को आर्य कहने वालों के प्राचीन मूल स्रोत के छायारूप शाखा उपशाखाओं में मान्त्रिक भेषज्य प्रक्रिया के प्रायः मिलने पर भी, शाखा तथा उपशाखाओं में विभक्त हुई वैज्ञानिक भेषज्य विद्या के भारत के समान ग्रीस में भी मिलने के प्रमाण होने से दोनों देशों के चिकित्सा विज्ञान में समानता को देखकर प्रतीत होता है कि साक्षात् अथवा दूसरे देशों के द्वारा विज्ञान का संक्रमण भारत से ग्रीस में अथवा ग्रीस से भारत में हुआ है। यदि भारतीय वैद्यक पर ग्रीस का प्रभाव होता तो ग्रीक-वैद्यक में आये हुए विषय, शब्द तथा प्रक्रियाएं न्यूनाधिक


१. (a) यूनानी चिकित्सकों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले अनेक द्रव्य मिश्र से आते थे। यूनानी चिकित्सा के नीतिनियमों का आधार मिश्री चिकित्सा के नीति नियमों में निहित है।
(b) ईरानी और भारतीय चिकित्सा शास्त्रों से यूनानी को अनेक बातें प्राप्त हुईं।
२. इसी ओडिसी में कहा गया है कि रोग लोगों को देवताओं द्वारा बरपा किये जाते हैं (V 396 IV 411) इसलिये उनका इलाज भी वे ही कर सकते हैं (V. 397) इसलिये होमर के समय जादू टोने की चिकित्सा यूनानियों में प्रचलित थी—ऐसा असंदिग्धरूप में माना जा सकता है। (E. R. E. Vol. VI P. 540)
३. ३-४ की टि. सं. सं. उपो. पृ. १२३ में देखें।
५. होमर ने मिश्र को श्रद्धांजलि अर्पित की है क्योंकि उसका ही 'पितृदेवता' समस्त फेरियन जाति को चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा देता है।
६. अतः वाइज महोदय निम्न टिप्पणी करते हैं—'चिकित्सा के प्राचीन इतिहास विषयक तथ्यों को केवल यूनान और रोम के प्रसिद्ध लेखकों में ही ढूंढ़ा गया है। और वे तथ्य इस ढंग से व्यवस्थित किये गये हैं कि वे उस परम्परागत सिद्धान्त के अनुकूल हों जिसके अनुसार यूनानी स्रोत से प्रादुर्भूत न होने वाली सभी पद्धतियों को अस्वीकार कर दिया जाता है। (The Surgical Instruments of the Hindus Vol. I. P. 330 by G.N. Mukhopadhyay.)